समाज का जनाज़ा : एक दलित के शव की यात्रा

अनुवाद: फैयाज अहमद फैजी
लेखक: गनपत राय भील

बदीन ज़िले में एक भील जाति के नौजवान की लाश को उसके क़ब्र से खोद कर बाहर निकाल कर फेंक दिया गया। यह अमानवीय कृत्य उच्चवतम पवित्रता के धार्मिक जोश में साहिबे ईमान(इस्लाम के सच्चे मानने वाले) वालो ने किया। दैनिक सिंध एक्सप्रेस में इसकी फ़ोटो और रिपोर्ट कुछ विस्तार के साथ छपी। यह कहा जा सकता है कि यह फोटो सिंध की मौजूदा धर्मनिरपेक्ष और सूफीवाद की स्थिति का सही चित्रण करता है, और एक दलित के मृत्यु प्रमाण पत्र का वारंट भी है।
यह स्थिति सिंध के उन आदिवासी लोगो की है जो न सिर्फ सदियों से एक असहाय घुमन्तु जीवन जी रहे हैं बल्कि क़ब्र में भी उनका यही हाल है। सिंध की यह भूमि अब उन द्रविणों, दलितों की नही रह गयी है जिनके लाशों को यह अपने आलिंगन से दूर फेंक देती है। विदेशी आक्रांता आध्यात्मिक रूप से सिंध पर शासन कर रहें है जिनके सम्मान में भव्य मक़बरे निर्मित किये गए हैं, जबकि इस भूमि के मूल-स्वामी जीवनपर्यंत अपमानित किये गए हैं,और मरने के बाद भी उनको अपनी ही जमीन में जगह तक नही मिलती है। यह घटना पागलपन की कोई एक अकेली घटना नही थी बल्कि यह पूरे समाज का, दलितों के प्रति मनोभाव का प्रतिबिंब है। यह एक कडुवा सच है कि एक द्रविण मूल के दलित को ना सिर्फ पूरे जीवन बहिष्कृत और अपमानित किया जाता है बल्कि मरने के बाद भी उसको शांति नसीब नही होती है।

यह घटना 7 अक्टुबर 2013 ई० को सिंध प्रांत के बदीन ज़िले के क़स्बा पंगरियो की है, दलित भुरो भील की लाश को क़ब्र से खोद कर यह कहते हुए बाहर फेंक दिया गया कि यह एक अपवित्र हिन्दू अछूत की लाश है और मुस्लिम क़ब्रिस्तान में दफन नही किया जा सकता है। (1)
क़ब्र की जगह को लेकर विवाद में भीड़ ने अल्लाह हु अकबर(ईश्वर महान है) का नारा लगाते हुए लाश को क़ब्र से खोद कर बाहर निकाला और पंगरियो कस्बे की गलियों में घसीटा।(2)

