Poster of the web series 'Pataal-Lok'

पाताल लोक :धर्म विरोधी है, देखा नही व्हाट्सएप पर पढ़ा है

अपनी फिल्म “मदारी” में दिवंगत अभिनेता इरफ़ान खान कहते हैं कि –

“बाज चूज़े पे चपटा, कहानी सच्ची लगती है मगर अच्छी नही। चूजा वापिस बाज पर चपटा , कहानी सच्ची नहीं लगती मगर खुदा कसम बहुत अच्छी लगती है।”

ऐसे ही हमारा समाज सच्ची कहानियों से भरा पड़ा है। रोज़ ऑफिस जाते समय, रेलवे स्टेशन पर, रास्ते में ट्रैफिक सिग्नल पर ऐसी ही अनेकों सच्ची कहानियाँ हमारे इर्द गिर्द हर वक़्त , हर घड़ी घूमती रहती हैं। ऐसी ही एक कहानी पर्दे पर 20 मई को प्रस्तुत हुई, जिसका नाम है “पाताललोक”

कहानी की शुरुआत अभिनेता जयदीप अहलावत के बड़े ही दिलचस्प डॉयलोग के साथ होती है जिसमें वे बताते हैं कि –

“यह जो दुनिया है न, ये एक नहीं तीन दुनिया है। सबसे ऊपर स्वर्ग लोक, जिसमें देवता रहते हैं। बीच में धरती लोक, जिसमें आदमी रहते हैं और सबसे नीचे पाताल लोक, जिसमें कीड़े रहते हैं। वैसे तो ये शास्त्रों में लिखा हुआ है लेकिन मैंने वट्सऐप पे पढ़ा था।”

हर कहानी अपने आप मे विशेष होती है। इस कहानी की विशेषता है कि ये आपको क्षण के सौवें हिस्से में भी सामाजिक कुरीति दिखा जाती है और आपको पता भी नही चलेगा अगर आप एक अच्छे दर्शक नही हैं तो। कहानी के मुख्य किरदार हैं इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी और उनके साथी अंसारी। कहानी की शुरुआत दिल्ली के एक पुल से होती है जहाँ सीबीआई की स्पेशल टीम के साथ डीसीपी भगत चार अपराधियों के एनकाउंटर के इरादे से उनको रोकती जो एक मशहूर पत्रकार संजीव मेहरा के क़त्ल के इरादे से दिल्ली में ठहरते हैं। लेकिन अचानक से मीडिया की ओवी वैन देखकर उनको जिंदा पकड़ने पर मजबूर हो जाती है। इन अपराधियों में विशाल त्यागी उर्फ हथौड़ा त्यागी, तोप सिंह, चीनी और कबीर होते हैं। त्यागी मुख्य अपराधी होता है।

A still form the web series Pataal Lok - Inspector Hathiram interrogating Kabir
A still form the web series Pataal Lok – Inspector Hathiram interrogating Kabir

अब कहानी यहां से पीछे की ओर जाती यही और सारे अपराधियों की कहानी से हमारा परिचय कराती है। चीनी को उसका मामा ट्रैन में छोड़कर चला जाता है और चीनी फिर निजामुद्दीन स्टेशन पर अन्य अनाथ बच्चों के साथ ही रहता है जो मजबूरन चोरी चकारी करके अपना पेट भरते हैं। एक दिन चोरी के सामान से चीनी को मेकअप किट मिलती है। वो लिपस्टिक लगाकर खुद को आईने में देखकर खुश हो जाता है और उसी दिन से वो खुद को एक औरत के रूप में देखना पसंद करता है। सीरीज में दिखाया गया है कि शाकाल नाम का व्यक्ति बच्चों का यौन उत्पीड़न करता है। यह सबसे डरावना दृश्य है। चीनी को त्यागी के साथ गाड़ी में रहने के पैसे मिलते हैं और गरीबी के चक्र से मुक्ति पाने के लिए चीनी तैयार हो जाता है साथ देने के लिए।

