हाँ, मुसलमानो का तुष्टिकरण हुआ है, लेकिन अशराफ़ मुसलमानों का

यह 11 जून 2017 को पटना (बिहार) में बागडोर और अन्य संगठनों द्वारा आयोजित एक-दिवसीय कांफ्रेंस ‘बहुजन चौपाल: भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियाँ’ में प्रो. खालिद अनीस अंसारी के वक्तव्य की संशोधित प्रतिलिपि है.  

मैं अपनी बात शुरू करने से पहले जो आयोजक संगठन हैं बहुजन चौपाल के उनका शुक्रगुजार हूँ की उन्होंने मुझे मौका दिया. प्रो. इश्वरी प्रसाद की इजाज़त से…मैंने बहुत सारी चीजें तैयार की थीं लेकिन चूँकि वक़्त कम है तो मैं कुछ ही मुद्दों पर अपनी बात रखना चाहूँगा. एक संघर्ष हमारे सामने नज़र आ रहा है जहाँ पर कुछ ताक़तें धर्मतंत्र, एक थिओक्रेसी, स्थापित करना चाहती हैं भारत में और दूसरी जो ताक़तें है वो जनतंत्र के लिए संघर्ष कर रही हैं. तो कुल मिलाकर एक थिओक्रेसी [theocracy] वर्सेज डेमोक्रेसी [democracy] या धर्मतंत्र बनाम जनतंत्र की लड़ाई है…और मैं उत्तर प्रदेश से आया हूँ. पिछले चुनाव का जो नतीजा आया और उससे पहले जो चुनाव हुए भारत में उससे साफ़-साफ़ ये इशारा मिल रहा है की जो धर्मतंत्र बनाना चाहते है वो शक्तियां भारत में हावी हैं.

खालिद अनीस अंसारी

अपनी बात को जो लोग विजयी हुए उनके नज़रिए से भी रख सकता हूँ लेकिन मुझे लगता है जिनका काफिला लुटा, आज बात उनके नज़रिए से रखनी चाहिए. जो लोग यहाँ जनतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं, उसको गहरा बनाना चाहता हैं, उनको हम लोग ‘सेक्युलर’ और ‘सामाजिक न्याय’ की शक्तियों के नाम से जानते हैं. आज अगर इन शक्तिओं का काफिला लुटा, अगर आज ये शक्तियां कमज़ोर हैं भारत में, तो मुझे लगता है की कहीं-न-कहीं इनके सेकुलरिज्म और सामाजिक न्याय के या तो सिद्धांत [theory] में या व्यवहार [practice] में कमी रही. व्यवहार में कमी लगभग सभी विचारधारा के मानने वाले लोगों में रहतीं है. मैं कोशिश करूँगा कि सिद्धांत में क्या कमियां रहीं ‘सेकुलरिज्म’ और ‘सामाजिक न्याय’ के उस पर आज कुछ बात रखूं. 

सबसे पहले सेकुलरिज्म की बात करते है. यह माना जाता है कि यहाँ पर सांप्रदायिक दंगों की जो राजनीति है या साम्प्रदायिकता की जो राजनीति है उसको सेकुलरिज्म चुनौती देगा. सेकुलरिज्म के साथ उसका सीधा-सीधा संघर्ष है. इस पर थोड़ा ऐतिहासिक परिपेक्ष्य यहाँ पर देना जरुरी है. अगर आप आज़ादी से पहले देखें तो यहाँ पर कई तरह की ताकतें संघर्ष कर रही थीं. मैं बात सिर्फ मुस्लिम बॉडीपोलीटिक [Muslim bodypolitic] पर ही करूँगा. बंटवारे की जो पूरी राजनीति है, एक पेचीदा राजनीति है. लेकिन बहुत सारी बातें वहां से निकलती है जो कहीं आज आते-आते गुम हो गयीं और उन पर आज दोबारा बहस करना जरुरी है. अगर आप देखेंगे तो आज़ादी से पहले मुसलमानों के अन्दर दो तरह के [महत्वपूर्ण] संगठन थे. एक ‘मुस्लिम लीग’ जो कि सवर्ण या अशराफ़ मुसलमानों का संगठन था जो ‘दो राष्ट्रों के सिद्धांत’ को मान रहा था, टू नेशन थ्योरी [two nation theory] का समर्थन कर रहा  था. दूसरी तरफ ‘मोमिन कांफ्रेंस’ थी जो पसमांदा मुसलमानों का संगठन था और वह टू नेशन थ्योरी का विरोध कर रही थी. जब 1946 का इलेक्शन आता है जिसे कन्सेंसस ऑन पाकिस्तान [consensus on Pakistan] कहा जाता है…और उस वक़्त अगर आप जानते हैं तो भारत में यूनिवर्सल एडल्ट फ्रैंचाइज़ [universal adult franchise] नहीं था, सब लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं था. एक रिस्ट्रिक्टेड इलेक्टोरेट [restricted electorate] था भारत में. वही लोग वोट दे पाया करते थे जो साहिब-ए-हैसियत हुआ करते थे, जिनके पास संपत्ति हुआ करती थी या कुछ ख़ास डिग्री बी.ए…ये सब कर रखा होता था.

