Image credit:cartoonist Mir Suhail
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कभी लोकतंत्र, कभी सैन्यतंत्र के बीच पिसते म्यांमारवासी

कभी लोकतंत्र, कभी सैन्यतंत्र के बीच पिसते म्यांमारवासी 

बर्मा, ब्रह्मदेश या म्यांमार कहूँ, इसे 1948 में आज़ादी तो मिल गई थी लेकिन आज़ादी मिलने के साथ ही म्यांमार आंतरिक संघर्षों में उलझ गया। कभी चुनाव होने के कुछ साल बाद तो कभी चुनाव के परिणाम आने के साथ, दोनों ही समय सेना की दखलंदाज़ी देखने को मिलती रही है। फिर चाहे वह 1962 हो, 1988 हो या 1990, सेना तख्ता पलट कर सत्ता पर काबिज होती रही है। यूं कहें तो आमतौर पर 1962 के बाद से म्यांमार में सैन्य शासन ही रहा है। 1988 में स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे वहां के नेता आंग सान की बेटी सू की को लोकतंत्र समर्थक नेता के रूप में लोकप्रियता हासिल हुई। 1988 में म्यांमार में आम चुनाव हुए और आंग सान सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेटिक (एनएलडी) ने बहुमत हासिल की। लेकिन सेना जुंटा ने इस परिणाम को अनदेखा कर दिया और चुनावी धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए सैन्य शासन लागू कर दिया। सैन्य शासन लागू होते ही सू की को नजरबंद कर दिया गया।

2008 में सत्तारूढ़ जुंटा ने राज्य शांति और विकास परिषद में लोकतंत्र के लिए खाका तैयार कर नए संविधान की घोषणा की। जिसमें ह्लुटाव(निचला सदन) में सेना के लिए 25% सीटें आरक्षित की गईं और रक्षा मंत्रालय, सीमा सुरक्षा और गृह मंत्रालय को सेना के अधीन किया गया। यह ज़ाहिर सी बात है कि जिस देश की सेना के पास इतने ज़्यादा अधिकार हों, वहाँ लोकतंत्र को जिंदा रखना आसान काम नहीं है। 2010 में सू की को रिहा कर दिया गया। 2011 के आम चुनाव हुआ जिसमें सैन्य समर्थित यूनियन सोलिडेरिटी एन्ड डेवलपमेंट पार्टी की जीत हुई। दूसरा आम चुनाव नवम्बर 2015 में हुआ, जिसमें नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेटिक ने जीत हासिल की। तीसरा आम चुनाव 8 नवम्बर 2020 को सम्पन्न हुआ, जिसमें नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेटिक ने 83 प्रतिशत सीटों पर जीत हांसिल की। लेकिन जिस दिन संसद का पहला सत्र शुरू होने वाला था, उसी रात सेना ने तख़्तापलट कर सत्ता अपने हाथों में ले ली। दस साल पहले ही देश ने लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई थी लेकिन एकबार फिर से देश सैन्यशासन की ओर लौट आया है। सेना ने सू की और राष्ट्रपति यू वी मिंट समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर सत्ता अपने हाथ मे ले ली है और सैन्य ने टीवी चैनलों के माध्यम से एक साल के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी है। कई शहरों में इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद कर दी गई हैं। अब सत्ता कमाण्डर-इन-चीफ़ मिन आंग व्हाइन्ग के हाथ में है। विश्व भर के तमाम देशों ने लोकतंत्र कायम रखने के पक्ष में अपनी प्रतिक्रियाएं दी जिसमें सबसे मुखर होकर अमेरिका ने आवाज उठाई है। 

सेना का मानना है कि 8 नवम्बर 2020 को हुए चुनाव में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी हुई है। इस  आपातकाल के एक साल के दौरान चुनाव में हुई धोखाधड़ी की समीक्षा की जाएगी, चुनाव आयोग में सुधार किया जाएगा और एक  साल का आपातकाल खत्म होने के बाद फिर से चुनाव होगा। 

आंग सान सू की एक शांति आइकन या भस्मासुरी सेना की पोषक– 

आंग सान सू की का जन्म 1945 में रंगून में हुआ था। सू की के पिता आंग सान ने आधुनिक बर्मी सेना की स्थापना की थी। 1947 में आंग सान की राजनैतिक हत्या कर दी गई थी। सू की अपनी माँ और दो भाईयों के साथ रंगून में बड़ी हुईं। स्नातक की पढ़ाई लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान से करने के बाद 1972 में भूटान में रह रहे डॉ. माइकल हैरिस से शादी की। अपने कारावास के दौरान सू की वैश्विक आइकन बन गईं। 1991 में नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद, वैश्विक मीडिया ने उनकी तुलना महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला से की थी। 1992 में सू की को अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य के लिए भारत सरकार ने जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया था। सू की नजरबंदी के बाद 2010 में रिहा हुई। जिसके बाद नवम्बर 2015 में हुए आम चुनाव में वह चुनाव लड़ीं और जीत हासिल किया।

