Indian Muslim Sultans and Kings Image credit : pinterest.com

मध्यकालीन अशराफ़ इतिहास के पसमांदा सवाल

हम यह जानते हैं कि पसमांदा मुसलमानों का न कोई राज्य रहा है और न कोई राजा। क़ौम के बनाए ढांचें में पसमांदा मुसलमान तब तक फिट नहीं हुए जब तक लोकतंत्र में प्रत्येक वोट का महत्व नहीं बढ़ा। विदेशी नस्ल के मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों ने भारतीय पसमांदा समाज को कभी अपने बराबर नहीं समझा और यही हाल विदेशी नस्ल के उलेमा का भी रहा। कई प्रमुख मध्यकालीन उलेमा न सिर्फ़ भारतीय हिंदुओं के बल्कि वह भारतीय मुसलमानों के भी ख़िलाफ़ थे। यह तथाकथित मुस्लिम उलेमा, बादशाह और सुल्तान जब तक हुकूमत में रहे तब तक यह इस्लामी मसावात (बराबरी) को अपने पैरों तले कुचलते रहे। आज जब दक्षिणपंथी ताक़तें तथाकथित मुस्लिम/इस्लामी हुकूमत को निशाना बना कर अपना राजनीतिक हित साधने की कोशिश कर रही हैं तब इन अशराफ़ उलेमाओं, बादशाहों की 10वीं-11वीं पीढ़ियां अपने इतिहास को (जो कि पसमांदा समाज के लिए मनुवादी इतिहास रहा है) पूरे मुसलमानों के इतिहास के रूप में पेश कर रही हैं। उन्हें पता है कि 85% पसमांदा इन तथाकथित मुस्लिम/इस्लामी हुकूमत पर पसमांदा विरोधी हुकूमत होने का आरोप लगाने लगें तो फिर इन की साख नहीं बच पाएगी। इस लिए इस दौर की सरकार द्वारा मध्यकालीन हुकूमत को तथाकथित मुस्लिम/इस्लामी हुकूमत कहना जहां दक्षिणपंथी हिन्दुओं के हित में है तो वहीं दक्षिणपंथी अशराफ़ मुसलमानों के भी हित में है।

इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या का लाभ

यही एक तरीक़ा है शोषकों के पास कि वह शोषितों के दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर लें,जैसा कि Steven Biko कहता है ‘The most potent weapon of the oppressor is the mind of the oppressed ‘(दमनकारी के हाथ उत्पीड़न का सबसे ताकतवर हथियार पीड़ित का दिमाग है) शोषित पसमांदा मुसलमान, अपने शोषक अशराफ़ शासक वर्ग के शोषण को भूल कर उन की संस्कृति को अपनी संस्कृति और उन के इतिहास को अपना इतिहास बना लेंगे। यही वजह है कि अशराफ़ वर्ग दशकों से इन सुल्तानों, बादशाहों, उलेमाओं के बारे में झूठे क़िस्से और कहानियां गढ़ता आया है। पसमांदा समाज को कभी अपना अनुभव दर्ज करने का मौक़ा ही नहीं दिया गया। पसमांदा समाज सदियों से अशराफ़ों के अनुभव को अपना अनुभव, उन की जीत को अपनी जीत और उन के झूठे क़िस्सों को इतिहास मानता रहा है। इस का नतीजा यह हुआ कि कई उलेमा, बादशाह और सुलतान ऐतिहासिक पुरुष न हो कर दिव्य पुरुष बन गए। अब कुछ बादशाहों का सम्बन्ध इतिहास से नहीं रहा, बल्कि अब इन्हें मुस्लिम आस्था का विषय बना दिया गया है। आस्था का विषय बनाने का लाभ यह है कि सारे प्रश्न रोक दिए जाएंगे, अब कोई शोध उन की छवि को धूमिल नहीं कर सकता। अगर ऐसा किसी ने किया तो ईशनिंदा की तरह उस को लोग देखने लगेंगे। एक बार जब सारे हमलावरों को (इस्लाम की राह में किया गए जेहाद) इस्लामी योद्धा(गाज़ी) घोषित कर स्थापित कर दिया जाए और मंदिर तोड़ने और लूटने को ‘बुत-शिकन'(मूर्ति भंजक) घोषित कर दिया जाए तो फिर क्या खुद को ज़्यादा धार्मिक समझने वाले पसमांदा मुसलामन इन अशराफ़ बादशाहों और सुल्तानों की आलोचना भी बर्दाश्त कर पाएंगे! फिर वही होगा जैसा कि किसी शायर ने कहा है…

