Sir Syed Ahmad Khan

रद्द-ए-सर सैयद – सर सैयद का निरस्तीकरण

जब पसमांदा आंदोलन ने सर सैयद अहमद खाँ के राष्ट्रविरोधी, इस्लाम-विरोधी, महिला शिक्षा विरोधी, पसमांदा विरोधी और जातिवादी विचारों को उजागर कर उसका विरोध करना शुरू किया तो अशराफ और कुछ लिखे पढ़े पसमांदा की तरफ से कहा जाने लगा कि किसी को बुरा कहने और गढ़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा, सर सैयद ने जो कहा, लिखा और किया वो उनके साथ चला गया. उस ज़माने में संसाधनों की कमी के कारण सर सैयद ने पसमांदा और महिलाओं की शिक्षा पर अशराफ जातियों को वरीयता देना उचित समझा, कि अगर एक बार अशराफ शिक्षित हो गया तो वह शिक्षा को उनतक पहुँचा सकता है जो इसका बोझ नही उठा सकते, सर सैयद के समय शिक्षा को शासन, प्रशासन और सरकारी नौकरी में जाने का साधन समझा जाता था, और उस समय की औरतों में विरले ही इस तरह की नौकरियों के लिए अभिरुचि थी। इसलिए ऐसा माना जाता है कि ऐसी स्तिथि में  पुरुष शिक्षा को वरीयता दिये जाने को सर सैयद द्वारा उचित समझना हितकर था, आज उनके द्वारा स्थापित किया गया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से ना जाने कितने लोग शिक्षा हासिल कर अपनी जिंदगियों को सवार रहें हैं, और यह सर सैयद का ही एहसान है कि आप जैसे लोग पढ़ लिख कर इस लायक हो गए गए है कि सर सैयद की आलोचना कर सकें। बज़ाहिर (बाह्यरूप से) देखने सुनने में तो ये आपत्ति बहुत सही मालूम होती है लेकिन इसकी तह में जाने पर कुछ और ही बात सामने आती है। जिस से प्रतीत होता है कि यह आपत्ति दरअसल सर सैयद के नज़रिए और विचार को और मज़बूती प्रदान करने उनको इतिहास पुरुष, समाजसुधारक मुसलमानों का उद्धारक  एवं हीरो बनाये रखने और पसमांदा के लिखे पढ़े तबके के साथ साथ पूरे पसमांदा को दिग्भ्रमित (गुमराह) करने के लिए अशराफ द्वारा  एक चाल के तौर पर लगाया जा रहा है ताकि सर सैयद के आभामंडल और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मुस्लिम नाम पर अशराफ ने जो अब तक लाभ प्राप्त किया है उसमें कोई व्यवधान उत्पन्न ना हो और भविष्य में भी अधिक से अधिक लाभ अपने अशराफ जाति को पहुंचाने में कोई विघ्न ना हो। जबकि लिखे-पढ़े पसमांदा द्वारा उठाये जाने वाले इसी आपत्ति के पीछे उसका भोलापन, शराफत, साफ नियत और ईमानदारी झलकती है और वो सब कुछ भुला कर झगड़ा लड़ाई से दूर रहते हुए यथा स्तिथि में आगे बढ़ने की बात करता है।

सर सैयद ने जो भी काम किया वो विदेशी मुस्लिम राजा, मुस्लिम नव्वाब, मुस्लिम जमींदार या एक शब्द में कहें तो अशराफ की पहले से मज़बूत स्तिथि को और अधिक मज़बूती प्रदान करने के लिए किया. सर सैयद ये समझते थे कि मुस्लिमों {सर सैयद की नज़र में मुस्लिम सिर्फ अशराफ (सैयद, शेख, मुगल, पठान) ही थे और वो उनको हमेशा मुस्लिम और मेरे भाई पठान, भाई सैयद आदि कह के सम्बोधित करते थे जबकि पसमांदा को शिल्पकार, जुलाहा, कसाई और बदजात (बुरी जाति वाला) ही कह कर सम्बोधित करते थे. पसमांदा जातियों के नाम के साथ कभी भी भाई शब्द नही जोड़ा} को अंग्रेज़ो से लड़ने के बजाय उनसे गठबंधन कर अपनी सत्ता और वर्चस्व को बनाये रखना चाहिए और इसके लिए वो अंग्रेज़ों द्वारा लाई गई आधुनिक शिक्षा और तकनीक को सीख समझ कर उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलने को श्रेयकर समझते थे।

