पसमांदा : नाम तो सुना होगा!

मुझे ट्विटर जॉइन किए हुए बस कुछ ही दिन हुए थे। जब नीट और आईआईटी जेईई की परीक्षाओं को कालंतरित करने के लिए हैशटैग ट्रेंड कर रहे थे। पर एक अलग तरह का पैटर्न समझ आया जब एक तरफ एक दिन रोजगार, स्वास्थ्य या सामाजिक समस्यायों पर कोई हैशटैग ट्रेंड करता तो दूसरी तरफ अगले दिन एक अलग ही तरह का हैशटैग ट्रेंड करता और वो था हिन्दू मुस्लिम नफरत का जैसे कि हिन्दू मॉन्यूमेंट्स ताजमहल से ज्यादा खूबसूरत हैं या फिर काशी मथुरा बाकी है। कोई भी गंभीर मुद्दा हो वो अंत में ‘हिन्दू खतरे में है’ के भेट चढ़ जाया करता है आजकल। फिर क्या था ट्विटर मोह भंग हो गया और मैं वापस से किताबो और अखबारों के पीछे से दुनिया को देखने लगी। पर इस बीच बिहार के चुनाव हुए तो जीत किसकी हुई इससे ज्यादा चर्चा हिन्दू घरों में चर्चा का विषय यह रहा कि ओवैसी की ५ सीटो पर विजय मिल गई। दिवाली की छुट्टियों पर घर आना हुआ और पिताश्री अपने व्हाटसएप ज्ञान को मेरे ऊपर आज़मा रहे थे। चूंकि मैंने इतिहास पढ़ रखा है तो एक हद तक मैंने उन्हें जतला दिया कि वो तर्को में तो नहीं जीत सकते पर ये उनकी हिन्दू आस्था के प्रति अंधा मोह है जो उन्हें कुतर्क करने पर मजबूर कर रही। अंततः वो कश्मीर की विपदा वर्णन करते रहे की बिचारे हिन्दू तो बचे ही नहीं और इस तरह हिन्दू खतरे में है। मैंने मन में बोला हैशटैग इज स्टील इन ट्रेंड। कश्मीर की समस्या का हल करती इससे पहले ही उनका दुख और डर सामने आया ओवैसी बनकर। ओवैसी जितना ज़हर तो हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी जी द्वारा भी उगला गया है मैंने तुरुप का पत्ता डालते हुए उनका भड़काऊ भाषण और अपशब्द सब सुना दिए सीधे यूट्यूब के माध्यम से। किस्सा खत्म। पर किस्सा दिमाग में चल रहा था।

5 सीटो का फायदा जो असदुद्दीन ओवैसी को मिला वो इसलिए नहीं कि उसकी राजनीतिक विचारधारा किसी बदलाव की द्योतक है वो इसलिए क्योंकि ‘हिन्दू खतरे में है’। अब जब हिन्दू खतरे में है तो मुस्लिम तो आंकड़ों में मात्र 14.3 प्रतिशत हैं कुल आबादी के, वो तो और भी ज्यादा खतरे में होने ही थे। मेरे पसमांदा साथी पिछले तमाम सालो से ये लिखते आ रहे कि इस हिन्दू मुस्लिम राजनीति में सिर्फ सवर्णों और अशरफों का फायदा है अब उनकी ये बातें समूर्त दिख रही हैं। अब उत्तर प्रदेश के २०२२ के चुनाव पर बहुत सारे विचार रखे जा रहे कि कैसे ओवैसी जी दलित मुस्लिम का वोट बांट देंगे। कुछ बुद्धिजीवी ये भी समझा रहे की मुस्लिम समाज का वोट किसी की प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है और AIMIM बीजेपी की बी टीम भी नहीं है। इन सारे समीकरणों में कभी किसी बुद्धिजीवी ने मुस्लिम को अशरफ और पसमांदा में बांट कर नहीं दिखाया कि आखिर कैसे एक हिन्दू दलित को सारे मुस्लिम के साथ जोड़ देना पसमांदा विचारधारा, पसमांदा आवाज़ और पसमांदा अधिकारों के विरोध में है।

