“अहल-ए-बैत कौन ?”

जहाँ तक अहल-ए-बैत की फ़ज़ीलत व मरतबे का सवाल है तो निःसन्देह वह आम लोगों से अलग हैं। उन को उन की नेकियों पर क़ुरआन दोहरे अज्र का और उन की ग़लतियों (गुनाहों) पर अन्य लोगों के मुक़ाबले दोहरे सज़ा का भी एलान करता है। इतना ही नहीं अहल-ए-बैत को ख़िताब करते हुए क़ुरआन स्वयं कहता है कि, “तुम आम औरतों (लोगों) की तरह नहीं हो।”

अहल-ए-बैत के कार्यों/ज़िम्मेदारियों, उन पर आयद पाबंदियों व उन को प्राप्त श्रेष्ठता के सम्बंध में क़ुरआन ने सूरः अहज़ाब में बहस की है। पूरे क़ुरआन में यही (सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत) एक ऐसा स्थान है जहाँ पर क़ुरआन ने “नबी सल्ल0 के अहल-ए-बैत को अहल-ए-बैत लफ़्ज़” के साथ ख़िताब किया है। हालांकि यह सिलसिला 28वीं आयत से शुरू होता है जो इस प्रकार है-


"ऐ नबी! अपनी बीवियों से कहो, अगर तुम दुनिया और उस की ज़ीनत चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिला कर भले तरीक़े से रुख़सत कर दूँ (28), और अगर तुम अल्लाह और उस के रसूल और आख़िरत के घर की तलबगार हो तो जान लो कि तुम में से जो भले काम करने वाली है, अल्लाह ने उन के लिये बड़ा बदला जुटा कर रखा है (29)। नबी की बीवियों! तुम में से जो खुली बेहयाई वाली हरकत करेगी उसे दोहरा अज़ाब दिया जाएगा। अल्लाह के लिये यह बहुत आसान काम है (30), और तुम में से जो अल्लाह और उस के रसूल की फ़रमाँबरदारी करेगी और भले काम करेगी, उस को हम दोहरा बदला (अज्र) देंगे और हम ने उस के लिये इज़्ज़तदार रोज़ी जुटा कर रखी है (31)। नबी की बीवियों! तुम आम औरतों की तरह नहीं हो। अगर तुम अल्लाह से डरने वाली हो तो दबी ज़बान से बात न किया करो कि दिल की ख़राबी में पड़ा कोई शख़्स लालच में पड़ जाए बल्कि साफ़ सीधी बात करो (32), अपने घरों में टिक कर रहो, पिछले दौर (दौर-ए-जाहिलियत) की सी सज-धज न दिखाती फिरो, नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो और अल्लाह और उस के रसूल की फ़रमाँबरदारी करो। अल्लाह तो यह चाहता है कि तुम अहल-ए-बैत-ए-नबी (नबी के घरवालों) से गन्दगी को दूर करे और तुम्हें पूरी तरह पाक कर दे।(33)

कोई भी अदब (साहित्य/लिट्रेचर) का ज़ौक़ रखने वाला शख्स तो दूर, कोई आम व्यक्ति भी उक्त आयतों को पढ़ते हुए किसी भी तरह से क्या यह गुमान कर सकता है कि यहां पर अहल-ए-बैत कह कर नबी की बीवियों के सिवा किसी और को ख़िताब किया गया है?

क़ुरआन की इतनी स्पष्ट आयत/शहादत के बाद भी इब्लीसी【1】 तहरीक के इमामों ने, अहल-ए-बैत कौन हैं?/अहल-ए-बैत में कौन-कौन हैं? जैसे विषय छेड़ कर इसे भी एक इख़्तिलाफ़ी/विवादित विषय बना दिया है जैसे-


1- एक गिरोह इस आयत के कारण अहल-ए-बैत में नबी की बीवियों को (मजबूरन) स्वीकार करता तो है लेकिन उन के साथ हज़रत अली, फ़ातिमा, हसन व हुसैन रज़ि0 व उन के वंशजों को भी शामिल करता है।


2- एक गिरोह अहल-ए-बैत में नबी की बीवियों को मानता तो है लेकिन उस के अनुसार असलन अहल-ए-बैत हज़रत अली, फ़ातिमा, हसन व हुसैन हैं और नबी की बीवियाँ ज़िमनन शामिल हैं।


3- एक गिरोह के अनुसार नबी सल्ल0 के अहल-ए-बैत में आप सल्ल0 की बीवियाँ, आप सल्ल0 के वह दधियाली रिश्तेदार जिन पर सदक़ा हराम है व हजरत सलमान फ़ारसी व ज़ैद बिन हारिसा रज़ि0 भी शामिल हैं।


