Image from a propaganda video released on March 17, 2014 by the Islamic State of Iraq and Syria (ISIS) via AFP. Image credit: USNI News

इस्लामी आतंकवाद और पसमांदा मुसलमान

लाल बहादुर वर्मा लिखते हैं ,आतंक से आतंकवाद का सफर लम्बा है. आदिकाल से मनुष्य आतंकित होता आ रहा है और आतंकित करता आ रहा है. मनुष्यों ने अपनी सत्ता को लेकर जो भी संस्था बनाई उसमे अक्सर आतंक को एक उपकरण के रूप में प्रयोग किया. धर्म में ईश्वर का आतंक, परिवार में पितृसत्ता का आतंक, राज्य में सर्वभौमिक्ता का आतंक अर्थात सेना, पुलिस का आतंक’. बहरहाल हम यहाँ जिस आतंक की बात कर रहे हैं उससे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश से लेकर व्यक्ति दोनों आतंकित हैं. आमतौर से आतंकवाद की परिभाषा यही बताई जाती है कि ‘आतंकवाद राजनैतिक या सामाजिक उद्देश्य के लिए एक हिंसक व्यवहार है जो समाज या उसके बड़े भाग में भय पैदा करने के लिए किया जाता है.’ गौरतलब है कि ये परिभाषा इस मायने में आधी अधूरी है कि वह गैर-राज्य कारकों द्वारा की जाने वाली हिंसा पर तो आतंकवाद की मोहर लगाती है लेकिन सरकार द्वारा की जाने वाली हिंसा को इस परिभाषा से बाहर रखती है. इसका कारण ये है कि जिसे आतंकवाद कहा जाता है वह ‘स्वीकृत हिंसा’ के दायरे में नहीं आता. पर दिलचस्प बात यह है कि इस ‘अस्वीकृत हिंसा’ जिसे आतंकवाद की श्रेणी में रखा गया है और ‘स्वीकृत हिंसा’ जिसमे सरकार चाहे तो किसी भी प्रकार का दमन कर सकती है, के बीच विभाजक रेखा बेहद झीनी है. गुलाम भारत में अंग्रेज़ सरकार भगत सिंह को आतंकवादी कहती थी लेकिन आज भगत सिंह को स्वतंत्रता सेनानी की हैसियत हासिल है. कब कौन सी सरगर्मी आतंकवाद के खाते में डाल दी जाए और किसे ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’, ‘बड़े पेड़ गिरने से धरती थोड़ी तो कांपती है’ या ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ कह कर नवाज़ा जाए यह तैय करने का काम ख़ास तबकों के ही अधिकार में रहा है. 1988 में आई Rambo III याद करें उस फिल्म में तालिबान वहां हीरो हैं जो रूस के खिलाफ लड़ रहे हैं और अमेरिका इनकी मदद कर रहा है। रूस के हारने के बाद और वर्ल्ड ट्रेड टावर गिरने के बाद यह आतंकवादी हो गए और आज 20 सालों बाद फिर अमेरिका तालिबान से आतंकवाद का तमगा हटा रहा हैऔर अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत को वैधानिक दर्जा देने को तैयार है. तो सवाल यह है कि किसी संगठन या व्यक्ति को आंतकवादी कहना और फिर उससे आतंकवाद टैग वापस लेना यह कौन तय करता है ?

छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर राज्यों या कश्मीर में सेना द्वारा की गई हिंसा स्वीकृत हिंसा है क्योंकि माना जाता है कि वह देश की रक्षा में की गई हिंसा है. परआज के दौर में स्वीकृत हिंसा का एक नया रूप भी सामने आया है, कुछ उदाहरण लें- गाय की हत्या की अफवाह पर 30-32 पसमांदा मुसलमान मार दिए जाते हैं और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, उल्टा हत्यारों को मंत्री जी माला पहनाते हैं. कश्मीर में बकरवाल समुदय की लड़की ‘आसिफा’ का बलात्कार होता है और बलात्कारियों के पक्ष में रैलियाँ निकाली जाती हैं. राजस्थान में एक शेरशाहाबादी जाति के अफ़राजुल को शम्भू लाल रैगर मारता है और उसकी वीडियो भी बनाता है. फिर भी उसके पक्ष में चंदा जमा किया जाता है. राजस्थान उच्य न्यायालय की छत पर चढ़ कर भगवा फैराया जाता है. इन सारी हिंसाओं को हमारे बहुसंख्यक समाज ने अपनी मौन स्वीकृति दी है. क्या इस स्वीकृत हिंसा को आतंकवाद नहीं कहना चाहिए या कहा जाएगा?