A still form the web series Pataal Lok - Chini crying in front of lady constable

दूसरा अपराधी कबीर, जब उसका नाम पूछा जाता है तो बताता है कि उसका नाम कबीर एम है। उसकी जेब से एक मेडिकल सर्टिफिकेट मिलता है जिसके आधार पर ये पुख्ता हुआ कि वो मुस्लिम है। सीबीआई की टीम नम्बर बटोरने (वाहवाही या इनाम ) के लिए कबीर को पाकिस्तानी आतंकी साबित करते हैं। ऐसे में हाथीराम चौधरी छानबीन करके पता लगाता है कि कबीर एक मामूली गाड़ी चोर है। उसके पिता से बातचीत पर पता लगा कि उसके बड़े भाई को कर सेवकों ने एक ट्रेन में सामान्य मीट को बीफ समझके मार दिया था इसलिए उसने उसकी झूठी सर्जरी का सर्टिफिकेट बनवाया ताकि किसी को ये न पता चले कि उसका खतना हुआ है। इसी पूछताछ के दौरान कबीर के पिता एक अंदर तक झकझोर देने वाली बात कहते हैं कि –

“जिस लड़के मैनें मुसलमान भी न बनने दिया उसको आप लोगों ने आतंकी बना दिया।”

हालांकि कहानी यहाँ थोड़ी डगमगा जाती है , कार सेवकों और राम मंदिर का सम्बंध 2020  में दिखाना एक बेतुकी बात थी। भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं को दिखाने का और भी जरिया हो सकता था। हाथीराम एक आम पुलिस वाला है जिसने जिंदगी में कभी कोई बड़ा केस नही सम्भाला है। संजीव मेहरा, एक वरिष्ठ पत्रकार और दिल्ली की हाई क्लास फैमिली का एक हिस्सा, जो कि सरकार विरोधी आवाज के तौर पर जाने जाते हैं , उनके खून की साजिश की छानबीन को हाथीराम इस तरह देखते हैं कि संजीव स्वर्ग लोक का वासी है इसीलिए उसकी जान की पहरेदारी होती है। पाताल लोक में अगर किसी का खून हो जाये तो इतनी गम्भीरता से नही लिया जाता।

समाज मे चर्चा है कि ये कहानी सनातन विरोधी एजेंडा है।समाज के एक बड़े हिस्से को घटनाओं से मिले विचारों का सामान्यीकरण करने की बुरी बीमारी है। इसको ऐसे समझिए कि मान लीजिए कि किसी एक गांव के व्यक्ति ने कोई अपराध कर दिया तो अपराधी कौन हुआ ? गांव या व्यक्ति ? अपराध अगर व्यक्ति ने किया है तो उसकी सजा भी व्यक्ति तक ही सीमित है।

एक कहानी लिखते समय लेखक इस बात की कल्पना नही करता है उसकी लिखी गयी बातों का सामान्यीकरण बहुत ऊँचे स्तर तक किया जाएगा। कहानी और किरदारों की जरूरतों को पूरा करते समय लेखक ये नही सोच रहा होता है कि अबकी बार तो मैं सनातन धर्म को खत्म ही कर दूँगा। लेखक अगर किसी समाज मे फैली कुरूतियों को दिखाता है तो इसका अर्थ ये नही कि वो सम्पूर्ण समाज को दोषी ठहरा रहा है बल्कि वो उस बुराई के पनपने की तेजी के बारे में विचारता है। उदाहरण के लिए, सीरीज में अंसारी , तारीख नाम के अपराधी को पकड़ने जाता है और दुर्घटना की वजह से वो भाग निकलता है। इस घटना के पश्चात थाने में कार्यरत पुलिस वालों को कहते दिखाया जाता है कि –

“कटवे को पकड़ने अगर कटवे को भेजोगे तो यही होगा।”

