Religious Hegemony in Islam
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वर्चस्व की जाति, जाति का वर्चस्व

दो साल पहले बुलंदशहर में इस्लामी धार्मिक महासम्मेलन (इज्तेमा) के लिए करोड़ों मुसलमान एकत्रित हुए। इस से एक बात तो साबित होती है कि मुस्लिम समाज पर आज भी उलेमाओं (आलिम का बहुवचन अर्थात मौलानाओं) की पकड़ मज़बूत है, जिनकी तक़रीरों को सुनने के लिए 1 करोड़ लोग भी आ सकते हैं लेकिन अब दूसरा और ज़रूरी सवाल यह किया जाए कि इस इज्तेमा (मुसलमानों का सम्मलेन/सत्संग) से मुस्लिम समाज को क्या लाभ हुआ? अच्छा! तो हम दुनियावी लाभ की बात न करें क्योंकि यहां बात ज़मीन से नीचे यानि ‘क़ब्र’ की और आसमान से ऊपर यानि ‘जन्नत’ की होती है। चलिए ठीक है… तो फिर आप यही बताएं कि जन्नत में जाने के लिए क्या हमें इस्लामी सिद्धांत पर नहीं चलना चाहिए? क्या इस्लाम में मसावात (बराबरी) का सिद्धांत नहीं है? तो फिर इस्लाम में जातिवाद जैसी बुराईयों के खिलाफ मोर्चा क्यों नहीं खोला जाता है? क्या आज तक कभी इन उलेमाओं ने जातिवाद के ख़िलाफ़ कोई सार्वजनिक पहल की है? कितनी तकरीरें इस विषय पर हुई हैं? सच्चाई तो यह है कि मुस्लिम समाज में ज़ात-पात का ज़हर इन्हीं अशराफ़ (सवर्ण) उलेमाओं ने फैलाया है जिन्होंने ‘कुफ़ू’ के नाम पर मुस्लिम समाज को विभिन्न श्रेणियों में बाँट दिया।

‘कफ़ू’ का सिद्धांत यह बताता है कि कौन किस जाति में शादी कर सकता है और किस जाति में शादी नहीं कर सकता? कौन किस जाति के बराबर है और कौन उससे नीचा है! कुफ़ू एक ज़रिया, एक हथियार था जिसके द्वारा यह जातिवादी उलेमा इस्लाम में नस्ल/वंश परंपरा वाली बात को क़ानूनी (इस्लामी) मान्यता दे सकें। आप हनफ़ी मसलक के सबसे बड़े मदरसों में से एक देवबंद की आधिकारिक वेबसाइट देखिए। आप को इस तरह की बातें दिखेंगी जैसे:- एक अरब, ग़ैर-अरब से श्रेष्ठ है, अंसारी, दर्ज़ी, धोबी से सैयद-शेख़ श्रेष्ठ हैं, खानदानी मुसलमान, नए हुए मुसलमान से श्रेष्ठ हैं… आदि।

Equality in Lineage in Muslims
इसे देवबंद की official website से लिया है

‘हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’ के लेखक प्रोफ़ेसर मौलाना मसऊद आलम फ़लाही साहब कहते हैं कि इस्लामी मान्यता के अनुसार इस तरह की श्रेष्ठता का दावा सबसे पहले इब्लीस ने किया था। इब्लीस ने कहा था कि –

“मैं आदम के आगे सजदा नहीं करूँगा क्योंकि वह मिट्टी से बना है, मैं आग से और आग मिट्टी से अफ़ज़ल (श्रेष्ठ) है। इब्लीस ने जन्म के आधार पर ख़ुद की श्रेष्ठता को साबित करने की कोशिश की और आज इब्लीसवादी अशराफ़ उलेमा भी अपनी जाति की श्रेष्ठता को साबित करने के लिए ख़ुद को नबी (स.अ.) की ख़ानदान से जोड़ते हैं।”