इस सर्व विदित तथ्य है कि बुरे कर्म और बुरे विचार को बुरा ही कहा जाता है, और इसके वाहक को भी बुरा ही जाना पहचाना और समझा जाता है। इसके पीछे मंशा यही है कि समाज में यह बात स्पष्ट रहे कि क्या बुरा है और क्या अच्छा। जहाँ एक ओर अच्छे काम पर प्रशंसा, ईनाम और उपहार है वहीं दूसरी ओर बुरे काम पर डांट डपट, अपयश और तिरस्कार है। स्वयं ईश्वर ने क़ुरआन में फरिश्ते अजाजील के बुरे काम को रद्द (निरस्त) करते  हुए फटकार लगाई और उसे मरदूद (जिसकी बात को रद्द कर दिया जाय), मलऊन (दुत्कारा, फटकारा हुआ) इब्लीस (दुष्ट, ईश्वर की दया ने निराश) और शैतान (अवज्ञाकारी, उद्दंड) कहा है और उस फरिश्ते का यही तिरस्कारी नाम इतने कुख्यात हुए कि आज कोई उसका असली नाम नही जानता। ठीक उसी प्रकार सर सैयद के कुविचारों और कुकृत्यों को रद्द करना उचित और आवश्यक है, जहाँ तक तिरस्कृत नाम की बात है आज सर सैयद का असली नाम “अहमद” गुम हो चुका है. अहमद कहने पर कोई उसे सर सैयद नहीं समझेगा। जब कि सर सैयद का सर अंग्रेजों की दी हुई उपाधि है और सैयद उनकी जाति का नाम है और खान भी अंग्रेज़ों की दी हुई उपाधि खान बहादुर का संक्षिप्त रूप है। शायद ईश्वर अपने अंतिम ईशदूत के नाम को अपयश से बचना चाहता हो, ज्ञात रहें कि ईशदूत मुहम्मद का एक प्रसिद्ध नाम अहमद भी है।

रही बात गड़े मुर्दे उखाड़ने की तो ये देखना पड़ेगा कि क्या वाकई सर सैयद गढ़े मुर्दे हैं? और उन्होंने जो कहा, लिखा और किया वो उनके साथ ही दफन हो चुका है? ऐसा हरगिज़ नही है, हर साल सर सैयद का जन्मदिन मनाना (अशराफ का एक बड़ा धड़ा इस्लाम के प्रवर्तक ईशदूत मुहम्मद के जन्मदिन को मनाना हराम और अनुचित कहता है लेकिन वही लोग सर सैयद का जन्मदिन बड़े ही जोश व उत्साह के साथ मनातें हैं) उनके कहे, लिखे और किये गये कार्यों की चर्चा करना ये साबित करता है कि सर सैयद का शरीर भले ही काल के गर्भ में समा चुका है लेकिन उनकी विचार धारा को अभी भी परवान चढ़ाने की पूरी कोशिश की जा रही है। वैसे ही जैसे मनु के मरने के बाद भी मनु की विचारधारा को ज़िंदा रखा गया है। अभी हाल ही उनकी लिखी किताब “असबाबे बगावते हिन्द” जो उनके देश-विरोधी, इस्लाम-विरोधी और पसमांदा-विरोधी विचारों का प्रतिनिधि है, का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया है। 

सर सैयद को आज भी अशराफ यह समझता और कहता है कि “सर सैयद हमारे माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल का हिस्सा हैं (सर सैयद हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य का हिस्सा हैं) सर सैयद माज़ी का हवाला भी है और सुबहे-उम्मीद भी (सर सैयद भूत का सन्दर्भ भी हैं और उम्मीद की सुबह भी) सर सैयद के इंतेक़ाल को एक सदी से ज्यादा का अरसा हो चुका है मगर अभी तक उनका ख्वाब अधूरा है (सर सैयद को गुज़रे एक शताब्दी से अधिक हो चुका है मगर अभी तक उनका स्वप्न अधूरा है) इस प्रकार बात साफ हो जाती है कि ना तो सर सैयद गढ़े मुर्दे हैं और ना ही उनका विचार अब बीते समय की बात को चुका है। सर सैयद सदैव पसमांदा के शिक्षा और तरक़्क़ी के विरुद्ध थे, पसमांदा उनके खिलाफ कभी नहीं था, बल्कि पसमांदा उनके प्रकोप से अपनी रक्षा कर रहा है। अब न्यायप्रिय लोगों की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि इस प्रकार के कुविचारों से देश और समाज की रक्षा किया जाए। और पसमांदा आंदोलन यही कर रहा है। 