यह कहना बिल्कुल निरर्थक है कि सगे-सम्बन्धी की वैमनस्यता लंबे समय तक नही टिकती है, बल्कि यह पश्चाताप करती है, वापस होती है और फिर चुकाती भी हैै। इस उपमहाद्वीप के आदिवासी किसी भी प्रकार से अन्य लोगो के प्रिय नही माने जाते हैं। ये सिंधी लोग कुर्द के वंशज है, जो दजला और फरात नदियों के किनारे से आये हैं, ये द्रविणो के सिंधु नदी की सभ्यता का गुणगान करते हैं। लेकिन उनलोगो के अस्तित्व को सहन नही करते हैं जो सच में इस तरह के अतिक्रमण और आक्रमण के असली पीड़ित हैं।
यह उदासीनता और घृणा असामान्य नही है और ना ही कोई नई प्रक्रिया है। आदिवासी जीवन की प्रत्येक घटना मौत से कम यातनापूर्ण नही है। यह ऐसी है जैसे जीवन के अस्तित्व के लिए एक ज़रूरी परिस्थिति हो। और जब सच में इनकी शारीरिक मृत्यु हो जाती है तो इस लायक भी नही समझे जाते कि इनकी मिट्टी, मिट्टी से मिल जाये।
किसी भी आदिवासी समाज की अपेक्षा जोगी समाज आम तौर पर इस तरह की परिस्तिथियों का प्रायः सामना करता है। जब कभी भी जोगी जाति के किसी परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उस व्यक्ति के लाश को रिल्ली(एक प्रकार का पारंपरिक सिंधी कम्बल) से ढक देते हैं, जोगी औरतें बजाय रोने या विलाप करने के, एक दर्दभरी खामोशी का पालन करती हैं, छोटे बच्चे भी अस्वाभाविक एवं रहस्यमय भय से चुप्पी साध लेतें हैं,अगर कोई बच्चा अपने दुःख को सहन नही कर पाता और रो पड़ता है तो माता-पिता उस रोते हुए बच्चे को अपने बाहों में समेट लेते है ताकि बच्चे की आवाज़ जोगी बस्ती के बाहर ना जा सके। इस एक विशेष क्षण पर संसार उस जगह को तंग कर देता है जहाँ मनुष्य जीवन यापन कर सकता हो। यह कुछ और नही बल्कि बर्बर,वहशी, भेड़ियों और क्रूर जानवरो का जंगल राज है। मर्द रात होने का इंतज़ार करतें हैं, लाश को भोर होने से पहले ही चुपके से दफ़न कर दिया जाता है, क़ब्र के ऊपर चढ़ी हुई मिट्टी, जिसे उधारीमिट्टी कहते हैं, कपकपाते हाथों से मुठ्ठी भर-भर के बराबर कर दिया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यहाँ किसी भी प्रकार की कोई क़ब्र या दफनाने का निशान नही था। कुछ आखिरी प्रार्थना अपने ठंग से करते हैं, दफनाने के तुरंत बाद ही जोगी लोग किसी अन्य नये स्थान के लिए प्रस्थान कर जातें हैं। घरेलू कुत्ते और गदहे जो उनके साथी हैं,और इस पूरे मातमी और दुखित प्रकरण के प्रत्यक्ष साक्षी हैं, अवश्य ही इस बात पर गर्व और सुखद अनुभूति करते होंगे कि वे मनुष्यों के किसी जाति से नही हैं। उनका गर्व करना किसी भी तरह से अनुचित नही है। जानवरो से बदतर दलित जीवन का अर्थ अपनी ज़िंदा और मुर्दा लाशो के एक ना खत्म होने वाली शव यात्रा के अतिरिक्त और कुछ नही है।

दलितों के इन हालात के लिए पूरा समाज, राज्य,जातिवाद, नस्लवाद, चरमपंथी प्रवृत्तियाँ और अमानवीय मूल्य जिसे हमनें प्रश्रय दे रखा है, जिम्मेदार हैं। दलित भी अपने तिरस्कार के लिए उतने ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वो इस तरह के अमानवीय रवैय्ये और अत्याचार के खिलाफ प्रतिक्रिया करने के बजाय उसे एक प्राप्त अंतर्निहित प्रवृति के रूप में स्वीकार करते हुए सहन करते रहते हैं। दलितों को अपने मानवीय अधिकारों, सामाजिक न्याय और समानता के लिए एकजुट होना होगा। दलितों ने अपने खुद के प्रयासों से इस उपमहाद्वीप पर जहाँ कहीं भी सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन खड़े किये है, उसमे सफल रहें हैं। उनके संघर्ष में उनका अपना चरित्र,एकता और दावों ने एक बुनियादी और निर्णायक भूमिका अदा किया है। इसलिए कि कोई अन्य महात्मा या उद्धारक उनके भाग्य को बदलने के लिए अवतरित नही होगा, ऐसा ना तो कोई कभी आया है और ना ही आगे आएगा। गैर-सरकारी संगठन, तथाकथित सिविल सोसाइटियाँ, कागज़ी शेर मानव अधिकार आयोग, राष्ट्रीय या सरकारी मानव अधिकार संगठन तो खुद ही शायद दलितों से भी ज़्यादा दबे हुए हैं। महान और बड़े क्रांतिकारियों ने, प्रसिद्ध नेताओ और राष्ट्रवादीयो ने दलितों के मामले में ज़बानी जमाखर्च के अलावा कुछ नही किया है। ऐसे परिदृश्य में दलितों और आदिवासियों के सामने इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नही है कि वो स्वयं की ओर लौटे और महाराष्ट्र के इंक़लाबी कवि नामदेव धासल ने जो कहा है उसका शंखनाद करें….
इस संसार का समाजवाद
इस संसार का साम्यवाद
और इसके सारे संस्करण
हमने उन सब को परख लिया है
और इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि
केवल हमारी अपनी छाया ही हमारे पैरों को ढाँक सकती है