आप यूट्यूब पर दर्जनों ऐसे वीडियो देख सकते हैं जहाँ यह उलेमा खुल के बोल रहे हैं कि सैयद बाक़ी जातियों से अफ़ज़ल (श्रेष्ठ) हैं। बस आप को यूट्यूब पर लिखना होगा ‘सैयद का अदब’ या ‘सैयद की अज़मत’ और दर्जनों वीडियो आप के सामने होंगे। क्या यही काम ब्राह्मण अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए नहीं करते हैं? जब कोई ब्राह्मण कहता हैं कि हम ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं इसलिए हम अन्य सभी जातियों से श्रेष्ठ हैं? लेकिन ब्राह्मणों को यह बात अच्छी तरह से पता थी कि सिर्फ़ बोलने से कुछ नहीं होगा इसलिए उन्होंने अपनी बात ईश्वर के मुंह से कहलवाई अर्थात ईश्वर की वाणी वेद को माना जाता है। अब अगर यह बात वेद में ही लिख दी जाए तो कौन इसका विरोध करेगा? विरोध करने के लिए पढ़ना लिखना होगा जबकि पढ़ने लिखने का अधिकार तो सिर्फ ब्राह्मणों के पास था। धर्म के व्याख्याकार वही थे। ब्राह्मण अपनी बात साबित करने के लिए ऋग्वेद का सहारा लेते हैं जिसके 10वें मंडल में पुरुषसूक्त नामक अध्याय में इस बात का वर्णन कर देते हैं। जब ईश्वर की वाणी के रूप में ब्राह्मणों ने यह स्थापित कर दिया कि ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ हैं तो उनको अपनी बात आम जनता के बीच स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। लोगों ने ग़ैर-बराबरी को भी प्राकृतिक माना। जैसे हर मज़दूर को लगता है कि अगर वह ग़रीब है तो उसकी वजह वह ख़ुद है और वह मज़दूर व्यवस्था पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता। यही वजह है कि डॉक्टर आंबेडकर अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में लिखते हैं कि ” जाति और वर्ण ऐसे मामले हैं, जिनकी चर्चा वेदों और शात्रों में की गई है और परिणामस्वरूप बुद्धि का आहान किसी हिन्दू पर कोई असर नहीं डाल सकता (मतलब इस मामले में तर्क और बुध्दि के इस्तेमाल की मनाही है). ब्राह्मणो की सर्वोचता साबित करने के लिए तरह-तरह के किस्से और कहनियाँ गढ़ी गई। ब्राह्मणो की सेवा करने के बदले मिलने वाले सुख, वरदान, मोक्ष का महिमामंडन किया गया। डॉ. सिद्धार्थ अपने लेख ‘मेहनतकशों के शोषण-उत्पीड़न की वैदिक-सनातन परंपरा’ में लिखते हैं “ऋग्वेद यह पुरुष सूक्त भारत के लिखित इतिहास में पहली बार यह घोषणा करता है कि बिना किसी प्रकार के शारीरिक श्रम के जीने वाले परजीवी ब्राह्मणों को स्वयं विराट पुरूष (ब्रह्मा) ने सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया है और अपने शारीरिक श्रम से सब कुछ सृजित करने वाले शूद्रों को ब्रह्मा ने अपने पैरों से पैदा करके सबसे निम्न स्थान दिया है। जब स्वयं ब्रह्मा ही दूसरे के श्रम पर जीने वाले परजीवियों- ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों-द्विजों को श्रेष्ठ और श्रम करने वाले शूद्रों-महिलाओं को निकृष्ट घोषित कर दिया, तो उसके बाद क्या बचता है।”