चंगेज़ खान महान था हलाकू महान था

इस देश में जो आया वह डाकू महान था

पहचान की राजनीति

जेम्स मिल शायद वह पहला व्यक्ति था जिस ने इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या सबसे पहले की थी। मिल ने भारतीय इतिहास को हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में बांटा। उस ने ब्रिटिश काल को ईसाई काल नहीं कहा। यह एक सोचा समझा तरीक़ा था जिस से भारत में सिर्फ़ दो ही पहचान उभरें (हिन्दू-मुस्लिम समाजों की अन्य पहचानों पर कोई बात न हो) और उन में ही टकराव हो और ऐसा हुआ भी। अधिकतर अशराफ़ इतिहासकारों, शायरों, लेखकों ने मध्यकाल के इतिहास को अपने सुनहरे काल की तरह पेश किया और ऐसा ही सवर्ण इतिहासकारों और कवि लेखकों ने प्रचीन भारत के इतिहास के साथ किया। अब्दुल हलीम शरर, राशिद-अल-खेरी तथा हाकिम मुहम्मद अली ने ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। सुल्तानों और बादशाहों को पूरे मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि के रूप में दिखाया। ऐसा दिखाया जाता है जैसे वह बादशाह होने की हैसियत से नहीं बल्कि एक मुसलमान होने की हैसियत से शासन कर रहे थे। इन लेखकों और शायरों की नज़र में यह मुसलमानों का स्वर्णीम युग था यही वजह है कि दशकों से भारत में कट्टर हिंदुत्ववादी शक्तियों ने ‘मुस्लिम पहचान’ को निशाना बनाने के लिए भारत के ‘मुस्लिम इतिहास’ और ‘मुस्लिम बादशाहों’ को निशाना बना रहे हैं। पर क्या वाक़ई यह सुल्तान और बादशाह भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं!

इस संदर्भ में पसमांदा समाज के साथ दिक़्क़त यह है कि वह एक साथ दो पहचानों के साथ डील करता है। जहां वह अपनी मुस्लिम पहचान के कारण दक्षिणपंथी हिन्दुओं के निशाने पर आ जाता है, वहीं अपनी पसमांदा पहचान के कारण वह मुस्लिम समाज के अंदर हाशिए पर नज़र आता है। उस के इतिहास को, उस के दुःख को, उस के शोषण को तथाकथित भारत के मुस्लिम इतिहास की चादर में छुपा लिया जाता है। जिसे अशराफ़ लेखक और कवि मुसलमानों का स्वर्णिम युग कहते हैं, वही युग पसमांदा मुसलमानों के लिए दासत्व, अवमानना व अवनति का प्रतीक था। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि ‘मुस्लिम’ सुल्तानों और बादशाहों ने पसमांदा समाज को कभी अपना नहीं समझा। ऐतिहासिक दृष्टि से हम दक्षिणपंथियों की इस बात को सिरे से ख़ारिज नहीं कर सकते कि इन ‘मुस्लिम’ और इन के विदेशी अमीरों की राजनीतिक-धार्मिक-सांस्कृतिक स्वामिभक्ति भारत से बाहर थी। भारतीय पहचान को, भारतीय संस्कृति को तो यह बादशाह हमेशा ही हीन समझते थे। भारत हमेशा ही इन के लिए कर्मभूमि बनी रही, जन्मभूमि या मातृभूमि नहीं बनी। 

