Poster of film The Birth of A Nation

धर्म की व्याख्या का खेल

कुछ दिनों पहले एक फ़िल्म देखी The Birth of A Nation. ये फ़िल्म नैट टर्नर नामक गुलाम पे आधारित है जिसने गुलामी के विरुद्ध 1831 में अमेरिका में विद्रोह किया था. इस फिल्म के नायक नैट टर्नर को उसके गोरे मालिक पढ़ना सिखाते हैं. पर सिर्फ वहीं तक कि वह बाइबिल पढ़ सके उससे आगे उसे पढ़ने नहीं दिया जाता. पढ़ा-लिखा होने के कारण उसके गोरे मालिक उसकी परवाह करते है जैसे मालिक अपने प्रिय घोड़े/कुत्ते की करता है. गुलामी के खिलाफ छिटपुट घटनाएँ चल रही होती हैं. काले गुलाम अपने गोरे मालिकों का आदेश मानने से इनकार करने लगते हैं. इससे गोरे मालिकों की पूरी सत्ता हिलने लगती हैं क्यूंकि गोरे मालिकों की पूरी सत्ता गुलामों से आदेश मनवाने पे टिकी थी. अगर गुलाम आदेश मानने से इकार कर दें इसका अर्थ ये होता कि वो अपना फैसला खुद कर सकते हैं. अर्थात उनके पास चयन की आज़ादी आ जाती. मतलब अब वो वस्तु की तरह कार्य नहीं करेंगे जिसके कार्य पहले से तय होते हैं. इस खतरे को गोरे मालिक समझते हैं और गुलामी के एक बड़े हथियार ‘धर्म’ का प्रयोग करते हैं. काले गुलाम क्यूंकि गोरे मालिकों की बात सुनने को तैयार नहीं हैं इसलिए उन्हें उन्हीं के बीच का एक इंसान चाहिए जो उनको ये समझा सके कि गुलामी/दासता धर्म सम्मत है. ईश्वर ने उन्हें उनके मालिकों की सेवा के लिए ही बनाया है. इस काम के लिए वो नैट टर्नर को पकड़ते हैं. शुरुआत में नैट टर्नर एक वफादार गुलाम की तरह अपने मालिकों की बात मानता है और काले गुलामों को ये समझाता है कि बाइबल में कैसे गुलामों को अपने मालिकों की इज़्ज़त करने का हुक्म दिया गया है और ईश्वर की कृपा पाने के लिए तथा ‘अच्छे ईसाई’ बनने के लिए ये आवश्यक है कि आप बाइबल की सारी बातें माने. इस तरह गोरे मालिक धर्म के ज़रिए विद्रोह दबाने की कोशिश करते हैं. पर रुकिए, कहानी यहाँ खत्म नही होती. 

अपने समाज पर ज़ुल्म देखते देखते और बाइबल पढ़ते-पढ़ते उस नैट टर्नर को इस बात का एहसास हो जाता है कि अब तक वह जिस बाइबल की व्यख्या कर रहा है वो तो गोरे मालिकों की व्याख्या थी. बाइबल की गुलामों की व्याख्या कहाँ है? नैट टर्नर अब बाइबल को दोबारा पढ़ता है पर अब गुलामों के नज़रिए से पढ़ता है और उसी बाइबल का इस्तेमाल कर के गुलामों को ज़ुल्म के खिलाफ संगठित करता है और विद्रोह कर देता है. हालांकि ये विद्रोह कामयाब नहीं होता और नैट टर्नर समेत सभी मारे जाते हैं. पर ये विद्रोह ग़ुलामों की आज़ादी का वाहक बनता है और  January 31, 1865 को अमेरिका से गुलामी प्रथा अधिकारिक रूप से खत्म कर दी जाती है.