पसमांदा शब्द शायद ज्यादातर लोगों के लिए नामामुली सा शब्द है। पर मुझे ये भारत के भविष्य और भारत को वर्तमान की एक एकमात्र कड़ी समझ आती है। पसमांदा शब्द में इतनी ताकत है कि भारत की राजनीतिक समझ बदल सकता है। मुस्लिम आबादी का ८५% पसमांदा ना ओवैसी में अपना प्रतिनिधि खोज पाता है ना ही अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी की कोई उम्मीद कर सकता है। उसकी मुश्किलें और उसकी पहचान कई मापदंडों से होकर गुजरती है। भारत में किसी की पहचान उसकी जाति के आधार पर ज्यादा तय किया जाता है। क्या यही वजह नहीं की ओवैसी कौम के हको की बात तो करते हैं पर पसमांदा रिजर्वेशन चुप्पी साध जाते हैं। फिर भला ये कौम कौन है? पसमांदा समाज की अनदेखी कोई आज की नई बात नहीं है। दलित बहुजन हिन्दू हजारों साल से खतरे में है वो भी अपने धर्म के सवर्णों द्वारा। ठीक ऐसे ही जब हम भारत में मुस्लिम शासकों की बात करते हैं तो एक ऐसा नैरेटिव बनाते है कि हिंदुराष्ट्र को मुस्लिम शासकों द्वारा गुलाम बना लिया गया था । पर हम भूल जाते हैं पसमांदा समाज को भी उतने ही ज़ख्म तत्कालीन शासकों द्वारा मिले हैं जितने कि दलित बहुजन को। शासक का धर्म उसके राजशाही के बीच में कभी नहीं आया।

आज जब भारत एक लोकतांत्रिक देश है तो आम जनता अपने फैसले उन जंगी नफरतों के साए में नहीं ले सकता है जो दो भिन्न धर्मो के शासकों द्वारा लड़े गए। वो दो धर्म कोई भी दो धर्म हो सकते हैं। वैसे भी जब इतिहास के मील के पत्थरों पर पसमांदा को उकेरा जायेगा तो इतिहास के सफर का रास्ता बहुत अलग होगा। जिसको जानने समझने के बाद जनता आज के नेताओ की हिन्दू मुस्लिम की बिसात पर बिछी राजनीति को आज नहीं तो कल पलट ही देगी। पसमांदा वह शब्द है जिससे सभी बचते नज़र आते हैं। लेकिन धीरे धीरे ही सही तब्दीली तो आनी ही है। पसमांदा एक्टिविस्ट राजनीति की बहस को यथार्थ के पटल पर ला रहे जो अशराफो की राजनीति से उलट है, जिसमें हिन्दू कट्टरपंथियों पर पलटवार और नफरत की ही बात थी जिसमें पसमांदा समाज के बेहतरी का कोई ज़िक्र ही नहीं हुआ करता था और दकियानूसी विचारो को ही बढ़ावा दिया जाता रहा।

पसमांदा पॉलिटिक्स रिवर्स पॉलिटिक्स है जिसमें हिंदूवाद को उग्र करने की हर बात को पसमांदा अपना मुद्दा मानता ही नहीं वो फिर चाहे वो बाबरी मस्जिद का मुद्दा हो या हिंदी उर्दू का मुद्दा। हिंदुराष्ट्र बनाने का जो सपना बीजेपी देखती है उसके लिए मुस्लिम को एक खतरे की तरह दिखाने का आडम्बर सोशल मीडिया के द्वारा हिंदुओ के दिमाग में रचा जा रहा है पर क्या होगा जब मुस्लिम आबादी का ८५% इस भ्रम को तोड़ देगा और बहुजन आबादी के साथ मिलकर भारत की राजनीति को एक सही दिशा देगा जो बाबा साहेब के आदर्शो और विचारधारा पर चलेगा। और इसके लिए जरूरी है कि हम सब आपने राजनीतिक पहचान को धार्मिक पहचान से अलग करें। बहुजन पसमांदा समाज एक शिक्षित समाज बने और नेटवर्क बनाए जिससे वो ऑर्गेनाइज हो सके।