तो अगर आप मुसलमानों को देखें तो इस तरह के लोग जिनको वोट देने का अधिकार था उनकी आबादी सिर्फ 12 से 15 प्रतिशत थी और ये [ज़्यादातर] लोग सवर्ण या अशराफ़ मुसलमान थे. 1946 का इलेक्शन जिसमे मुस्लिम लीग ने बहुत मज़बूती से जीत हासिल की और पाकिस्तान का रास्ता साफ़ हुआ, उसमे अगर किसी की जिम्मेदारी [बनती] है तो ये अशराफ़ 12-13 प्रतिशत वर्ग की ज़िम्मेदारी है. अशराफ़ एज़ ए क्लास [as a class] ने पकिस्तान को वोट दिया. ये अलग बात है कि हर वर्ग में बग़ावती तेवर के लोग होते हैं. कुछ लोग ऐसे ज़रूर थे जिन्होंने टू नेशन थ्योरी का विरोध किया जैसे [मौलाना] अबुल कलाम आजाद साहब…और भी कई लोग थे इस तरह के. लेकिन वह महज़ व्यक्ति हैं, बुद्धिजीवी हैं, वो अपने वर्ग की नुमाइंदगी नहीं करते. 

तो पहली बात आज़ादी की…जो बंटवारे की पूरी राजनीती है, पेचीदा राजनीती है. मैं उस डिस्कशन में नहीं जाना चाहता हूँ. मैं सिर्फ इस फैक्ट [fact] की तरफ इशारा करना चाहता हूँ कि अगर 1946 का इलेक्शन कन्सेंसस ऑन पाकिस्तान है, अगर 1946 के इलेक्शन में मुस्लिम लीग भारी मतों से जीत कर आती है तो उसमे सारे मुसलमानों की ज़िम्मेदारी नहीं थी क्योंकि 85% मुसलमानों का वोट टेस्ट [test] ही नहीं हुआ था. ये एक बहुत important बात है. और हम आज़ादी के बाद देखें तो [शायद] राही मासूम रज़ा ने कहा है…एक जगह लिखा है कि वो पुराने मुस्लिम लीगी जो बंटवारे की पूरी राजनीती में लगे हुए थे, अचानक उन्होंने कांग्रेसी टोपी पहनी और जा के कांग्रेस से जुड़ गए. तो दोस्तों, बटवारे का विरोध किया पसमांदा—पिछड़े, दलित, आदिवासी—मुसलमानो ने और जिन लोगों ने पाकिस्तान का समर्थन किया एक वर्ग की तरह, जातीय वर्ग की तरह वह कांग्रेस से जुड़ गए और तब से भारत में जिसे हम मुस्लिम राजनीति बोलते हैं, उस पे उनका पूरी तरह से वर्चस्व है. और ये वर्चस्व आज तक जारी है!

मुस्लिम राजनीती से जुड़े जितने भी institutions [संस्थान] हैं, चाहे वो जमियत उलेमा-ए-हिन्द हो, चाहे वो जमात-ए-इस्लामी हो, चाहे वो पोपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया हो, चाहे वह आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड हो…सारे संगठनो को अगर आप उठा कर देखेंगे तो इन्हीं 15%…जो सवर्ण मुसलमान हैं…इन्हीं का दबदबा है, इन्हीं का कब्ज़ा है. ये बात आज तस्लीम करनी चाहिए हमें कि भारत में मुसलमानों के अन्दर according to People’s of India Project 705 जातियां है. इन 705 जतियों में सिर्फ 15 से 20 जातियां वैसी हैं सय्यद, शेख़, मुग़ल पठान…जिन्होंने सारे मुसलमानों के नाम पर जितने मुसलमान institutions हैं उन पर कब्ज़ा कर रखा है. ये बात आज खुल कर कहने ही जरुरत है.