इतिहास में हिन्दू शासन या हिन्दू पहचान प्रमुख न हो कर जाति, नस्ल, देश, राज्य कि पहचान प्रमुख हुआ करती थी। उसी तरह मुस्लिम पहचान कभी भी कोई एक पहचान नहीं रही है। यहाँ भी अरब, तुर्की, ख़िलजी, लोदी आदि काल रहा है। इन मुसलमान बादशाहों की विदेशी नस्ल की पहचान हमेशा ही प्रमुख बनी रही हैं। स्थानीय संस्कृति को यह हमेशा ही घृणा की दृष्टि से देखते रहे। इन की भाषा विदेशी रही जिसे राजनितिक संरक्षण प्राप्त था। पसमांदा मुसलामनों की भाषा हमेशा हीन समझी गई। इन के दरबार के रीति-रिवाज विदेशी रहे। अशराफ़ मुसलमानों में जातिय/नस्लीय गर्व इतना था और है कि वह अपने विदेशी मूल का शजरा (परिवार वृक्ष) रखते हैं और अपने नामों के साथ अपने पूर्वजों के नाम और यहाँ तक कि अपने विदेशी शहर का नाम भी लगाते थे। (लोधी और सूरी शासकों ने भारतीय संस्कृति को महत्व दिया क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान से होने के नाते इन को भी हीन समझा जाता था) अशराफ़ लेखकों, कवियों, इतिहासकारों और सवर्ण-अशराफ़ फ़िल्म डायरेक्टरों ने इन्हीं अशराफ़ संस्कृति को ‘मुसलमानों की संस्कृति’ के रूप में पेश किया। पसमांदा मुसलमानों के साथ दिक़्क़त यह हुई कि वह इन विदेशी संस्कृति को अपनाने के चक्कर में वह अपनी स्थानीय संस्कृति से कट गए और इन विदेशी मुसलमानों ने इन्हें कभी आत्मसात भी नहीं किया। जब भी इन अशराफ़ मुसलमानों पर कोई मुसीबत आती तो इसकी वजह उलेमा भारतीय पसमांदा मुसलमानों की हिन्दू रीति-रिवाजों के कारण ईमान में आई कमी को दर्शाते। (इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए मसूद आलम फलाही की किताब ‘हिन्दुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’ पढ़ें)

नस्लीय-जातीय सर्वोच्चता की मानसिकता

अशराफ़ बार-बार यह तर्क देते हैं कि मुसलमानों (अशराफ़) की हुकूमत 800 साल तक भारत में रही। अगर यह बादशाह चाहते तो सभी को मुसलमान कर देते। मतलब उन्होंने ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन नहीं कराया। अब सवाल यह उठता है कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया! क्या वह सभी धर्मनिर्पेक्ष थे या इस्लाम कि तालीमात को मानते थे (तुम्हारा दीन तुम्हारे साथ मेरा दीन मेरे साथ) या फिर इसके पीछे कोई आर्थिक कारण और निम्न जातियों के प्रति इन की तिरस्कार की भावना रही है! ‘मुस्लिम’ सुल्तानों और बादशाहों के प्रशासन को अगर हम देखें तो पाते हैं कि उन के प्रशासन में कोई भी पसमांदा मुसलमान नज़र नहीं आता। यहाँ तक कि भारत के ऊंची जातियों से धर्मांतरित मुसलामन भी प्रारम्भ में उन के प्रशासन में आप को नज़र नहीं आएंगे।