आमतौर से बताया जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. ये बात इसलिए बताई जाती है ताकि इस्लाम को या मुसलमानों को आतंकवाद से न जोड़ा जाए. यह एक सुनियोजित गणित पर आधारित गढ़ी गई कहानी होती है ता कि एक मुस्लिम खुद को कथित मुस्लिम आतंकवादी से परे कर के सोचे और खुद को उनसे अलग कर के देखे. ऐसा करने पर सवर्ण हिन्दू राष्ट्रवादीयों को अपना खेल खेलना आसान हो जाता है. लेकिन सरकार ने जो खालिस्तान के विरुद्ध किया उसे वह कभी उस शिद्दत से पटल पर नहीं लेकर आती जितनी शिद्दत से कश्मीर के आतंकवाद को. जबकि कश्मीरी आतंकवाद से पहले असम का उल्फा और बोडो संघर्ष भी उभरा था. आज भी बंगाल में गोरखा संघर्ष, पूर्वोत्तर में नागा संघर्ष, छत्तीसगढ़ की नक्सल हिंसा, कश्मीर कश्मीर के संघर्ष के साथ-साथ ही चल रहा है. पर इन आतंकवादों की एक क्षेत्रीय प्रकृति थी. लेकिन पिछले कुछ समय में राष्ट्रिय स्तर पर आतंकवादी गतिविधियाँ भी बढ़ी हैं. यह गौर करने वाली बात है कि भारत में ये गतिविधियाँ न्यायालय की लचर प्रकृति के साथ-साथ बढ़ी हैं. अर्थात साम्प्रदायिकता के उभार ने आतंकवाद को बल दिया है. पर भारत में साम्प्रदायिक और जातिये आतंक (हाशिये के समाज पर होने वाला सवर्णों का आतंक) को आतंकवाद की कैटेगरी में नहीं रखा जाता क्योंकि जो लोग इसको बढ़ावा दे रहे हैं वे सवर्ण समाज से आते हैं और जैसा कि कहा गया है कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ उसी प्रकार इन सवर्णवादी संगठनों द्वारा की गई हिंसा, हिंसा नहीं है तो आतंकवाद के खाने में भला कैसे फिट होगी फिर! सवर्णवादी संगठनों ने पहले राजनीति का साम्प्रदायिकरण किया फिर साम्प्रदायिकरण का अपराधीकरण किया और अब अपराधीकरण को देशभक्ति से जोड़ रहे हैं. कोई भी गुंडा हाथ में तिरंगा लिए किसी को भी मार सकता है. उसके द्वारा की गई हिंसा को राष्ट्र हित में उचित ठहरा दिया जाएगा. हमारे  प्रधान सेवक का मौन उनकी हिंसा को स्वीकृति प्रदान करता है. यह पूरा मामला लाभ हानि को ध्यान में रखते हुए खेला गया खेल है.  