4- एक गिरोह के नज़दीक अहल-ए-बैत में आप सल्ल0 के दधियाल के मात्र वह रिश्तेदार (हज़रत अली, अक़ील, जाफ़र और अब्बास रज़ि0 की औलाद) हैं जिन पर सदक़ा हराम हैं अर्थात इस गिरोह ने नबी सल्ल0 की बीवियों को अहल-ए-बैत मानने से ही इनकार कर दिया।

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कितनी हैरत की बात है कि जिन (नबी की बीवियों) को अहल-ए-बैत क़ुरआन कह रहा है वह एक गिरोह के नज़दीक अहल-ए-बैत में शामिल ही नहीं हैं और एक गिरोह के नज़दीक अगर शामिल भी हैं तो उन के साथ वह लोग नहीं शामिल है बल्कि बीवियां उन लोगों के साथ शामिल हैं। दूसरे शब्दों में क़ुरआन जिन (बीवियों) को अहल-ए-बैत कह रहा है वह मुख्य अहल-ए-बैत नहीं बल्कि गौण अहल-ए-बैत हैं। मुख्य अहल-ए-बैत हज़रत अली, फ़ातिमा, हसन, हुसैन, अक़ील, जाफ़र, अब्बास रज़ि0 की औलादें हैं।

इब्लीसी तहरीक के इमामों व विद्वानों द्वारा सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत में प्रयोग लफ्ज़ ‘अहल-ए-बैत’ को जिस तरह सियाक़-ओ-सबाक़ से काट कर उस की मनमानी बल्कि इब्लीसवादी【1】 व्याख्या की गई है और जिस तरह ज़ोर-ओ-शोर से चीख़-चीख़ कर प्रोपेगण्डा फैलाया गया उस ने अन्य इस्लामिक स्कालर्स/विद्वानों को मजबूर कर दिया कि उस को रद्द किया जाए। फलस्वरूप उलेमा के एक बड़े तबक़े (बड़ी तादाद) ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और दलीलों/तर्कों के साथ इन के दावों की हवा निकाल दी। यहाँ हर विद्वान को नक़्ल कर पाना मुमकिन नहीं है इस लिये हम कुछ प्रमुख विद्वानों की इबारतें नकल कर रहे हैं:

1- मौलाना अबुल आला मौदूदी साहब【2】अपनी प्रमुख तफ़्सीर ‘तफ़हीम-अल-क़ुरआन‘ में इस (सूरः अहज़ाब की 33वीं) आयत की तफ़्सीर करते हुए लिखते हैं कि, “जिस सियाक़-ओ-सबाक़ में यह आयत वारिद हुई है उस से साफ़ ज़ाहिर है कि नबी सल्ल0 की बीवियाँ मुराद हैं।”

आगे और स्पष्ट करते हुए मौदूदी साहब लिखते हैं कि, “ख़ुद क़ुरआन मजीद में भी इस स्थान के अतिरिक्त दो और स्थानों (सूरः हूद व सूरः क़सस) पर यह शब्द आया है और दोनों स्थानों पर उस के मफ़हूम में बीवी शामिल है बल्कि मुक़द्दम है।”

मौदूदी साहब आगे रक़मतराज़ हैं कि, “…………बल्कि ज़्यादा सही बात यह है कि (इस) आयत का असल ख़िताब बीवियों से है और औलाद मफ़हूम लफ़्ज़ से इस में शामिल क़रार पाती हैं। इसी बिना पर इब्न-ए-अब्बास (रज़ि0) और उरवा बिन ज़ुबैर और इकरमा कहते हैं कि इस आयत में अहल-ए-बैत से मुराद नबी सल्ल0 की बीवियाँ हैं।”

मौदूदी साहब आगे फ़रमाते हैं कि, “बाज़ रवायत में जो यह बात आई है कि हज़रत आयशा रज़ि0 और हज़रत उम्मे सलमा रज़ि0 को नबी सल्ल0 ने उस चादर के नीचे नहीं लिया जिस में इन चारों असहाब (हज़रत अली, फ़ातिमा, हसन व हुसैन) को लिया था। इस का यह मतलब नहीं है कि सल्ल0 ने उन को, अपने घर वालों (अहल-ए-बैत) के दायरे से ख़ारिज क़रार दिया था बल्कि इस का मतलब यह है कि बीवियाँ तो अहल-ए-बैत में शामिल थी हीं क्यों कि क़ुरआन ने उन्हीं को मुख़ातिब किया था।”

2- जावेद अहमद ग़ामदी साहब इस आयत की तफ़्सीर करते हुए अपनी पुस्तक ‘अल-बयान’ में लिखते हैं कि, “अहल-ए-बैत का लफ़्ज़ इस्तेमाल कर के साफ़ कर दिया गया है कि इस का शर्फ़ (श्रेय) असलन उन्हीं (बीवियों) को हासिल है, दूसरे की शमूलियत इस में (अगर) हो सकती है तो असलन नहीं बल्कि तबअन व ज़िमनन (ही) हो सकती है।”