निज़ाम-उल-मुल्क तोसी ने सियासत नामा में लिखा है कि दिल्ली के सुल्तानों ने ईरानी राजाओं की विचारधारा और सभ्यता को स्वीकार कर लिया था। राज्यकीय विभागों और उच्च पदों पर तो तुर्को का ही वर्चस्व था। भारतीय मूल(पसमांदा) के मुसलमान विभागों(शासकीय) और पदों से दूर ही रहें। केवल मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली का वह पहला बादशाह था जिसने भारत के योग्य  व्यक्तियों को जो मुसलमान हो चुके थे कुछ उच्च पद दिए, हालांकि यह बात बाहर से आये हुए मुसलमानो की इक्षा के विरुद्ध होती थी, जो बिना किसी गैर (भारतीय मूल के लोग) के मिश्रण के शासन के व्यवस्था प्रणाली में अंदर तक पहुँच रखते थे, और उन्होंने जातिगत अस्मिता के गैर इस्लामी विचार की तरफ झुकाव को हवा दिया।

सुल्तान शमसुद्दीन अल्तमश और गयासुद्दीन बलबन स्थानीय मुसलमानों को घृणा की नज़र से देखतें थें। अल्तमश ने 33 मुसलमानों(भारतीय मूल के पसमांदा) को शासकीय पदों से केवल इसलिए बर्खास्त कर दिया कि उनका सम्बन्ध किसी उच्च वर्ग के परिवार से नही था। और बलबन ने निचले स्तर के मुसलमानों(पसमांदा) को सरकारी पदों से बर्खास्त करते हुए कहा था कि मैं जब नीच परिवार के किसी सदस्य को देखता हूँ तो मेरा खून खौलने लगता है।

पेज न० 14, ज़ात-पात इस्लाम की नज़र में, मौलाना डॉ० अब्दुल हक़ कासिमी

नस्ल और ज़ात के आधार पर यह अपने मनसब/पद बाटा करते थे। अगर कोई स्थानीय मुसलमान ऊंचे पद पर पहुंचने की कोशिश भी करता तो उसे हटा दिया जाता था। मसऊद आलम फ़लाही अपनी किताब ‘ज़ात-पात और मुसलमान’ में लिखते हैं सुल्तान इल्तुतमिश और बलबन जो ग़ुलाम वंश से थे, इन के वक़्त में किसी निचली जाति के व्यक्ति (चाहे वह मुसलमान ही क्यों न हो ) की ऊंचे पद पर नियुक्ति नहीं हो सकती थी। अगर यह मालूम हो जाए कि कोई पदाधिकारी निचली जाति का है तो उसे पदच्युत कर दिया जाता था। बलबन ने तो बाक़ायदा एक विभाग ‘नकाबत’ बनाया था जो पदाधिकारियों की जाति की जांच करता था। बलबन का मानना था की शासन के दायित्व को अकुलीन व्यक्तियों में नहीं बाटा जा सकता है। सुल्तान शमशुद्दीन अल्तमश के काल में निज़ामूल मुल्क(एक उच्च शासकीय पद) जुनैदी(कोरी/जुलाहा मसूद pg 187) ने जमाल मरज़ूक़( जो पसमांदा जाति से थे) को एक पद देना चाहा तो  मंत्री ख्वाजा अज़ीज़ बिन बेहरोज़ ने एक फ़ारसी का शेर(दो पंक्तियां) पढ़ा जिसका अर्थ है-

” नीच के हाथ में क़लम ना दें अगर उसमे साहस आ गया तोकाबा में लगे काले पत्थर को इस्तिनजे का ढेला* बना देगा”

पेज न० 57,ज़ात-पात इस्लाम की नज़र में, मौलाना डॉ० अब्दुल हक़ कासिमी

* मुस्लिम मूत्र त्यागने के बाद पानी से धोते है या मिट्टी के ढेले से सुखाते हैं। इसी को इस्तिनजा कहते हैं।

यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि शुरुआत के सुल्तान दास हुआ करते थे। इरफ़ान हबीब लिखते हैं कि दासों को जातिविहीन माना जाता था। इस्लाम क़ुबूल करने के बाद उन्हें किसी भी काम में लगाया जा सकता था। वह जिस काम से जुड़ते थे कालांतर में उन की जाति वही गिनी जाती थी।(इरफ़ान हबीब, ‘भारतीय इतिहास में जाति और मुद्रा’, पेज-19) यह सुल्तान ग़ुलाम होने के बावजूद ख़ुद को विदेशी शासक वर्ग का ही मानते थे और भारत की पसमांदा जातियों से नफ़रत करते थे। विदेशी मुसलामनों की श्रेष्ठता की अवधारणा ने स्थानीय मुसलमानों की प्रगति के सारे रास्ते बंद कर दिए और उन्हें समाज की निचली सीढ़ी पर बने रहने को बाध्य किया। इतिहासकार मुबारक़ अली अपनी किताब ‘इतिहास का मतान्तर’(पेज-61) में लिखते हैं कि उन विदेशी मुसलामनों के बच्चों तक को घृणा की नज़र से देखा जाता था जिन की माताएं स्थानीय होती थीं। उदाहरण के तौर पर दक्षिण भारत में अरब के अधिवासियों को ‘नवैत’ कहा जाता था। जब उन में से कुछ ने तमिल स्त्रियों से विवाह कर लिया तो उन के द्वारा उतपन्न बच्चों को ‘लब्बी’ कहा गया तथा उन्हें अरब परिवारों के बराबर नहीं माना गया।  कोरोमंडल में बसने वाले अरब, स्थानीय मुसलमानों की सामाजिक-सांस्कृतिक परम्परा को ग़ैर-इस्लामी मानकर घृणा करते थे।मुबारक़ अली आगे लिखते हैं कि जब सिकंदर लोदी के उत्तराधिकार का सवाल उठा तो अफ़ग़ान संभ्रांत वर्ग ने इस आधार पर उस का विरोध किया कि उसकी मां स्थानीय थी तथा सुनारों की जाति की थी। सिंध में मुज़फ्फर खान तुर्क को गद्दी का उत्तराधिकारी इस लिए नहीं बनने दिया गया क्यों कि उस की मां सिंधी ‘झरिया’ जनजाति की थी। मिर्ज़ा बाक़ी तरख़न जिस की मां एक सिंधी थी, को हिकारत से ‘सिंधी बच्चा’ कहा जाता था।

पसमांदा समाज का तिरस्कार

इतिहासकार मुबारक अली अपनी किताब ‘इतिहास का मतांतर’ (पृष्ठ 28) में लिखते हैं कि ‘मुस्लिम शासक-श्रेणी’ अपने ऊंचे सामाजिक रुतबे के प्रति सचेत थी। वह किसी निम्न जातिय धर्मान्तरित मुसलमान को अपने बराबर मानने को तैयार ही नहीं थी। इस लिए उन्होंने केवल राजपूत या ब्राह्मण आदि सवर्ण हिंदुओं को धर्मान्तरित करने तथा उन के साथ बराबरी का सम्बंध रखने की कोशिश की। विजेता के रूप में वह निम्न जातियों को सामाजिक तौर पर पिछड़ा रखना चाहते थे क्यों कि यही वह लोग थे जो हर क्षेत्र में उन की सेवा करते थे। किसान से ले कर झाड़ू देने वाले तक सभी निचली जातियों के थे। मुबारक अली लिखते हैं मुस्लिम शासक-श्रेणी ने दो स्तम्भों पर अपनी सत्ता स्थापित कर रखी थी और वह दो स्तंभ थे-धार्मिक श्रेष्ठता तथा विदेशी होने का भाव। मुबारक़ अली आगे लिखते हैं कि अकबर पहला मुस्लिम शासक था जिस ने भारत की दूसरी शासक पहचानों (राजपूत और ब्राह्मण) को महत्व दिया है। अकबर के बनाए प्रशासनिक ढांचे पर ही औरंगज़ेब जैसे बाद के बादशाह भी चलते रहे परन्तु अकबर महान ने भारत की पसमांदा पहचान को इस क़ाबिल नहीं समझा था। पसमांदा मुसलमानो के साथ ना सिर्फ सामाजिक आधार पर घृणा और नीचतापूर्ण व्यवहार किया गया, बल्कि सरकारी तौर पर भी उनसे नफरत की गई जैसा कि