आईये, अब उपरोक्त संदर्भ के आधार पर हम पसमांदा आन्दोलन को समझने की कोशिश करते हैं. मुस्लिम समाज में अशारफ तबके का वर्चस्व है. एकाधिकार और वर्चस्व में फर्क ये होता है कि वर्चस्व की स्थिति में जिन तबकों पर वर्चस्व होता है वो खुद उनकी सत्ता मान लेते हैं जबकि एकाधिकार में सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की स्थिति बनी रहती है. अशराफ वर्ग जब सत्ता में था (स्वघोषित भारत के मुस्लिम काल में) तो उन्होंने पसमांदा समाज के लोगों की नियुक्तियां उच्च पद पे न करके अपनी सत्ता बनाए रखी. यही कारण है कि जब अंग्रेज़ यहाँ पर आए और उन्होंने जात-पात से ऊपर उठ कर सिविल सेवा में सभी को दक्षता के आधार पर चयन करने की नीति बनाई तो उस वक़्त कौम के हमदर्द कहे जाने वाले सर सय्यद ने कहा कि “ब्रिटेन में हर व्यक्ति आला और अदना, ड्यूक और अर्ल या किसी शरीफ खानदान का बेटा और एक दर्जी या किसी अदना दर्जे के खानदान का बेटा बराबर इम्तेहान दे सकता है. जो यूरोपियन ब्रिटेन से कम्पटीशन का इम्तेहान देकर आते हैं, उनमें अदना खानदान के भी होते हैं और आला खानदान के भी होते हैं. मैं कहता हूँ कि आप सब ये यकीन करते होंगे कि जो अदना (कथित निम्न जाति के) खानदान के लोग हैं वह मुल्क या गवर्नमेण्ट यानि सरकार के लिए मुफीद नही हैं. लेकिन इंगलैण्ड से जो आते हैं वह हमारी आँख से इतनी दूर हैं कि हम नहीं जानते कि वह लार्ड के बेटे हैं या ड्यूक के या एक दर्जी के और इस सबब ये भ्रम कि हम पर एक अदना आदमी हुकूमत करता है, हमारी आँख से छुपा हुआ रहता है. लेकिन हिन्दुस्तान में ये ख्याल नही है. हिन्दुस्तान की शरीफ (शोरफा/बड़ी ज़ातें) कौमें हिन्दुस्तान के अदना दर्जे (नीची जाति) के व्यक्ति को, जिसकी जड़ बुनियाद से वह परिचित हें. अपनी जान व माल पर हाकिम होना पसन्द नही करेंगे। (खुतबात-ए-सर सैय्यद).

पर जैसा की हमें पता है कि सर सय्यद की बात को माना नहीं गया. अब अशराफ सर्वोच्चता बनाए रखने की दूसरी संस्था का प्रयोग किया गया. ये संस्था थी मदरसा. मदरसा अशरफवाद की अंतिम पनाहगाह साबित हुई. ये संस्थाएं पहले भी अशराफ सर्वोच्चता को कायम रखने का काम करती थी. अशराफ मौलाना बहुत पहले से ही अपने फतवो को मदरसों के ज़रिए फैलाते रहे हैं और मुस्लिम समाज में ज़ात-पात का ज़हर घोलते रहे हैं. इस प्रकार वो बहुत पहले से ही बराबरी/ मसावात का संदेश देने वाले धर्म इस्लाम में एक गैर-इस्लामी चीज़ डाल चुके थे (क्यूंकि ये नहीं माना जा सकता कि जिन दलित जातियों ने हिन्दू धर्म जातिय उत्पीड़न के कारण छोड़ा वह दलित जातियां दुबारा उसी जाति को अपने साथ लायेंगी जो उनके उत्पीड़न का कारण थी).

इन अशराफ मौलवियों ने जातिय सर्वोच्चता को इस्लाम में पैदा किया और समझया कि कैसे सैयद जन्म से ही महान होते हैं. क्यों अशराफ जातियों को ही मुसलमानों का नेतृत्व किया जाना चाहिए? क्यों छोटी जाति के लोग अशराफों के स्तर के नही हैं? अपनी बात की वैधता के लिए अब इन अशराफ मौलानाओं को पसमांदा समाज के कुछ गुलामों की आवश्यकता थी जो इनके मदरसों से पढ़ कर निकलें और इस बात को पसमंदा समाज को समझा सकें. और हुआ भी ऐसा ही. कई सौ सालों तक उनके इस फतवों और किताबों को सीने से लगा कर पसमांदा मुसलमान घूमता रहा.

