गिनतियाँ

कवि : अरविंद शेखावत

चाँद किसी खूँटी पर टँगा है
उस झोपड़ी की भीत
और क्षितिज
आज एक जैसा है।

पूर्णिमा को धारदार तीखा चाँद
कैप्टन अमेरिका की ढाल सरीखा लग रहा है।
किसी ने घोंप दिया है
उसे आसमाँ में
और
बादल लहुलूहान हो गया है
सफ़ेद रक्त बिखर गया है जहाँ तहाँ।

तारे कनखियों से देख रहे हैं
चालाकी से चुप हैं
उनकी झिलमिलाहट में कोई रुकावट नहीं।

सुबह जब आएगा
क्राइम सीन में
सूरज;
हँसेगा तो बहुत
सुबह जो हवा सफ़ाई करेगी
बहा ले जाएगी
सारे सबूत।
मुझे इस तबाही में सारे रोमांटिक प्रतीक
अब साज़िश लगते है।

नहीं समझे?
कवि कहना चाहता है कि
कि इन रोमांटिक प्रतीकों के लग चुके है
तुम कब बदलोगे अपना नज़रिया?

चुनाव के हर वोट
और क्रिकेट के हर शॉट
के बीच किसी का दम घुटता है ।

जब तक मैं एक गीत सुनता हूं,
कोई मरता है अकाल मौत,
एक इंस्टा फीड देखकर हटता हूं
फेसबुक पर आती है , कोई श्रद्धांजलि की पोस्ट।

और ऐसे में जब प्रश्न पूछना त्रासदी है
उत्तर मिलना अपवाद है
जिम्मेदारी शब्द देश से निष्कासित है

छिपाए गए आंकड़े
श्मशान की राख में से झांक रहे हैं।
बेबसी पॉलीथिन में लिपटे
शवों से ताक रही है।

मरने से पहले
तुम सब
जिंदा होकर
कुछ तो पूछो
उनसे जो शासक हैं।

यक़ीन मानो
तुम्हारे होने की बुनियादी शर्त
बारह अंकों के आधार नम्बर नहीं है।
तुम एक आँकड़ा भर नहीं हो,
कोरोना की मौत का
किसी चुनाव में वोट का।

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