मुग़ल राजा अकबर ने कसाईयो और मछुआरों के लिए राजकीय आदेश जारी किया था कि उन के घरों को आम आबादी से अलग कर दिया जाये और जो लोग इस जाति से मेलजोल, आना जाना रखें उनसे जुर्माना वसूला किया जाए।

नई दुनिया हफ्ता रोज़ा अखबार, 12-18 मार्च 2018 पेज न० 16, उन्वान दास्तान गरीब नवाज़ किस्त पहली, खान आसिफ
आयिने अकबरी जिल्द न ० 1, न ० 349
(दीन इलाही का पसे मंज़र पेज 222)
पेज न० 61, ज़ात-पात इस्लाम की नज़र में, मौलाना डॉ० अब्दुल हक़ कासिमी
अनुवाद एवं प्रस्तुति: फैयाज़ अहमद फैज़ी

 मसऊद आलम फ़लाही अपनी किताब ‘हिन्दुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’ (पृष्ठ 204) में लिखते हैं कि एस.सी. दुबे को नक़्ल करते हुए लिखते हैं कि अकबर ब्राह्मणों से धर्मांतरित हिन्दुओं को सैयद का दर्जा देता था। आगे वह अकबर का एक फ़रमान नक़्ल करते हैं जहां अकबर अपने आदेश में कहता है कि “शहरों में नीची क़ौम के लोगों को इल्म हासिल करने से रोक दिया जाए क्योंकि इन क़ौमों के इल्म हासिल करने से फ़साद पैदा होता है।” ना सिर्फ पद और प्रोत्साहन में उच्च और निम्न का विभेद किया जाता था बल्कि सज़ा के निर्धारण में जातिगत श्रेणी के अनुसार भी भेद किया जाता था जैसा कि आइने अकबरी भाग-2, पेज संख्या 233 पर उच्च और निम्न परिवार के सदस्यों पर अर्थदंड का विवरण कुछ इसतरह लिखा है-

अगर नीच श्रेणी का मलेछ किसी उच्च श्रेणी और उच्च परिवार के किसी व्यक्ति को अपशब्द कहे तो उस से अर्थदण्ड के रूप में साढ़े बारह दिरहम लिए जाएंगे, अगर बराबर श्रेणी के लोग एक दूसरे को गाली दें तो उस का आधा और अगर उच्च श्रेणी वाला किसी को गाली दें तो उस से चौथाई वसूल किया जाएगा

पेज न० 187, ज़ात-पात इस्लाम की नज़र में, मौलाना डॉ० अब्दुल हक़ कासिमी[मूल उर्दू से अनुवाद एवं प्रस्तुति: फैयाज़ अहमद फैज़ी]

ऐसे और भी कई उद्धरण दिए जा सकते हैं यह बताने के लिए कि कैसे पसमांदा जातियों की दरिद्रता के लिए यह तथाकथित मुस्लिम बादशाह ज़िम्मेदार हैं। इरफ़ान हबीब अपनी किताब ‘भारतीय इतिहास में जाति और मुद्रा‘ में लिखते हैं; 11वीं सदी में अल बरुनी ने बुनकरों और मोचियों समेत आठ व्यवसायों को समाज-बहिष्कृत ‘अत्यंत’ (निकृष्ट) जातियों की श्रेणी में रखा था। निकृष्ट स्थिति और गतिशीलता के अभाव के कारण दस्तकारों की प्रतिरोधक क्षमता ही कम हुई होगी और इस प्रकार उजरत रुपी लागत भी कम रही होगी। जाति प्रथा ग्राम समुदायों से राजस्व प्राप्त करने में तथा नगरों में उजरत-रुपी लागत को कम करने में सहायक थी। इस लिए भारत के सभी मुस्लिम शासकों के पास उसे सुरक्षित रखने के पर्याप्त कारण थे। मुसलमानों में भी ‘कमीन’ समुदायों के रूप में निकृष्ट जातियों के प्रतिरूप विकसित हुए।  ये समुदाय अछूत तो नहीं थे फिर भी इन को अपमान के भाव से देखा और दूर रखा जाता था। (इरफ़ान हबीब, ‘भारतीय इतिहास में जाति और मुद्रा’,पृष्ठ 16, 18, 19) 