3- ‘तिबयान-उल-क़ुरआन’ नामक तफ़्सीर के लेखक का कथन है कि, “इकरमा के अनुसार सूरः अहज़ाब की इस (33वीं) आयत के सम्बंध में हज़रत इब्न-ए-अब्बास रज़ि0 ने फ़रमाया- यह आयत बिलख़ुसूस नबी सल्ल0 की बीवियों के मुतअल्लिक नाज़िल हुई है। इकरमा ने कहा जो शख़्स चाहे मैं उस से इस बात पर मुबाहला कर सकता हूँ कि यह आयत नबी सल्ल0 की बीवियों के सम्बंध में नाज़िल हुई है।” (तारीख़-ए-दमिश्क़, अलकबीर, जिल्द-73, पेज-111, दारअहया अलतरास अलअरबी बैरुत-1421 हि0)

4- अमीन अहसन इस्लाही साहब ‘तदब्बुर-ए- क़ुरआन‘ में इस आयत की तफ़्सीर में लिखते हैं कि, “अहल-ए-बैत होने का शर्फ़ (श्रेय) असलन आप सल्ल0 की बीवियों को (ही) हासिल है। यह आयत इस बाब में नश कतई की हैसियत रखती है। क़ुरआन में इस की नज़ीर भी मौजूद है। यहां अहल-ए-बैत से नबी सल्ल0 की बीवियों के सिवा किसी और को मुराद लेने की कोई गुंजाइश (ही) नहीं है। दूसरों की शमूलियत इस में हो सकती है तो असलन नही बल्कि (मात्र) तबअन व ज़िमनन (ही) हो सकती है। इस लिये उन ग़ाली फ़िरक़ों की मन्तिक़ हमारी समझ मे नहीं आती जो असलन के तो मुनकिर हैं लेकिन फ़ुरू पर तूफ़ान खड़ा करते हैं।”

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इब्लीसवादी विचारधारा से ग्रसित बल्कि इब्लीसवादी तहरीक के इमामों/विद्वानों में से जो लोग यहां (सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत) पर अहल-ए-बैत लफ़्ज़ का इस्तेमाल नबी की बीवियों के लिये नहीं मानते अथवा जो लोग हज़रत अली, फ़ातिमा, हसन व हुसैन के साथ नबी की बीवियों को भी शामिल मानते हैं वह लोग दो बातें/दलील अपने दावे में पेश करते हैं:

1- आयत 28 से 32 तक में बीवियों से ज़रूर ख़िताब हुआ है लेकिन 33वीं आयत में क़ुरआन ने मुज़क्कर का सेग़ा (पुरुषवाचक संज्ञा का) इस्तेमाल किया है। अगर यहाँ बीवियाँ/सिर्फ़ बीवियाँ मुराद होतीं तो जिस तरह 28 से 32 तक मुअन्नस का सेग़ा (स्त्रीवाचक संज्ञा का) इस्तेमाल किया है उसी तरह आयत 33 में भी क़ुरआन मुअन्नस (स्त्रीलिंग) का सेग़ा ही इस्तेमाल करता।

2- मुज़क्कर का सेग़ा इस्तेमाल करने के साथ-साथ क़ुरआन ने यहां बहुवचन का प्रयोग किया है। अगर स्त्रियों के सिवा कोई और मुराद न होता तो क़ुरआन बहुवचन का प्रयोग न करता।

बज़ाहिर तो पहली नज़र में उक्त दोनों दलीलें बड़ी माक़ूल और वज़नी दिखाई पड़ती हैं लेकिन हक़ीक़त यह है कि ऐतराज़ करने वालों की उक्त दलीलों में न तो कोई वज़्न है और न ही किसी तरह इन्हें माक़ूल ही ठहराया जा सकता है क्यों कि जब आप अरबी ज़बान/अदब पर ग़ौर करेंगे तो यह ऐतराज़ व तर्क (दलील) बड़े ही हास्यास्पद व किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नज़र आएंगे क्योंकि ऐसा प्रयोग अरबी अदब में न सिर्फ़ आम बात है बल्कि यह अरबी ज़बान/अदब की ख़ूबसूरती व उसूल/नियम का हिस्सा भी है। बल्कि ऐसे उसूल सभी ज़बानों/साहित्य/अदब में पाए जाते हैं।【3】

