एक नुक्ता इधर से उधर और आपके किरदार पर कई सवाल उठ सकते हैं। जैसे ‘टोपी शुक्ला’ की कहानी में दादी टोपी से सिर्फ इसलिए चिढ़ जाती है, क्योंकि वह ‘ज़रूर’ को ‘जुरूर‘ बोलता है। उर्दू एक ऐसी भाषा थी, जो कभी स्थानीय शब्दों, मुहावरों और उपमाओं से सजी हुई थी। यह भाषा, यहाँ की बाकी भाषाओं की तरह, यहाँ की संस्कृति को परिलक्षित करती थी और आम लोगों की जुबान में शामिल थी, इसीलिए इसे हिंदवी भी कहा गया। उर्दू, जो आज एक संभ्रांत वर्ग की बोली मानी जाती है, ने अपना सफर ज़बान-ए-हिंद से शुरू किया और ज़बान-ए-दिल्ली, रेख्ता, गुजरी, दक्खनी, जबान-ए-उर्दू-ए-मुअल्ला जैसे अन्य नामों से अपने अस्तित्व में आई।

इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे उर्दू अशराफ समाज की सभ्यता और संस्कृति का ही आईना है, और कैसे इस आईने में पसमांदा समाज का दर्द नजर नहीं आता है। हम यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे उर्दू को अशराफों ने अपने वर्चस्व के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है।

‘उर्दू’ तुर्की भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है शाही सैन्य शिविर या बाजार/तंबू। जाहिर है तुर्की शासकों के आगमन पर अशराफ तबके की भाषा फारसी को दरबार की भाषा का पद मिला था। फारसी भाषा से भारतीय जनता अनभिज्ञ थी और भाषा की खाई ने इन दो वर्गों के बीच की खाई को और बढ़ा दिया।

पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली अपनी किताब ‘इतिहास का मतांतर’ में लिखते हैं – ‘जब तुर्कों के पतन के बाद खिलजी, तुगलक, लोधी सत्ता में आए, तो फारसी के वर्चस्व को आघात लगा, क्योंकि इन अफगान शासकों की मातृभाषा फारसी नहीं थी। इसके अलावा वे ईरान और मध्य एशिया के उन अभिजात्य वर्ग के प्रति अपनी नफरत का प्रदर्शन करना चाहते थे, जिनकी भाषा फारसी थी। जब मुगलों को हराकर सूरियों ने सत्ता प्राप्त की, तो उन्होंने भी खुले रूप में फारसी के प्रति घृणा व्यक्त की।

परंतु मुगलों की दुबारा जीत ने फारसी तथा विदेशी संस्कृति को नवजीवन प्रदान किया, जिन्होंने हमेशा अपने आप को भारत और भारत की संस्कृति से अलग थलग रखा। मुगल दरबार की आर्थिक तंगी के कारण ईरान से लेखकों और कवियों का आना भी मंद पड़ गया, जिससे फारसी भाषा को भारत में जो ऊर्जा मिलती थी, वह भी बुरी तरह प्रभावित हुई।

ऐसे में जो वर्ग उर्दू को निम्न श्रेणी की भाषा मानता था और इसे सचेतन वर्ग की भाषा मानने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था, उस वर्ग ने उर्दू की शुद्धता के लिए कदम उठाए, ताकि शासक और शासित श्रेणी की भाषा का अंतर स्पष्ट रूप से उभरे। सिराजुद्दीन खान आरजू ने इस प्रक्रिया को तेज किया और उर्दू के स्तर को ऊँचा उठाया। उन्होंने घोषणा की कि भाषा का स्तर अब संभ्रांत वर्ग के बोलने के काबिल हो गया है। पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली उर्दू के इस पक्ष पर मुहम्मद हुसैन आजाद की किताब ‘आबे हयात’ का उद्धरण देते हैं, जिसमें मुहम्मद हुसैन आजाद लिखते हैं कि किस प्रकार अरबी-फारसीकरण ने उर्दू की जड़ें इसके अपने ही वातावरण से काट दीं। भारतीय पृष्ठभूमि की सारी उपमाओं को दरकिनार कर उनके स्थान पर अरबी व फारसी उपमाओं को भाषा पर थोप दिया गया। फलस्वरूप जो नए मुहावरे उभरे, उनका ना तो भारत के सांस्कृतिक परिवेश से कोई संबंध था, ना यहाँ के विचार से।1