उलेमा की स्थिति

इस दौर में एक दूसरा प्रभावशाली ग्रुप उलेमाओं का था। उलेमाओं ने अपनी जातिवादी और साम्प्रदायिक नीतियों को लागू करवाने के लिए लगातर सुल्तानों-बदशाओं और संभ्रांत अशराफ़ों वर्ग को प्रभावित करते रहे। इतिहासकार मुबारक़ अली अपनी किताब ‘अलमिया-ए-तारीख़’ में लिखते हैं “हिंदुस्तान में मुसलमान हुक्मरान ख़ानदानों के दौर-ए-हुकूमत में उलेमा हुकूमती इदारों की मदद से इस बात की कोशिश करते रहे हैं कि मुसलमान समाज में रासिख़-उल-अक़ीदा की जड़ें मज़बूत रहें ताकि इस की मदद से वह अपने असर और रसूख़ को बाक़ी रख सकें। हुकूमतों ने उलेमा का तआवुन हासिल करने की ग़रज़ से जहां उन को हुकूमत के आला ओहदों पर फ़ायज़ किया (जैसे क़ाज़ी, हकीम आदि) वहां उस के साथ उन्हें मदद-ए-मआश (आर्थिक मदद) के नाम पर जागीरें दे कर आर्थिक रूप से ख़ुशहाल रखा। इस लिए उलेमा और हुकूमत के दरमियान मफ़ाहिमत और समझौते के जज़्बात कायम रहे और उन्होंने इस के एवज़ उन हुकूमतों को इस्लामी क़रार दे कर मुसलमान रैयत को वफ़ादार रहने की तलक़ीन की। उलेमा का काम मसलों को हल करना नहीं बल्कि मसाएल पैदा करना था क्यों कि जैसे-जैसे मुस्लिम समाज को उन मसाएल में उलझाया जाता रहा वैसे-वैसे समाज में उलेमा का असर और रसूख़ बढ़ता रहा और वह मुस्लिम समाज के रहनुमा बनते रहे इस लिए उन्होंने उन मसाएल का हल ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की बल्कि वक़्त के साथ-साथ नए मसाएल दरियाफ़्त करते गए।” यह बात उलेमा के बार में सिर्फ मध्यकाल तक ही सीमित नहीं है। हम आज के दौर में भी यही सब कुछ देखते हैं। इन उलेमाओं ने न सिर्फ़ हिन्दू-मुस्लिम नफ़रत को बढ़ाया बल्कि कुफ़ू’ (कौन सी जाति किस जाति में शादी कर सकती है) के बहाने अशराफ़िया रक्त शुद्धता को बनाए रखा। पसमांदा जातियों को शिक्षा और सत्ता से दूर रखने में भी इन की अहम भूमिका रही है। औरंगज़ेब द्वारा फतवा-ए-आलमगीरी का संकलन हुआ। (जिसके आधार पर मुफ़्ती फतवा देते रहे)जिसमें कुफु के नाम पर इस्लामी जातिवाद को और अधिक मजबूती प्रदान करते हुए प्रमाणित किया गया। औरंगज़ेब की धर्मनिरपेक्षता केवल अशराफ-सवर्ण टाइप की धरमनिर्पेक्षता थी जिसमें बहुजन-पसमांदा के लिए कुछ नहीं था। औरंगज़ेब के शासन काल में, अकबर के शासन काल से भी अधिक ब्राह्मण और राजपूत शासन प्रशासन में रहें हैं।(इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए मसऊद आलम फ़लाही की किताब ‘हिन्दुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान’ को देखें)। 

