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मुस्लिम आरक्षण: पसमांदा मुसलमानों के लिए होलोकास्ट

तथाकथित मुस्लिम लीडरशिप द्वारा काफ़ी समय से निरन्तर मुस्लिम आरक्षण की मांग की जाती रही है। इधर सच्चर आयोग की उस तथाकथित रिपोर्ट (मुसलमानों की हालत दलितों से बदतर है) की आड़ लेकर (हालांकि जस्टिस सच्चर ने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा है) यह माँग और तेज़ कर दी गयी है। जब हम बतौर मुसलमान इस मांग की तरफ़ देखते हैं तब हमें पहली नज़र में ऐसा लगता है कि यह मांग बिल्कुल जायज़ है तथा मुस्लिम समाज को इस की सख़्त ज़रूरत है और इस मांग को करने वाले ही मुसलमानों के सच्चे हमदर्द और रहनुमा हैं तथा इस मांग के विरोधी सम्पूर्ण मुस्लिम समाज के विरोधी और मुस्लिम विरोधी ताक़तों के हाथों के खिलौने व दलाल हैं। लेकिन इस मांग पर जब हम ईमानदारी से गम्भीरतापूर्वक ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं तब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इसे हम एक आधारहीन मांग व एक सुनहरे धोखे के सिवा यदि कुछ और कहना चाहें तो सिवाए निरी जेहालत (हद दर्जे की मूर्खता) के और कुछ नहीं कह सकते!

जो लोग मुस्लिम आरक्षण की मांग कर रहे हैं क्या वह सच में मुस्लिम समाज के हितैषी हैं या यह मुस्लिम हित के नाम पर किसी वर्ग विशेष का हित साधना चाहते हैं? मुस्लिम आरक्षण की मांग करने वालों से मेरे दो प्रश्न हैं-

1- क्या यह लोग नहीं जानते कि पसमांदा (पिछड़े) मुसलमानों को मण्डल के अंतर्गत ओबीसी वर्ग का व अनुच्छेद 342 के अंतर्गत एस०टी० वर्ग का आरक्षण पहले से ही मिल रहा है? या फिर-

2- इन की नज़र में सिर्फ़ अशराफ़ वर्ग (शेख़, सैयद, मुग़ल, मिर्ज़ा आदि) के लोग ही मुसलमान हैं? जिन मुस्लिम जातियों को सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़ा मान कर मण्डल आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार ओबीसी के अंतर्गत व जिन्हें अनुसूचित जनजाति का होने के कारण अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आरक्षण मिल रहा है क्या उन को यह लोग मुसलमान नहीं मानते हैं?

अगर मुस्लिम आरक्षण की माँग करने वाले उन जुलाहा, धुनिया, कुंजड़ा, तेली, मनिहारा वग़ैरह को जिन्हें मण्डल के अंतर्गत व जिन्हें अनुसूचित जनजाति (बकरवाल आदि) का मानते हुए अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आरक्षण मिल रहा है उन को मुसलमान नहीं मानते हैं तो वह अपनी माँग पर डटे रहें और वह जिन को मुसलमान समझते रहे हैं उन के लिए आरक्षण की मांग जारी रखें।

लेकिन अगर मुस्लिम आरक्षण की माँग करने वाले पसमांदा वर्ग के मुसलमानों को भी मुसलमान मानते हैं और इनकी नज़र में सच में यह (पसमांदा अर्थात जोलाहा, धुनिया, कुजड़ा, बकरवाल, बंजारा, नट वग़ैरह) लोग भी मुसलमान ही हैं और साथ ही यह मुसलमानों का हित सच में चाहते हैं तो इन्हें मुस्लिम आरक्षण की मांग को फ़ौरन त्याग देना चाहिए क्योंकि धर्म आधारित आरक्षण असंवैधानिक है जो मिलना असंभव है। जब-जब किसी भी सरकार ने इन तथाकथित मुस्लिम रहनुमाओं/ठेकेदारों के दबाव में मुसलमानों के नाम पर अर्थात धर्म के आधार आरक्षण देने का प्रयास किया है तब-तब न्यायलय ने इसे निरस्त किया है। चाहे वह आंध्रा की सरकार का प्रयास रहा हो या महाराष्ट्रा की सरकार ने ऐसा प्रयास किया हो, क्योंकि धार्मिक या आर्थिक आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है। संविधान के अनुसार आरक्षण सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को ही मिल सकता है। इस लिए अगर मुस्लिम हित ही आप का (तथाकथित मुस्लिम रहनुमाओं का) उद्देश्य है तो आप संवैधानिक दायरे में रहते हुए मांग कीजिये कि-

