हर सवाल का सवाल ही जवाब हो

अशराफ अक्सर पसमांदा आंदोलन पर मुस्लिम समाज को बांटने का आरोप लगाकर पसमंदा आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश करता है। जिसके भ्रम में अक्सर पसमांदा आ भी जाते हैं। जबकि पसमांदा आंदोलन वंचित समाज को मुख्यधारा में लाने की चेष्टा, सामाजिक न्याय का संघर्ष, हक़ अधिकार की प्राप्ती का प्रयत्न है। जिसका किसी भी धर्म से कोई सीधा टकराव नही है। इतिहास साक्षी है कि अशराफ, हमेशा से धर्म का इस्तेमाल अपनी सत्ता और वर्चस्व के लिए करता आ रहा है, और इसमें सफल भी रहा है। अतः उसके लिए यह आरोप लगाना बहुत आसान है। पसमांदा की तरक़्क़ी में सबसे बड़ी बाधा अशराफ ही बना हुआ है जो पसमांदा को धार्मिक और भावनात्मक बातो में उलझा कर उसको उसकी असल समस्यों, रोज़ी रोटी, समाजी बराबरी और सत्ता में हिस्सेदारी से दूर रखते हुए स्वयं को सत्ता के निकट रखना सुनिश्चित किये हुए है। इसलिए पसमांदा को इस धोखे से बाहर निकल कर सामाजिक न्याय की इस लड़ाई में अशराफ के विरुद्ध कमर कसकर खड़ा होना होगा।

जब साद बिन उबादह और अबु बकर के खिलाफत की कशमकश, अली और माविया का सत्ता संघर्ष, बाबर और इब्राहिम लोदी की लड़ाई, क़ारी तैयब और दारुल उलूम देवबंद के इंतेजामिया(प्रबन्ध कमिटी) की लड़ाई, जमीयतुल उलेमा के अरशद मदनी और महमूद मदनी की लड़ाई और तब्लीग़ी जमात के मौलाना साद और मौलाना जोहैर की लड़ाई (लिस्ट अभी और भी है) मुस्लिम समाज को बांटने की लड़ाई नही है और दोनो पक्षो के मुसलमान होने में किसी को कोई शक नही है तब भला पसमांदा और अशराफ सँघर्ष मुस्लिम समाज को बांटने की लड़ाई कैसे हो गयी? और पसमांदा के इस्लाम को शक की निगाह से क्यो देखा जा रहा है? पसमांदा तो अपने राजनैतिक सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक उत्थान के लिए एक सामाजिक जागरूकता का कार्यक्रम क्रियान्वित कर रहा है।

एक इतिहासिक तथ्य यह भी है कि अब तक अशराफ द्वारा संचालित किसी भी मुस्लिम संगठन और संस्था द्वारा पसमांदा के राजनैतिक सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक उत्थान के लिए किसी प्रकार की कोई नीति या कार्यक्रम नही रहा है।

प्रथम पसमांदा आंदोलन के जनक मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ने अशराफ के इस आरोप का अपने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में इस प्रकार जवाब दिया….

“सुब्हान अल्लाह  भारत देश में सैकड़ो अंजुमने बनायीं जाये, पचासो कांफ्रेंसें आयोजित हों, एक दूसरे के खिलाफ धड़े बंदियां की जाये, एक अंजुमन व कांफ्रेंस के सदस्य दूसरी अंजुमन व कांफ्रेंस के सदस्यों को बेईमान, ग़द्दार,चोर आदि कहें, लिखें और मशहूर करें। यही नहीं बल्कि उनके व्यक्तिगत कमज़ोरियों और पारिवारिक ग़लतियो को प्रचारित करने  के लिए पैसे बर्बाद करें, एक दूसरे को ईर्ष्यालु, गवर्नमेंट का जासूस आदि बताएं, काफिर व मुशरिक के फतवे दिए जायें। ये बातें भारत में रोज़ हों, बराबर हों और बहोत ज़्यादा हों। मगर उन सारी नालायकियो से मुसलमानो में एकता पैदा हो, निःस्वार्थ भाव से सेवा का उत्साह पैदा हो। और अगर कोई गरीब व मजबूर समाज अपने उलेमा (धर्म गुरुओं) नेताओ और लीडरों की तरफ से निराश होकर अपनें सामाजिक सुधार व शिक्षा की व्यवस्था करें तो उस से मुसलमानो में बिखराव पैदा होने का डर प्रकट किया जाये ” माशाअल्लाह।”

(पेज4,अलइकराम,1,फरवरी1927ई०,जिल्द-2, नंबर-2)