 क़ुरआन ने स्वयं दूसरे स्थानों पर इस का प्रयोग किया है। इस की सब से बेहतरीन मिसाल/दलील सूरः हूद की 73वीं आयत है। चूंकि वहां पर भी अहल-ए-बैत लफ़्ज़ का इस्तेमाल हुआ है, इस लिए हम नीचे सूरः हूद की 71 से 73 नम्बर तक की आयत नक़्ल कर रहे है ताकि बात सियाक़ के साथ आ जाये और पूरी तरह स्पष्ट हो जाये। देखें सूरः हूद की 71 से 73 नम्बर तक की आयत-


“इब्राहिम की बीवी भी खड़ी हुई थी। वह यह सुन कर हँस दी। फिर हम ने उस को इसहाक़ की और इसहाक़ के बाद याक़ूब की ख़ुशख़बरी दी। (71),  वह बोली, हाय मेरी कमबख़्ती! क्या अब मेरे यहां औलाद होगी? जब कि मैं बुढ़िया फूँस (बांझ) हो गई और यह मेरे मियाँ भी बूढ़े हो चुके? यह तो बड़ी अजीब बात है।(72) वह (फ़रिश्ते) बोले, अल्लाह के हुक्म पर तअज्जुब? अल्लाह की रहमतें और बरकतें नाज़िल हों आप पर, ऐ अहल-ए-बैत (इब्राहिम के घर वालों)! और यक़ीनन अल्लाह बहुत तारीफ़ के क़ाबिल और बड़ी शान वाला है।”(73)

सूरः हूद की 71 से 73 नम्बर तक की आयत का अध्ययन करने से कौन शख़्स कह सकता है कि यहाँ अहल-ए-बैत लफ़्ज़ का इस्तेमाल हज़रत इब्राहिम अलैहि0 की बीवी के सिवा किसी और के लिये हुआ है! यदि कोई यह दावा करता है तो वह यह बता सकता है कि अगर अहल-ए-बैत लफ़्ज़ से मुराद हज़रत इब्राहिम अलैहि0 की बीवी मुराद नहीं हैं तो फिर कौन हैं? ज़ाहिर सी बात है कि यहाँ पर अहल-ए-बैत से मुराद हज़रत इब्राहिम अलैहि0 की बीवी ही है।

सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत में इस्तेमाल अहल-ए-बैत लफ़्ज़ का बीवियों के सम्बंध में इस्तेमाल होने का इनकार करने वाले भी जानते हैं कि यदि यहां इनकार कर दिया जाए तो फिर यह साबित नहीं किया जा सकता कि यहां अहल-ए-बैत किसे कहा गया है! इस लिये यहां पर न कोई प्रश्न खड़ा किया गया और न ही सूरः अहज़ाब की तरह यहां पर मुज़क्कर व जमा (बहुवचन) के प्रयोग का मुद्दा उठाया गया बल्कि बिना चूँ-चरा के स्वीकार कर लिया गया है। जब कि सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत की ही तरह यहां पर भी मुज़क्कर का सेग़ा (पुरुषवाचक संज्ञा) व जमा (बहुवचन) का प्रयोग किया गया है।

जो लोग सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत में प्रयोग मुज़क्कर का सेग़ा (बहुवचन) की आड़ में नबी सल्ल0 की बीवियों को अहल-ए-बैत नहीं मानते या उन के साथ औरों को अहल-ए-बैत में शामिल मानते हैं उन को रद्द करते हुए बहुत से विद्वानों द्वारा जवाब दिया गया है। लेख की लम्बाई को ध्यान में रखते हुए सब को नक़्ल करना न तो मुमकिन है और न ही मुनासिब। इस लिये हम बतौर सुबूत यहाँ 2-3 लोगों के जवाब/दलील नक़्ल कर देते हैं-

1- प्रसिद्ध पाकिस्तानी विद्वान जावेद अहमद ग़ामदी साहब अपनी तफ़्सीर ‘अल-बयान’ में सूरः हूद की 73वीं आयत की तफ़्सीर में लिखते हैं कि, “असल अल्फ़ाज़ हैं
’رَحْمَتُ اللّٰہِ وَبَرَکٰتُہٗ عَلَیْکُمْ اَہْلَ الْبَیْتِ‘

इन में ‘अलैकुम’ का ज़मीर जमा मुज़क्कर है, अरबी ज़बान में घर की औरतों के लिये यही शाइस्ता अंदाज़-ए-ख़िताब है। इस में पर्दादारी और अदब व एहतराम के जो तक़ाज़े मलहूज़ हैं। उन का अंदाज़ा हर साहब-ए-ज़ौक़ आसानी के साथ कर सकता है।”

2- अमीन अहसन इस्लाही साहब अपनी प्रसिद्ध तफ़्सीर ‘तदब्बुर-ए-क़ुरआन’ में सूरः हूद की 73वीं आयत की तफ़्सीर में लिखते  हैं कि,
“’رَحْمَتُ اللّٰہِ وَبَرَکٰتُہٗ عَلَیْکُمْ اَھْلَ الْبَیْتِ‘