1- अनुच्छेद 341 पर लगा धार्मिक प्रतिबन्ध हटाया जाये ताकि हिन्दू दलितों की तरह मुस्लिम दलितों (मुस्लिम धोबी,भंगी आदि) को भी SC आरक्षण का लाभ मिल सके जिस से लोकसभा व विधानसभा की अनुसूचित ज़ाति हेतु आरक्षित सीटों से हमारा वह मुस्लिम वर्ग जिस की पहचान सभी फ़िरक़ों के उलेमाओं ने अरज़ाल (नीच, कमीन, निकृष्ट) व तमाम आयोगों ने दलित/एस०सी० के रूप में चिन्हित किया है उस की जाति/वर्ग के लोगों के लिए भी विधायक व सांसद बनने तथा IAS, IPS, IARS आदि सर्विसेज़ में जाने का मार्ग प्रशस्त हो सके

2- जब तक अनुच्छेद 341 पर लगा धार्मिक प्रतिबन्ध समाप्त नहीं होता तब तक हिन्दू SC की भांति जीवन यापन करने वाली मुस्लिम SC जातियों को जिन की स्थिति बक़ौल सच्चर कमिटी रिपोर्ट के, दलितों से बदतर है, ST में शामिल किया जाये ताकि उन को अनुच्छेद 342 में प्रदान किये गए आरक्षण का लाभ मिल सके जिस से उन की स्थिति में कुछ तो बदलाव आए!

3- पिछड़ा आरक्षण को पिछड़ा, अति पिछड़ा व सर्वाधिक पिछड़ा में बांटा जाये अथवा कम से कम बिहार में लागू कर्पूरी ठाकुर फ़ार्मूला पूरे देश में लागू कर ओबीसी आरक्षण को पिछड़ा और अति पिछड़ा में बांटा जाये ताकि ओबीसी में शामिल जो पसमांदा मुस्लिम जातियां ओबीसी में सम्मिलित अन्य सक्षम/मज़बूत जातियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहीं हैं वह पसमांदा मुस्लिम जातियां अपने समान अन्य धर्मों की पिछड़ी/अति पिछड़ी जातियों के साथ अति पिछड़ा वर्ग में शामिल हो जाएं जिस की वह हक़दार हैं ताकि वह अपने हितों की रक्षा कर सकें।

4- पिछड़ा, अति पिछड़ा व सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग हेतु (अथवा कम से कम पिछड़ा वर्ग हेतु ही) लोक सभाओं तथा विधान सभाओं में भी उसी प्रकार सीटें आरक्षित की जाएं जिस प्रकार क्षेत्रीय/स्थानीय चुनावों में ओबीसी हेतु व विधान सभा व लोक सभा में एस०सी०, एस०टी० हेतु सीटें आरक्षित की जाती हैं।

मैं तथाकथित मुस्लिम (अशराफ़) लीडरशिप से विनम्रता पूर्वक निवेदन करता हूँ कि वह उपरोक्त माँगों/मुद्दों पर सोचे एवं विचार करे। इससे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी अर्थात मुस्लिम समाज को वह सब कुछ मिल जायेगा जिस की शायद उस ने अभी कल्पना भी नहीं की होगी।

उक्त माँगो/मुद्दों की सब से बड़ी विशेषता यह है कि इन मांगों से न तो हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण होगा न ही संघ या भाजपा जैसे किसी मुस्लिम विरोधी संगठन तथा राजनैतिक दल को हिन्दू-मुस्लिम कार्ड खेलने का अवसर मिलेगा, जिस कार्ड के सहारे अब तक वह सत्ता तक पहुँचते रहे हैं।

मेरा दावा है कि आप चाहे न्याय की दृष्टि से देखें अथवा वर्तमान परिस्थितियों को दृष्टि में रखकर विचार करें, किसी भी दृष्टि से उक्त तरीक़ों से बेहतर मुस्लिम हित साधने का कोई अन्य तरीक़ा नहीं हो सकता है। यदि किसी के पास हो तो सुझाये जिस से मुस्लिम हित भी सध जाये और किसी भी साम्प्रदायिक संगठन अथवा दल को कोई ध्रुवीकरण का अवसर भी न मिले।

