पाटिकर समाज

असम के पाटिकर समाज की पीड़ा

आज का यह लेख अत्यंत दुःखद, भावनात्मक और हताशाजनक है। पूरे भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक और पीड़ित हैं। हालांकि भारत में हिन्दू को छोड़कर अन्य धर्मों के लोग भी अल्पसंख्यक हैं। फिर भी क्या आप इस वास्तविकता को जानते हैं कि मुस्लिम समाज में भी स्वयं कुछ मुस्लिम केवल कुल और वंशगत प्रताड़ना के लिए अल्पसंख्यक हैं। जानते नही! अतएव बताता हूं, हमें पाटिकर या पाटियारा कहा जाता है, एक जनसमूह जो असम के करीमगंज जिले के सुदूर ग्रामीण अंचल में वास करते हैं। भारत ही क्यों पूरी दुनिया में हमलोग ही एक मात्र ऐसे जन समूह हैं जो आज भी पाटि शिल्प का पेशा करतें हैं। करीमगंज जिले (Assam) के कालीगंज इलाके के तीन गांवों में हमारी बस्तियां सीमित हैं। कुल मिलाकर हम सब दो हजार होगें। लेकिन हिन्दू या अन्य धर्म के लोग हमें कुछ नही करते ना ही कुछ बोलते हैं, उत्पीड़न भी नही करते। हम अपने पड़ोसी तथाकथित कुछ मुस्लिमो द्वारा उत्पीड़ित होते हैं। ये लोग ना तो हमें हिन्दू मानते हैं और ना ही मुसलमान समझते हैं। पूरे देश में मुस्लिम पाटिकर लगभग दो हजार होगें लेकिन हमारे पड़ोसी कुछ नामधारी मुसलमान जो हम लोगो को नीच जाति का समझते हैं, बहुत अधिक अपमानित और प्रताड़ित करते हैं। इसलिए हमलोग तो मुसलमानो के बीच भी अल्पसंख्यक हैं।

हमलोग तो इस्लाम का हर तरह से सम्मान और संस्कार का पालन करते हैं। हम तो एकमात्र ऐसे मुसलमान है जिन्होंने इस्लाम को सबसे अधिक मजबूती से पकड़े हुए हैं। हम लोग वही मुसलमान है जो शाह जलाल से अनुराग करने वालो को मान कर धन्य हो गए। हम लोग तो वही मुसलमान है कि गरीब होने के बाद भी चोरी, डकैती, ड्रग के व्यवसाय में हमारा नाम तक नही है। हम लोग तो वही मुसलमान है जो सरल सहज और गरीबी में जकड़े हुए क्षेत्र विशेष की शिक्षा की दर में वृद्धि कर रहें हैं। हम लोग तो वही मुसलमान हैं जो मिट्टी के छोटे घरों में भूखे रह कर भी डाक्टर, इंजीनियर,शिक्षक और अधिवक्ता बने हैं। हम लोग मार खाते हुए, अपमानित होते हुए भी हलाल तरीके से करोड़पति हो गए। कारण, एक समय, नहीं! आज भी हम लोगों को गरीब बोलने और मानने के बाद भी पैसे और शिक्षा के क्षेत्र में हम लोग बहुतों से आगे निकल आए हैं। हम लोग लगातार अपमानित होते रहने के बाद भी सम्मान के साथ बचे रहने के रास्ते को स्वयं ही खोज लेते हैं। उस पर और भी ईर्ष्या बढ़ रही हैं। हमारी उन्नति सिर्फ हम नही कर रहें हैं, स्वयं ईश्वर कर दे रहा हैं। इस उन्नति के पीछे हमारा मूल मंत्र हम लोगो का अपमानित होने के बाद भी अल्लाह के निर्देश मानते हुए जीवन यापन करना है। उसके बाद भी हम लोग महनत करके खाते हैं, मजदूरी करते हैं, पा तैयार करते हैं और हमलोग स्वयं स्वच्छंद रहते हैं। बोलने के लिए बाध्य हो रहा हूं कि मुसलमान समाज में उत्पीड़ित होने के बाद भी हमारी उन्नति कोई भी रोक नही सकता है। कितनी भी हिंसा हो जाए, क्योंकि हम अपनी स्थिति से सचेतन होकर उन्नति के पथ पर हैं।

नोट: पाटि एक विशेष प्रकार की चटाई होती है जो असम राज्य के बराक घाटी के कछार क्षेत्र के एक विशेष प्रकार के गन्ने से तैयार किया जाता है। यह बहुत ही महीन होता है और इस पर सोने से ठंडा महसूस होता है इस लिए इसे शीलातल पाटि भी कहते हैं। यह सिर्फ पाटिकर समाज द्वारा तैयार किया जाता है। यह सिलीगुड़ी, सिलहट और कछार क्षेत्र में बनाया जाता है। पाटि तैयार करने वाले पाटिकर या पाटियारा कहें जाते हैं धार्मिक विश्वास के आधार पर इनमे हिन्दू और मुसलमान दोनों होते हैं।(अनुवादक)

लेखक: एडवोकेट तीतिउर्रहमान
अनुवादक: फैयाज अहमद फैजी

आभार:
मैं ओहि उद्दीन अहमद अध्यक्ष पसमांदा महाज़ असम राज्य एक प्रभारी पूर्वोत्तर राज्य, का आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने इस लेख के अनुवाद करते समय आवश्यक बिंदुओ को समझने में अपरिहार्य सहयोग किया।

लेखक एडवोकेट तीतिउर्रहमान, असम राज्य पसमांदा महाज़ के सचिव और पेशे से अधिवक्ता हैं।
अनुवादक फैयाज अहमद फैजी, लेखक, अनुवादक, स्तंभकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवम् पेशे से चिकित्सक हैं।

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