bride signing the marriage certificate
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कुफ़ू मान्यता और सत्यता

कुफू का शाब्दिक अर्थ बराबर, मिस्ल, हमपल्ला और जोड़ होता है। इस्लामिक विद्वानों (उलेमा) द्वारा ये शब्द सामान्यतः शादी-विवाह (वर-वधू) के सम्बन्ध में प्रयोग किया जाता है, अर्थात जब ये कहा जाता है कि फला फला का कुफू है तो अर्थ ये होता है कि फला फला आपस मे बराबर है और एक दूसरे से शादी हो सकती है। कुफू निर्धारण के आधार में इस्लामिक विद्वानों में कुछ मतभेद भी है। विद्वानों द्वारा सामान्यतः कुफू का निर्धारण कुछ मतभेदों के साथ दीन व तक़वा, दौलत, क्षेत्र, पेशा, आज़ादी-ग़ुलामी, जाति/कबीला, आदि आधार पर किया गया है। कुफू निर्धारण के उक्त आधार के फलस्वरूप मुस्लिम समाज में ये मान्यता स्थापित है कि –

“हज्जाम, जुलाहा और रंगरेज बराबर के नहीं हैं क्योंकि इनके काम नीच और घटिया हैं। सैयद सैयद के बराबर है। शेख, फारुकी, उसमानी, सिद्दीकी लोग आपस में बराबर हैं। बैतार (गाँव में घूमकर जख्म साफ़ करने वाला), अत्तार (तेल, इत्र बेचने वाला) से शादी कर सकता है। बजाज और अत्तार आपस में शादी कर सकते है। दर्जी, रंगरेज, हजाम और फर्राश (झाड़ू देने वाला) एक दूसरे के बराबर नही हैं। कुरैशी नस्ल (सैयद, शेख) की महिला का विवाह गैर कुरैशी पुरुष के साथ नही हो सकता क्योंकि गैर कुरैशी, कुरैशी के बराबर नही है।”1

1. शामी (दुर्रे मुख्तार), फतहुल कदीर (हिदाया पर लिखी गयी टीका)

हालाँकि इस्लामी सिद्धांत ठीक इसके विपरीत है। इस्लाम में ऐसे किसी सिद्धांत के लिए कोई स्थान नही है। हजरत अबू हुरैरा रज़ी0 बयान करते हैं कि आप सल्ल0 ने फ़रमाया –

“औरत से इन चार चीज़ों के आधार पर शादी की जाती है, उसके माल व दौलत के आधार पर या हसबो नसब(जाति) के आधार पर या हुस्न-ओ-जमाल(सुंदरता) के आधार पर या दीन व तक़वा(धर्म परायणता) के आधार पर। तो तुम दीनदार औरत (धर्म परायण) से शादी कर के कामयाब हो जाओ, अल्लाह तेरा भला करे।”2

2. मुस्लिम किताबुलनिकाह

सत्यता तो ये है कि ये तथाकथित अशराफ ओलामा जिन कामों को घटिया बताते हैं उन्हीं कामों को अशरफुल मख़लूक़ात (सर्वश्रेष्ठ मखलूक) अर्थात इन्सानों में सर्वश्रेष्ठ स्थान रखने वाली जमात (नबी/रसूल) में-से कई नबियों ने स्वयं उन कामों को, जैसे- कपड़ा बुनने व कपड़ा सिलने जैसे उन तमाम पेशों को अपनाया है जिनको ये नीच, घटिया व बाएशे शर्म घोषित कर रहे है। उदाहरणार्थ- हज़रत ज़करिया (अलैहि0) बढ़ई का काम करते थे।3 यहाँ तक कि आप सल्ल0 खुद बकरियाँ चराते थे और आपने स्वयं फ़रमाया कि –

“अल्लाह ने कोई नबी ऐसा नही भेजा जिसने बकरियाँ न चराई हों, सहाबा ने पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल आपने भी बकरियाँ चराईं? आपने फ़रमाया- मैं मक्का वालों की बकरियाँ मामूली उजरत (मेहनताने) पर चराया करता था।“4