में ‘अलैकुम’ ज़मीर मुज़क्कर जमा का इस्तेमाल अरबी ज़बान के शाइस्ता अंदाज़-ए-ख़िताब की मिसाल है। औरतों के इस अंदाज़-ए-ख़िताब में पर्दादारी और एहतराम की जो शान है वह मोहताज-ए-इज़हार नहीं। क़ुरआन मजीद और कलाम-ए-अरब में इस की निहायत वाज़ेह और लतीफ़ मिसालें मौजूद हैं। (जैसे) इम्र-अल-क़ैस का एक शेर भी क़ाबिल-ए-ज़िक्र है-

“:فلولا کان اھل الدّار فیہا کعھدنا وجدت مقیلا عندھم ومعرّسا”

3- वर्तमान समय के प्रसिद्ध यूट्यूबर, दुनिया-ए-उर्दू में सम्भवतः सब से अधिक सुने व सर्च किये जाने वाले ‘इंजीनियर’ उपनाम से प्रसिद्ध पाकिस्तानी इस्लामिक स्कॉलर इंजीनियर मोहम्मद अली मिर्ज़ा साहब एक वीडियो में इस ऐतराज़ का जवाब देते हुए कहते हैं कि, “अरबी ज़बान में किसी बात की अहमियत वाज़ेह करने के लिये मुज़क्कर का सेग़ा इस्तेमाल किया जाता है, यह अरबी ज़बान का उसलूब/वसूल है।” 【4】

जो गिरोह नबी सल्ल0 की बीवियों के साथ-साथ हज़रत अली, फ़ातिमा, अक़ील, जाफ़र व अब्बास रज़ि0 की संतानों को भी या मात्र उन्ही को अहल-ए-बैत मानते हैं उन का स्रोत, सूरः अहज़ाब की 33वीं आयत की उक्त व्यख्या (जो सियाक़-ओ-सबाक़ व अरबी अदब दोनों द्वारा ऊपर विद्वानों के कथनों व दलीलों द्वारा रद्द की जा चुकी है) के अतिरिक्त, कुछ हदीसें भी है जिन में सब से मज़बूत दलील के रूप मे ‘सही मुस्लिम’ की 6225 से 6228 नम्बर【5】तक की व मुस्लिम की ही 6261 नम्बर की हदीस को आधार बनाकर अहल-ए-बैत का उक्त खेल इब्लीसी तहरीक के इमामों व विद्वानों द्वारा खेला गया है। जिस से यह साबित करने की लगातार कोशिश की गई है कि नबी की बीवियां अहल-ए-बैत में नहीं है या नबी की बीवियां भी अहल-ए-बैत हैं लेकिन असलन (मूल) अहल-ए-बैत वह नही हैं बल्कि हज़रत अली, जाफ़र, अक़ील व अब्बास रज़ि0 की औलाद हैं। सही मुस्लिम की वह हदीसें निम्नवत हैं-

1- हदीस नम्बर 6225
रसूल सल्ल0 एक दिन मक्का और मदीने के दरम्यान वाक़ेअ मक़ाम ‘ख़ुम’ (पानी के मक़ाम) पर ख़ुत्बा सुनाने को खड़े हुए। आप सल्ल0 ने अल्लाह की हम्द की और उस की तारीफ़ को बयान किया और वा’ज़-ओ-नसीहत की, फिर इस के बाद फ़रमाया कि ऐ लोगो! मैं आदमी हूँ, क़रीब है कि मेरे रब का भेजा हुआ (मौत का फ़रिश्ता) पैग़ाम-ए-अज़ल लाये और मैं उसे कुबूल कर लूँ। मैं तुम में दो बड़ी चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ। पहली तो अल्लाह की किताब है और उसमें हिदायत और नूर है। तो अल्लाह की किताब को थामे रहो और इस को मज़बूत पकड़े रहो। ग़रज़ कि आप सल्ल0 ने अल्लाह की किताब की तरफ़ रग़बत दिलाई। फिर फ़रमाया कि दूसरी चीज़ मेरे अहल-ए-बैत हैं। मैं तुम्हें अपने अहल-ए-बैत के बारे में अल्लाह तआला की याद दिलाता हूँ, ऐसा तीन बार फ़रमाया। हुसैन ने पूछा कि ऐ ज़ैद! आप सल्ल0 के अहल-ए-बैत कौन से हैं, क्या आप सल्ल0 की अज़वाज (पत्नियां) अहल-ए-बैत नही हैं? सैयदना ज़ैद रज़ि0 ने कहा कि अज़वाज (पत्नियां) भी अहल-ए-बैत में दाख़िल हैं लेकिन अहल-ए-बैत वह हैं जिन पर ज़कात हराम है।【6】 हुसैन ने कहा कि वह कौन लोग हैं? सैयदना ज़ैद रज़ि0 ने कहा कि वह अली, अक़ील, जाफ़र और अब्बास रज़ि0 की औलादें हैं। हुसैन ने कहा कि इन सब पर सदक़ा हराम है? सैयदना ज़ैद रज़ि0 ने कहा हाँ।”

इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए यह लेख पढ़ें: ज़कात और तथाकथित सैयद

2- हदीस नम्बर 6226:
यह हदीस 6225 जैसी ही है।

3- हदीस नम्बर 6227:
इस में 6225 नम्बर की हदीस से निम्न शब्द अधिक है-
“अल्लाह की किताब जिस में हिदायत और नूर है, जिस ने इस को मज़बूती से थाम लिया और इसे ले लिया वह हिदायत पर होगा और जो इस से हट गया वह गुमराह हो जाएगा।”

4- हदीस नम्बर 6228:
यह हदीस भी हदीस नंबर 6225, 6226,6227 ही की तरह है लेकिन इस में यह निम्न परिवर्तन/शब्दों की अधिकता है:

“हम ने उन से पूछा: आप (सल्ल0) के अहल-ए-बैत कौन हैं? आप की अज़वाज? उन्हों ने कहा: नहीं। अल्लाह की क़सम औरत अपने मर्द के साथ ज़माने का बड़ा हिस्सा रहती है, फिर वह उसे तलाक़ दे देता है तो वह अपने बाप और अपनी क़ौम की तरफ़ वापस चली जाती है। आप सल्ल0 के अहल-ए-बैत वह हैं जो उन के ख़ानदान से हैं, आप के वह दधियाली रिश्तेदार जिन पर सदक़ा हराम है। (आगे उन दधियाली रिश्तेदारों के नाम हैं जिस का ज़िक्र 6225 नम्बर की हदीस में ऊपर गुज़र चुका है)

5- हदीस नम्बर 6261:
उम्मुल मोमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रज़ि0 कहती हैं, “कि रसूल सल्ल0 सुबह को निकले और आप सल्ल0 एक चादर ओढ़े हुए थे जिस में کجاووں की सूरतें या हांडियों की सूरतें बनी हुई थी, इतने में हसन आये तो आप सल्ल0 ने उन को चादर के अंदर कर लिया, फिर हुसैन आये तो उन को भी उस में दाख़िल कर लिया, फिर फ़ातिमा ज़ोहरा आईं तो उन को भी उन्हीं के साथ शामिल कर लिया, फिर अली आये तो उन को भी शामिल कर के फ़रमाया कि, अल्लाह तआला चाहता है कि तुम से नापाकी को दूर करे और तुम को पाक करे ऐ घर वालों।”
उक्त हदीसों को बतौर दलील पेश करने वालों को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से बाहर निकल कर कम से कम एक बार इन पर नज़्र-ए-सानी कर लेना चाहिए क्यों कि:

1- नबी सल्ल0 की बीवियों के सिवा और कोई अहल-ए-बैत में है, इस से न तो पूरी तरह क़ुरआन खाली है बल्कि पहला दौर अर्थात पहली दूसरी सदी की किताबें भी इस से पूरी तरह खाली हैं। इमाम मालिक ने अपनी मोअत्ता में (जिसे हदीस की पहली किताब समझा जाता है) अहल-ए-बैत की ऐसी किसी भी एक रवायत को लेना पसंद नहीं किया जब कि आप मदीने ही में रहते थे और मोअत्ता वहीं पर लिखी। या तो आप तक ऐसी कोई रवायत पहुंची नहीं या आप ने लेना मुनासिब नहीं समझा अर्थात आप के मे’अयार पर अहल-ए-बैत से सम्बंधित ऐसी कोई रवायत सही नहीं उतरी होगी।

2- इमाम बुख़ारी ने भी अहल-ए-बैत से सम्बन्धित ऐसी कोई हदीस (सम्भवतः) नहीं ली जब कि बुख़ारी साहब का दौर इमाम मुस्लिम का ही दौर है और इमाम मुस्लिम के उस्ताद भी हैं। इमाम बुखारी के सम्बंध में भी यह कहा जा सकता है कि या तो उन तक ऐसी कोई रवायत पहुंची नहीं या उन्हों ने भी इसे लेना सही नहीं समझा, दूसरे लफ़्ज़ों में उन के मे’अयार पर रवायत सही नहीं उतरी होगी।

