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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और पसमांदा

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी स्थापना से ले कर आज तक यह दावा करता आया है कि वह इस देश में बसने वाले सब से बड़े अल्पसंख्यक समाज की एक अकेली प्रतिनिधि संस्था है जो उन के व्यक्तिगत एवं सामाजिक मूल्यों को, जो इस्लामी शरीयत/कानून द्वारा निर्धारित किये गए हैं, देखने भालने का कार्य सम्पादित करती है। इस के अतिरिक्त बोर्ड मुसलमानों की तरफ़ से देश के बाह्य एवं आतंरिक मामलों में न सिर्फ़ अपनी राय रखता है बल्कि देशव्यापी आंदोलन, सेमिनार एवं मीटिंग के द्वारा कार्यान्वित भी करता है। अभी हाल में ही ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ आंदोलन करने की बात कही गई है।


अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या बोर्ड का यह दावा सही है?

अगर इस के संघटनात्मक ढांचे को देखें तो हमें वहीं इस का जवाब मिल जाता है। बोर्ड ने मसलकों और फ़िरक़ों के भेद को स्वीकार करते हुए सारे मसलकों और फ़िरक़ों के उलेमाओं (आलिम का बहुवचन) को बोर्ड में जगह दी है, जो उन के मसलक/फ़िरक़े की आबादी के अनुपात के आधार पर है। बोर्ड का अध्यक्ष सदैव सुन्नी सम्प्रदाय के देवबंदी/नदवी फ़िरक़े से आता है। ज्ञात रहे कि भारत देश में सुन्नियों की संख्या सब से अधिक है और सुन्नियों में देवबंदी/नदवी समुदाय, बरेलवी समुदाय से यद्दपि संख्या में अधिक न हो फिर भी असर एवं प्रभाव की दृष्टि से सबसे बड़ा गुट है। बोर्ड का उपाध्यक्ष सदैव शिया सम्प्रदाय से होता है। यद्दपि शिया सप्रदाय संख्या में सुन्नी सम्प्रदाय के छोटे से छोटे फ़िरक़े से भी कम है फिर भी वैचारिक आधार पर शिया, सुन्नियों के हमपल्ला माने जाते हैं।


अब सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय मुस्लिम समाज सिर्फ़ मसलकों/फ़िरक़ों में ही बंटा है? तो इस का जवाब नकारात्मक मिलता है। मुस्लिम समाज मसलकों और फ़िरक़ों में बंटे होने के साथ-साथ नस्ली और जातिगत आधार पर भी बंटा है। जहाँ सैयद, शैख़, जुलाहा, धुनिया, धोबी, मेहतर, भटियारा, बक्को और नट आदि जातियां मौजूद हैं लेकिन बोर्ड अपने संगठन में उपर्युक्त विभेद को मान्यता प्रदान नहीं करता है और संगठन में किसी भी पसमांदा (पिछड़े, दलित और आदिवासी) मुस्लिम जातियों को उन की जातिगत संख्या के आधार पर किसी भी प्रकार का प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं करता है।

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ऐसा नहीं है कि बोर्ड भारतीय मुसलमानों के जातिगत विभेद से अवगत नहीं है। बोर्ड स्वयं ग़ैर कुफ़ू में शादी-ब्याह को न्यायोचित नहीं मानता है अर्थात एक शरीफ़/उच्च/विदेशी जाति के मुसलामन को एक रज़ील (मलेच्छ)/निम्न/नीच/देशी जाति के मुसलामन से हुए विवाह को न्याय संगत नहीं मानता है। और इस प्रकार के विवाह को वर्जित क़रार देता है। (2) जब कि मुहम्मद (स०अ०व०) ने दीनदारी (धार्मिक कर्तव्य परायणता) के आधार पर शादी विवाह करने का निर्देश दिया है। (3)