वही दूसरी और अगर हाथीराम किसी को पकड़ने में नाकाम होता है तो उसको धर्म से नहीं जोड़ा जाता है। समाज मे ऐसे व्यक्ति भी हैं जो आपको हर समय आपके धर्म विशेष कि वजह से आपके हर कार्य को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। अब ये निर्भर करता है कि आप रहते कहाँ हैं। ऐसी दृश्यों के आलोचक यूटोपिया के वासी हैं। उन्हें लगता है कि वो सतयुग में जी रहे हैं जहाँ उनके समाज मे कोई बुराई नही है, और अगर है भी तो हर छोटी गलती की सजा निश्चित है। हर समाज और धर्म बुराइयों से भरा है। आप अपनी कमियाँ ये बोलकर नही छुपा सकते हैं कि दूसरा भी बुरा है। बैलेंसवाद आपको वास्तविकता से रूबरू नही होने देता है। हर धर्म के लोगों को कट्टरता और आस्था में अंतर समझने की आवश्यकता है। आस्थावान व्यक्ति शांत होता है, विरोधी विचार को सकारात्मक आलोचना के नजरिए से देखता है और सुधार की ओर अग्रसर होता है। वहीं दूसरी तरफ कट्टर व्यक्ति आलोचना को सम्मान और अपमान का विषय बनाकर हिंसक हो जाता है।

सीरीज में व्यंग्य का प्रयोग बहुत बारीक है। गुर्जर के साथ काम करने वाले पूजारी को गाली गलौच करते दिखाया गया है। पूजारी या सन्तों के जीवन सिद्धांत को अगर समझा जाए तो मिलेगा की उनकी भाषा मे मधुरता और शुद्धता की आवश्यकता है। परंतु इसके उलट, यहाँ एक सन्त को हिसंक और अश्लील दिखाया है। इस घटना का सामान्यीकरण कर सीरीज पर सनातन संस्कृति के अपमान का आरोप लगता है। ऐसा करने वाले लोगों को धर्म और समाज के अंतर को समझने की आवश्यकता है। धर्म यानी कि वो नियम या पद्धतियाँ जो आपको आपके धर्मग्रन्थों से प्राप्त हैं। और समाज किसी विभिन्न धर्मों का मिश्रण है जो कि अपने अपने धर्मों के नियमों का पालन करने का दावा रखते हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई हिन्दू कोई अपराध करता है तो क्या सवाल धर्म पर उठाया जाएगा ? क्या इसका ये अर्थ निकाला जाए कि हिन्दू धर्म अपराध करने की प्रेरणा देता है ? बिल्कुल नहीं। इसका अर्थ ये है जो व्यक्ति एक धर्म विशेष की शिक्षाओं में विश्वास रखने का दावा करता है वो उस धर्म का एक झूठा और बेकार अनुयायी है जिसने न कभी धर्म को जिया और न ही समझा।

मशहूर अभिनेता और मार्शल आर्ट्स विशेषज्ञ ब्रूस ली (दिवंगत), एक बार कहते हैं –

“अंडर द हैवेन , वी आल आर वन”

यानी आसमान के नीचे रहने वाले सभी मनुष्य एक समान हैं। मनुष्य आपराधिक प्रवृत्ति का जीव है। मनुष्य ने अपनी इच्छानुसार पहले कबीलों का गठन किया, फिर धर्मों का गठन किया और फिर राष्ट्र नाम की संस्था का गठन किया। हर कबीले, धर्म और राष्ट्र का अपना एक हिंसक इतिहास है। और हर धर्म विभिन्न जातियों में विभाजित है। किसी राष्ट्र में कोई धर्मं ऐसा नही है जिसके अनुयायियों ने कभी किसी रूप में भी अन्याय न सहा हो।