3- तथाकथित अहल-ए-बैत से सम्बंधित रवायतों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जब हम इन रवायतों का अध्ययन करते हैं और तमाम रवायतों को इकट्ठा कर के उन सब रवायतों के (जिन में बीवियों के अतिरिक्त औरों को अहल-ए-बैत कहा गया) प्रकाश में आने के कार्यकाल पर मंथन करते हैं तो हम देखते हैं कि अहल-ए-बैत से सम्बंधित रवायतें सब से पहले अब्बासी व फ़ातिमी (ख़िलाफ़त) काल मे सामने आती हैं। यह वही दौर है जिस दौर में तथाकथित अहल-ए-बैत की फ़ज़ीलत में व बनू उमैया विशेषकर अमीर मुआविया के विरोध में रवायतें सब से पहले सामने आनी शुरू हुईं। इस के पहले अहल-ए-बैत में आप सल्ल0 की बीवियों के सिवा और कोई अहल-ए-बैत में शामिल है, इस का कोई सुबूत आप को किसी भी किताब/सहीफ़ा/पुस्तक/हदीस में कोई रवायत आंखों में सुरमा लगाने को भी नही मिलेंगी।

4- ऐसी तमाम हदीसों में सबसे प्रमाणित हदीसें मुस्लिम की 6225 से 6228 नम्बर तक की हदीस है जिस के रावी ज़ैद बिन अरक़म रज़ि0 हैं। जब उन की बयान की गई 6225 से 6228 नम्बर तक की हदीस का अध्ययन किया जाता है तो उस में ही ऐसे विरोधाभास व अहल-ए-बैत की ऐसी बेबुनियाद परिभाषा/व्यख्या नज़र आती है कि उन को क़ुबूल करना मुश्किल हो जाता है। जैसे-

A- हदीस नम्बर 6225 में ज़ैद बिन अरक़म का कथन है कि, “अज़वाज (पत्नियां) भी अहल-ए-बैत में दाख़िल हैं लेकिन अहल-ए-बैत रसूल सल्ल0 के ख़ानदान के वह लोग हैं जिन पर ज़कात हराम है।” लेकिन वही 6228 नम्बर हदीस में कथन इस तरह है कि, “हम ने उन से पूछा: आप (सल्ल0) के अहल-ए-बैत कौन हैं? आप की अज़वाज? उन्होंने कहा: नहीं। अल्लाह की क़सम औरत अपने मर्द के साथ ज़माने का बड़ा हिस्सा रहती है, फिर वह उसे तलाक़ दे देता है तो वह अपने बाप और अपनी क़ौम की तरफ वापस चली जाती है। आप सल्ल0 के अहल-ए-बैत वह हैं जो उन के ख़ानदान से हैं। आप के वह दधियाली रिश्तेदार जिन पर सदक़ा हराम है।” 6225 (6225 से 62267 तक) नम्बर की हदीस के मुताबिक़ बीवियाँ अहल-ए-बैत में शामिल तो हैं लेकिन 6228 नम्बर की हदीस के मुताबिक़ बीवियाँ अहल-ए-बैत में शामिल क़रार ही नहीं पाती हैं। एक ही रावी से बयान की गई हदीस बल्कि ‘अहल-ए-बैत’ शब्द की परिभाषा में ऐसा विरोधाभास किसी भी तरह सम्भव ही नहीं है। सहाबा से तो दूर किसी मामूली व्यक्ति से भी ऐसा विरोधाभास मुमकिन ही नहीं है।

B- क़ुरआन साफ़-साफ़ मात्र नबी की बीवियों को अहल-ए-बैत कह कर मुख़ातिब कर रहा है जिस पर हज़रत इब्न-ए-अब्बास व उरवा बिन ज़ुबैर साफ़-साफ़ कह रहे हैं कि इस (सूरः अहज़ाब की 33वीं) आयत में अहल-ए-बैत से मुराद नबी की बीवियां ही हैं और इकरमा तो इस के लिये मुबाहला करने को तैयार हैं। जैसा कि ऊपर दौरान-ए-बहस तिबयान-उल-क़ुरआन व मौदूदी साहब की दलीलों में गुज़र चुका है, जब कि 6228 नम्बर की रवायत बीवियों के सम्बंध में कहती है कि वह अहल-ए-बैत में कैसे हो सकती हैं क्योंकि तलाक़ के बाद औरत अपने क़ौम और अपने बाप की तरफ़ वापस चली जाती है! यह दलील मज़हकाख़ेज़ तो है ही साथ ही साथ क़ुरआन से टकराने वाली भी है क्योंकि क़ुरआन ने जितनी भी जगह अहल-ए-बैत लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया वह सिर्फ़ और सिर्फ़ बीवियों के लिये किया है।