बात साफ़ हो जाती है कि बोर्ड जातिगत विभेद से भली-भांति परिचित होने के बाद भी रज़ील (मलेच्छ) और जल्फ़ (असभ्य/पसमांदा) को अपने संगठन में प्रतिनिधित्व नहीं देता है। दूसरी महतव्पूर्ण बात यह है कि बोर्ड आधी आबादी यानि महिलाओं के प्रतिनिधित्व को भी नज़र अंदाज़ करता है। बोर्ड महिला  प्रतिनिधित्व को न्यायोचित नहीं मानता है।

जब कि इस्लामी इतिहास पर दृष्टि  डालें तो पता चलता है कि ख़लीफ़ा उमर (र०अ०) ने एक महिला सहाबी (मुहम्मद स०अ०व० के साथी), शिफ़ा बिन्त-ए-अब्दुल्लाह अल-अदविया को मदीना के मार्केट का लोक-वाणिज्य प्रशासनिक अधिकारी बनाया था। वह इस्लामी इतिहास की पहली शिक्षिका एवं चिकित्सिका भी थीं। ख़लीफ़ा उमर (र०अ०) उन से सरकारी कामकाज में बराबर राय-मशवरा भी किया करते थे।(4)

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हालांकि अब बोर्ड ने महिलाओं को शामिल तो कर लिया है लेकिन यहां भी उच्च/अशराफ़ (शरीफ़ का बहुवचन) वर्ग की महिलाओं को ही वरीयता दी गयी है। बोर्ड में ग़ैर-आलिम की भी भागीदारी होती है जो ज़्यादातर पूंजीवादी/आधुनिक शिक्षाविद्/क़ानूनविद् होते हैं लेकिन यहां भी अशराफ़/उच्च/विदेशी वर्ग का ही वर्चस्व है।


सारांश यह है कि बोर्ड के अशराफ़ उलेमा ख़ुद को देसी पसमांदा मुस्लिम उलेमा की ओर से स्वयं प्रतिनिधित्व का दावा करते है और पसमांदा महिलाओं और पुरुषों को प्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधित्व के योग्य न मान कर प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं करते। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड केवल मुस्लिम उच्च वर्ग/विदेशी नस्ल के अशराफ़ वर्ग की ही प्रतिनिधि संस्था है, जो देश के कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 10%(लगभग 2 करोड़) ही हैं बाक़ी बचे 90% (लगभग 18 करोड़) देसी पसमांदा मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का सिर्फ़ दावा है, हक़ीक़त नहीं।

“न तुम सदमे हमें देते, न हम फ़रियाद यूँ करते
न खुलते राज़ सर-ए-बस्ता, न ये रुस्वाइयां होतीं”

-फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी

(लेखक अनुवादक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पेशे से चिकित्सक हैं।)

नोट: यह लेखक के अपने निजी विचार हैं, सम्पादक का सहमत होना आवश्यक नहीं।

संदर्भ (रेफ़रेन्सेज़):

(1) इंक़लाब उर्दू दैनिक, नई दिल्ली (वाराणसी) शुक्रवार, 6 नवंबर 2015, वॉल्यूम नं० 3, इशू नं० 290, फ्रंट पेज।
(2) पेज नं०-101-105, 237-241, मजमूआ-ए-क़ानून-ए-इस्लामी, 5वाँ एडिशन, 2011, प्रकाशक आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, 76-A/1, ओखला मेन मार्किट, जामिया नगर, नई दिल्ली-110025, इंडिया।
(3) हदीस : औरत से चार आधार पर शादी किया जाता है, उस के माल (धन), उस की जाति (हसब-नसब), उस के जमाल (हुस्न, सुंदरता) और उस के दीन (धर्म, मज़हब) के लिए। तुम लोग दीनदारी (धार्मिक कर्तव्यपरायणता) को प्राथमिकता दो, तुम्हारे हाथ घी में होगा।
-बुखारी हदीस नं० 5090, मुस्लिम हदीस नं० 1166
(4) मिन फ़िक़्हीद्दौला फ़िल इस्लाम, अल्लामा युसूफ़ करज़ावी, पेज नं० 175-176, एडिशन 2007, दारुशशुरुक़, काहिरा, मिस्र।


A doctor by profession. Voluntary social services, translation and writing are my other inclinations.

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