कुछ साल पहले शीबा असलम फहमी आतंकवाद और कुरआन शरीयत की व्याख्या के ऊपर राजेंद्र यादव जी को जवाब लिखते हुए एक लेख लिखा था ‘सब धान बाइस पंसेरी‘ उसमें शीबा असलम फहमी कहती हैं कि ‘आपने मेरे बहाने मुस्लिम समाज से यह भी पूछा है कि ”क़ुरान और शरियत के इंटरप्रिटेशन (व्याख्याएं) ही तालिबानों के दिशा-निर्देश बनते हैं और फ़िदायीनों का निर्माण करते हैं.” राजेन्द्र जी, काश धर्म के प्रति आपकी झुंझलाहट और ग़ुस्सा, आपको और गहरे अध्ययन व विश्लेषण की ओर प्रेरित कर पाता. ‘तालिबान’ के कुकर्मों से लेकर बेमानी हिंसा तक जो कुछ भी हो वह इस्लाम या क़ुरान सम्मत इसलिए नहीं बन जाता क्योंकि उसे अरबी भाषा के किसी शब्द से पुकारा जाता है. ‘तालिबान’, ‘मुजाहिदीन’, ‘लश्कर’, ‘फ़िदायीन’, ‘जेहादी’, ‘जैश’ आदि अरबी शब्दों की आड़ में अफ़ीम व अवैध हथियारों से लेकर सिखों से जज़िया वसूलने जैसे जो गोरखधंधे चल रहे हैं वह विशुद्ध आधुनिक ‘पर्वरजन’ हैं, जिन्हें ‘इस्लामी’ गतिविधियां मानकर आप इन गिरोहों को धार्मिक वैधता दे रहे हैं. विश्व बिरादरी इनकी हरकतों को जितना ‘इस्लाम’ से जोड़ेगी यह उतने ही मजबूत होंगे. इन घटनाओं को ‘इस्लामिक आइडियल टाइप’ की पहचान देना ही सबसे ख़तरनाक भूल है. और यह आपसे चाहते भी बस इतना ही हैं कि इनकी हरकतों को ‘इस्लामी’ माना जाए जिससे जनसाधारण भ्रमित हो और इन्हें व्यापक विरोध का सामना न करना पड़े. उनके मनमुआफ़िक़ यह ग़लती आप जानकारी की कमी के कारण करते हैं, अमरीका इसे प्रायोजित करता है, जिससे कि उसे इन समाजों को ‘सुधारने, लोकतांत्रिक व सभ्य’ बनाने के अधिकार प्राप्त हो सकें. (ज़रा एडवर्ड सईद की ‘ओरियन्टल थियरी’ दोहरा लीजिए तो समझ में आएगा कि) यह अरबी नामोंवाले आंदोलन व दस्ते जो 1400 सालों में कभी नहीं बने, अब कुकुरमुत्तों की तरह क्यों उग रहे हैं?

तालिबान’ का प्रायोजक अमरीका के सिवा कौन है? क्या ज़्यादा बड़ा सवाल यह नहीं कि इन अवैध गिरोहों के पास कभी न ख़त्म होने वाली अत्याधुनिक हथियारों की निर्बाध सप्लाई कहां से हो रही है? क्या इनके पास बम, लांचर, मोर्टार, मिसाइल, टैंक, ए.के. 47 ग्रेनेड जैसे अतिआधुनिक हथियारों व उपकरणों की उत्पादन तकनीक व क्षमता है? यह कैसे अचानक इन महंगे और सटीक हथियारों के साथ बिलों से प्रकट हो जाते हैं? कौन-सा बाज़ार, तंत्र व एजेंसियां है जो हथियारों की बिक्री व उन्हें इन हवाई-पटटीविहीन बीहड़, दुर्गम स्थानों तक ‘एयर लिफ्ट’ व ‘ड्राप’ कर रही हैं? इतनी बड़ी संख्या में सामरिक साज ओ सामान बिना किसी की नज़र में आए, इन ठिकानों पर कैसे पहुंचता है? विश्व भर में चल रही मन्दी का असर इन गिरोहों की गतिविधियों पर क्यों नहीं दिखता? या कहीं ऐसा तो नहीं कि किन्हीं ‘बाज़ारों’ की मंदी को इन्हीं ख़रीदारों के ज़रिए उबारा जा रहा हो?

अमरीका, इज़्राइल, चीन जैसे हथियारों के दुकानदारों की ‘धर्मनिरपेक्ष तटस्थता’ उनसे यह सवाल नहीं करती कि आख़िर उनका बनाया-बेचा माल कहां खप रहा है? जब भारत में आतंकवादियों से मिले छोटे हथियारों से यह तुरंत चिन्हित हो जाता है कि यह हथियार कहां का उत्पादन है तो वहां युद्ध-टैकों व रॉकेट-लांचरों के खुलेआम प्रयोग के बावजूद यह सवाल कोई क्यों नहीं उठाता? स्वयं अमेरिका ही यह बुनियादी सवाल क्यों नहीं करता? आख़िर यह कोई छोटे-छोटे हीरे-जवाहर तो है नहीं कि पठान अपनी शलवार के नेफ़े में छुपाकर तस्करी कर ले? इनके उ॰गम का स्थान तय कर ‘सप्लाई पर रोक’ लगाने के लिए अमरीका जैसा सक्षम ग़ुंडा चुप क्यों है? क्योंकि उसका मक़सद दोनों पक्षों को हथियार बेचते रहना है बस.'(इस विषय पर आप को 2018 में आई Vice फिल्म देखना चाहिए जिसे  Adam McKay.  ने directed किया था )