उर्दू अदब के पसमांदा सवाल

यहां तक समझने के बाद आपको यह बात समझ में आ गई होगी कि उर्दू का जन्म भले ही भारत के निम्न वर्ग में हुआ था, लेकिन बाद में उर्दू अशराफों की जुबान बनकर रह गई। किसी भी सभ्यता को मारना हो, तो उनकी भाषा को मार दो, सभ्यता अपने आप कब्र की पनाह ले लेती है।

अशराफ वर्ग पसमांदा समाज को अहल-ए-जबान में शामिल नहीं करते थे। इसका असर भी उर्दू अदब में नजर आता है। 85 प्रतिशत पसमांदा समाज को, उनकी समस्याओं को और उनकी संस्कृति को सिरे से खारिज कर दिया गया है।

उर्दू अदब में प्रगतिशील आंदोलन का भी एक दौर चला है, पर उनकी सारी प्रगतिशीलता अपनी जाति पर आकर खत्म हो गई। इन्होंने खुदा की जात को तो आड़े हाथों लिया, पर अपनी जात पर कुछ नहीं लिखा। यह बताना आवश्यक नहीं है कि प्रगतिशील आंदोलन के शुरुआती दौर में लिखने वाले सभी लोग उच्च जाति के थे।

ये लेखक और शायर जाति का प्रयोग बस वहीं तक करते हैं, जहाँ से ये अपने वर्ग-संघर्ष की बात शुरू कर सकें। उर्दू में ‘दलित मुसलमानों का अदब’ कहाँ है? इस विषय पर डॉक्टर अयूब राईन अपनी किताब ‘दलित मुस्लिम साहित्य और लेखक’ में लिखते हैं कि ‘‘मुस्लिम वर्ग के लोग (अशराफ) अपनी कमी, कुरीतियों और सामाजिक नाइंसाफियों के बारे में खुद भी कम लिखते-बोलते हैं।

दूसरे समाज के लोग यदि किसी भाषा-साहित्य के माध्यम से उन मुद्दों को उठाते हैं, तो मुसलमानों के विशेष वर्ग (अशराफों) की तरफ से हंगामा खड़ा किया जाता है। ऐसी सूरत में उर्दू भाषा समेत अन्य भाषाओं पर पूरे मुस्लिम समाज अथवा पसमांदा अथवा दलित मुसलमानों के संबंध में लेखक प्रायः बचने की ही कोशिश करते रहते हैं।’’

चूंकि उर्दू पर अशराफ लोगों का वर्चस्व है और इन्हीं के पास तमाम संसाधन हैं। इसीलिए यही तय करते हैं कि गजल के मौजू (मुद्दे) क्या हों! अगर पसमांदा शायर और लेखक कुछ लिखते हैं, तो उसे अदब के स्तर का ना मानकर खारिज कर दिया जाता है।यही वजह है कि पसमांदा शायर अपने लूम, साड़ी, कपड़े, बानी, खेती-किसानी, अपने मवेशी, कपड़े और अपने समाज की परेशानी वगैरह पर शेर न लिखकर अशराफों की तरह औरतों की कमर और उनकी जुल्फों पर शायरी करते नजर आ जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि उर्दू अदब जाति से अंजान था। मिर्जा हादी ‘रुस्वा’ की उमराव जान ‘अदा’ को ही लें। इस कहानी में नवाब छब्बन साहब का एक दोस्त था ‘हुस्नु’ जो छब्बन साहब से बेईमानी करता है। पर छब्बन साहब की तवायफ (किताब में रंडी लफ्ज लिखा है) बिस्मिल्लाह को पता चल जाता है। इस पर बिस्मिल्लाह नवाब साहब से कहती है…

बिस्मिल्लाह– कहो तो नवाब हुस्नु को कोतवाली भिजवा दूँ?