ठीक इसी तरह इन अशराफ़ उलेमाओं ने भी ख़ुद को नबी (स.अ.) से जोड़ कर झूठी हदीसें गढ़ीं। उन्होंने भी सैयद की सेवा करने के नाम पर मिलने वाली जन्नत के किस्से गढ़े अगर सैयद गरीब है तो यह उस सैयद का इम्तिहान नहीं है बल्कि हमारा इम्तिहान है की हम उस सैयद की कितनी सेवा कर पाते है। यह भी ज्ञात रहे कि हदीसों का संकलन नबी (स.अ.) की वफ़ात के 100 साल बाद शुरू हुआ है। यह वही वक़्त था जब सत्ता के लिए शिया और सुन्नीयों के बीच जंग हो रही थी। सत्ता की दावेदारी को सही साबित करने का सबसे आसान तरीका क्या होता है? वह यह कि आप किसी तरह अपनी सत्ता को ईश्वर का आदेश साबित कर दें। राजनीतिक विज्ञान में इसे राज्य की दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत’ के रूप में हम पढ़ते हैं। राज्य ईश्वर ने बनाया इसलिए राजा ईश्वर का दूत है, ‘ज़िल्ले इलाही’ है। कोई भी उसकी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर सकता। बस यही होड़ उस वक़्त भी मची हुई थी। सुन्नी सत्ता को कुरैश तक सीमित रख रहे थे और शिया सत्ता को अली (र.अ.) की ख़ानदान तक। अगर यह साबित कर दिया जाए कि नबी (स.अ.) ने किसी ख़ास ख़ानदान या क़बीले को सत्ता सौंपी थी तो उसकी दावेदारी ईश्वरीय हो जाएगी क्योंकि नबी (स.अ.) ईश्वर के दूत थे। अब कोई भी आम मुसलमान हदीस का नाम सुन कर शांत हो जाएगा और नहीं पूछेगा कि कैसे तुमने इस्लाम के बुनियादी उसूल ‘मसावात’ (समानता) के ख़िलाफ़ हदीस गढ़ दी? जो इस्लाम कहता है कि –

“इस्लाम मे कोई वंश परम्परा नहीं है!”

वहां तुमने वंश परंपरा को मज़बूत कैसे कर दिया? पर यह हिम्मत करता कौन है? भले ही इमाम बुख़ारी (र.अ.) ने अपनी समझ (रिवायतन और दरायतन) और तहक़ीक़ (शोध) के ज़रिए कई लाख हदीसों में से कुछ हज़ार हदीसों का संकलन किया हो पर आज उन हदीसों को अगर कोई दुबारा अपनी तहक़ीक़ का आधार बनाए तो मुन्किर-ए-हदीस (हदीस का इनकार करने वाला) बन जाएगा और फ़ौरन इस्लाम से ख़ारिज कर दिया जाएगा। इस से हुआ यह कि इन हदीसों को आधार बना कर बड़े-बड़े मौलानाओं ने फ़तवे दिए। आज जो कठमुल्ले जातिवादी भाषा बोल रहे हैं दरअसल इनमें उनका दोष कम, उनके धार्मिक (तथा मानसिक भी) पिताओं का दोष ज़्यादा है।

Muslim Religious leaders leading people away from real issues of education, health and employment
Muslim Religious leaders leading people away from real issues of education, health and employment
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इन अशराफ़ मौलवियों ने जातीय सर्वोच्चता को इस्लाम में पैदा किया और समझाया कि कैसे सैयद जन्म से ही महान होते हैं! क्यों अशराफ जातियों को ही मुसलमानों का नेतृत्व किया जाना चाहिए! क्यों छोटी जाति के लोग अशराफ़ के स्तर के नहीं हैं! जैसे अंग्रेज़ों ने भारत पर हुकूमत करने के लिए भारतीयों को इस बात को मानने के लिए बाध्य कर दिया था कि भारतीय अभी सत्ता संभालने के क़ाबिल नहीं हैं, अगर अंग्रेज़ न आए होते तो भारत कभी आधुनिक नहीं बन पाता। अंग्रेज़ों ने अपनी सत्ता बनाने के लिए अपने कुछ मानसिक गुलाम पैदा किए जो रंग और चमड़ी से भारतीय हों और सोच से अंग्रेज़। ठीक ऐसे ही अपनी बात की वैधता के लिए अब इन अशराफ़ मौलानाओं को अब पसमांदा समाज के कुछ ग़ुलामों की आवश्यकता थी जो इनके मदरसों से इनकी किताबों को पढ़ कर निकलें और इस बात को पसमंदा समाज को समझा सकें। कमाल की बात यह है कि ऐसा हुआ भी! कई सौ सालों तक उनके इन फ़तवों और किताबों को पसमांदा मुसलमान सीने से लगा कर घूमता रहा। पूर्व राज्य सभा सांसद अली अनवर अंसारी साहब अपनी मशहूर किताब ‘मसावात की जंग’ में लिखते हैं कि पिछली सदी में लिखी गई मौलाना अशरफ़ अली थानवी की किताब ‘बहिश्त-ए-ज़ेवर’ को देख सकते हैं जिसकी गिनती उन किताबों में होती है जिसे सुन्नी सम्प्रदाय के हनफ़ी मसलक के लोग शादी-बियाह में विदाई के वक़्त अपनी बेटियों को देते हैं। कुछ साल पहले तक बिना इस किताब को पढ़े गाँवों में मुस्लिम लड़कियों का ब्याह नहीं होता था। इस किताब में मौलाना थानवी लिखते हैं कि –