3. मुस्लिम किताबुल फ़ज़ायल (ज़करिया अलैहि0)
4. बुखारी किताबुल एजारा

जहाँ तक कुरैशी महिला (सैयद, शेख) का गैर कुरैशी पुरुष व पेशे के ऐतबार से शादी का सम्बन्ध है तो स्वयं मोहम्मद सल्ल0 ने कई कुरैशी महिलाओं का विवाह गैर कुरैशी पुरुषों के साथ करवाया था। जैसे आप सल्ल0 ने एक कुरैशी महिला जिनका नाम फातमा बिन्त कैश था, का निकाह अपने आज़ाद किये गए ग़ुलाम ज़ैद बिन हारसा रज़ी0 के पुत्र ओसामा रज़ी0 से करवाया था5 जबकि ओसामा की माता एक कनीज (गुलाम/लवण्डी) थी, इसी परम्परा को आप द्वारा शिक्षित आपके सहाबा (साथियों) ने भी आगे बढ़ाया जिसका सबसे प्रमुख उदाहरण प्रथम व द्वितीय खलीफा क्रमशः हजरत अबू बक्र सिद्दीक व हजरत उमर फारूक रज़ी0 द्वारा सलमान फ़ारसी रज़ी0 द्वारा उनकी पुत्रियों के लिए भेजा गया पैगामे निकाह स्वीकार करना (ये अलग बात है कि द्वितीय खलीफा की पुत्री के साथ निकाह किन्ही परिस्थितियोंवश सम्भव न हो सका) तथा प्रथम खलीफा द्वारा अपनी पुत्री का उनके (सलमान फ़ारसी रज़ी0) साथ निकाह करना है। जबकि सलमान फ़ारसी उनके मुकाबले नव मुस्लिम भी थे, गैरकुरैशी भी थे, अजमी भी थे और चटाई बुनने का काम करते थे। हज़रत अबूबकर सिद्दीक रज़ी0 जो बेपनाह धनवान थे अपनी बेटी असमा रज़ी0 का निकाह निहायत गरीब ज़ुबेर बिन अव्वाम रज़ी06 से किया और अपनी बहन फरवह रज़ी0 का निकाह अशाअत बिन कैश रज़ी0 के साथ किया जो गैर कुरैशी थे और पेशे के ऐतबार से कपड़ा बुनने वाले थे।7 ये वह अबू बक्र हैं जिनका स्थान मोहम्मद सल्ल0 के बाद उम्मत में सबसे उच्च है।

5. सोनन-अल नेसाई
6. बुखारी किताबुलनिकाह, अलएसाबा वलइस्तियाब-इब्ने हजर असकलानी, अलजामे लेएहकामिल क़ुरआन-करतबी, सीरतुन नबी-अल्लामा शिबली नोमानी।
7. दार कतनी, अल एसाबा।

कुफू पर उक्त विचारधारा के विरुद्ध मैं अपनी बहस को हाशमी8 घराने से सम्बंधित महिलाओ (तथाकथित सैयदानी) के मुद्दे पर केंद्रित करना आवश्यक समझता हूँ क्योंकि जन्म, वंश के आधार पर श्रेष्ठ मानने वालों ने हाशमी घराने के लोगों को ही सर्वश्रेष्ठ माना है। कुछ विद्वानों ने तो सिवाए हाशमी पुरुष के अन्य किसी को इनका कुफू माना ही नहीं अर्थात हाशमी महिलाओं से शादी के योग्य हाशमी पुरुष के सिवा अन्य कोई पुरुष है ही नहीं। इस सिद्धांत को सही साबित करने के लिए इबलीसवादियोंद्वारा एक तर्क ये भी दिया जाता है कि हाशमी घराने की लड़की (तथाकथित सैयद की लडकी) का अन्य किसी के साथ निकाह न होने का एक प्रमुख कारण ये भी है क्योंकि उस पर जकात10 हराम है और अगर वह किसी और को ब्याह दी गयी और वह जकात का मुस्तहक (हकदार) होगा तो जकात खायेगा और इस तरह सैयदानी को भी जकात खाना पड़ेगा जो कि उस पर हराम है. इस तरह उससे जो औलाद होगी वह हराम (अकलहराम) होगी वगैरह-वगैरह।

8. क़ुरैश कबीले की वह शाखा जिसमे आप सल्ल0 का जन्म हुआ।
9. वह लोग जो इस्लामी सिद्धांत कर्म को श्रेष्ठता का आधार मानने की जगह जन्म,वंश को श्रेष्ठता का आधार मानते हैं।
10. वह रकम जो हर मालिके निसाब मुसलमान द्वारा निकालनी अनिवार्य है।जो उसके वार्षिक बचत का ढाई प्रतिशत होती है।

अगर तथाकथित सैयद पर ज़कात हराम मान भी ली जाये (हालाँकि ऐसा बिल्कुल नही है11) तो भी उक्त तर्क बिल्कुल निराधार है क्योंकि पति के लिए अगर ज़कात लेना जायज़ होगा तो शौहर की ली हुई ज़कात पत्नी के लिए ज़कात नही रह जायेगी क्योंकि इस गैर सैयद के लिए वह सदक़ा है और उसकी पत्नी के लिए हदिया क्योंकि नान नफ़क़ा की ज़िम्मेदारी भी उसी पर है इसकी दलील उम्मुल मोमिनीन12 हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ी0 की वह हदीस है जिसमें आप फरमाती हैं कि –