नवाब (छब्बन)– नहीं, मेरे सर की कसम! ऐसा न करना, सैयद है।

बिस्मिल्लाह– सैयद काहे का! उसके बाप का तो पता नहीं।

नवाब– खैर, वह तो अपने मुँह से कहता है।

उर्दू बचाव का नारा और पसमांदा

ब्रिटिश राज में ही यह तय हो गया था कि अंग्रेजी वह भाषा है, जिसके दम पर आप ऊंचे ओहदे को हासिल कर सकते हो। इसलिए सर सैयद अहमद खान ने जहाँ एक ओर अशराफ तबके के लिए अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई पर जोर दिया, वहीं दूसरी ओर पसमांदा समाज में आधुनिक शिक्षा की खिलाफत करते रहे।

यह भी दिलचस्प है कि अंग्रेजी पढ़ा-लिखा यह वर्ग उर्दू बचाव के नाम पर भारत विभाजन का भी पक्षधर बन गया और पसमांदा मुसलमानों को यह समझाने लगा कि यदि भारत का विभाजन नहीं हुआ, तो उर्दू नहीं बचेगी। मौजूदा दौर में उर्दू और मुस्लिम संस्कृति एक दूसरे के पर्याय की तरह देखे जाते हैं।

नतीजतन पसमांदा मुसलमानों पर उर्दू बचाने का दबाव है, पर अशराफ के लड़के तो अंग्रेजी पढ़ रहे हैं, इसलिए उर्दू बचाने की जिम्मेदारी पसमांदा के कंधों पर आ गई, लेकिन उर्दू पढ़े-लिखे पसमांदा के लिए नौकरी का कोई ठिकाना नहीं है।

जरा यह आंकड़े देखें, जिन्हें प्रोफेसर मसऊद आलम फलाही ने अपनी किताब ‘हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान’ (काजी पब्लिकेशन नई दिल्ली 2020) में दिया है – इंजीनियर शमी खान खटाना और आयशा समन साहिबा ने भारत की 21 यूनिवर्सिटी में मुसलमानों से संबंधित विभागों जैसे उर्दू, अरबी, पारसी, फारसी, इस्लामिक स्टडी इत्यादि में शिक्षकों (असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर) की सामाजिक स्थिति पर जानकारी एकत्र की। इसके अनुसार, कुल 296 शिक्षकों में कथित अशराफ वर्ग के 272 शिक्षक हैं, अनुसूचित जाति के 3 शिक्षक, अनुसूचित जनजाति के 3 शिक्षक, और अन्य पिछड़ा वर्ग के 18 शिक्षक हैं।

मतलब करीब 92 प्रतिशत अशराफ शिक्षक हैं और यह साफ है कि शिक्षा से जुड़े हर संसाधन पर इन्हीं की नुमाइंदगी चलती होगी। इस तरह हम देखते हैं कि उर्दू बचाने की जिम्मेदारी पसमांदा की है और उर्दू से कमाने तथा अपना सत्ता वर्चस्व बनाए रखने की जिम्मेदारी अशराफों की है।

सिगनिफायर (सूचक) और सिग्नीफाइड (भावार्थ)

‘पंचतंत्र’ की कहानियों के पात्र जानवर जरूर हैं, पर वे कहानियां जानवरों के बारे में नहीं हैं, बल्कि इंसानों के बारे में हैं। जानवर सिर्फ सिग्निफायर (सूचक) हैं, जबकि उसके सिग्निफाइड (भावार्थ) में जानवर नहीं, बल्कि इंसान हैं। बहुत से सवर्ण-अशराफ लेखक-लेखिकाओं ने दलित पात्र खड़े किए, पर ये दलित पात्र अपने दलित किरदार को रिप्रेजेंट नहीं करते थे, बल्कि ये सवर्ण ही थे, जिन्हें दलित का जामा पहना दिया गया हो। यह समझाने की कोशिश की गई कि भाषा सिग्निफायर (सूचक) और सिग्निफाइड (भावार्थ) का एक यूनिटी (मेल) है, जहाँ शब्द सिग्निफायर (सूचक) है और उसका अर्थ सिग्निफाइड (भावार्थ)। जैसे प्रेमचंद की कफन कहानी में जो दलित पात्र हैं, वे बस सिग्निफायर (सूचक) के रूप में दलित हैं, जबकि असल में उनका चरित्र अशराफ/सवर्ण का ही है।