“शेख़, सय्यद बड़ी जातियों के हैं, दोनों आपस में शादी करेंगे। मुग़ल-पठान सय्य्दों के बराबर नहीं हैं। नए मुसलमान ख़ानदानी मुसलमान के बराबर नहीं हैं। पेशे में बराबरी यह है कि जुलाहे, दर्ज़ियों के मेल और जोड़ के लायक़ नहीं हैं। इसी तरह नाई, धोबी वग़ैरह भी दर्ज़ी के बराबर नहीं है”

बहिश्त-ए-ज़ेवर, खंड 4, 12.14.

इन मदरसों ने ‘ग़ुलाम’ पसमांदा मौलानाओं की जो फ़ौज तैयार की उसने कभी भी इन फ़तवों, किताबों, उलेमाओं को चुनौती नहीं दी क्योंकि इन्हें समझाया गया है कि इस्लाम सीखने के लिए इन्हें ‘तक़लीद’ (फ़तवों के हिसाब से अपनी ज़िन्दगी बसर करना) करना है। तक़लीद नहीं समझ में आया हो तो आसान भाषा मे इसे ‘अंधभक्ति’ ही समझें। अंधभक्त और ग़ुलाम पसमांदा की फ़ौज आज भी अपनी ग़ुलामी के सारे तर्क को स्वीकार कर, हर पसमांदा-तहरीक को, आज तक ख़ुद ही दबाती आ रही हैं। आप इस बात ऐसे समझें कि- हर साल IAS टॉपर से हर कोचिंग अपना प्रचार करवाना चाहती है। इसके लिए उन टॉपरों को लाखों रुपए भी दिए जाते हैं। पैसे इसलिए दिए जाते हैं क्योंकि अब उन टॉपरों की Hegemony (अधिपत्य/नायकत्व) बन चुकी है सीविल सर्विस के प्रतिभागियों के बीच। वह जो भी बोलेंगे उसे सच माना जाएगा और बाक़ी के प्रतिभागी छात्र उसका अंधा अनुसरण करेंगे।

Voltaire ने कहा था कि –

“If you want to know who controls you, look at who you are not allowed to criticize.”

(अगर आप को यह देखना है कि आप पर कौन शासन कर रहा है तो आप यह देखिए आप को प्रश्न पूछने से कौन रोक रहा है।)

अगर आप किसी के वर्चस्व में होते हैं तो आपको लगता ही नहीं है कि आपके ऊपर किसी की कोई सत्ता थोपी गई है। जो भी व्यवस्था बनी है या बनायी गयी है, उसे आप अपने लिए बेहतर मानते हैं। तब सत्ता आप के लिए एक ‘विश्वास तंत्र’ में बदल जाती है। अब इस विश्वास तंत्र के ख़िलाफ़ कोई विरोधी स्वर उठता है तो आप ख़ुद उस स्वर को दबाने की कोशिश करने लगते हैं। सबसे पहले प्रश्न पूछने वाले को अज्ञानी घोषित किया जाता है, फिर उसका चरित्र हनन करने की कोशिश होती है। उसे किसी विरोधी शक्ति का एजेंट बोला जाता है, जैसे ‘भाजपा का एजेंट’, ‘यहूदी का एजेंट’…आदि। फिर उसके ख़िलाफ़ फ़तवा दिया जाता है!

