रफ़ी युसुफ़पूरी

रफ़ी युसुफ़पूरी:हमको चलना था चलते रहें

सुने अरबाबे दिल अहले हुनर भी
पिन्हा है संग पारो में गुहर भी

जैसे हीरा हमेशा कोयले के खान से निकलता है ठीक वैसे ही ज़्यादातर महान विभूतियां गुरबत,पसमांदगी,अभाव,बेबसी और बेकसी के आलम से निकल कर दुनिया को रौशन करती रही हैं उदाहरण स्वरूप हज़रत मुहम्मद(स०) से लेकर बाबा कबीर(र०)तक एक सिलसिला आता है। अदब भी इस उसूल से बाहर नहीं, ज़माने में बेहतरीन साहित्य के सृजनकर्ता इसी पृष्ठभूमि के रहे हैं पूरा भक्ति काल के साहित्यकार इस जुमरे में आते हैं, इसी सिलसिले में एक नाम समाज के सबसे वंचित तबके से आने वाले रफिउल्लाह साहब रफ़ी युसुफपूरी का आता है। बकलम अज़खुद उन्होंने अपनी लाचारी व बेकसी को यूं पैराहन दिया है….

“चूल्हा था सर्द तीन दिनों से कि एक फकीर
फैला के हाथ घर का मेरे राज़ ले गया”

रफ़ी साहब युसुफपुर (गाजीपुर, यूपी) कस्बे के उस्ताद शायर माने जाते रहें हैं, कस्बे के अदब परवरी में उनका मुकाम वली-ए-आला( सबसे बड़े अभिभावक) का रहा है लेकिन कुर्बान जाइए ऐसी शख्सियत पर उनकी इंकिसारी पर कि अपने को उस्ताद कहे जाने का मज़ाक बनाते हुए एक ऐसी महफ़िल में जिसमें अमेरिका से आए मेहमान लोग भी शामिल थे कहा कि मैं कोई उस्ताद ओस्ताद नहीं हूं लोग उस्ताद कहने लगे इसलिए मेरा नाम ही उस्ताद हो गया है। गौर तलब है कि उनको सभी लोग उस्ताद ही कह कर संबोधित किया करते थे। ख़ाकसारी इंकिसरी उनके व्यक्तित्व की पहचान थी बड़े छोटे सभी से निहायत ही अदब से मिलते थे खैरियत ज़रूर पूछा करते थे। रास्ता चलने में अपने रसूल की पैरवी करते हुए झुक कर चलते थे।


अगर चै रफ़ी साहब को गालिब व इक़बाल की तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनैतिक संरक्षण एवं सम्पन्नता हासिल नहीं थी लेकिन अपने अभाव ग्रस्त जीवन में भी उन्होंने उत्कृष्ट साहित्य की रचना किया जिसकी मिसाल शायद ही मिले। कठिन परिस्थितियों एवं आर्थिक अभाव में पारिवारिक जिम्मेदारियों का वहन करते हुए उच्च कोटि के अदब की तखलीक करना अपने आप में किसी मोअज्जजे से कम नहीं माना जा सकता है। मैं कोई साहित्यिक नक्काद नहीं कि उनकी कविताओं के रचना विन्यास, उरूज़ व बलागत, तकती, रदीफ और काफ़िए की पैमाईश और माने मतलब के हिसाब से गुण दोषों पर आलोचना प्रस्तुत करू, लेकिन एक सुनने वाले और प्रभावित होने वाले के हैसियत से कह सकता हूं कि रफ़ी साहब का साहित्य, उसका मर्म ना सिर्फ दिल की गहराइयो तक उतर जाता है बल्कि ज़ेहन व दिमाग़ तक को झकझोर कर रख देता है।

कहते हैं

बन गए बाग़ बाँ वो रफी
फूल को जो मसलते रहें

और

गुल सितां को लूटने वाला तो कोई और है
खार क्यों हरशख्स के दामन से है उलझा हुआ

और

खाने को भीख, रहने को फुटपाथ मकां है
सड़कों के सेवा खेल का मैदान कहां है
और ऐ राह के मुसाफिर बूटों से ना रौंद
मेरी नज़र में मेरा बच्चा भी शाहे जहां है

वो इन दुख, परेशानियों, पशेमानियो और अभाव के उन्मूलन से कभी नाउम्मीद होते नज़र नहीं आते वो बाबा कबीर(र०) की तरह “अमर देस्वा” का ख्वाब ही नहीं देखते बल्कि उसे चरितार्थ करने की हौसलाकुन बात भी करते हैं

मैं पस्ती से बुलंदी का फसाना ले के उभरूंगा
सुकूने दिल हो जिसमें वो ज़माना लेके उभरुंगा
समंदर की तहों में इस यकीन के साथ डूबा हूं
जो उभरूंगा तो मोती का खजाना लेके उभारुंगा

अमर देस्वा(सुकुने दिल का ज़माना) और पस्ती से बुलंदी की दास्तां की खातिर वो कभी रुके नहीं चलते रहें चलते रहें.….