अभी हाल में लगातार आतंकवाद को आधार करके कई सीरीज़ बनाई गई है जिसमें स्पेशल ऑप्स , The Family man ,Bard of Blood अनुभव सिन्हा निर्देशित फिल्म ‘मुल्क’ आई है जिसकी वजह से दुबारा आतंकवाद पर चर्चा शुरू हो गई थी. इससे पहले भी बॉलीवुड आतंकवाद पर केंद्रित फ़िल्में बनाता रहा है. सुभाष गई की कर्मा,मेहलू कुमार की तिरंगा पर आप गौर करें कि 80 के दशक में बनने वाली फिल्मों में आतंकवाद का विशेषत: कोई धर्म नहीं होता था पर 90 के दशक में बनने वाली फिल्मों में आतंकवाद को पूरी तरह से पकिस्तान द्वारा आरोपित एक छदम युद्ध के रूप में दिखाकर एक नया रुख दे दिया जैसे रोज़ा, सरफरोश, दिल से, माँ तुझे सलाम, जाल आदि. फिर अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड टॉवर पर अमेरिका के डॉलर पर पले आतंकवादियों ने हमला कर दिया; और इसके साथ ही शुरू हो गया अमेरिकी प्रोपोगंडा. अब साफ़ तौर पर आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ दिया जाता है. हॉलीवुड की तरह हमारे बॉलीवुड ने भी इस बात को अंगीकार कर लिया. फना, धोखा, मुखबिर, आमिर, ए वेडनेस्डे आदि फिल्मों में अब न सिर्फ आतंकवाद का एक धर्म था बल्कि अब आतंकवाद राष्ट्र-देशों की सीमा पार कर के एक अंतर्राष्ट्रीय हैसियत हासिल कर चुका था. किसी गैर-मुस्लिम मासूम बच्चे से एक आतंकवादी का चेहरा बनाने को कहा जाए तो बहुत संभव है वह एक धार्मिक मुस्लिम (जिसकी दाढ़ी है, जो टोपी लगता है, जो नमाज़ पढ़ता है) का चेहरा बना बैठे. इस तरह की धारणा ने खासी हद तक अवचेतन में जगह बना ली है. अब एक नया एंगल भी गाढ़ा जा रहा है जहाँ आतंकवादी ‘इस्लामिक भेसभूषा’ में नहीं है। यह भी आपकी तरह एक आम नौजवान हैं जींस पेंट पहनते हैं दाढ़ी नहीं रखते. इस प्रकार हम यह देखते हैं कि इन फिल्मों के माध्यम से अमेरिका और पश्चिमी देशों का मकसद पूरा होता है. दुनिया को एक शत्रु मिल जाता है. ऐसे में अमेरिका के लिए आतंकवाद का आरोप लगा कर किसी भी मुस्लिम देश पर हमला कर उसे बर्बाद करना,अपने हथियारों की प्रदर्शनी करना और उसके खनिज संसाधनों को लूटना न्यायोचित हो जाता है जैसे इराक, अफगानिस्तान, सीरिया आदि पर उसने इस नेरेटिव का भरपूर इस्तेमाल किया है. इस तरह हम देखते हैं कि फ़िल्में परसेप्शन बनाने का काम करती हैं कि ‘हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता पर हर आतंकवादी मुस्लिम होता है.’

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मै माफ़ी चाहूंगा अगर अब आप को बुरा लगे पर यहाँ मै आतंकवाद का जातिय चरित्र भी देखना चाहता हूँ.यह सवाल करना ज़रूरी है क्योंकि पसमांदा मुसलमान अपनी मुस्लिम पहचान के कारण जहाँ निशाने पर होते हैं वही मुस्लिम समाज के अंदर अपनी पसमांदा पहचान के कारण यह हाशिये पर होते हैं. मुस्लिम पहचान की आड़ में ये बातें छुप जाती है कि इस आतंकवाद की जड़ में कौन है? इन हिंसाओं से किसे लाभ पहुँच रहा है? क्या साम्प्रदायिक आतंकवाद का लाभ सवर्ण हिंदूवादी संगठनों को नहीं मिल रहा? एक ज़रा चुभता हुआ सवाल पूछता हूँ- जितने भी ‘स्वघोषत इस्लामी आतंकवादी संगठन‘ हैं उनका मुखिया किस जाति विशेष का है? कितने आतंकवादी संगठनो के मुखिया पसमांदा समाज से आते हैं? हाँ, दोनों ओर के फुट-सोल्जर पसमांदा और दलित समाज से ज़रूर आते हो सकते हैं. एक उदाहरण से समझाता हूँ- पसमांदा समाज से आते समाजशास्त्री प्रो. खालिद अनीस अंसारी एक मज़ेदार बात बताते हैं. वे कहते हैं कि-

