छलांग फ़िल्म वह पकवान (Dish) है जिस के पास सभी सामग्री (Ingredients) और मसाले मौजूद थे, साथ ही एक बेहतरीन ख़ानसामां भी लेकिन इस के बावजूद यह एक लज़ीज़ बिरयानी की बजाय सिर्फ़ फीका पुलाव बन कर रह जाती है।

ना-ना, आप पहले ही वाक्य को पढ़ कर मायूस न हों! दरअसल हंसल मेहता और राजकुमार राव जब साथ आते हैं तो आप की उम्मीदें कुछ बढ़ जाती हैं ख़ास तौर से तब जब दोनों ने Shahid (2013), CityLights (2014) और Aligarh (2015) जैसी शानदार फ़िल्में दी हों। हालांकि दोनों के दो और प्रोजेक्ट Bose: Dead/Alive (2017) और Omerta (2018) उतने कामयाब नहीं रहे लेकिन हंसल मेहता की SonyLIV पर पिछले महीने रिलीज़ हुई वेब सीरीज़, Scam 1992 ने समीक्षकों तथा दर्शकों से ख़ूब वाह-वाही बटोरी है और अभी तक देखी जा रही है।

छलांग फ़िल्म हरियाणा के एक छोटे से शहर की, एक पीटी मास्टर महेन्द्र सिंह हुड्डा उर्फ़ ‘मोंटू’ (राजकुमार राव) की कहानी है जिसे न तो अपने काम से प्यार है और न ही ज़िन्दगी में उस का कोई मक़सद है। हर काम को अधूरा छोड़ना उस की आदत है। फिर एक दिन स्कूल में एंट्री होती है अपनी हेरोइन नीलिमा उर्फ़ ‘नीलू’ (नुसरत भरुचा) की जो दिल्ली से पढ़ कर स्कूल में बच्चों को कम्प्यूटर पढ़ाने आयीं हैं। तमाम हिन्दी मसाला फिल्मों की तरह हमारे हीरो को भी हेरोइन की ज़ुल्फ़ों में गिरफ़्तार होना ही है। फ़िल्म में मज़ा तब और बढ़ जाता है जब एक और सीनियर पीटी मास्टर इंदर मोहन सिंह (मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब) की एंट्री होती है जो अपने काम को ले कर सीरियस है और मोंटू को क़त्तई सीरियस नहीं लेता। अब हमारे हीरो साहब को होता है कॉम्प्लेक्स। इस के बाद बनने लगता है प्रेम त्रिकोण और हमारे हीरो के अन्दर का मर्द जाग जाता है। फ़िल्म में इस के बाद क्या होगा यह बताने की ज़रूरत नहीं क्यों कि इस के अंजाम से आप पहले से ही बाख़बर हैं फिर भी आप देखना चाहते हैं कि फ़िल्म किन-किन रास्तों से होते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंचती है!

छलांग में हंसल मेहता और राजकुमार राव बहुत निराश तो नहीं करते परंतु मंत्रमुग्ध भी नहीं कर पाते। फ़िल्म देखते वक़्त ऐसा महसूस होता है कि हंसल मेहता पर राजकुमार का स्टारडम हावी हो रहा है या यूँ कहें कि “उन दोनों की यारी, फ़िल्म पर पड़ी भारी”। हंसल से राजकुमार का मोह नहीं छूटता (हमारा भी नहीं छूटता लेकिन फ़िल्म से समझौते की बुनियाद पर नहीं)। फ़िल्म पूरी तरीक़े से राजकुमार राव पर केंद्रित है ख़ास तौर पर इस का पहला भाग, इस में और किसी किरदार को पनपने ही नहीं दिया गया है।