अन्याय के अनेकों रूपों में से एक जातिगत अन्याय का उदाहरण पाताल लोक में भी देखने को मिलता है। चार अपराधियों में से तीसरा अपराधी, तोप सिंह,  पंजाब के ग्रामीण पृष्ठभूमि से और बंजारा जाती से सम्बन्ध रखता है। सीरीज में दर्शाया गया है कि कैसे सवर्ण समाज के लोग उनका दमन करते हैं। गली से गुजरते समय उसकी मर्दानगी पर सवाल करना , बेवजह मार पिटाई करना आम बात दर्शाया गया है। इस दृश्य को आधार बनाकर सनातन धर्म को दलित विरोधी और जातिवादी बताने का प्रयास किया गया है, ऐसा आरोप समाज का एक हिस्सा लगाता है। उदाहरण के तौर पर 2014 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध 47 हजार 64 अपराध घटित हुए थे। इनमें आठ हजार 75 मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। यूपी में दलित उत्पीड़न के हर रोज औसतन 20 मामले दर्ज किए गए। देशभर में दलितों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न के मामले में अकेले यूपी की हिस्सेदारी 17 फीसदी से भी ज्यादा है। दलित नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक उत्तर प्रदेश में दलितों की हत्या की दर देश में दलितों की औसत हत्या दर से दोगुनी है। बात अगर करें साल 2014 के आंकड़ों की, तो उत्तर प्रदेश में दलितों की 245 हत्याएं हुई थीं जबकि पूरे देश में कुल 744 मामले सामने आए थे। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में दलितों की हत्या की दर राष्ट्रीय दर से दोगुनी थी। उत्तर प्रदेश में दलितों के खिलाफ बलवा या दंगा के 342 मामले हुए, जब कि पूरे देश में करीब एक हजार, 47 मामले दर्ज किए गए थे। दलितों के विरुद्ध अपराधों ने हर सरकार के कार्यकाल में नए कीर्तिमान स्थापित किए। ऐसे ही हर राज्य की अपनी अपनी अनगिनत कहानियाँ हैं ।

भारतीय पाठकों की कुशलता को देखते हुए, उनको किसी एक लेख में समाहित कर पाना व्यर्थ और अम्भव नजर आता है। सीरीज के आलोचकों से प्रश्न है कि क्या वो इन आंकड़ों को नजरअंदाज कर सकते हैं ? कोई भी शिक्षित व्यक्ति इतने गम्भीर और चिंताजनक आंकड़ों को हल्के में कभी नही लेगा।

अभिनेता सलमान खान और ऋतिक रोशन का एक मजेदार किस्सा है। शुरू के दिनों में दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। बाद में ऋतिक रोशन की कोई फ़िल्म बॉक्स आफिस पर नाकाम रही तो सलमान ने कह दिया कि उस फिल्म कोई कुत्ता तक देखने नहीं गया था। इस संदर्भ में, हाल ही में ऋतिक रोशन से किसी साक्षात्कार में पूछा गया कि सलमान खान के बारे में क्या चीज़ बुरी लगती है ? इसके उत्तर में ऋतिक कहते हैं कि उनसे हर कोई प्यार करता है लेकिन सबसे बुरी चीज है कि उनको लगता है हर कोई उनके खिलाफ साजिश कर रहा है। उनके अंदर एक “विक्टिम सिंड्रोम” है। भारत के संदर्भ में हर धर्म का एक बड़ा हिस्सा “विक्टिम सिंड्रोम” का शिकार है। उस हिस्से को लगता है कि हर वो कलम , हर वो आवाज जो तुम्हारे अंदर विद्यमान कुरीतियों को उजागर करती है, वो तुम्हारे अस्तित्व को जड़ से मिटाना चाहती है। “विक्टिम सिंड्रोम” ने हर धर्म के बड़े हिस्से में डर पैदा किया है और डर आपको दुनिया का सबसे हिंसक प्राणी बनने पर मजबूर कर सकता है।

अपनी फिल्म मदारी में दिवंगत अभिनेता इरफान खान अपहरण किए गए बच्चे से कहते हैं कि बच्चे चुप हो जा, वरना कुछ हो जाएगा मेरे हाथों। मैं डरा हुआ हूँ , कुछ गलत कर बैठूँगा।