रेफरेन्सेस:
https://www.siasat.pk/forum/showthread.php?212279-Dead-body-of-a-Hindu-dug-and-thrown-out-of-the-graveyard

https://www.reuters.com/article/us-pakistan-hindus-grave/religious-tension-in-pakistan-as-muslims-dig-up-hindu-grave-idUSBRE9970EF20131008

गणपत राय भील, अम्बेडकरवादी दलित लेखक हैं जो मिथि, सिंध,पाकिस्तान में रहते हैं। दोलत थारी की तरह आप पाकिस्तान के एक सशक्त दलित लेखक हैं। आप दोनों ने दलितों से सम्बंधित बहुत सी किताबें और लेख प्रकाशित किया है। वैसे तो दलित को सिंध के साहित्य और पत्रकारिता में राजनैतिक वर्ग के तौर पर पहचान दिलवाने को श्रेय दोलत थारी को जाता है जिन्होंने 2000 के शुरुवाती वर्षो में मासिक पत्रिका “दलित आवाज़” का प्रकाशन किया, लेकिन ये गणपत राय भील थे,जो पाकिस्तान दलित अदब और शेड्यूल कास्ट फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान से जुड़े हैं, जिन्होंने वास्तव में दलित विमर्श को साहित्यिक क्षेत्र एवं स्थानीय दलित समाजसेवियों में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया और प्रसिद्धि दिलायी। गणपत साहब ने दलितों के लिए लगातार लिखा है, और सिंधी भाषा के मासिक संकलन “दलित अदब” के प्रकाशन और सम्पादन का का कार्य जारी रखा हैं।

A doctor by profession. Voluntary social services, translation and writing are my other inclinations.

1 comments On समाज का जनाज़ा : एक दलित के शव की यात्रा

  • बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
    (शुरू अल्लाह के नाम से जो बेहद मेहरबान निहायत रहम वाला है)
    जातिवाद या झूठवाद

    हाय रे शब्दों का खेल|मेरे प्यारे भारत के लगभग हर नागरिक को कैसे झूठवाद-रूपी नाग ने डस रखा है और इस झूठवाद के ज़हर ने कैसे अल्लाह द्वारा दी गई सोचने, समझने व गौर करने की ताकत को मौत दे दी है,ज़रा मेरा पूरा लेख ध्यान से पढ़ें |