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संसाधनों की कमी की बात सिर्फ एक सुन्दर बहाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं. दुनिया जानती है कर्मसिद्ध व्यक्तियों ने सदैव संसाधनों के अभाव और कमी में ही मानवता को राह दिखाई है. अभावों का रोना रोने वाले या तो कर्मसिद्ध नहीं होते या फिर स्वार्थी होते हैं। संसाधनों की कमी बता कर सिर्फ अशराफ को शिक्षित करना और ये कहना कि अशराफ फिर पसमांदा को शिक्षित करेगा ये एक कोरी कल्पना मात्र ही साबित हुआ। अशराफ द्वारा मुस्लिम नाम पर संचालित किसी भी संस्थान और संगठन में पसमांदा की शिक्षा को लेकर किसी प्रकार की कोई नीति अब तक सामने नहीं आई है बल्कि पसमांदा को शिक्षा से दूर रखने की नई नई युक्तियाँ देखने को मिलती रहती हैं, उदाहरण स्वरूप, आधुनिक शिक्षा से रोकने के लिए धार्मिक शिक्षा पर बल देना और उसे मरने के बाद की सफलता से जोड़ना, आधुनिक शिक्षा को शिक्षा ना मानकर उसे फन (कौशल) का नाम देना आदि।

महिलाओं में सरकारी नौकरी के प्रति अभिरुचि का ना होना एक ऐसा बहाना है जिस पर हँसी आती है। ऐसा कौन होगा जो किसी के सशक्तिकरण के साधन को सिर्फ इस बिना पर नकारना पसंद करे कि उसकी रुचि नहीं है. बचपन में बहुत से लोग ऐसे थे जिनकी पढ़ाई लिखाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन फिर भी वो महान हुए और दुनिया को बहुत कुछ दिया. अगर सर सैयद का सिद्धान्त वह लोग भी मानते तो आज दुनिया आविष्कारों और नयविचारों से वंचित ही रह गयी होती। 

जिस समय सरसैयद पसमांदा और महिलाओं की शिक्षा का ऊल जलूल बहाने बनाकर विरोध कर रहें थें लगभग ठीक उसी समय ज्योति राव फुले उनकी पत्नी सावित्री फुले और एक पसमांदा महिला फातिमा शेख शिक्षा का अलख जगाने में जी जान से लगे हुए थें। आसिम बिहारी भारत भूमि के इतिहास के वो पहले महापुरुष हैं जिन्होंने प्रौढ़ शिक्षा एवं पसमांदा महिलाओं को शिक्षित करने की योजना बनाई। ज्ञात रहे कि आसिम बिहारी के नेतृत्व में चल रहे प्रथम पसमांदा आंदोलन जमीयतुल मोमिनीन (मोमिन कॉन्फ्रेंस) की महिला शाखा ने 1936 के आस पास केवल बिहार राज्य में लगभग सौ की संख्या में बालिकाओं के शिक्षा के लिए स्कूल खोले थे। इसी आंदोलन के रज्जाक दम्पत्ति ने इरबा रांची के आसपास के इलाके में पसमांदा एवं आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा के लिए लगभग 17 स्कूल खोले थे। रज्जाक जी ने इस काम के लिए अपनी अनपढ़ पत्नी नफरू निसा को शिक्षित किया ताकि वो लड़कियों को पढ़ा सकें।

जहाँ तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में सब के पढ़ने की बात है, तो उसे भी समझ लेना चाहिए। एक तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय केंद्रीय विश्व विद्यालय है और उसका सारा खर्च देश के नागरिकों के द्वारा दिये गए कर से वहन किया जाता है, यह किसी जाति विशेष या सम्प्रदाय विशेष की सम्पत्ति नहीं है। वहाँ भारत के प्रत्येक नागरिक को शिक्षा प्राप्त करने का बराबर अधिकार है। लेकिन हैरत ही बात है कि अन्य सरकारी विश्विद्यालयों की तरह अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में पिछड़े दलित और आदिवासी के आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। हालांकि कई अन्य प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था है जैसे 50% आंतरिक आरक्षण जो वहाँ के छात्रों को अगली कक्षा में प्रवेश के लिए मिलता है। आरक्षण तो नहीं है लेकिन प्रवेश फॉर्म में जाति का कॉलम है। जब जाति आधारित आरक्षण देना ही नहीं है तो फिर जाति पूछने का मतलब क्या है? ये पूरा मामला सीधा सीधा अशराफ के अल्पसंख्यक और मुस्लिम नाम पर अपना तुष्टिकरण करवा लेने की राजनीति का है। संस्था के अल्पसंख्यक दर्जे की आढ़ में आरक्षण ना देकर दलित, पिछड़े, आदिवासी और पसमांदा को विश्वविद्यालय से दूर रखने का षणयंत्र है। एक बात अशराफ द्वारा यह भी समझायी जाती है कि अगर आरक्षण होता तो हिन्दू भी बड़ी संख्या में आ जाते और मुस्लिमों का बहुत बड़ा नुकसान हो जाता। यह भी पसमांदा को बेवकूफ बनाकर अपने पीछे लामबंद करने का साधन भर है, अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में ज़्यादातर मुस्लिम ही पहुंचतें हैं और अगर आरक्षण होता तो मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या लाभान्वित होती, ज्ञात रहें कि पसमांदा कुल मुस्लिम आबादी का 90% है, और अन्य पिछड़े वर्ग एवं अनुसूचित जन-जाति के आरक्षण से आच्छादित है।