अब भाजपा कहती है कि जो कांग्रेस का सेकुलरिज्म है वह सियुडो सेकुलरिज्म [psuedo secularism] है. भाजपा यह भी कहती है की भारत में मुसलमानों का तुष्टिकरण हुआ है. मैं आज डंके की चोट पर आपसे कहना चाहता हूँ कि ‘हाँ, मुसलमानो का तुष्टिकरण हुआ है, लेकिन अशराफ़ मुसलमानों का!’ मुसलमानों के अन्दर भी पन्द्रह-पचासी [15:85] की लड़ाई है और यह पंद्रह…हर जगह अपनी आबादी से ज्यादा नुमाइंदगी है इनकी.

पिछले उत्तर प्रदेश के इलेक्शन में देख लीजिये, दलित-मुस्लिम अलाइंस [alliance]…एकता का नारा लगा. जिस पार्टी ने यह नारा लगाया उसने 100 मुसलमानों को टिकट दिया. उन 100 टिकटों में [क़रीब] 90 अशराफ़ को मिले. पंद्रह सैकड़ा जिनकी आबादी है उनको 90 टिकेट मिले और जिनकी आबादी पचासी सैकड़ा है उनको सिर्फ 10 टिकट मिले. इन 90 टिकटों में भी जो पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चहरे थे…बहुजन समाज पार्टी के…जो आज इस पार्टी में नहीं है किसी कारणवश…बीच में काफी मीडिया में रहा…जिनको निकाला गया पार्टी से वो शेख़ बिरादरी से आते हैं. इन 90 टिकटों में से 48 टिकट सिर्फ मुसलमानों की शेख बिरादरी को मिला था. 

साथियों, यह बात की जातिवाद या जाति की जो समस्या है यह कोई हिन्दू परिघटना है मैं इससे नाइत्तेफाकी रखता हूँ. जाति दक्षिण एशिया की problem है. पेशावर के लेकर ढाका तक और श्रीनगर से लेकर कोलम्बो तक मिलती है. सारे धर्मों में, सारे छेत्रों में. आज इस बात को तसलीम कर लेना चाहिये.

bahujan chaupal

तो सेकुलरिज्म की यहाँ राजनीति क्या होगी? आप देखिये, दंगे होते हैं लगातार. इधर एक साहब कहते हैं मुसलमानों में से कि ‘हम मोदीजी के टुकड़े-टुकड़े काट देंगे’. उनके विडियो चारो तरफ circulate होते हैं और जो हिन्दू कन्स्टिटूअन्सी [constituency] है, हिंदुत्व की जो कन्स्टिटूअन्सी है वो consolidate होती है. यह बात समझने की जरुरत है. इस पर मैं थोड़ा आंकड़ों के साथ बात करना चाहता हूँ. हमारे यहाँ दंगे होते हैं. साल में एक बार होते हैं, कभी दो बार होते हैं और कभी-कभी तीन साल में एक बार होते हैं.

आइये, थोड़ा कश्मीर पर नज़र डालें जहाँ पर वायलेंस हैज बिकम ए वे ऑफ़ लाइफ [violence has become a way of life], जहाँ पर हिंसा एक तौर-ए-ज़िन्दगी बन गई है. अभी कश्मीर में एम.एच.ए. सिकंदर वहां रिसर्च स्कॉलर हैं, एक्टिविस्ट हैं उन्होंने एक आर्टिकल लिखा है…10 मई को, डेली ओपिनियन में ‘The Brahmins among Muslims We Don’t Talk About’. क्या लिखते हैं? अगर इजाज़त हो तो मैं एक छोटा सा extract सुनाता हूँ आपको. यह 10 मई का आर्टिकल है. पहला आर्टिकल आया है इतिहास में जिसने कश्मीर के मुसलमानों की जातीय समस्या को खोलकर रखा है. इन सब बातों पर हमारा सेक्युलर ख़ेमा चर्चा नही करेगा. 