“कश्मीर के आतंकवाद का भी जातिय रूप है. उनके शब्दों में, ‘थोड़ा कश्मीर पर नज़र डालें जहाँ पर हिंसा एक तौर-ए-ज़िन्दगी बन गई है. अभी कश्मीर में एम.एच.ए. सिकंदर जो वहाँ के रिसर्च स्कॉलर एंव एक्टिविस्ट हैं, ने 10 मई 2017 को डेली ओपिनियन में ‘The Brahmins among Muslims We Don’t Talk About’ शीर्षक के तहत एक आर्टिकल लिखा है. यह आर्टिकल कश्मीर पर है एक कश्मीरी सय्यद द्वारा. वे लिखते हैं, ‘To this day the Syeds dominate the bureaucracy and the invisible apartheid continues. The Islamic revivalist movements that spread their network in Kashmir, including Jamaat-e-Islami, too were dominated by the Syeds.’ यानि ‘पूरे प्रशासन पर सय्यद हावी हैं और ये अदृश्य रंगभेद जारी है. और जो इस्लामी पुनरुद्धार आंदोलन जिन्होंने जमाते-इस्लामी समेत पूरे कश्मीर में अपना नेटवर्क फैलाया है, वह सभी सय्यद द्वारा शासित हैं.”

“Few Syeds and Khojas lost their lives or took part in the insurgency”. यानि ‘भारत के खिलाफ जो इंसर्जेंसी है उस में बहुत कम सय्यद परिवार और बहुत कम [सय्यद] लोगों ने अपनी जानें दीं हैं. (कश्मीर में Khojas दूसरी अमीर जातियों को कहते हैं)

“But both United Jihad Council and Hurriyat Conference was dominated by Syeds, who want the sacrifices from the non-Syeds and luxurious lives for their wards and extended family” यूनाइटेड जिहाद और हुर्रियत कांफ्रेंस दोनों सय्यद के कब्ज़े में है जो कि दूसरों (यानि पसमांदा) द्वारा कुर्बानियाँ चाहते हैं जबकि अपने और अपने विस्तृत परिवार

परिवार के लिए सुविधाओं भरी ज़िन्दगी चाहते हैं.

“They have used every mechanism to keep the masses occupied with the conflict so that they don’t engage with the larger questions associated with it, including caste and privileges”. (उन्होंने (सय्यदों ने) सभी तंत्रों का इस्तेमाल लोगों को एक झगड़े में उलझाये रखने के लिए किया है ता कि वे, जाति और सुविधाओं समेत इससे जुड़े बड़े सवालों की तरफ न मुड़ सकें)

इतिहास में यह पहला आर्टिकल आया है जिसने कश्मीर के मुसलमानों की जातीये समस्या को खोलकर रखा है. इन सब बातों पर हमारा तथाकथित सेक्युलर ख़ेमा कभी चर्चा नही करेगा. यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि आतंकवाद का भी जातिय चरित्र होता है.