“एक मरतबा आप सल्ल0 तशरीफ़ लाये उस वक़्त चूल्हे पर एक हाण्डी थी (जिसमें गोश्त पक रहा था) आपकी खिदमत में सिर्फ रोटी और सालन दिया गया आपने फ़रमाया हाण्डी से कुछ क्यों नहीं दिया? बताया गया कि इसमें सदके का गोश्त है जो बरीरा (रज़ी0) को कहीं से मिला है और आप सदक़ा नही खाते आप सल्ल0 ने फ़रमाया इसके लिए सदक़ा है और हमारे लिए हदिया।”13

11. इस विषय पर विस्तृत बहस अग्रिम आर्टिकल "ज़कात और तथाकथित सैयद" नामक आर्टिकल में की जायेगी।
12. मुसलमानो की माँ
13. बुखारी किताबुल निकाह

जो लोग ज़कात को आधार बनाकर तथाकथित सैयदानी (महिला सैयद) को अन्य किसी का कुफू नहीं मानते उनसे जानना चाहता हूँ कि उनके पास इसका क्या जवाब है –

1- “आप सल्ल0 ने अपनी तीन साहबजादियों की और दूसरी हाशमी औरतो की आप सल्ल0 की मौजूदगी में बनू हाशिम13 के बहुत से लोगों ने अपने घराने की औरतों का निकाह गैर हाशमी लोगों से किया। यहाँ तक कि आपने अपनी फूफी ज़ाद बहन ज़ैनब रज़ी0 का निकाह अपने आज़ाद किये ग़ुलाम ज़ैद बिन हारसा रज़ी0 के साथ तथा अपनी चचेरी बहन जोबाआ रज़ी0 का निकाह मिसदाद बिन असवद रज़ी0 से किया जो गैर कुरैशी और एक वर्णन के मुताबिक हब्शी ग़ुलाम थे। क्या ये बात उस समय किसी की, यहाँ तक कि (नउजबिल्लाह) आप सल्ल0 की समझ में भी नही आयीं। जो तर्क आज ये अशराफ ओलमा (विद्वान) प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब तो यही अशराफ ओलमा दर असल आले इबलीस14 ही दे सकते हैं।”

14. इबलीस की पैरवी करने वाले अर्थात जो लोग श्रेष्ठता का आधार कर्म नही जन्म, वंश मानते हैं।

2- अशरफ अली थानवी (फारूकी), मुफ्ती शफी (उसमानी), कारी तय्यब (शेख), सैयद हुसैन अहमद मदनी, अब्दुल करीम, सैयद असगर हुसैन, मौलाना ज़करिया (सिद्दीक़ी), मुफ्ती अज़ीज़ुर्रहमान (उसमानी), मुफ्ती ज़फ़ीरुद्दीन, मुफ्ती तक़ी उसमानी (पूर्व चीफ जस्टिस पाकिस्तान),15 ने सारे शेखों (फारूकी, सिद्दीकी, उसमानी) को व मौलाना अहमद रज़ा ख़ाँ उनके पुत्र मुफ्ती मुस्तफा रज़ा ख़ाँ व अरशदुल क़ादरी16 ने सारे शेखो (फारूकी, सिद्दीक़ी, उसमानी) के साथ-साथ तालीम याफ्ता अन्सारी अर्थात अंसारे मदीना (जोलाहा नहीं), मुगल व पठान को भी सैयदानी का कुफू करार दिया है। क्या सादात पर जकात हराम मानने वाले इन सब (मुगल, पठान, अन्सारे मदीना) पर भी जकात हराम मानते हैं?

15. बहिश्ती ज़ेवर, नेहायतुल अरब फी गायातुन्नसब, अलक़ौलुर्रफ़ी, रिसाला मसावात इस्लाम की बाज़ रवायत के मुताल्लिक़ सवाल का मोफस्सल जवाब, किताबुल निकाह, फतावे दारूल उलूम देवबन्द, निकाह और बराबरी, मजहरूल उलूम(माहनामा)सहारनपुर अगस्त 1999, फ़ज़ायले आमाल।
16. फतावे रिजविया भाग-3, ज़ेरो-ज़बर।
The question of Kafu in marriage (by Pasmanda Democracy)

यह लेख 15 अक्टूबर 2017 को hindi.roundtableindia.co.in पर प्रकाशित हो चुका है।

नुरुल ऐन मोमिन 'आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ' (उत्तर प्रदेश) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और पेशे से एडवोकेट हैं.

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