Muslims offering namaz-e-juma
Google search result

पसमान्दा मुस्लिम : समान अवसरों से वंचित हाशिये का समाज

इस बात को दोहराने की ज़रूरत नहीं है कि कुल मुस्लिम आबादी में पसमान्दा मुसलमान संख्याबल में ज़्यादा हैं। इतने बड़े समाज/समूह को राजनीतिक दल किस तरह नज़र अंदाज़ कर सकते हैं! आखिर कौन सी ऐसी पहचान अहम मोड़ पर अचानक हावी हो जाती है कि पसमान्दा पहचान हाशिये पर चली जाती है! आजकल बहुत कम प्रतिशत वोट बैंक रखने वाले समूहों को भी मोल-भाव के बहुत से मौके मिल रहे हैं। ऐसे में पसमान्दा समाज की मोल-भाव क्षमता नहीं के बराबर होना, अफ़सोसनाक है।

आज तक यह तबक़ा हर तरह के बदलाव और लहर के बावजूद भी बतौर एक साझा पहचान के किसी भी राजनीतिक दल के द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। इस बात को स्वीकारा जाना चाहिये कि देश के राजनीतिक दलों ने Participative Democracy को बढ़ावा देने में अपना सकारात्मक किरदार अदा किया है और बहुत से महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। जिसके नतीजे में बहुत से वंचित समूहों को सामने आने का अवसर मिला है। इतने सारे परिवर्तन और सकारात्मक पहल के संदर्भ में पसमान्दा समाज के अस्तित्व और अस्मिता के सवाल अपने आप बहुत महत्वपूर्ण बन जाते हैं। जैसे देश के आबादी में बड़ा शेयर रखने वाला पसमान्दा तबक़ा अब तक क्यों उपेक्षित रहा! क्या इसे सेक्युलर दलों की नाकामी नहीं माना जाये! वंचितों के हमदर्द होने का दावा करने वाले यह दल लगभग 70 साल की जम्हूरियत में भी अत्यंत जोख़िम भरी स्थिति में रह रहे इस तबक़े को उसका संवैधानिक अधिकार क्यों नहीं दिला पाये!

हम यहां पर किसी दल विशेष या व्यक्ति विशेष पर दोषारोपण करने के बजाये स्थितियों के सही आंकलन पर ज़ोर देंगे। क्योंकि हमारा मानना है कि दोषारोपण की जगह मुद्दों को ठीक से समझना एवं उसके हल के लिये संविधान के दायरे में कोशिश करना एक जम्हूरी सिस्टम के लिए ज़्यादा ज़रूरी है। कुछ अपवादों के साथ जिस तरह देश में बुनियादी बदलाव के लिए कांग्रेस पार्टी के प्रयासों को नकारा नहीं जा सकता ठीक उसी तरह सोशलिस्ट और अंबेडकरवादी दलों के प्रयासों को भी रेखांकित करने की ज़रूरत है। यह भी कहना उचित होगा कि भविष्य में बड़े बदलाव की संभावना भी इन्हीं दलों से जुड़ी है। इन दलों के अंदर राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प बनने की पूरी संभावना है। इन दलों की हर क़िस्म के प्रगतिशील समाज में समान स्वीकार्यता इन्हें ज़्यादा मज़बूत एवं संभावनापूर्ण बनाती है साथ ही ज़रूरी बदलाव के लिये आत्म विश्वास भी प्रदान करती है। अगर यह दल देश के पसमान्दा समाज को मुख्य धारा मे लाने के लिये नेक नियति के साथ प्रयास करते हैं तो इस समाज के सपनों को साकार किया जा सकता है।

समान पहचान, समान सरोकार

यहाँ पसमान्दा के शाब्दिक अर्थ पर चर्चा करना ज़्यादा अहम नहीं है। बल्कि यह सवाल ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं कि पसमान्दा के आजीविका के साधन क्या हैं! इनके आर्थिक, सामाजिक और तालीमी सरोकार क्या देश के दूसरे वंचित तबक़ों से अलग हैं? क्या पसमान्दा भारत के पिछड़े, दमित और हाशिये के लोगों से कोई अलग पहचान रखते हैं? अगर इनकी पहचान दूसरे वंचितों की तरह ही हैं तो फिर पसमान्दा समाज को सकारात्मक पहल (Affirmative Actions) का फ़ायदा क्यों नही मिल पाया। इसे भारतीय संविधान का अहम हिस्सा कहा जाता है। डॉ. अंबेडकर ने भी इसे बहुत ज़रूरी माना था।