‘To this day the Syeds…’, कश्मीर पर लिख रहे हैं, कश्मीर के हैं ये और खुद सय्यद हैं…‘To this day the Syeds dominated the bureaucracy and the invisible apartheid continues. The Islamic revivalist movements too were dominated by the Syeds’. ये कह रहे है कि जो पूरा प्रशासन है उस पर सय्यदों का कब्ज़ा है और जो सो-कॉल्ड [so-called] तथाकथित इस्लामिक आंदोलन है उस पर भी सय्यदों का कब्ज़ा है. ‘Few Syeds and Khojas’…खोजा दूसरे अमीर जातियों को कहते हैं कश्मीर में…“Few Syeds and Khojas lost their lives or took part in the insurgency”. ये कह रहे हैं कि भारत के खिलाफ जो इंसर्जेंसी है उस में बहुत कम सय्यद परिवार और बहुत कम [सय्यद] लोगों ने अपनी जानें वहां पर दीं. “But both United Jihad Council and Hurriyat Conference was dominated by Syeds, who want the sacrifices from the non-Syeds and luxurious lives for their wards and extended family’. तो क़ुरबानी तो चाहते हैं कि दूसरी जो पसमांदा जातियां [हैं वह] दें लेकिन उनके अपने बच्चे चैन से अमेरिका में बैठके जीते हैं. ‘They have used every mechanism to keep the masses occupied with the conflict so that they don’t engage with the larger questions associated with it, including caste and privileges’.

नजीब पसमांदा बिरादरी से आते हैं, अख़लाक़ पसमांदा बिरादरी से आते हैं, हमारे पहलू खान [मेव मुसलमान हैं] पसमांदा बिरादरी से आते हैं. कल मेरे पास तीन सौ लोगों की लिस्ट आई है जो लिंच [lynch] हुए हैं [या जिन पर हमला हुआ है], उसमे से अभी तक कोई भी अशराफ़ तबके का आदमी मुझे नही मिला है. मेरी रिसर्च जारी है, मैं जल्दी ही इस पर लिखने वाला हूँ. मुज़फ्फरनगर दंगो में पसमांदा मारे जाते हैं, मेरठ-मलियाना में पसमांदा मारे जाते हैं, गुजरात मे पसमांदा मारे जाते हैं. बहुत कम, अपवाद के ही तौर पर, सय्यदों की कुछ दुकाने जलाई गई है और कुछ लोगों की मौत हुई है. दंगो की भी भारत में जाति होती है. यह समझने की जरूरत है. और अगर हिन्दू साम्प्रदायिकता, हिंदुत्व अगर बढ़ता है तो उसकी बहुत बड़ी वजह मुस्लिम साम्प्रदायिकता है. दोनो का चोली-दामन का साथ है, एक द्वंद्वात्मक रिश्ता है. जब तक आप अकलियतों के अन्दर साम्प्रदायिकता जोकि उनके सवर्ण तबके चलाते हैं उस पर प्रहार नही करेंगे, कभी भी हिंदुत्व को हरा नही सकते हैं जो उन के सवर्ण तबके चलाते हैं. तो इसी लिए भाजपा जो बात कहती है कि मुसलमानों का तुष्टिकरण हुआ है वह सच है लेकिन आधा सच है. और जब तक इस बात को हम सेकुलरिज्म में नही लाएंगे और एक बहुजन अंडरस्टैंडिंग [understanding] नही देंगे सेकुलरिज्म की…जो बाबा कबीर ने दी थी, जहां पर वो हिन्दू फंडामेंटलिस्म और मुस्लिम फंडामेंटलिस्म को मिलके चोट पहुंचाते थे…यह कहीं हमारे सेक्युलर योद्धा भूल गए. 1970 तक इनको यह याद था. लेकिन 1970 के बाद धीरे-धीरे हमारे सेक्युलर योद्धा इस बात को भूल गए और आज जो सेकुलरिज्म हमें परोसा जा रहा है ये सवर्ण सेकुलरिज्म है. इसको उखाड़कर फेंकने की जरूरत है ताकि बहुजन सेकुलरिज्म आ पाए.

डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि दंगा बहुत जरूरी है…सवर्ण बहुत दंगा कराते हैं क्योंकि वही एक समय होता है जब हिंदुओं को यह एहसास होता है कि हम हिन्दू हैं वरना रोजमर्रा की ज़िंदगी में वो जातियों में बंटे होते है. यह डॉ. आंबेडकर ने कहा था. जो बात डॉ. आंबेडकर ने नहीं कही वह बात यह है की मुसलमानों में भी वही हालत है. और इस बात को आज कहने की जरूरत है.