डर आपको कभी न कभी ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर देगा जब आप जरूरत से अधिक रक्षात्मक हो जाएंगे, और जरूरत से अधिक रक्षात्मक व्यक्ति हर बात पर संदेह करता है और हिंसक बन जाता है।

हथौड़ा त्यागी सीरीज का मुख्य अपराधी है। जिसने 45 कत्ल किए हैं। त्यागी की तीन बहनों का बलात्कार उसके चेचेरे भाइयों ने जमीन के झगड़े के चलते किया। बदले की आग में त्यागी ने अगले ही दिन तीनों भाइयों को हथोड़े से मार दिया। इस दृश्य में सत्या फ़िल्म के एक दृश्य की झलक मिलती है जहाँ एक अश्लील चुटकुला खत्म होते होते गोलियां चलने लगती हैं। इस दृश्य में भी अश्लील चुटकुला खत्म होते होते त्यागी तीनों भाइयों को मार देता है। इसके बाद त्यागी मदद के लिए अपने कोच के पास जाता है ,जो उसे दलुनिया गुर्जर की शरण में ले जाता है। गुर्जर उसकी परीक्षा लेता है जिसमें वो एकलव्य की भाँति उससे अपना अंगूठा काटने के लिए कहता है और त्यागी ऐसा करता भी है। उसकी पहली परीक्षा थी कि कुत्ते उसे अपना पाते हैं या नहीं। गुर्जर मानता है कि जो व्यक्ति कुत्ते से प्रेम करता है और कुत्ता भी उस व्यक्ति को , तो वो उत्तम व्यक्ति होता है। जब त्यागी पाता है कि संजीव मेहरा और उसकी पत्नी डॉली एक कुत्ते का ध्यान रख रहे हैं जिसका नाम सावित्री है ,तो वो संजीव को मारने का विचार स्थगित कर देता है। हिन्दू धर्म मे एक मशहूर कहानी है जिसमें सावित्री अपने पति के प्राण यमराज से भी वापिस ले आती है, उसी के आधार पर कुत्ते का नाम सावित्री रखा जाता है।

A still form the web series Pataal Lok - Tyagi after killing his cousin brothers with hammer

सीरीज में दिखाया गया है कि सीबीआई कबीर को एक आतंकवादी के तौर पर पेश करती है जबकि वो एक मामूली चोर होता है। न्यायिक संस्था का ऐसा रूप दिखाना भी विरोध का एक मुख्य कारण है। यहाँ ये समझना अत्यंत आवश्यक है कि घटनाओं से उतपन्न हुए चरित्र और विचारों का सामान्यीकरण करना घातक होता है। कुंठित धड़ा ये मानने को तैयार नही की लोकतंत्र में ऐसे अधिकारी भी मौजूद हैं जो बहादुरी के एक मैडल और एक प्रमोशन के लिए किसी बेकुसूर को भी सलाखों के पीछे धकेल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर 1996 में राजस्थान के समलेटी में एक बम धमाका हुआ। इसमें कुल 12 लोगों को आरोपी बनाया गया जिसमें अहमद बाजा,अली भट्ट, मिर्जा निसार अब्दुल गोनी और रईस बेग भी शामिल थे। इन आरोपियों को बरी करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजक पक्ष मामले में आरोपियों के खिलाफ षडयंत्र रचने के सबूत देने में नाकाम रहा। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के मुख्य दोषी अब्दुल हमीद के साथ इन आरोपियों के संबंध साबित नहीं हो पाए। 5 बेकुसूर लोग अपनी जिंदगी के स्वर्णिम 23 वर्ष बिना किसी कुसूर के जेल में काटकर आते हैं। मिर्जा निसार को जिस समय गिरफ्तार किया गया उस समय उसकी उम्र 16 साल थी लेकिन क्राइम ब्रांच ने 19 साल उम्र बताकर आरोपी बनाया। 23 साल तक उनके परिवार जिल्लत झेलते रहे और आतंकी का ठप्पा लगा रहा।  हमारा ये कानून बल्कि दुनिया की कोई भी ताक़त उनको उनकी जिंदगी के 23 साल वापिस नही दे सकते। भारतीय लोकतंत्र समय समय पर न्यायिक तंत्र में सुधार हेतु नए नियम और कानून बनाता रहता है लेकिन आज भी हम पूर्णतः सफल नही हुए हैं। यहाँ समझने की बात ये है कि ऐसी घटनाओं को जानने के बाद भी हम इनका सामान्यीकरण नही करते और न्यायतंत्र में अपना भरोसा कायम रखते हैं।