इन तमाम बातों के बावजूद छलांग फ़िल्म की सब से बड़ी कमज़ोरी इस का डायरेक्शन या लीड एक्टर नहीं बल्कि स्टोरी और कुछ हद तक एडीटिंग है। इस फ़िल्म को तीन लोगों (लव रंजन, असीम अरोड़ा और ज़ीशान क़ादरी) ने मिल कर लिखा है। ऐसा नहीं है कि इस फ़िल्म विषय बहुत अनोखा है या यह किसी अलग शैली (Genre) की फ़िल्म है। यह एक हल्की-फुल्की, प्रेम-त्रिकोण (Love Triangle) वाली ख़ालिस बॉलीवुडिया मसाला फ़िल्म है। इस की ending से भी आप वाक़िफ़ होते हैं फिर भी आप देखना चाहते हैं कि इस की कहानी कैसे अपनी मंज़िल पर पहुंचती है! क्यों कि इस फ़िल्म की छोटी-छोटी (Detailing) और छोटे-मोटे बल्कि छोटे से छोटा किरदार भी इस की ताक़त हैं। तीनों लेखक ही इस ताक़त का इस्तेमाल नहीं कर पाते और इसी वजह से फ़िल्म साधारण से असाधारण होने की तरफ़ ‘छलांग’ नहीं लगा पाती।

हमारे लेखकों ने राजकुमार का किरदार लिखने में अपने क़लम की स्याही कुछ ज़्यादा ही ख़र्च कर दी जिस से दूसरे किरदारों को उभरने का मौक़ा नहीं मिला। ज़ीशान अय्यूब को main antagonist होने के नाते थोड़ा और बड़ा रोल मिलना बनता था जो एक्टिंग के मामले में राजकुमार की ही तरह दमदार अभिनेता हैं। इसी तरह इला अरुण, सौरभ शुक्ला और सतीश कौशिक जैसे मंझे हुए कलाकारों को भी कम ही स्पेस मिला है। नुसरत के माता-पिता के रूप में सुपर्णा मारवाह और राजीव गुप्ता तथा राजकुमार के भाई के रोल में चिल्लर पार्टी वाले अमन जैन भी सिर्फ़ भीड़ का हिस्सा भर हैं। सब से ज़्यादा दुख होता है सेक्रेड गेम्स वाले बंटी भइया (जतिन सरना) के रोल पर। फ़िल्म में जब इन की एंट्री होती है तो आप ख़ुश होते हैं कि ”अरे यह भी इस फ़िल्म में हैं!” लेकिन जब आप अंत में फ़िल्म क्रेडिट्स पढ़ते हैं तो याद आता है कि “अरे यह भी तो इस फ़िल्म में थे!”

अभिनय इस फ़िल्म का सब से दमदार पहलू है। यहां किसी भी कलाकार ने निराश नहीं किया है। राजकुमार तो हैं ही, ज़ीशान अय्यूब भी जिस सीन में आते हैं कमाल करते हैं। इला अरुण, सतीश कौशिक, सौरभ शुक्ला और यहां तक कि जतिन सरना भी कम रोल के बावजूद जंचते हैं। नुसरत हरियाणवी एक्सेंट में कोफ़्त पैदा करती हैं लेकिन अपने एक्सप्रेशन और हाव-भाव से उस की पूरी भरपाई कर देती हैं।

म्यूज़िक भी फ़िल्म का कमज़ोर पक्ष है। इस के गाने अपनी छाप नहीं छोड़ पाते सिवाय टाइटल ट्रैक ‘छलांग’ के जो सिर्फ़ दलेर पाजी की वजह से थोड़ी देर तक आप के साथ रहते हैं। फ़िल्म के कई दृश्य में आप को दंगल फ़िल्म के बैकग्राउंड म्यूज़िक की याद शिद्दत से आती है जिसे आप अपने मन में लूप पर चला कर छोड़ देते हैं।

इन तमाम बातों के बावजूद यह फ़िल्म एक बार देखने लायक़ ज़रूर है। ऐसा नहीं है कि इस के लिए हॉउसफुल सिरीज़ की तरह आप को अपना दिमाग़ घर पर रख कर जाने की ज़रूरत है। हाँ, अगर आप को बहुत हैवी डिश पसन्द नहीं तो फिर आप को यह पुलाव पसन्द भी आ सकता है!

मोहम्मद अलतमश, हुनरमंदों के शहर मऊ, उत्तर प्रदेश से तअल्लुक़ रखते हैं। 'एन्टी नेशनल यूनिवर्सिटी' जेएनयू से पढ़ाई की है। पहले तबलीग़, फिर कम्युनिस्टों का झण्डा उठाया और आख़िरकार पसमांदा आंदोलन की अलख जगा रहे हैं.... मतलब कि दैर-ओ-हरम से हो कर मैख़ाने आये हैं!