यह सेकुलरिज्म पर कुछ बात मैं करना चाहता था. अब सामाजिक न्याय पर आ जाईये आप. तो सामाजिक न्याय में… डॉ. आंबेडकर एक बहुत अच्छी बात कहते हैं…जहाँ वह कास्ट [caste] को कभी-कभी नेशन [nation] बोलते हैं, अलग राष्ट्र बोलते हैं…की भारत चार हज़ार राष्ट्रों में बटा हुआ है. वहीं कभी-कभी एक अच्छा वर्ड [word] जो सुनने में अच्छा नही लगता है लेकिन बहुत कारगर वर्ड है…वो वर्ड यूज़ [use] करते हैं ‘गैंग्स’ [gangs]. जातियों को गैंग्स कहते हैं. जैसे माफिया लोग, दाऊद इब्राहिम का गैंग. तो हमारे यहां जातियां गैंग्स भी हैं कहीं न कहीं. My dog right or wrong, हमारी जाति का व्यक्ति सही है. और ये कहीं न कहीं हमारे यहाँ एक वैल्यू सिस्टम [value system] बना हुआ है. सामाजिक न्याय की राजनीति जब शुरू हुई तो कहीं न कहीं वहां पर भी ये गैंग्स ऑपरेट [operate] कर रहे थे. चूंकि

जाति सिर्फ सवर्णों की प्रॉब्लम [problem] नही है. अगर जाति ग्रेडेड इनइक्वलिटी [graded inequality] है, अगर जाति क्रमिक असमानता है तो जाति ऊपर से लेकर नीचे तक लोगों के जहनो में भरी हुई है. यह समझने की जरूरत है. सिर्फ सवर्णो को गाली देकर काम नही चलेगा. हमे अपने अंदर के जातिवाद को चुनौती देना होगी.

क्या जब यह बहुजन पार्टियाँ बनीं, जिन पार्टियों ने उनको लीड [lead] किया, क्या उन्होंने गैंग्स की तरह काम किया की नही? यह सवाल उठाने की जरूरत है. अगर गैंग्स की तरह काम नही करते, तो आज ‘अति-पिछड़े’ की बात क्यों आती? आज ‘महादलित’ की बात क्यों होती? आज क्यों ‘पसमांदा’ की बात होती? कहीं न कहीं वहां पर इंसाफ नही मिला. भारत में इतनी सारी आबादी है, इतनी सारी जातियां हैं, उनको इंसाफ नही मिला. यह जातियां जो शासन-प्रशासन में गयीं, जिन्हें राजनीतिक सत्ता मिल गई, वो एक गैंग्स की तरह ऑपरेट [operate] कर रहे थे…और डॉ. आंबेडकर भी इस बात को लिखते हैं. तो गैंग्स से बाहर निकलना है…तो उन्होंने…डॉ. आंबेडकर ने एक प्रोजेक्ट [project] दिया है जिसे अनहिलेशन ऑफ कास्ट [annihilation of caste] कहते हैं. एक पूरी किताब लिखी है. लेकिन जिन पार्टियों ने यहां पर सरकारें बनाई, जो लोहियावादी थे, 10-10 साल शासन में रहे, आज तक लोहिया का जो कलेक्टेड वर्क [collected work] है वह सस्ते में नही छापा है उत्तर प्रदेश में. जो दलित थे आज तक डॉ. अम्बेडकर का कलेक्टेड वर्क [collected work] नही छपा, महाराष्ट्र सरकार ने छापा. आप लोहिया का नाम लेते हैं, आप डॉ. आंबेडकर का नाम लेते हैं, उनकी मूर्तियां बनाते हैं, लेकिन उनके विचारों का प्रचार-प्रसार नही करते. इस पर क्या समझा जाए? क्योंकि उनके विचारों का प्रचार-प्रसार होगा तो सवाल और उंगलियां सिर्फ उधर ही नही उठेंगी, सवाल और उंगलियां अपने ऊपर भी उठेंगी.