    हाय रे मेरे प्यारे भारतीयों ! हर वो व्यक्ति जो काम के नाम को जाति कहता है, वो झूठा है |यहाँ काम के नाम को जाति समझने वाला अनुसूचित जाति या जनजाति या पिछड़ा वर्ग का हो या अन्य वर्ग का, सब झूठे है |भारत में वर्ण धर्म (जिसे बार-बार हिन्दू धर्म के नाम से हर ज़रिए से प्रचारित व प्रसारित किया जाता है ) में आस्था रखने वाले लोग रोज़ाना झूठ बोलते हैं | अब सुरेश वशिष्ठ के क्या कहने, कि काम लोहे का यानी वो लुहार है काम के ऐतवार से | परन्तु उससे कोई नाम पूछता है तो कहता है सुरेश यानी उसने सच कहा उसका नाम सुरेश ही है |अब उससे उसकी जात पूछो तो कहता है पंडित यानी बजाए वशिष्ठ बताने के उसने काम का नाम पंडित को अपनी जात बताया| पूछने वाले व्यक्ति ने फिर कहा – आपकी जात पूछ रहा हूँ, आपका काम नहीं |आप का काम तो में देख रहा हूँ कि आप लुहार हैं |आप अपनी जात बताएं यानी आपके, बाप, दादा , खानदान या परिवार का नाम |वह फिर बोला वैसे मेरा सरनेम वशिष्ठ है पर में पंडित जात का हूँ | अर्थात सफ़ेद झूठ बोला | है ना अजीब गोरख धंधा | आशीष विश्वकर्मा एक कॉलेज में प्रोफेसर है | परन्तु उनसे कोई नाम पूछता है तो कहते हैं आशीष, यानी उन्होंनें सच कहा उनका नाम आशीष ही है | अब उनसे उनकी जात पूछो तो कहते है बढ़ई, यानी बजाए विशकर्मा बताने के उन्होंनें काम का नाम बढ़ई को अपनी जात बताया | पूछने वाले व्यक्ति ने फिर कहा- आपकी जात पूछ रहा हूँ आपका काम नहीं |आप का काम तो में जानता हूँ कि आप प्रोफ़ेसर हैं |आप अपनी जात बताएं यानी आपके , बाप, दादा, खानदान या परिवार का नाम |वह फिर बोले वैसे मेरा सरनेम विश्वकर्मा है पर में बढ़ई जात का हूँ |अर्थात सफ़ेद झूठ बोला | है ना अजीब गोरख धंधा | प्रदीप सुमन जी प्रतापगढ़ के ज़िलाधीश हैं | परन्तु उनसे कोई नाम पूछता है तो कहते हैं प्रदीप , यानी उन्होंनें सच कहा उनका नाम प्रदीप ही है | अब उनसे उनकी जात पूछो तो झिझकते हुए कहते है चमार , यानी बजाए सुमन बताने के उन्होंनें काम का नाम चमार को अपनी जात बताया | पूछने वाले व्यक्ति ने फिर कहा आपकी जात पूछ रहा हूँ आपका काम नहीं |आप का काम तो में जानता हूँ कि आप हमारे शहर के जिलाधीश हैं | आप अपनी जात बताएं यानी आपके बाप, दादा , खानदान या परिवार का नाम |वह फिर बोले वैसे मेरा सरनेम तो सुमन है पर मैं चमार जात का हूँ |अर्थात सफ़ेद झूठ बोला |है ना अजीब गोरख धंधा |श्रीमती तृप्ति पाशवान भारत की सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद पर हैं |परन्तु उनसे कोई नाम पूछता है तो वे कहती हैं तृप्ति ,यानी उन्होंनें सच कहा उनका नाम तृप्ति ही है |अब उनसे उनकी जात पूछो तो झिझकते हुए कहती हैं भंगी , यानी बजाए पाशवान बताने के उन्होंनें काम का नाम भंगी को अपनी जात बताया | पूछने वाले व्यक्ति ने फिर कहा , मैं आपकी जात पूछ रहा हूँ आपका काम नहीं | आप का काम तो में जानता हूँ कि आप भारत की सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद पर हैं| आप अपनी जात बताएं यानी आपके बाप, दादा ,खानदान या परिवार का नाम |वह फिर बोलीं वैसे मेरा सरनेम तो पाशवान है पर में बहुत निचली जात भंगी समाज से हूँ |अर्थात सफ़ेद झूठ बोला |है ना अजीब गोरख धंधा |

    (उल्लिखित लेख में उपयुक्त हुए नाम काल्पनिक हैं| लेखक उसकी तथ्य-पुष्टि से बरी है|)