जब पिछड़ा और दलित आंदोलन से किसी पिछड़े और दलित के धार्मिक अस्तित्व पर कोई फर्क नही पड़ा, और वो आज भी अपने सारे धार्मिक कर्मकांड  पूजा पाठ तीर्थ इत्यादि बड़े शौक़ से कर रहें हैं। और साथ ही साथ भारतीय समाज में अपनी सामाजिक पहचान पिछड़े और दलित को बनाये हुए अपने अधिकारों को हासिल कर  आगे बढ़ रहें हैं तब फिर पसमांदा अगर ऐसा करने की कोशिश कर रहा है तो इसमें गलत क्या है? पसमांदा को भी भारतीय समाज में अपनी पसमांदा  पहचान को और सुदृण करने को कोशिश करते हुए अपने अधिकारों की प्राप्ति की ओर अग्रसर होना होगा।

इसी सवाल का जवाब 10 नवंबर, 1934 ई० को गया में होने वाले जमीयतुल मोमिनीन के राष्ट्रीय अधिवेशन में सरदार लतीफुर रहमान नगमतिया ने अपने अध्यक्षीय भाषण में इस प्रकार दिया….

“मेरी समझ मे ये नही आता कि ऐसा क्यों सोच लिया गया है? आखिर हम ने इस्लामी भाईचारे के किस केंद्र, किस संस्थान और किस प्रतिष्ठान से एक समाज की हैसियत से अलगाव कर लिया है? अगर एक इंसान अपने परिवार के सुख और संवृद्धि में रुचि लेता है और उसकी सुधार एवं विकास की कोशिश करता है तो क्या कोई सद्बुद्धि व्यक्ति उन कोशिशों को अनुचित कह सकता है ?”

सचाई यह है कि पसमांदा आंदोलन के उभार से अशराफ में यह डर व्याप्त है कि कहीं अब पसमांदा को भी, जिनकी आबादी कुल मुस्लिम आबादी के 90% है, भागेदारी न देनी पड़ जाए। वो पूर्व की भांति पसमांदा को अपना सेवक बना कर ही रखना चाहता है।

इसी सवाल के जवाब में 27 अगस्त 2017 को मऊ नाथ भंजन यूपी में होने वाले अखिल भारतीय पसमांदा महाज़ के सम्मेलन में महाज़ के प्रधान राष्ट्रीय महासचिव वक़ार अहमद कहते है:

“….हमने जब इसमे बहस करना शुरू किया बात चलाना शुरू किया तो कहा गया कि क़ौम का बटवारा हो रहा है।
जब देवबंदी बरेलवी करने से, शिया सुन्नी से करने से, सपा बसपा करने से ,चार जगह आप का वोट आराम से बांट लेते हैं आप लोग, हम कहने भी नही जाते किसको वोट दो, वो बटवारा नही कहा जाता, हमारे स्टेज पर बोल देने से 100, 200 लोगो के सुन लेने से क़ौम का  बटवारा कैसे हो जाता है? क़ौम का बटवारा नही होता क़यादत(नेतृत्व) का बटवारा हो जाता है। कोई सालिम अंसारी को मजबूरी में चुनना पड़ जाता है, कभी अहमद हसन को जगह देनी पड़ जाती है, ये बटवारा है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी, आज़म खान की हकमारी हो जाती है, ये बटवारा है। ये बटवारा बर्दाश्त नही हो रहा है….”

उपर्युक्त विवरण से यह ज्ञात हुआ कि पसमांदा आंदोलन पर मुस्लिमो को बांटने का आरोप बेबुनियाद है। और अशराफ की “धर्म और धार्मिक एकता की नीति” केवल एक हथियार है जिससे वो पसमांदा के हक़ अधिकार की अवहेलना करते हुए,  नेतृत्व विहीन रखते हुए स्वयं को सारे मुस्लिमो का नेतृत्वकर्ता बनाये रखना चाहता है। पसमांदा आंदोलन, अशराफ द्वारा पसमांदा के हकमारी के विरुद्ध फूंके गए बिगुल का नाम है,  समर तो अभी शेष है।
इस लेख को और अच्छे से समझने के लिए मेरा लेख “मुस्लिम तुष्टिकरण का सच” और अहमद सज्जाद द्वारा लिखित और मेरे द्वारा अनुवादित एवं संकलित “दास्तान-ए- भेदभाव” ज़रूर पढ़े।

फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी

लेखक, अनुवादक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पेशे से चिकित्सक हैं

A doctor by profession. Voluntary social services, translation and writing are my other inclinations.

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