अगर हम भारत के मुस्लिम समाज की बात करें तो मुसलामनों में शिक्षा का स्तर कम है भारतीय पसमांदा समाज को पंचरवाला कह कर लोग मज़ाक बनते हैं. यक़ीनन इससे मुझे भी दुःख होता है पर इस सवाल का जवाब तो देना होगा न कि मुसलमानों का 85% पसमांदा समाज आज अगर गलाज़त में जी रहा है तो कसूरवार कौन है? सरकार को तो हम जी भर के गालियां देते ही हैं पर अब हमें अशराफ मुस्लिम रहनुमाओं से सवाल करने होंगे. हमारे मुसलिम समाज के धार्मिक और राजनीतिक रहनुमाओं ने कौन-सी रणनीति बनाई है जिस पर चल कर यह समाज अपनी गलाज़त से निकल सके? शिक्षा और रोज़गार क्या हमारी मुस्लिम राजनीति का हिस्सा है भी? ये समस्याएं आखिर कभी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा क्यों नहीं बन पाती हैं? तलाक के मुद्दे पर तो सड़कें भर देने वाले हमारे धार्मिक रहनुमा क्या इन मुद्दों पर कभी सड़कों पर निकले हैं? हिंदुत्व (फासिस्ट ताकतों) को मुसलमानों का सबसे बड़ा खतरा बताने वाले हमारे रहनुमाओं ने उससे लड़ने के लिए कौन-सी लोकतांत्रिक रणनीति समाज को दी है? कैसे हम इस खतरे का मुकाबला करें? क्या कोई तरीका है मुसलिम समाज के पास? दरअसल, हमारे रहनुमा (धार्मिक और राजनीतिक दोनों) सिर्फ जज्बाती बातों पर अपनी रोटियां सेंकने का काम करते हैं. हर चुनाव में ये इन पसमांदा मुसलामनों की भीड़ दिखा कर अपने बेटों और दामादों के लिए सीट मांग लेते हैं. बिहार का शरीयत बचाव आंदोलन तो अभी हाल का उदाहरण है. इनके पास समाज की स्थिति को सुधारने की कोई रणनीति नहीं है. इसलिए ये पसमांदा समाज को तालीम, रोजगार और विकास जैसे मुद्दों से भटकाने के लिए बुरका, मदरसा, अलीगढ़, ईशनिंदा, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों में उलझाए रखते हैं. अगर फिर कोई मज़ाक बनता है तो ये अपना सीना भी पीटते हैं कि हमारा मज़ाक बनाया जा रहा है.

हम यह भी देखते हैं कि पुलिसिया रिपोर्ट के आधार पर बेगुनाह मुलिस्म नौजवान अपनी ज़िंदगी का 14-14 साल जेल में गुज़ार देते हैं. जो लोग 14 साल बाद आतंकवाद के मामले से रिहा हो रहे हैं. उनकी ज़िन्दगी के उन साल की क्षतिपूर्ति कैसे होगी? जिन पुलिस वालों ने इन नौजवानों पे झूठे आरोप लगाकर चार्जशीट फ़ाइल की थी क्या उनपे कार्यवाही होगी? क्या आज तक किसी पुलिस अधिकारी पर इस बिना पर कोई कार्यवाही हुई है? उनके घरवाले (और वो खुद) जिन्होंने एक ‘आतंकवादी’ के रिश्तेदार के रूप में जो यातनाएं झेली है उसका मुआवज़ा क्या होना चाहिए? ऐसे ढेर सारे सवाल हैं जिनके जवाब न सरकार की ओर से न प्रशासन की ओर से कभी नहीं दिए जाएंगे. लेकिन इसका परिणाम क्या होगा ये सोचने वाली बात है. आज आलम यह है कि पूरे हिंदुस्तान में कहीं से भी जब किसी मुस्लिम युवक को पुलिस आतंकवादी कह कर उठाती है तो मुस्लिम समाज से पहली प्रतिक्रिया ये आती है कि ‘बेचारे निर्दोष को उठा लिया अब 6-7 साल जेल में यूँ ही रखेंगे’ या ‘जाने कब छूटेगा’ ये प्रतिक्रियाएं बहुत स्वभाविक हैं. ये प्रतिक्रिया ये भी बताती है मुस्लिम समाज का सरकार/प्रशासन पे कितना भरोसा है और सरकार और प्रशासन ने भरोसा कायम रखने के लिए क्या किया है? अगर सरकार और प्रशासन चाहते हैं कि भरोसा कायम हो तो उन अधिकारियों पर इमानदारी के साथ कार्यवाही की जानी चाहिए. मुस्लिम समाज का भरोसा जीतने के लिए सरकार और न्यायालय दोनों को पहल करने की आवश्यकता है. सिर्फ जज साहब द्वारा पुलिस वालों को नसीहत दे कर छोड़ने से तो काम नहीं बनने वाला.

~लेनिन मौदूदी

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