खून तलवे उगलते रहें
हमको चलना था चलते रहें

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि एक ज़माने में कव्वाली का बड़ा ज़ोर हुआ करता था हर कव्वाल का अपना एक पसंदीदा शायर हुआ करता था। रफ़ी साहब हमारे दयार के प्रसिद्ध कव्वाल शफी परवाज़ युसुफपूरी के दिल पसंद शायर थे। एक ऐसे ही कव्वाली के मुकाबले की चर्चा करते हुए उस्ताद रफ़ी युसुफपुरी साहब ने मुझे बताया कि फौरन शेर ग़ज़ल लिखना और उसे गाने की नौबत आ गई, शफी साहब ने रफ़ी साहब की तरफ देखा दोनों ने आंखो ही आंखो में एक दूसरे को समझ लिया फिर क्या था रफ़ी साहब एक एक शेर लिख कर आगे बढ़ाते जाते और शफी साहब उसको गाते जाते इस तरह मार्का सर हुआ, यह कमाल की बात है कि फौरी तौर पर ग़ज़ल के शेर कहना और तुरन्त ही उसे सुर लय और ताल के साथ गा देना अपने आप में एक शाहकार से कम नहीं यह अद्भुत वाक्या बखुद जबानी रफ़ी साहब से सुनना भी कुछ कम दिलचस्प नहीं,एक समय था जब पूर्वी यूपी के जिलों में रफ़ी-शफी की जोड़ी ने धूम मचा रखी थी।

बकलम सरफराज आसी साहब कि

“नाज है हमको कि इस कस्बे में पैदाईश हुई
तुम हमारे शहर ए युसुफ़पुर की पहचान हो”

वाकई मुझे बहुत गर्व है कि मैंने रफ़ी साहब का ज़माना पाया उनकी सरपरस्ती पाई सतूर लिखते समय मेरी आंखे नम हैं। उनके बारे में क्या लिखूं क्या छोङू समझ नहीं पा रहा हूं। ये हम सब की बद नसीबी है कि उनसे उस तरह से मुसतफीज़ नहीं हो सके जैसा कि हक था, उनकी हिफाजत नहीं कर सके जैसा कि उनको हक पहुंचता था, साहबे हैसियत लोगो से भरे पड़े इलाके में रफ़ी साहब अच्छे इलाज से महरूम रहें, मैं खुद को भी इसका कसूरवार समझता हूं।

ख्याल तक ना किया अहले अंजुमन ने कभी
तमाम रात जली शमा अंजुमन के लिए

अब उनकी यादे ही शेष है उनकी रहनुमाई उनकी तरबियत हमें आगे राह दिखाती रहेगी। रफ़ी साहब ने शायरी को ना सिर्फ लब व रुखसार की बात से निकाल कर हक अधिकार, दुख दर्द जुल्म व ज़्यादाती के विरूद्ध आवाज़ की तरजुमनी तक ले आए, बल्कि उसके निराकरण के उपाय तक को वाज़ह किया। उम्मीद है कि नई नस्ल नदी के इस गमन को रुकने नहीं देंगी। आशा नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि उनकी प्रसिद्ध रचनाओं का यह संग्रह अवश्य ही ना सिर्फ साहित्य बल्कि समाज को भी उचित राह दिखलायेगा।
रफ़ी साहब की तरफ से मैं ज़माने को कहना चाहता हूं ….

मैं वो बुलबुल हूं फुगां जिसकी ना बदलेगी कभी
आशियाने से कफस तक मेरी आवाज़ है एक

आखिर में मैं आभारी हूं सरफराज अहमद अासी जी का कि उन्होंने मुझे एक महान व्यक्तित्व पर कुछ लिखने का मौका दिया। आसी साहब का यह कारनामा है कि वो लगातार व अंथक महनत के जरिए ऐसे विस्मृत विभूतियों को समाज के सामने लाने का साहसिक कार्य कर रहें हैं जिनके कृत्यों के बारे में जानना समझना समाज के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है, यकीनन इस काम ही अहमियत भी और यह काम वक्त की जरूरत भी है।

फैयाज अहमद फैजी
लेखक, अनुवादक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पेशे से चिकित्सक

A doctor by profession. Voluntary social services, translation and writing are my other inclinations.

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