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हाशिए के समाज और पहचान का संकट

[प्रस्तुत आलेख जय प्रकाश फ़ाकिर द्वारा उपरोक्त विषय पर दिए गए व्याख्यान का हिस्सा है, जो उन्होंने DEMOcracy द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिया था. इस व्याख्यान का विडियो लिंक आखिर में दिया गया है]

मैं #DEMOcracy का शुक्रगुज़ार हूँ जिसने मुझे इस विषय पर बोलने का मौक़ा दिया. किसी भी बात को रखने के दो तरीक़े होते हैं. पहला कि हम बात कुछ सिद्धांतों, विचारों से शुरू करें, दूसरा ये कि बात हम अपने अनुभव से शुरू करें. ये जो आज का मुद्दा है “हाशिए के समाज और पहचान का संकट” ये बहुत अहम् मुद्दा है जिससे मैं ख़ुद दो-चार रहा हूँ इसलिए मैं बात अपने अनुभव से ही शुरू करना चाहता हूँ. मै आप को बताना चाहता हूँ कि मैं “वन गुज्जर” जाति से तअल्लुक़ रखता हूँ, मेरे पूर्वज कश्मीर से बिहार आए थे. बिहार में भी पहले ‘गोपालगंज’ में थे फिर ‘सिवान’ में बस गए. मतलब ये है कि मेरे परिवार का लगतार प्रवास होता रहा है.

दरसल ये हालत हर हाशिए के समाज पे रहने वाले लोगो की होती है, वो लगतार अपने ही देश में प्रवासी बने रहते हैं. ये पहचान मुख्यधारा की पहचान से अलग होती है पर इन पहचानों को किसी बड़ी पहचान में मिलाने की हर संभव कोशिश की जाती है. जैसे जनजातीय समाज (जिसमें मैं भी आता हूँ) हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं है न ही हिन्दू समाज जनजातीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है फिर भी हिन्दू धर्म की अखंडता बचाए रखने के लिए जनजातीय समाज को हिन्दू समाज का हिस्सा मान लिया जाता है. मै साफ़ कहूँ तो बौद्ध और जैन जैसे अलग धर्मों को भी हिन्दू धर्म का ही हिस्सा मान लिया जाता है. जो समाज अखंड हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं बन पाते उनके लिए आप को एक अलगाव/द्वेष नज़र आ जाएगा.

एक सवाल किया जाता है कि क्या सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए धर्म की आवश्यकता होती है? मेरा मनना है कि हाँ होती है वरना क्या कारण था कि अश्वेत लोगों को इस्लाम धर्म क़बूल करना पड़ा जबकि उनके पास “अश्वेत पहचान” तो थी ही. आप Malcolm X को लें जिन्होंने इस्लाम धर्म कबूल किया और अपनी लड़ाई को एक नया आयाम दिया. यही कारण है कि मैंने भी अपने स्नातक के अंतिम वर्ष में इस्लाम धर्म को क़बूल कर लिया. इस्लाम धर्म की अपनी समस्याए हैं पर ये हिन्दू धर्म की कार्बन कॉपी नहीं है जैसा कि कुछ लोगों का मानना होता है.

जाति के विषय पर इस्लाम, हिन्दू धर्म से काफ़ी अलग है. इस्लाम में हिन्दू धर्म की तरह जाति को सैद्धांतिक मान्यता नहीं दी गई है इसलिए मेरी अपील पसमांदा युवाओं के लिए ये है कि वो समस्याओं की सरलता में न जाएं बल्कि उसकी जटिलता का अध्यन करें. उन्हें हिन्दू धर्म और मुस्लिम समाज में जाति के भेद को समझाना होगा. ये काम युवा निष्पक्ष हो के कर सकते हैं क्योंकि अभी तक उनकी कोई तयशुदा धारणा नहीं बनी है इसके साथ ही हमें अपने अनुभव को सैद्धांतिक ढांचे में ढालना भी होगा, सिद्धांत बनाने का काम हम स्वर्ण जातियों को नहीं सौंप सकते. ये काम भी हमें ही करना है क्योंकि बिना सिद्धांत के आप अपने सामूहिक अनुभव को लोगों को नहीं समझा पाएंगे. सिद्धांत/विचारधारा ही आपकी चेतना और आप के अनुभव को जोड़ने का काम करती है.

भारत में अब तक बहुत कम चिन्तक पैदा हुए जिसका कारण ये है कि हम विरोधी तर्कों को समझना ही नहीं चाहते. जैसे एक मर्द के रूप में हम औरतों के तर्क को समझना नहीं चाहते वैसे ही एक स्वर्ण के रूप में हम दलित/पसमांदा के तर्कों को समझना नहीं चाहते. जो भी तर्क हमारे हितों के ख़िलाफ़ है उस ओर हम देखते ही नहीं हैं. जब “दास कैपिटल” कार्ल मार्क्स ने लिखी तो उसे मजदूर बहुत आसानी से समझ लेते थे पर बड़े-बड़े बुद्धिजीवी भी इस किताब को नहीं समझ पा रहे थे. ऐसा इसलिए था क्योंकि ये किताब मजदूरों के पक्ष में थी और पूंजीपतियों के विरुद्ध.