‘मुस्लिम’ शासन व्यवस्था में सैयदों की स्थिति

इन उलेमा में एक बड़ा वर्ग सैयद उलेमा का था। सैयद मौलवियों ने झूठी कहानियां और हदीसें गढ़ कर सैयदों की श्रेष्ठता को स्थापित किया। इस बात को मुस्लिम समाज में स्थापित कर दिया कि सैयद जन्म से ही श्रेष्ठ हैं। यही वजह है कि मुस्लिम शासक सादात (सैयद) परिवारों की ख़ास देखभाल करते थे। क़ाज़ी, मुफ़्ती और सदर जैसे सारे ओहदे उन्हें दिए जाते थे। इस के अलावा ऊंचे प्रशासनिक पद भी उन्हें दिए जाते थे। उन्हें जागीरें, वज़ीफ़े एवं छात्रवृत्तियां दी जाती थीं। शासक उन का सम्मान करते तथा उन के अपराध आम तौर पर क्षमा कर दिए जाते। हत्या के मामले में भी सैयद को मौत की सज़ा नहीं दी जाती क्यों कि सैयद का ख़ून बहाना शासक अपशकुन मानते थे।  इस नज़रिये का नतीजा यह हुआ कि सैयद वर्ग अत्यधिक सुविधा सम्पन्न बन गया। सारी सुविधाओं को एक छोटे से दायरे में सीमित रखने के लिए सैयदों ने अन्य जातियों एवं समूहों से संबंध विच्छेद कर लिया तथा दावा किया कि उन का रक्त विशुद्ध है। ख़ून को शुद्ध रखने के लिए वह कुफ़ू के सिद्धांत को इस्लाम में लेकर आए। वह अपने परिवारों में शादियां करते तथा अन्य जाति समूहों से उन के आवास दूर होते। यहाँ तक की उन के क़ब्रिस्तान भी अलग होते ताकि लोग आकर चढ़ावा चढ़ा सकें। मक़बरे आमदनी के बड़े स्रोत्र होते हैं। इन असाधारण सुविधाओं के कारण बड़ी संख्या में सैयदों ने मध्य एशिया, ईरान तथा अरबी दुनिया से आना शुरू किया। सदातों (सैयदों) के इतने परिवार हो गए कि हर शहर और गाँव में एक-दो (सैयद) परिवार थे जिन के लिए वह गर्वित थे। (इतिहासकार मुबारक़ अलीइतिहास का मतांतरपृष्ठ 50, 51)

उस वक़्त के बादशाह हाथी का महावत सिवाय सैयद के दूसरे को नही रखते थे। (क्योंकि किसी और जाति को वह इस काबिल नहीं समझते थे कि वह बादशाह के सामने अपनी पीठ कर के बैठ सके)

शाहने मुगलिया की तवाज़ेह
मलफूज़ 33, पेज 271, मलफूज़ात जिल्द 15

सैयद जाति की सामाजिक वर्चस्व को समझने के लिए यह लेख पढ़ें : वर्चस्व की जाति, जाति का वर्चस्व

संदर्भ :

१- मुबारक अली, इतिहास का मतान्तर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण २००२

२- मुबारक अली, ‘अलमिया-ए-तारीख़, तारिख पब्लिकेशन, लाहौर, पाकिस्तान, संस्करण १९९४

३- इरफ़ान हबीब, भारतीय इतिहास में जाति और मुद्रा,पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस, संस्करण २००६

४- मसऊद आलम फ़लाही, हिन्दुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान, आइडियल फाउंडेशन, मुम्बई, संस्करण २००९

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