2017 में रखाइन प्रान्त में पुलिस चौकियों पर हुए आतंकवादी हमले के कारण सेना द्वारा एक अभियान चलाया गया, जिसे सेना ने ‘जातीय सफाया’ का नाम दिया। बीते साल दिसंबर में डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (एमएसएफ़) ने बांग्लादेश पहुंचे शरणार्थियों के साथ एक सर्वे किया था। सर्वे में पाया गया कि 25 अगस्त से 24 सितम्बर के बीच कुल 9,000 रोहिंग्या लोगों की मौत हुई और लाखों रोहिंग्या देश छोड़ने को मजबूर हो गए थे। जिसके चलते दुनिया के बड़े शरणार्थी संकटो मे से एक म्यांमार के कारण पैदा हो गया। इस्लामिक देशों के सहयोग संगठन (ओआईसी) की तरफ से गांबिया द्वारा दायर याचिका में म्यांमार सेना और सुरक्षा बलों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ जनसंहारक कार्रवाही का आरोप लगाया गया था। गाम्बिया ने संयुक्त राष्ट्र के जांच मिशन के रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि – संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त स्वतंत्र मानवाधिकार के विशेषज्ञों और जाँचकर्ताओं ने भी अगस्त 2019 में पेश की गई अपनी एक रिपोर्ट में उन हालात के बारे में कुछ इसी तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था, जिनकी वजह से इतनी बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोगों को बांग्लादेश भागना पड़ा। म्याँमार पर संयुक्त राष्ट्र के जाँच मिशन की रिपोर्ट के अनुसार

“महिलाओं और लड़कियों की व्यवस्थित तरीक़े से हत्या करना, प्रजनन आयु की लड़कियों और महिलाओं को चुनकर उनका बलात्कार करना, गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर हमले करना, उनके प्रजनन अंग को भंग करना और उन्हें ज़ख़्मी बनाना, उनके गालों, गर्दनों, छातियों और जांघों पर जबड़ो से काटने के निशान बनाना, महिलाओं और लड़कियों को इस तरह गंभीर रूप से घायल कर देने कि वो अपने पतियों के साथ यौन संबंध बनाने या गर्भ धारण करने लायक़ ना रह जाएँ और उन्हें इस चिंता में दाख़िल कर देना कि अब वो बच्चे पैदा करने के योग्य नहीं बचें, इन सभी अपराधों के लिए देश की सेना ज़िम्मेदार है.”।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त स्वतंत्र मानवाधिकार

9 दिसम्बर 2019 को हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के जजों के सामने आंग सान सू की ने सुनवाई में सेना का बचाव करते हुए कहा कि म्यांमार की सेना यानी ततमादेव ने जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल किया है, पर उनके देश को ही रखाइन में सैनिकों या सैन्य अधिकारियों द्वारा इन संभावित युद्धापराधों की जांच का मौका मिलना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के लिए यह धारणा बनाना मददगार नहीं होगा कि सिर्फ संसाधन वाले धनी देश ही अपने देश मे समुचित जाँच करके मुकदमा चला सकते हैं।  

सत्ता संभालने के बाद सू की ने चुप्पी साधकर अंतरराष्ट्रीय प्रशासकों और फिर हेग में रोहिंग्या मुसलमानों के सैन्य उत्पीड़न का मुखर रूप से बचाव कर मानवता को निराश कर चुकी हैं। यदि वह सेना की नजर में अच्छी बने रहने के लिए ही नरसंहार का समर्थन कर रही थी तो, वह निश्चित रूप से ही उनके काम नहीं आया है। सू की के भी हाथ रोहिंग्या के खून से रंग चुके हैं। जिस भस्मासुर को वह पालपोस कर बड़ा कर रहीं थी वही उसको भस्म करने के लिए आज सामने आया है, तो हैरत किस बात की हो रही है। म्यांमार में फिर से लोकतंत्र की खिड़की खुलने में पता नहीं कितना वक्त लगेगा। शायद एक साल, दो साल या फिर उससे कहीं अधिक। जिन्होंने पिछली बार म्यांमार के लोकतांत्रिक संघर्षों का समर्थन किया था, वह फिर से ऐसा करने में हिचक महसूस करेंगे, क्योंकि सू की उन्हें एक बार निराश कर चुकी हैं। समर्थन के लिए भी अब उन्हें म्यांमार में एक नए नायक या नायिका की तलाश होगी, जो म्यांमार को एक नई दिशा और दशा प्रदान कर सके। 

अनामिका जैन अम्बर का एक शेर है-
रियासत भी  तुम्हारी है सियासत भी तुम्हारी है 

सलाखें भी तुम्हारी  और हिरासत भी तुम्हारी है 

जिसे चाहे कहो मुजरिम किसी सूली पे लटका दो 

वकालत भी तुम्हारी है अदालत भी तुम्हारी है।

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