मगर अफ़सोस सद अफ़सोस…. यह तथाकथित मुस्लिम (अशराफ़) लीडरशिप ऐसा (उक्त माँगों का समर्थन) बिल्कुल नहीं करेगी और न ही कोई अन्य तरीक़ा ही बताएगी क्योंकि सत्यता यह है कि इन की मुस्लिम आरक्षण की माँग का उद्देश्य मुस्लिम हित नहीं बल्कि यह माँग अपनी (अशराफ़) लीडरशिप को क़ायम रखने व पसमांदा मुसलमानों को (आरक्षण के द्वारा) मिल रहे संवैधानिक लाभों से वंचित कर ख़ुद उस को प्राप्त करने का बेहतरीन हथियार/ज़रिया मात्र है क्योंकि तथाकथित मुस्लिम लीडरशिप (दरअसल अशराफ़ लीडरशिप) पसमांदा समाज में फैल रही जागरूकता व उन में उभर रही लीडरशिप की योग्यता में अपनी चौधराहट (एकछत्र राज) लिए ख़तरा महसूस कर रही है, जो उसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं है जैसा कि उस का चरित्र और इतिहास रहा है। दरअसल इन की इस (मुस्लिम आरक्षण की) माँग का उद्देश्य/कारण मुस्लिम हित नहीं बल्कि निम्न दो प्रमुख उद्देश्य/कारण हैं-

1- मुस्लिम आरक्षण की माँग से हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण होगा जिस से मुस्लिम नाम पर इन की लीडरशिप बनी रहेगी, जिसे वर्तमान समय में मिल रहे आरक्षण से लाभान्वित व जागरूक हो रही पसमांदा जातियों द्वारा बड़ी चुनौती मिलने लगी है।

2- यदि संवैधानिक संशोधन अथवा किसी अन्य प्रकार से धार्मिक आधार पर मुस्लिम आरक्षण मिल गया तो मण्डल द्वारा मिल रहे ओबीसी व अनुच्छेद 342 के अंतर्गत मिल रहे एस०टी० आरक्षण के दायरे से पसमांदा मुस्लिम जातिययां बाहर हो जाएंगी और मुसलमानों में हर प्रकार से मज़बूत होने के कारण यह अशराफ़ जातियां (विशेषकर सैयद, शेख़, मिर्ज़ा जैसी चन्द जातियां) मुसलमानों के नाम पर मिल रहे आरक्षण का पूरा लाभ उठाने में सफल हो जाएंगी जैसा कि ब्रिटिश काल में मिल रहे पृथक निर्वाचन प्रणाली के अंतर्गत था।

पसमांदा समाज को ये सदैव याद रखना चाहिए कि मुसलमामों की जिन जातियों को सभी फ़िरक़ों के उलेमाओं ने ज़लील करने और पीछे रखने के उद्देश्य से क़ुरआन-ओ-हदीस की मनमानी व्याख्या द्वारा अजलाफ़ और अरज़ाल अर्थात नीच, निकृष्ट तथा कमीन का सर्टिफिकेट दिया था उन जातियों को भारत सरकार सहित भिन्न-भिन्न प्रदेशों की सरकारों द्वारा गठित लगभग सभी आयोगों ने (अपने-अपने क्षेत्र/विषय के अंतर्गत) तरक़्क़ी व सम्मान देने के उद्देश्य से आरक्षण के दायरे में लाने के लिए उन्हें पिछड़ा तथा अतिपिछड़ा का सर्टिफिकेट दिया तथा भारतीय संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए 10 अगस्त 1950 के प्रेसीडेंशियल आर्डर (अनुच्छेद 341 पर लगे धार्मिक प्रतिबन्ध) को हटाने की सिफ़ारिश की तथा संविधान सभा ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सर्टिफिकेट दिया।

पसमांदा समाज को इस पर गम्भीरता से विचार करते हुए मुस्लिम आरक्षण की माँग का हर स्तर पर विरोध करना होगा वर्ना मुस्लिम आरक्षण की सफलता का अंजाम यह होगा कि अशराफ़ कम से कम मुस्लिम समाज में मुस्लिम शासन काल की भांति पसमांदा पर शासक होगा ही साथ ही साथ पसमांदा की स्थिति तथाकथित मुस्लिम शासन काल जैसी पुनः बद से बदतर हो जायेगी बल्कि मुस्लिम आरक्षण पसमांदा के लिए होलोकास्ट (Holocaust)【1】 साबित होगा।

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【1】 हिटलर द्वारा यहूदियों का नरसंहार करने के लिए की गयी विशेष व्यवस्था जिस के लिए हिटलर ने विशेष गैस के चैम्बर बनवाये थे जिस में लगभग 60 लाख यहूदी मारे गए थे। दरअसल हिटलर का इरादा इसी प्रकार यहूदियों की नस्लकुशी (धरती को यहूदी विहीन करने) का था।

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नुरुल ऐन ज़िया मोमिन ‘आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ‘ (उत्तर प्रदेश) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उन से  nurulainzia@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक (पसमांदा डेमोक्रेसी) का इस से सहमत होना आवश्यक नहीं।

यह लेख Round Table India पर Posted on: November 30, 2018 को प्रकाशित हो चूका है

नुरुल ऐन मोमिन 'आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ' (उत्तर प्रदेश) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और पेशे से एडवोकेट हैं.

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