ये कोई एक और संभावित समीकरण नहीं है। या फिर सिर्फ एक चुनाव में कुछ सीट निकाल लेने की तरकीब नहीं है। अगर भारत को मूर्खता की और अग्रसर होने से रोकना है तो मुद्दों और मूल्यों की राजनीति पर बात करनी होगी। इससे एक बात और भी अच्छी होगी मेरे पिताश्री ये सारे सवाल करना बंद कर देंगे कि आखिर क्यों बाल दिवस नेहरू के जन्मदिवस पर मनाया जाता है सिख गुरुओं के जन्मदिन पर क्यों नहीं? या फिर सुभाष चन्द्र बोस को वो महत्त्व क्यों नहीं दिया गया जो महत्त्व नेहरू को मिला? इन सवालों से मेरा या मेरी विचारधारा वाले लोगो का कोई लेना देना ही नहीं है हम जाति के विनाश पर अपनी बात शुरु करते हैं और बराबरी के सिद्धान्त पर अपनी बात खत्म।

अनाया तत्कालीन भारतीय राजनीतिक परिसर में फैली हिटलरशाही मूर्खता से आजीज़ आकर एक लेखक और विचारक बन पड़ी हैं। प्रोफेशनली ये मार्केटिंग फ़ील्ड में अनुभव रखती हैं।

अनाया तत्कालीन भारतीय राजनीतिक परिसर में फैली हिटलरशाही मूर्खता से आजीज़ आकर एक लेखक और विचारक बन पड़ी हैं। प्रोफेशनली ये मार्केटिंग फ़ील्ड में अनुभव रखती हैं सम्पर्क : [email protected]

1 comments On पसमांदा : नाम तो सुना होगा!

  • कपोल कल्पना को सच्चाई बता के लिखना
    ट्विटर पर औरंगजेब, मुगल, बिरयानी, यहां तक की जलेबी भी मुगल बना दी गई पर शायद 0फिगर मैंटेन करने के लिए अपने खाना तो क्या पढना भी छोड दिया होगा
    और एक ऐसे व्यक्ति को देखकर जो भरे गर्मी के मौसम में भी शेरवानी पहने हुए हो और फतवा ए आलमगिरी के बनाये हुए नियमों को सविंधान से ज्यादा मानने का खुला ऐलान करता हो तो काफिरों को चिंता होती है आप को ना होती हो क्योंकि आप तो अभी भी दूसरे द्वारा आपकी बताई हुई पहचान जोकि बस भारतियों को और संस्कृति की तुलना में कम विकसित दिखाने के पूर्वाग्रह से बनाई गई है उसे ही मान कर संतुष्ट हैं जबकि स्वयं भी कभी सोच लें तो आपके विचारों में कुछ परिवर्तन आ जाये हिंदू खतरे में है आप कह रहे हैं आपने इतिहास पढा है इसलिए आप को ऐसा नहीं लगता तो वर्तमान में ही देख सकते हैं लाहौर कराची पेशावर ढाका मुलतान जैसी जगह में जहां 30से 50 प्रतिशत आबादी थी आज वहां कोई नहीं है रातों रात गधे के सींगों की तरह पता नहीं कहाँ गायब हो गये कश्मीर को तो आप कोई समस्या मानती ही नहीं है और नेहरू परिवार से आप कयो पूछना नहीं चाहते अनुमान लगा रहा हूँ सही है या गलत या तो डरते हैं या फिर जो पिछड़े वर्ग के डाल में छुप कर जो मिल रहा है वो भी बंद ना हो जाये
    हमारी जाति को भी शूद्र कहते थे लेकिन हमारे बुजुर्ग उन्हें भीख मांग कर जीने वाले इस अधूरी लाइन को सुनते ही प्रणाम और सलाम बोल के निकल भागते थे और जब मुस्लिम लुटेरों का आतंक ज्यादा ही होता था तो लूट से बचने के लिए हमारे ही प्रदेश में आ के शरण लेते थे और हमें जाट देवता बुलाया करते
    मुगल जो खुद कुख्यात लुटेरे थे वो भी अबदाली जैसे लुटेरों के डर से प्रदेश में शरण ले के रहे और हमे जाटबदजात जो पीछे से कहते थे एहसास की वजह से कहना छोड दिया
    सम्मान मांगने से नहीं मिलता अपने कर्म और मेहनत से ही मिलता है कोटा प्रणाली भी सम्मान पाने में रुकावट पैदा करती है हमें अपने खुद के प्रयास से जो मिलता है सम्मान वो ही दिलाता है

Leave a reply:

Your email address will not be published.