इसी तरह मैत्रेयी पुष्पा ने एक जनजातीय चरित्र ‘अल्मा कबूतरी’ के नाम से खड़ा किया, जो कहीं से भी जनजाति नहीं है। आज बुनकरों की हालत किसी से छुपी नहीं है। कपड़ा बुनने वाले बुनकर खुद नंगे बदन काम करते हुए दो जून की रोटी के इंतजाम में लगे हुए हैं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब मिलकर काम करते हैं, तो मुश्किल से गुजर हो पाता है। मगर इन तमाम बातों से गुलजार साहब को कोई दिक्कत नहीं है। वह जुलाहों की इन समस्याओं पर कभी गजल नहीं लिखेंगे, क्योंकि इन समस्याओं पर गजल लिखना गजल के मापदंड में कभी शामिल ही नहीं किया गया।

गुलजार साहब (सम्पूर्ण सिंह कालरा) लिखेंगे कि ‘मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे!’ देखें कितना खतरनाक होता है समस्याओं को रोमांटिसाइज करना। सब कुछ अच्छा-अच्छा दिखाइए, गरीब होने को महिमा मंडित करिए, जैसे बॉलीवुड करता आया है। यह गजल क्या जुलाहा के बारे में है? है ही नहीं, जुलाहा तो प्रतीक मात्र है, बात तो गुलजार साहब ‘अपनी’ कर रहे हैं। पसमांदा समाज की समस्याओं को रोमांटिसाइज करके बेचा तो जा सकता है, मगर उसे अपनाया नहीं जा सकता।

उर्दू अदब में पसमांदा औरतें

उर्दू अदब में एक अशराफ लेखक की जिंदगी में तीन प्रकार की औरतें आती हैं: पहली तवायफ, दूसरी नौकरानी, और तीसरी उसकी बीवी। हम यह देखते हैं कि तवायफ और अपनी बीवी, यानी अपने घर की संस्कृति और अपने वर्ग की चेतना पर तो इन लोगों ने खूब लिखा है, पर बात जब नौकरानियों की होती है, तो उनकी कलम शांत हो जाती है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि भारत के इतिहास में वर्ग और जाति तकरीबन एक जैसी ही रही हैं। जब हम नौकर या नौकरानियों की बात करते हैं, तो दरअसल हम उस वक्त पसमांदा समाज की बात कर रहे होते हैं। अगर इतिहास के आईने में हमें अपनी अपमानित छवि नजर नहीं आती, तो हम बौद्धिक अपंग हो चुके हैं।

अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘कुठाँव’ में दलित मुस्लिम लड़की ‘हुमा’ का वर्णन कुछ इस तरह किया गया है – उसका चेहरा चौड़ा था, आँखें फैली-फैली सी थीं, होंठ बर्फी के तराशे हुए टुकड़ों की तरह थे, और छातियों पर अमरुद जैसी आकृतियां उभरी हुई थीं। नाक ऐसी थी जैसे किसी कीड़े ने काट लिया हो, मतलब ऐसी शक्ल-सूरत की लड़कियां बदसूरत होती हैं। यह सोच पूरी तरह से रंगभेदी है, जहाँ गोरी नस्ल की शारीरिक विशेषताओं को सुंदरता का मापदंड माना जाता है। हमारी सुंदरता की समझ अशराफिया ही क्यों है?

खां साहब के घर की लड़की ‘जुबैदा’ तथाकथित खूबसूरत लड़की है। अरे, सितारा भी तो खूबसूरत ही है, पर वह तो हलालखोर यानी हेला है। धोखा खा गए, न? दलित लड़की खूबसूरत कैसे हो सकती है? क्या सितारा का बाप एक अशराफ था?

डॉक्टर अयूब राईन अपनी किताब ‘दलित मुस्लिम साहित्य और लेखक’ में लिखते हैं कि उर्दू गजल को महबूब से बातें करना कहा गया है। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि उर्दू गजलों में महबूबायें चांद जैसी गोरी हुआ करती हैं। क्या उर्दू शायरी में ऐसी किसी महबूबा को सामने रखा गया है, जो दलित मुस्लिम समाज से हो? क्योंकि वह तो चाँद जैसी गोरी नहीं होती। यह रंगभेद उर्दू गजलों की शान है। अयूब राईन आगे लिखते हैं कि महिला हितों की बात उठाने वाली अशराफ लेखिका अपनी कहानी ‘दो हाथ’ में बहुसंख्यक हलालखोर समाज की चर्चा करती हैं, पर उन्हें मुंबई महानगर (जहाँ वह रहती थीं) में स्थित हज हाउस के पैखानों को साफ करने वाली महिलाओं का दर्द क्यों नहीं दिखा?