C-  यह कहना कि औरत तलाक़ के बाद अपनी क़ौम व बाप की तरफ़ लौट जाती है। नबी सल्ल0 की बीवियों के लिये मुमकिन ही नहीं है क्योंकि आप सल्ल0 की बीवियों को जब अहल-ए-बैत कह कर क़ुरआन ने ख़िताब किया, उस के पहले ही उन को यह आज़ादी दे दी थी कि नबी को छोड़ कर जाना चाहें तो (तलाक़ लेकर) चली जाएं। जब उन्हों ने आप सल्ल0 के साथ रहना क़ुबूल कर लिया तब उन पर आम औरतों से अलग पाबंदियां भी आयद की गयीं और मरतबा भी अलग दिया गया। उन्हें पूरी उम्मत की माँ भी कहा गया और आप सल्ल0 की मौत के बाद किसी से निकाह भी हराम कर दिया गया। कितनी हैरतअंगेज़ व हास्यास्पद बात है कि जिन्हें तमाम मुसलमानों की माँ होने का दर्जा दिया गया और किसी दूसरे के साथ उन का निकाह हराम कर दिया गया तथा जिनके शौहर (आप सल्ल0) का इंतेक़ाल भी हो चुका है और वह औरतें वहीं पर मौजूद हैं, साथ ही साथ उम्मत को दीन भी माँ की हैसियत से सिखा रही हैं और उम्मत उन के इल्म से फ़ैज़याब हो रही हो, उन के सम्बंध में यह कहना कि औरत तलाक़ के बाद अपनी क़ौम और बाप की तरफ़ लौट जाती है, वह अहल-ए-बैत कैसे हो सकती हैं, कितनी जाहिलाना बात है! यह एक सहाबी की ज़बान से निकलना नामुकिन तो है ही बल्कि स्वप्न में भी सम्भव नहीं है।

5- अगर थोड़ी देर के लिये सब कुछ दरकिनार कर के अहल-ए-बैत होने की शर्त ज़कात/सदक़ा का हराम होना ही मान लिया जाए तो कितनी अजीब बात है जिस नबी सल्ल0 की वजह से उन के ख़ानदान के लोगों (दधियाली रिश्तेदारों) पर ज़कात/सदक़ा हराम था उस नबी की बीवियों पर भला ज़कात/सदक़ा कैसे हलाल हो सकता है! जब कि उन की किफ़ालत (भरण-पोषण) की ज़िम्मेदारी उसी नबी की है।【6】

सच्चाई यह है कि नबी सल्ल0 की असलन/मूल अहल-ए-बैत मात्र आप सल्ल0 की बीवियाँ ही हैं। सिर्फ़ और सिर्फ़ इब्लीसवाद【1】को स्थापित करने के उद्देश्य से तथाकथित अहल-ए-बैत का खेल इब्लीसी तहरीक के इमामों द्वारा खेला गया है। यही कारण है कि इस से सम्बन्धित जितनी भी हदीसें मिलती हैं वह सब लगभग 200 साल बाद से ही प्रकाश में आनी शुरू हुईं और वह भी मदीने के बाहर से आनी शुरू हुई थीं। आखिर में साहिबे तदब्बुरे क़ुरआन के इन लफ़्ज़ों के साथ बहस खत्म करता हूँ कि- “अहले बैत होने का शर्फ़ (श्रेय) असलन आप सल्ल0 की बीवियो को (ही) हासिल है ये आयत (33/33) इस बाब में नश कतई की हैसियत रखती है, क़ुरआन में इसकी नजीर भी मौजूद है,………… इसलिये उन ग़ाली फ़िरक़ों की मन्तिक हमारी समझ मे नही आती जो असलन के तो मुनकिर हैं लेकिन फुरू पर तूफान खड़ा करते हैं।”

【1】लेख “सैयदवाद ही इब्लीसवाद है” देखें।
【2】मौदूदी साहब को इस्लाम व क़ुरआन की सियासी ताबीर/तफ़्सीर का जन्मदाता माना जाता है।
【3】जैसे इंग्लिश में I व WE के साथ साधारणतः shall लगता है लेकिन जब मज़बूत इरादा ज़ाहिर करना होता है, कोई बात ज़ोर दे कर कहनी होती है तो shall की जगह will लगाया जाता है, जैसे- “I will not compel you.”
【4】https://www.youtube.com/watch?v=bMmoXrQl3f0
【5】हमने हदीसों के नम्बर एप “इस्लाम 360” के अनुसार नक़्ल किये हैं ताकि हर किसी को आसानी से उपलब्ध हो जाये।
【6】लेख “ज़कात और तथाकथित सैयद” देखें।

-एडवोकेट नुरुल ऐन मोमिन
[email protected]

नुरुल ऐन मोमिन 'आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ' (उत्तर प्रदेश) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और पेशे से एडवोकेट हैं.

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