इसी बीच प्रोफ़ेसर मसूद आलम फ़लाही जैसे कुछ मौलाना पैदा हो गए हैं जिन्होंने न सिर्फ़ अशराफ़वाद की सत्ता को चुनौती दी बल्कि उन्हीं की लिखी हुई हदीसों और किताबों की पसमांदा हवाले से व्याख्या भी कर दी। उन्होंने अशराफ़ों की सत्ता के आध्यात्मिक आधार में सेंध लगा दी। मौलाना मसूद आलम फ़लाही की किताब ‘हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’ इस मायने में एक मील का पत्थर साबित हुई। इस किताब ने पोज़ीशन (पद) की लड़ाई को विचार के स्तर से उठा कर मनोविज्ञान के स्तर पर पहुंचा दिया। याद रहे आप का मनोविज्ञान ही आप के व्यवहार को निर्देशित करता है, इसलिए आपका व्यवहार वैसा ही रहेगा जैसी विचारधारा है। उदाहरण के लिए, सैयदवाद/मनुवाद/ब्राह्मणवाद एक विचारधारा है।  इस विचारधारा ने जो संस्कृति बनाई उसमें जातिवाद, छुआछूत, वर्ण व्यवस्था थी/है। हज़ारों सालों तक लोग मानते रहे कि वर्ण नाम की कोई चीज़ होती है पर जैसे-जैसे दलित चेतना तथा बहुजनवाद का उदय हो रहा हैं, वैसे-वैसे समाज एवं संस्कृति बदल रही है और उसी के अनुरूप हमारा मनोविज्ञान भी बदल रहा है। मतलब जब तक विचारधारा नहीं बदलती तब तक आपकी संस्कृति नहीं बदलेगी और जब तक आपकी संस्कृति नहीं बदलती, आपका मनोविज्ञान नहीं बदलेगा।

वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई विचार के स्तर से ही शुरू होती है। यही वजह है कि जब मौलाना मसऊद आलम की किताब आई तो आशराफ़ों में ख़लबली मच गई कि उनके वर्चस्व को चुनौती किसने दी? अशराफ़ और उनके मानसिक ग़ुलाम पसमांदा मौलानाओं ने उन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी क्योंकि अब धर्म का इस्तेमाल शोषण के लिए नहीं बल्कि शोषण के विरुद्ध लड़ने के लिए किया जाने लगा। अब तो खेल ही बदल गया। सैंकड़ों सालों में जो नहीं हुआ वह अब कैसे हो गया! अशराफ़ तबके के सबसे मज़बूत आधार यानी धार्मिक आधार पर ही हमला हो गया।  मदरसे जो अशराफ़वाद का सब से बड़ा अड्डा हैं, उसमें सेंध लग गई। अभी तक पसमांदा मौलानाओं का काम उन किताबों को सिर्फ पढ़ना और अमल करना था न कि उन किताबों में लिखे वाहियात तर्कों को चुनौती देना! यह पसमांदा आंदोलन का सबसे मज़बूत पक्ष था कि उनके खेल में उन्हीं को चुनौती दी जाए, हरा दिया जाए। अब अशराफ़ जातियों के पास दूसरा विकल्प यह है कि वह ‘हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’ किताब को हज़म कर लें यानी आत्मसात कर लें। इतिहास में हम यह देखते हैं कि जाति प्रथा के विरुद्ध जो भी आंदोलन खड़े हुए उन सभी आंदोलनों को मनुवाद ने आत्मसात कर लिया और इस तरह मनुवाद पहले से ज़्यादा मज़बूत हो कर उभरा।