अशराफ एक तीर से दो निशाने लगाता है. एक तो वो पसमांदा को हिन्दू का डर दिखाकर उसको उसके अधिकार से वंचित कर देता है और दूसरे हिन्दू नाम पर आदिवासी, दलित और पिछड़े को खारिज कर देता है। इस प्रकार बात साफ हो जाती है कि मुस्लिम नाम पर सिर्फ एक विशेष वर्ग को अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय से लाभ पहुँच रहा है। ये भी कहा जाता है कि अब वहाँ पसमांदा भी पढ़ लिख रहा है, लेकिन ये समझने वाली बात है कि आरक्षण के अभाव में कितने पसमांदा अपने से सबल अशराफ से प्रतिस्पर्धा करके प्रवेश ले पाता होगा? बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में एक पसमांदा का प्रवेश लेना आसान है बनिस्बत अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय के, वजह यह है कि बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जन-जाति के आरक्षण का लाभ पसमांदा उठा सकता है। और आज अगर पसमांदा अपनी मेहनत और लगन से अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में पढ़ ले रहा है तो ये सर सैयद का एहसान नहीं है बल्कि भारतीय संविधान और भारत सरकार के शिक्षा नीति का एहसान है। पसमांदा आंदोलन की यह माँग रही है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में आरक्षण लागू किया जाए और वहाँ की हर तरह की संस्थाओं (कोर्ट आदि) में पसमांदा को उनकी आबादी के आधार पर सीटें आरक्षित की जाएँ।

रही बात सर सैयद के, उस वक़्त में, योगदान और एहसान की जिसकी वजह से पसमांदा पढ़ लिख कर इस योग्य हो गया है कि वो सर सैयद की आलोचना कर सकें। तो यह बात सर्व विदित है कि सर सैयद पसमांदा के शिक्षा के धुर विरोधी थे। अगर किसी का एहसान है तो वह ब्रिटिश सरकार और भारत सरकार का जिसने सभी की शिक्षा के लिए जगह जगह स्कूल कॉलेज और विश्विद्यालय खोले, जहाँ पसमांदा भी पढ़ लिख सका। साथ ही साथ ज्योतिराव फुले का, और मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी का जिन्होंने पसमांदा के शिक्षा के लिए महती योगदान दिया है।

जहाँ तक पसमांदा के लिखे पढ़े तबके का यथास्तिथि में ही आगे बढ़ने का बहाना है वो सीधा सीधा उनकी पस्ती और दमित होने का ही सुबूत है कि वो अब भी अपने ऊपर हुए अत्याचार और ज़ुल्म का विरोध करने से घबराते और डरते हैं, पूरे समाज के बारे में ना सोच कर केवल खुद की उन्नति को ही वरीयता देना पसंद करतें हैं। जबकि अन्य कमज़ोर पसमांदा इस स्तिथि में ही नहीं होता कि विरोध कर सके।

जब जब सर सैयद के विचारों को ज़िंदा करने की कोशिश की जाएगी, न्यायप्रिय लोगों द्वारा उनके विचारों और कृत्यों को रद्द किया जाता रहेगा ताकि लोग इस तरह के विचार और कामों से खुद को बचाएं और जो लोग सर सैयद के विचारों और कार्यो से पीड़ित है वह लोग उत्पीड़न से अपनी रक्षा कर सकें।

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फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी लेखक हैं एवं AYUSH मंत्रालय में रिसर्च एसोसिएट के पद पर कार्यरत हैं.

A doctor by profession. Voluntary social services, translation and writing are my other inclinations.

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