तो बहुजन से कब हम परिजन की राजनीति में चले गए पता ही नही लगा. और यह वहीँ से आ रहा है जहां डॉ. आंबेडकर कहते हैं कास्ट ऐज गैंग्स. कास्ट, गिरोह, कास्ट, गैंग्स…जो सिर्फ अपना हित देखते हैं. तो बहुजन से परिजन की राजनीति की तरफ ट्रांसफॉर्मेशन [transformation] हुआ. सामाजिक न्याय गणित बन गया. इस जाति को इतना जोड़ो, उस जाति को वहां जोड़ो, 50% इधर निकालो, 3% उधर निकालो. सामाजिक न्याय का मामला तो और भी था. हमारे काश्तकार थे, किसान थे, शिल्पकार थे, बुनकर थे, कारीगर थे. यह बहुजन नहीं थे क्या? कॉमन स्कूलिंग सिस्टम [common schooling system], हमारे बच्चे, गरीब बच्चे, हमारे समाज के हैं. क्या उन्हें अच्छी शिक्षा की जरूरत नही थी? क्या हमारे लोगों को सेहत की जरूरत नही थी? क्या प्रोपोर्शनल इलेक्टोरल सिस्टम [proportional election system] की यहां जरूरत नही है? फर्स्ट पास्ट द पोस्ट [first-past-the-post electoral system] जिसकी वजह से बहुजन बार-बार हार रहा है. क्या यह सेन्ट्रल मुद्दा नही होना चाहिए था? कास्ट सेंसस [caste census] हमारा मुद्दा नही होना चाहिए था? रिजर्वेशन को गहरा करने का मुद्दा नही होना चाहिए था? संगठित और असंगठित क्षेत्र के जो इनकम डिफरेंशियल [income differentials] हैं उस पर बात नही होनी थी? 

कांशीराम जी जनता के बीच मे जाकर एक बात कहते थे. क़लम उल्टा कर दिया करते थे. कि क़लम उल्टा करने की जरूरत है और यह व्यवस्था परिवर्तन है. लोगो ने उनकी बात को गहराई से नही समझा. क़लम उल्टा कर दिया, लेकिन क़लम से लिखना भूल गए. कुछ लिखना भी तो था भाई! क़लम उल्टा कर के कुछ लिखना भी तो था. कुछ नीतियां भी तो बनानी थी. लेकिन लोग भूल गए और इसलिए कलम आज फिर उल्टा हो गया. इतिहास बार-बार मौका नही देता है. बहुत निर्मम होता है. तो दो बातें कहकर अपनी बात खत्म करूँगा. आज फिर से सामाजिक अंतर्विरोध तीव्र हो रहे हैं, राजनीतिक अंतर्विरोध तीव्र हो रहे हैं, आर्थिक अन्तर्विरोध तीव्र हो रहे हैं. 53 परिवारों का 70% सम्पत्ति पर कब्जा है. जहां पर इतनी गैरबराबरी होगी वहाँ बगावत भी होगी, बगावत को कुचलना भी होगा, और बग़ावत को बांटना भी होगा. तो हर तरह की धार्मिक बातें परोसी जा रही हैं हमारे बीच. इसका जिक्र पहले कई लोगों ने किया, मैं उस पर दोबारा नही बोलूंगा. लोहियाजी की एक बात कहकर मैं अपनी बात खत्म करूँगा कि ‘अगर सड़क ख़ामोश हो जाएगी तो संसद आवारा हो जाएगी’. सड़क पर उतरना पड़ेगा, संगठन बनाना पड़ेगा, थिंकटैंक [think tank] बनाने होंगे, अपना मीडिया बनाना होगा और इसके अलावा कोई रास्ता नही है. लंबा प्रोजेक्ट [project] है. फिर से कमर कसकर लड़ाई करनी होगी. शुक्रिया बहुत बहुत. Thank You.

प्रतिलिपि: अभीजीत आनंद, असिस्टेंट प्रोफेसर, ग्लोकल लॉ स्कूल, ग्लोकल यूनिवर्सिटी, सहारनपुर

यह लेख hindi.roundtableindia.co.in से साभार लिया गया है

प्रोफेसर खालिद अनीस अंसारी, ‘डॉ. अंबेडकर सेंटर फॉर एक्सक्लूशन स्टडीज एंड ट्रांसफॉर्मेशन एक्शन ‘ (ACESTA), ग्लोकल यूनिवर्सिटी (सहारनपुर) के अध्यक्ष हैं.

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