पसमान्दा विमर्श पेश किये गये सवालों के आस पास ही केन्द्रित है। देश के बहुजन में पसमान्दा तबक़ा भी आता है। देश की अन्य पेशागत जातियों, समूहों की तरह इन में भी आजीविका का साधन अपने दूसरे भाई-बंधुओं की तरह समान है। अन्य समूहों की तरह इस समाज में भी विविधता मौजूद है और पहचान के बहुत से हवाले हैं। पसमान्दा समाज का दुर्भाग्य यह है कि इस तबके को अवसरों और संसाधनों की प्राप्ति में संविधान की बुनियादी धारणा के विपरीत भेदभाव सहना पड़ता है।

उदाहरण के तौर पर देश के बुनकरों को लिया जाये तो इस तबक़े की पेशागत पहचान एक है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में बुनकरों का यह तबक़ा कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 4.5% शेयर करता है। देश के कई राज्यों में हिंदू और अन्य धर्म के मानने वाले बुनकर अनुसूचित जातियों में शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर गुजरात में कोली/कोरी बिरादरी आदि को देख सकते हैं। इसके साथ ही बुनकरों की उप जातियाँ भी आर्थिक, सामाजिक स्थिति के आधार पर अनुसूचित जतियों की सूची में सम्मिलित हैं। उन्हें संविधान में मौजूद रियायत मिलती है। इस संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ऐसे समूह/जातियाँ ना सिर्फ मुख्य धारा का हिस्सा बन रही हैं बल्कि संविधान की शक्तियों की स्वीकार्यता को भी परिभाषित कर रही हैं। इस संदर्भ में सबसे दुखद बात यह है कि मुस्लिम बुनकर अनुसूचित जातियों की सूची से बाहर हैं। इस तरह के दूसरे उदाहरण भी मौजूद हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या इस जगह पर धार्मिक पहचान के अलावा कोई और फ़ैक्टर काम कर रहा है? यहाँ कुछ देर ठहर कर सोचने की आवश्यकता है कि जब हमारा संविधान धर्म, रंग और क्षेत्र आदि के आधार पर भेदभाव को नकारता है तो इस मुद्दे पर आखिर क्यों असमानता है? इस सवाल पर तमाम प्रगतिशील लोगों, दलित मुस्लिम एकता का नारा देने वाले दलों तथा सेकुलर दलों को विचार करने की आवश्यकता है। हमारा मानना है कि इस सवाल को सुलझाये बिना वंचितों की एकता (Oppressed Unity) का कोई भी नारा बेमतलब है।
 

इस पूरे संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि धार्मिक उन्माद के इस दौर में वंचितों को उनके अधिकार दे कर ही समतावादी समाज की कल्पना को साकार किया जा सकता है। हमारा यह मानना है कि पेशागत समानताओं के आधार पर समाज के अलग अलग समूहों को चिन्हित करना और इन समाजों के समायोजन से एक तरह की ठोस पहचान बनाते हुये संविधान प्रदत्त अधिकारों की बहाली का प्रयास करना होगा। इस प्रयास से हम ना सिर्फ धार्मिक उन्माद का काट खोज पायेंगे बल्कि देश कि तरक़्क़ी और एकता के लिये भी महत्वपूर्ण होंगें।

आज जबकि दुनिया के प्रगतिशील देशों में विद्यमान असमानताओं को क़ुबूल करने का माहौल बन गया है तो हमें भी इस बारे में संजीदगी से विचार विमर्श करते हुए क़दम बढ़ाने की ज़रूरत है। किसी भी प्रगतिशील समाज की यह विशेषता होती है कि वह अपने अंदर की असमानता को खुले मन से स्वीकार करता है क्योंकि जब आप इसे स्वीकार कर लेते हैं तो अगला क़दम समस्या के समाधान की तरफ बढ़ाते हैं।

देश के पसमान्दा तबक़े के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक सरोकार भी देश की बहुजन आबादी की तरह हैं। सामाजिक और आर्थिक आधार पर समानता इस समाज का मक़सद है इसलिये संसाधनों और अवसरों की प्राप्ति में किसी भी तरह के भेदभाव को नकारना इस तबक़े का बुनियादी नारा है। यह बात सौ प्रतिशत सच है कि हमने कतिपय कारणों से सामाजिक संरचना को मज़बूत करने की जगह राजनैतिक संतुलन को संजोये रखने पर ज़्यादा ध्यान केन्द्रित किया है। यही वजह है कि हम लगभग 70 साल की इस जम्हूरियत में कहीं ना कहीं नाकाम रहे हैं। इस तरह देश निर्माताओं के सपनों के अनुरूप काम नहीं किया है।