हर भाषा के अस्तित्व का अपना महत्व है, क्योंकि भाषा में मानव जाति का अस्तित्व समाहित है। जैसे-जैसे हमारे फलसफे वक्त के साथ बदलते हैं, वैसे-वैसे हमारी जुबान में भी बदलाव झलकने लगता है। उर्दू को किसी धर्म या जाति तक सीमित रखना उचित नहीं, पर कहीं न कहीं यह भी सही है कि उर्दू के कागजों पर पसमांदा का दर्द स्याही बनकर नहीं उतरा। और यह काम करेगा कौन?

उर्दू को दर्शन की गहराई कौन देगा? उर्दू को मूलनिवासियों की आत्मा से कौन मिलवाएगा? यह उम्मीद हम अशराफ से तो नहीं लगा सकते। हमें, पसमांदा समुदाय को, अपने दर्द को अपनी भाषा, अपने शब्दों और अपनी बोली में बयान करने की जरूरत है। हमें अपनी लड़ाई को आवाज देना है, तो अपनी भाषा को गढ़ना होगा और इसे मजबूत करना होगा। इतिहास में हुई हर नाइंसाफी और उसके प्रतिरोध को दर्ज करना होगा। सबसे जरूरी यह है कि हमें मौजूदा उर्दू अदब को, जो अशराफ जातियों का अदब है, रद्द करना होगा। उर्दू जुबान का पसमांदा अदब, अशराफ अदब की कब्र पर उगेगा।

सुनो अशराफ़!

मैं तुम्हारी संस्कृति को रद्द करता हूँ
तुम्हारी उन सभी रिवायतों को रद्द करता हूँ
जो जन्म आधारित श्रेष्ठता की वकालत करती हैं।

मैं तुम्हारे उस अदब को भी रद्द करता हूँ
जिसमें पसमांदा समाज का दर्द नज़र नहीं आता।

सुनो! हमने तुम्हारे विरुद्ध विद्रोह का शंख फूंक दिया है
नहीं स्वीकार करते हम इस्लाम की तुम्हारी व्याख्या को
जहाँ एक सैयद और एक हलालखोर में भेद है।

हमने अपना उद्देश्य पा लिया है,
जाहिलियत की सभी रस्में आज से खत्म हुईं
श्रेष्ठता और बड़प्पन के सभी दावे,
खानदान, माल-ओ-दौलत के सभी दावे
अपने पैरों के नीचे रौंद दिए थे मेरे नबी (स०अ०व०) ने।

सुनो! आज हम भी रौंदते हैं
सैयदों की श्रेष्ठता के सभी दावों को
नबी (स०अ०व०) की आल बनकर।

~ अब्दुल्लाह मंसूर

संदर्भः

1- मुबारक अली, इतिहास का मतान्तर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2002, पेजः 117-118

2-सर सय्यद अहमद खांः व्याख्यान एवं भाषणों का संग्रह, संकलनः मुंशी सिराजुद्दीन, प्रकाशनः सिढौर 1892, ससंदर्भ अतीक सिद्दीकीः सर सय्यद अहमद खां एक सियासी मुताला, अध्यायः 8, तालीमी तहरीक और उसकी मुखालिफत, शीर्षकः गुरबा को अंग्रेजी तालीम देने का खयाल बड़ी गलती है, पृष्ठः 144-145

https://www.newageislam.com/books-and-documents/caste-and-caste-based-discrimination-among-indian-muslims—part-12–modern-indian-ulema-on-the-caste-question/d/3678

3- डॉ. अयूब राईन, दलित मुस्लिम साहित्य और लेखक, शशि प्रकाशन, बिहार, सुपौल, पहला संस्करण, 2022

4- मसऊद आलम फलाही, हिन्दुस्तान में जात-पात और मुसलमान, आइडियल फाउंडेशन, मुम्बई, संस्करण 2009 पेज  581

(लेखक, पसमांदा एक्विस्ट तथा पेशे से शिक्षक हैं. Youtube चैनल Pasmanda DEMOcracy के संचालक भी हैं.