    सुनो ध्यान से अब इस गोरख धंधे की वजह समझाता हूँ |

    भारत में ऊँच-नीच भावना से ग्रसित लोगों के बारे में गौरो-फ़िक्र करने पर अल्लाह ने यह रहस्यमई बात समझाई |भारत में वर्ण धर्म (जिसे बार-बार हिन्दू धर्म के नाम से हर ज़रिए से प्रचारित व प्रसारित किया जाता है ) में आस्था रखने वाले लोगों के वर्ण क्रम से प्रथमद्रष्टया यह पता चलता है कि वर्णक्रम में अपने आपको श्रेष्ठ समझने वाले लोगों के पुरखों ने यह नीच व घिनौनी हरकत साजिश के तहत अपनी श्रेष्ठता, बगैर योग्यता के सिर्फ जन्म के आधार पर कायम रखने हेतु की |
    इस शैतानी हरकत को अंजाम देने हेतु काम के नाम को जात कह कर जानते-बुझते झूठा प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया | भारत के मूल निवासियों पर साम दाम दण्ड भेद की हर क्षेत्र में साजिश करके हावी हो कर बाज़ काम को ओछे काम कह-कह कर और वो काम भारत के मूल निवासियों से करवाकर उन्हें उनके काम के नामों से झूठी जातीय पहचान दी |और भारत में बसने वाले आदम जात के लोग अपनी असल जातीय परिभाषा कि वो आदम जात हैं , अपने बाप दादा परदादा खानदान कौम की सूचक जात शब्द ही को भुला बैठे और काम के नाम को जात समझने के झूठे यक़ीन का शिकार हो गए |ये तो असल मैं झूठवाद है | ऐसा सिर्फ भारत में है | वरना सम्रद्ध देश जैसे साउदी अरब में आले सऊद जाति के लोग इस वक्त हुक्मरान हैं यानी सऊद की औलादें | अब समझे आप | दिमाग़ के जंग खाए ताले खुले कि नहीं ?
    जातिवाद तो परिवारवाद है जो अगर अच्छाइयों में दूसरे परिवारों से आगे हो तो उसको उसकी जाति यानी परिवार पर फख्र होना चाहिए | यह सब इंसानों की फितरत है|
    लोग कहते हैं कि संसद में इतने दलित सांसद , दलित विधायक, हैं | दलित राष्टपति हैं | फिर कैसे (झूठ वाद वाला ) जातिवाद है |सु नो इसका जवाब कि दलित सांसद , दलित विधायक, दलित राष्टपति हैं इसीलिए अत्याचार और भेद भाव हो रहा है। यदि झूठ भ्रष्टाचार इत्यादि के खिलाफ़ जागरूक शिक्षित , संगठित, संघर्षशील, सत्यप्रचारक होते तो ऐसा हरगिज़ नहीं होता , समझे भाई |

    ऐ मेरे भारत के मूलनिवासियों ! काम के नाम को जात समझ कर शिक्षित, संगठित, संघर्षशील हो कर कुछ वक्त का हौसला तो मिल सकता है और प्रतीतात्मक बदलाव भी | परन्तु असल सही तबदीली तब आएगी जब आप सभी जागरूक शिक्षित संगठित होकर खुली आँख से बड़े ही चौकन्ने हो कर संघर्षशील सत्य प्रचारक बनें, झूठ के खिलाफ़ वो चाहे अपने हों या पराए |

    3:57 अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता |
    61:7 अब उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े, जबकि उसे इस्लाम की ओर बुलाया जा रहा हो? अल्लाह ज़ालिम लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाया करता |
    61:8 वे चाहते हैं कि अल्लाह के प्रकाश को अपने मुंह की फूंक से बुझा दें, किन्तु अल्लाह अपने प्रकाश को पूर्ण करके ही रहेगा यद्यपि इनकार करने वालों को अप्रिय ही लगे |
    लोगों मेरे पहले सभी लेखों को ध्यान से पढ़ो| आप सब के बुद्धिपट खुलेंगे |
    मेरे फेसबुक ibrahim chittoria पर भारतीय नागरिकों को जागरूक करने हेतु कुछ लेख लिखे हैं, वो भी ज़रूर पढ़ें |

    जय हिन्द, जय मूलनिवासी, जय भीम, जय भारतवासी

    अस्सलामुअलैकुम

    लेखक – इब्राहिम चित्तौड़िया

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