प्रगतिशील ताक़तों के द्वारा ठोस सामाजिक संतुलन स्थापित नहीं कर पाने के कारण ही यह नज़ारा देखने को मिल रहा है कि खुले तौर पर एक बड़े समाज/ समूह को मुख्य धारे से काट देने की बात कही जाती है। इस संबंध में यह देखना ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि आखिर क्या कारण होते हैं कि इस तरह की मुहिम में देश के पसमान्दा और दमित तबक़े ही हमेशा Receiving End पर होते हैं। इसका जवाब ऊपर की लाइनों में मौजूद है! ऐसी स्थिति में संजीदगी के साथ किया गया प्रयास ही प्रगतिशीलता की ज़मानत होगा। इस बात पर गांठ बांध लेने की ज़रूरत है कि समाज संरचना में समतावादी एवं संविधान के अनुरूप नज़रिया ही देश की बुनियाद को मज़बूत बनायेगा और हाशिये के लोगों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।

आयोग, कमेटियां और पसमान्दा के सवाल

पसमान्दा की पहचान पर विचार करें तो यह बात सामने आती है कि इनकी पहचान भी देश के बहुजनों की पहचान है। मंडल आयोग कि रिपोर्ट इस सम्बंध में बहुत अहमियत रखती है। कुछ एक अपवादों को छोड़ कर इस आयोग कि सारी सिफ़ारिशें पसमान्दा तबके पर लागू होती हैं। लेकिन क्या आज पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि लगभग 28 साल के बाद मंडल आयोग की सिफ़ारशों से पसमान्दा तबक़ा लाभान्वित हुआ है?

इसका जवाब अगर हाँ में होता तो जस्टिस राजेन्द्र सच्चर (सच्चर कमेटी) अपनी रिपोर्ट में इस तबक़े की हालत दलितों (SC & ST) से बदतर नहीं बताते। यहीं पर ज़रा ठहर कर सोचने की ज़रूरत है कि आखिर क्या कारण है कि मंडल आयोग पसमान्दा तबक़े को प्रावधानों के बावजूद भी अधिकार नहीं दे सका? सच तो यह है कि ना इंसाफ़ी यहाँ से शुरू होती है। पहले तो मुस्लिमों की दलित जातियों को ग़लत ढंग से ओबीसी सूची में जगह दी गयी यह जानते होए भी कि इनकी स्थिति अन्य अनुसूचित जातियों के समान है।

ओबीसी एक बड़ा धड़ा है। लैंड होल्डर ओबीसी जातियों का मुकाबला मजदूरी करने वाली ओबीसी जातियां नहीं कर सकतीं। इस व्यवस्था को ओबीसी वर्गीकरण के द्वारा बैलेंस किया जा सकता है। इसकी मिसाल बिहार का कर्पूरी ठाकुर फार्मूला और अन्य राज्यों में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) मॉडल है। इस समूह में विविधता बहुत ज़्यादा है और ये धड़ा तरह-तरह के प्रयोगों से भी गुज़रा है। इस समूह में बहुत सी जातियों के अंदर धार्मिक कट्टरता बढ़ी है। नतीजे में मुस्लिम ओबीसी और अन्य ओबीसी के बीच अवसरों की प्राप्ति में अंतर देखने को मिला है। मुस्लिम ओबीसी को मिले कम अवसरों के बारे में जागरूक और समझदार लोग कहते हैं कि धार्मिक पहचान यहाँ पर मुख्य कारण है।

प्रकाश अंबेडकर ने भी अपने एक इंटरव्यू मे ओबीसी की बहुत सी जातियों को धार्मिक कट्टरता से प्रभावित बताया था। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ओबीसी वर्गीकरण के नहीं होने के कारण भी मुस्लिम ओबीसी अन्य प्रभावशाली ओबीसी जातियों से पिछड़ते रहे हैं। अवसरों की प्राप्ति में धार्मिक पहचान का सवाल खड़ा होना अफ़सोस नाक है। इससे स्थिति साफ होती है कि मंडल आयोग से लाभान्वित पिछड़ा वर्ग धार्मिक उन्माद और प्रोपगेंडे कि चपेट में हैं। यह हालात बहुत ही चिंताजनक हैं।

इसलिये बहस का निचोड़ यह है कि संविधान के अनुरूप आर्थिक और सामाजिक बुनियादों को Policy Making का आधार बनाया जाये। धार्मिक पहचान को नकारा जाये। इस सम्बंध में जस्टिस राजेंद्र सच्चर और जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आदि की सिफ़ारिशों को अमल मे लाया जाये। हमारा विश्वास है कि अगर संजीदगी के साथ प्रयास किया जाये तो समतामूलक और धार्मिक उन्माद से आज़ाद समाज कि बुनियाद डाली जा सकती है। इस प्रयास से हम Participative Democracy को आगे बढ़ायेगें एवं हाशिये के लोगों को मुख्य धारा का हिस्सा बना कर Nation Making में सहायक बन सकेंगे।

लेखक जेएनयू से पी.एच.डी. हैं। सामाजिक मुद्दों पर उनके लेख दि प्रिंट, फारवर्ड़ प्रेस, मीड़िया विजिल आदि में छपते रहते हैं।

Leave a reply:

Your email address will not be published.