इन अशराफ मौलवियों ने जातिय सर्वोच्चता को इस्लाम में पैदा किया और समझया कि कैसे सैयद जन्म से ही महान होते हैं. क्यों अशराफ जातियों को ही मुसलमानों का नेतृत्व किया जाना चाहिए? क्यों छोटी जाति के लोग अशराफों के स्तर के नही हैं? अपनी बात की वैधता के लिए अब इन अशराफ मौलानाओं को पसमांदा समाज के कुछ गुलामों की आवश्यकता थी जो इनके मदरसों से पढ़ कर निकलें और इस बात को पसमंदा समाज को समझा सकें. और हुआ भी ऐसा ही. कई सौ सालों तक उनके इस फतवों और किताबों को सीने से लगा कर पसमांदा मुसलमान घूमता रहा. उदाहरण स्वरुप पिछली सदी में लिखी गई अशरफ अली थानवी की किताब ‘बहिश्ते ज़ेवर’ को देख सकते हैं जिसकी गिनती उन किताबों में होता है जिसे तबलीगी जमात के लोग रोज़ मस्जिदों में शाम की नमाज़ के बाद पढ़ते हैं. कुछ साल पहले तक बिना इस किताब को पढ़े गाँवों में मुस्लिम लड़कियों की शादी नही होती थी. इस किताब में थानवी जी फरमाते हैं कि “शेख, सय्यद बड़ी जातियों के हैं,  दोनों आपस में शादी करेंगे. मुग़ल, पठान-सय्य्दों के बराबर नहीं है. नए मुसलमान खानदानी मुसलमान के बराबर नहीं है. पेशे में बराबरी ये है कि जोलाहे दर्ज़ियों के मेल और जोड़ के नहीं है. इसी तरह नई, धोबी वगैरह भी दरज़ी के बराबर नहीं है”: बहिश्ते ज़ेवर, खंड ४, १२.१४.

इन मदरसों ने गुलाम पसमांदा मौलानाओं की जो फौज तैयार की उसने कभी भी इन फतवों, किताबों, उलेमाओं को चुनौती नहीं दी. ये गुलाम पसमांदा आज भी अपनी गुलामी के सारे तर्क को स्वीकार कर पसमांदा समाज के विद्रोह को आज तक दबाते आ रहे हैं. पर इसी बीच मसूद आलम फलाही जैसे कुछ मौलाना पैदा हो गए हैं. जिन्होंने न सिर्फ अशराफवाद की सत्ता को चुनौती दी बल्कि उन्हीं किताबों हदीसों की पसमांदा व्याख्या भी कर दी. मसूद आलम फलाही की किताब ‘हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’इस मायने में एक मील का पत्थर साबित हुई. 

इन मदरसों ने गुलाम पसमांदा मौलानाओ की जो फौज तैयार की उसने कभी भी इन फतवों, किताबों, उलेमाओ को चुनौती नहीं दी. ये गुलाम पसमांदा आज भी अपनी गुलामी के सारे तर्क को स्वीकार कर पसमांदा समाज के विद्रोह को आज तक दबाते आ रहे हैं. पर इसी बीच मसूद आलम फलाही  जैसे कुछ मौलाना पैदा हो गए हैं. जिन्होंने न सिर्फ अशराफवाद की सत्ता को चुनौती दी बल्कि उन्ही किताबों हदीसों की पसमांदा व्याख्या भी कर दी. मसूद आलम फलाही की किताब “हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान” इस मायने में एक मील का पत्थर साबित हुई. बस अब क्या था अशराफ तबके के सबसे मज़बूत आधार यानी धार्मिक आधार पर ही हमला हो गया. खलबली मच गई की इनके वर्चस्व को चुनौती किसने दी? अशराफ और उनके गुलाम पसमंदा मौलानाओ ने इसके खिलाफ जंग छेड़ दी क्योंकि अब धर्म का इस्तेमाल शोषण के लिए नही बल्कि शोषण के विरुद्ध लड़ने के लिए किया जा रहा था. खेल ही बदल गया,  सैकड़ो सालों में जो नही हुआ वो अब कैसे हो गया? मदरसे जो अशराफवाद का अड्डा है उसमें सेंध लगा दी गई. अभी तक पसमांदा मौलानाओ का काम उन किताबो को सिर्फ पढ़ना था न कि उन किताबों में लिखे उनके वाहियात तर्को को चुनौती देना. ये पसमांदा आंदोलन का सबसे मजबूत पक्ष था कि उनके खेल में उन्ही को हरा दिया जाए.

“हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान” किताब के लेखक से हमारी बातचीत

पसमंदा आंदोलन का मानना यही है कि हमारा समाज धार्मिक समाज है तो इसे धार्मिक तरीके से ही पहले समझाया जा सकता है उसके बाद ही दूसरे तरीके इस्तेमाल किए जाएंगे. जैसे अगर कोई वकील किसी अपराधी को कानूनी किताब के ज़रिए बचाने की कोशिश करता है तो दूसरा वकील उस अपराधी को सज़ा दिलाने के लिए उसी कानूनी किताब का सहारा लेता है न कि उस किताब को फाड़ के फेक देता है.  जहाँ तक मुसलमानों की एकता का सवाल है उसे पहले से ही अगड़े मुसलमानों ने कई मसलक (अहल-ए-हदीस, बरेलवी, देओबंदी, वहाबी, सूफी, शिया, इत्यादि) बना कर खतरे में डाल रखा है. यह मिथकीय एकता केवल पसमांदा मुसलमानों को गुलाम बनाए रखने और एक ख़ास अशराफ वर्ग के प्रभुत्व को बरक़रार रखने का प्रयास है. वह एकता किस काम की जहाँ न बराबरी हो और न आत्मसम्मान अगर एकता दमनकारी है तो एकता बेमानी है.  इस मिथ पे व्यंगात्मक अंदाज़ में प्रथम पसमांदा आंदोलन के जनक मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी लिखते हैं कि, “सुब्हान अल्लाह, भारत देश में सैकड़ो अंजुमनें बनाईं जाएँ, पचासों कांफ्रेंसें आयोजित हों, एक दूसरे के खिलाफ धड़ेबंदियां की जाएँ, एक अंजुमन व कांफ्रेंस के सदस्य दूसरी अंजुमन व कांफ्रेंस के सदस्यों को बेईमान, ग़द्दार,चोर आदि कहें, लिखें और मशहूर करें। यही नहीं, बल्कि उनके व्यक्तिगत कमज़ोरियों और पारिवारिक ग़लतियो को प्रचारित करने के लिए पैसे बर्बाद करें, एक दूसरे को ईर्ष्यालु, गवर्नमेंट का जासूस आदि बताएं, काफिर व मुशरिक के फतवे दिए जायें. ये बातें भारत में रोज़ हों, बराबर हों और बहुत ज़्यादा हों. मगर उन सारी नालायकियों से मुसलमानों में एकता पैदा हो, निःस्वार्थभाव से सेवा का उत्साह पैदा हो. और अगर कोई गरीब व मजबूर समाज अपने उलेमा (धर्म गुरुओं) नेताओं और लीडरों की तरफ से निराश होकर अपनें सामाजिक सुधार व शिक्षा की व्यवस्था करे तो उस से मुसलमानों में विरोधाभास पैदा होने का डर प्रकट किया जाये. माशाअल्लाह।” (पेज 4, अलइकराम, 1 फरवरी 1927 ई०, जिल्द-2, नंबर-2)

अब पसमांदा मुसलमानों ने अगड़े मुसलमानों के ज़रिये की गयी मज़हब की व्याख्या की हकीक़त भी समझ ली है और मुस्लिम एकता का मतलब भी. अब वह बार-बार अगड़े मुसलमानों के जाल में फंसने वाले नहीं हैं. उनको अब ‘संसद’ (सरकारी इदारों) और मज़हबी इदारों दोनों में अपनी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी चाहिए. बात अब यहाँ से ही शुरू होगी!

यह लेख 16 सितम्बर 2017 को hindi.roundtableindia.co.in पर प्रकाशित हो चुका है।

Trailer of movie THE BIRTH OF NATION

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