हमें सबसे पहले पसमांदाओं को अशराफ़ों की आध्यात्मिक ग़ुलामी से निकालना पड़ेगा। जब तक ग़ुलामों को इस बात का अहसास न हो कि वह ग़ुलाम है तब तक किसी प्रकार का न विद्रोह होगा है न ही कोई बदलाव। पसमांदा समाज की चेतना अभी अविकसित अवस्था में है। जब तक चेतना का विकास नहीं होता तबतक उनका न तो कोई संगठन बन सकता है और न ही कोई आंदोलन खड़ा हो सकता है। यहाँ एक बात और स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि पसमांदा आंदोलन का मानना यही है कि हमारा समाज धार्मिक समाज है तो इसे धार्मिक तरीके से ही पहले समझाया जा सकता है। उनके अंदर चेतना का विकास किया जा सकता है। उसके बाद ही दूसरे तरीके इस्तेमाल किए जाएंगे। मार्क्सवादीयों का मानना था कि धर्म अफ़ीम है और आधुनिक तकनीकी समाज की प्रगति से धर्म अपना महत्व खोता जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं क्योंकि जो धर्म मज़दूर और मज़दूरी अर्थात श्रम और श्रमिकों के महत्व को मान्यता देते हैं उन धर्मों ने आसानी से आर्थिक और आध्यात्मिक संरचना को एक दूसरे से मिला लिया। कठोर पूंजीवादी संरचना में भी श्रम और श्रमिकों के लिए जगह बना ली गई। ज़कात, फ़ितरा, सूद (अर्थात ‘ब्याज’ जो कि इस्लाम में लेना और देना दोनों ही हराम है, पाप है) आदि की व्यवस्था इस्लाम धर्म को श्रम और श्रमिकों के अनुकूल बना दिया। यही वजह है कि पसमांदा जातियों का धर्म के प्रति वैसा गुस्सा नज़र नहीं आता जैसा गुस्सा शूद्र और दलित जातियों का हिन्दू धर्म के प्रति है। पसमांदा आंदोलन मानता है कि अगर कोई वकील किसी अपराधी को क़ानूनी किताब के ज़रिए बचाने की कोशिश करता है तो दूसरा वकील उस अपराधी को सज़ा दिलाने के लिए उसी क़ानूनी किताब का सहारा लेता है न कि उस किताब को फाड़ कर फेंक देता है। मतलब इस वक़्त पसमांदा आंदोलन की ज़रूरत पसमांदा नज़रिए से इस्लामी धार्मिक ग्रन्थों की व्याख्या है।

जहाँ तक मुसलमानों की एकता का सवाल है, उसे पहले से ही अगड़े (सवर्ण) मुसलमानों ने कई सम्प्रदाय तथा मसलक (अहल-ए-हदीस, बरेलवी, देवबंदी, वहाबी, सूफी, शिया, इत्यादि) बना कर ख़तरे में डाल रखा है। यह मिथकीय एकता केवल पसमांदा मुसलमानों को ग़ुलाम बनाए रखने और एक ख़ास अशराफ़ वर्ग के प्रभुत्व को बरक़रार रखने का प्रयास है। वह एकता किस काम की जहां न बराबरी हो और न ही आत्मसम्मान! अगर कोई एकता दमनकारी है तो ऐसी एकता बेमानी है। इस मिथक पर व्यंगात्मक अंदाज़ में प्रथम पसमांदा आंदोलन के जनक मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी (र.अ.) लिखते हैं कि –

“सुब्हान अल्लाह, भारत देश में सैकड़ो अंजुमनें बनाई जाएं, पचासों कांफ्रेंस आयोजित हों, एक दूसरे के खिलाफ गोलबंदियां की जाएं, एक अंजुमन व कांफ्रेंस के सदस्य दूसरी अंजुमन व कांफ्रेंस के सदस्यों को बेईमान, ग़द्दार, चोर आदि कहें, लिखें और मशहूर करें। यही नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत कमज़ोरियों और पारिवारिक ग़लतियों को प्रचारित करने के लिए पैसे बर्बाद करें। एक दूसरे को ईर्ष्यालु, गवर्नमेंट का जासूस आदि बताएं। काफ़िर व मुशरिक (ख़ुदा की ज़ात में दूसरे को शरीक करने वाला) के फ़तवे दिए जायें। यह बातें भारत में रोज़ हों, बराबर हों और बहुत ज़्यादा हों मगर उन सारी नालायकियों से मुसलमानों में एकता पैदा हो! निःस्वार्थ भाव से सेवा का उत्साह पैदा हो और अगर कोई ग़रीब व मजबूर समाज अपने उलेमा, (धर्म गुरुओं) नेताओं और लीडरों की तरफ़ से मायूस हो कर ख़ुद ही अपने सामाजिक सुधार व शिक्षा की व्यवस्था करे तो उस से मुसलमानों में विरोधाभास पैदा होने का डर प्रकट किया जाये। माशाअल्लाह!!”

(पेज नम्बर 4, अल-इकराम, 1 फ़रवरी 1927 ई०, जिल्द-2, नम्बर-2)

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