Multiple Identity के विषय में सबसे अच्छा काम Kimberly Karen Shaw ने किया है. उन्होंने एक सिद्धांत दिया Inter-sectionalism  का जिसमें वो कहते हैं कि एक मनुष्य की अलग-अलग पहचान के आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है पर क्या हो जो एक ही इंसान की कई पहचान मिलके उसके साथ ज़ुल्म करें जैसे एक पसमांदा मुसलमान को दलित जाति का होने के कारण भेदभाव का शिकार होना पड़ता है पर उसे दलित हिन्दुओं की तरह आरक्षण नहीं दिया जाता क्योंकि वो मुसलमान है. इस प्रकार हम देखते हैं कि पसमांदा मुसलमान, दलित हिन्दुओं से ज़्यादा पिछड़े हैं. Multiple identity के शिकार लोगों के साथ यही समस्या आती है.

इस समस्या का दूसरा पहलू ये है कि जब आप अपनी अलग पहचान का ज़िक्र करते हैं तो इसका तीव्र विरोध वे लोग करने लगते हैं जिनका सामाजिक-राजनीतिक हित आप की अलग पहचान के अस्तित्व को मानने से प्रभावित होता है. उदहारण के रूप में जैसे ही पसमांदा मुसलमान अपनी पसमांदा पहचान को ले के सजग होते हैं वैसे ही “मुस्लिम राजनीति” करने वाले लोग सतर्क हो जाते हैं क्योंकि इन लोगों की दुकान मुस्लिम एकरूपता के मिथ को बनाए रखने में है. जब तक आप मुस्लिम होने के नाते भेदभाव का आरोप लगायेंगे तब तक आप का विरोध नहीं होगा पर जैसे ही आप पसमांदा होने के कारण भी मुस्लिम समाज के अन्दर भेदभाव होने का आरोप लगाएंगे तो पूरे अशराफ़ बुद्धिजीवियों के पेट में मरोड़ होने लगेगा. यही कारण है कि खालिद अनीस अंसारी, मसूद आलम फ़लाही जैसे पसमांदा बुद्धिजीवियों पर हमले होने लगते हैं क्योंकि ये लोग “मुस्लिम एकरूपता” के मिथ को तोड़ रहे हैं.

यहाँ एक बात ये भी समझने की है कि पहचान का सम्बन्ध धर्म से ज्यादा इतिहास से जुड़ा होता है. पसमांदा की पहचान हमने नहीं बनाई ये पहले से थी. यही कारण है कि धर्म बदलने से भी जाति उत्पीड़न समाप्त नहीं होता. तो ज़रूरत इस बात की है कि हमें अपनी अलग-अलग पहचानों को महत्व देना चाहिए और हर जगह अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहिये. हमें “मानवतावादीयों” के विचार को नकारना होगा कि मनुष्य के रूप में हमारी सिर्फ एक ही पहचान है क्योंकि हमारा ये स्पष्ट मानना है कि दो विरोधी वर्गों के हित एक सामान नहीं हो सकते वर्ना क्या वजह थी जो मार्क्स ने “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ” कहा न कि “दुनिया के इंसानों एक हो जाओ”.

हमें इस्लाम की भी अपनी व्याख्या देनी होगी क्योंकि आज तक हम अशराफ़ उलेमाओं की ही व्याख्या पढ़ते और उन्हें ढोते आए हैं. ये याद रहे कि हाशिए के समाज के पास विकल्प नहीं होता इसलिए नैतिकता का बोझ भी उसपर नहीं लादा जा सकता. आप को पसमांदा नेता बहुत सी जातियों के साथ गठजोड़ बनाने की कोशिश करते दिखेंगे क्योंकि उनके पास विकल्प नहीं है और न ही उनकी कोई पैतृक राजनीतिक पार्टी है, जैसे कांग्रेस मुस्लिम अशराफ़ जातियों की पार्टी है. दूसरी बात आप को ये समझनी है कि सिर्फ पैसा कमा लेने से आप की सामाजिक स्थिति नहीं बदल जाती.

मै 2 लाख रुपया भी महीने में कमाता हूँ पर इससे मैं दिल्ली की किसी अच्छी कॉलोनी (जो आम तौर से ब्राह्मण-बनियों या शेख-सैयद के होते है) में घर नहीं ले सकता और मेरे साथ हुआ भी यही. भरत नगर, दिल्ली में जो घर मैं लेना चाह रहा था वो मुझे नहीं मिला पैसा होने के बावजूद भी. इस बात को आप दूसरे तरीक़े से समझें कि एक अमीर मर्द की सुख-सुविधा, ऐयाशी आदि के लिए दुनिया भर में तमाम निज़ाम बने हुए हैं पर एक अमीर महिला के लिए भी क्या वैसे ही निज़ाम (इंतेज़ाम) हैं? हमें अपनी सामाजिक स्थिति को बदलने के लिए मौजूदा व्यवस्था को बदलना होगा और किसी भी व्यवस्था को बदलने के लिए सामाजिक क्रांति की आवश्यकता होती है.

हिन्दीअनुवाद: लेनिन मौदूदी

यह लेख 18 नवम्बर 2017 को hindi.roundtableindia.co.in पर प्रकाशित हो चुका है।

मैं केंद्रीय सरकार में कार्यरत हूं. बहुजन दृष्टिकोण से मेरे बहुत से आलेख, कहानियां (उर्दू, हिंदी, अग्रेज़ी), कवितायेँ, साहित्यक आलोचना छप चुके हैं.

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