घटनाओं से जन्मे विचारों और चरित्र को घटनाओं तक ही सीमित रखना उचित है। व्यक्ति या संस्थाएं विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार से कार्य करती हैं और हर नई घटना में उनका नया चरित्र सामने आता है। एक नेक उदाहरण किसी व्यक्ति या संस्था को पूर्णतः नेक और एक बुरा उदाहरण किसी व्यक्ति या संस्था को पूर्णतः बर्बर साबित नही कर सकता है। इसीलिए किसी एक घटना का सामान्यीकरण करके हम भविष्य में किसी भी व्यक्ति और संस्था के प्रति एक संकीर्ण विचार पैदा कर लेते हैं जो समय आने पर घातक भी साबित हो सकता है। सीरीज के अंत मे हाथीराम अपनी छानबीन से पता लगाता है कि दनुलिया गुर्जर की मौत के बाद उसका भाई ग्वाला गुर्जर, जो कि एक राजनेता वाजपेयी को सपोर्ट देता है, राजनीति में आने का इक्छुक होता है। ये बात वाजपेयी को अच्छी नही लगी क्यूंकि ग्वाला उसके लिए सिर्फ एक गुंडा था न कि एक राजनेता। ग्वाला का दमन करने लिए उसने साजिश रची त्यागी के एनकाउंटर की क्योंकि त्यागी ही ग्वाला और दनुलिया का सबसे भरोसेमंद आदमी है जो वाजपेयी के लिए आगे चलकर खतरा बन सकता है। इसीलिए त्यागी को संजीव मेहरा के कत्ल के लिए दिल्ली भेजा गया ताकि जैसे ही वो संजीव मेहरा पर गोली चलाए डीसीपी भगत और उसकी टीम उसका एनकाउंटर कर दे।

सीबीआई द्वारा परोसी गयी कबीर और उसके साथियों की झूठी कहानी का सहारा लेकर संजीव मेहरा अपनी पोजीशन और चैनल बचा लेता है और खुद को एक हीरो के रूप में प्रोजेक्ट करता है। अंत में हाथीराम चौधरी सारी सच्चाई का पता लगाने के बाद संजीव मेहरा के पास पहुँचता है और उसे बताता है कि कैसे त्यागी ने उसकी जान बख्शी और इस केस का उससे कोई लेना देना नही है ? वो सिर्फ एक जरिया था एक राजनीतिक षड्यंत्र को अंजाम देने का। चूँकि संजीव मेहरा झूठ के सहारे अपनी पोजीशन हासिल करता है इसलिए हाथीराम कहता है कि –

“आपसे जब पहली बार मिला था ना, तो मुझे लगा कि कितने बड़े आदमी हो आप और मैं कितना छोटा. इस केस में मेरी चाहे कितनी भी वाट लगी हो, कम से कम ये ग़लतफ़हमी दूर हो गई।”

ये ठीक वैसा है जैसे “अ वेडनेसडे” फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह कहते हैं कि –

‘जब तक आपको मालूम नहीं था मैं कौन हूं, आप मुझसे डर भी रहे थे, मुझे सीरियसली भी ले रहे थे. अब मैंने आपको बता दिया मैं एक आम आदमी हूं तो आपकी आवाज़ में अचानक एक कॉन्फ़िडेन्स आ गया है. शायद आप अब ये भी सोच रहे होंगे कि, ‘अच्छा! टेररिस्ट नहीं है. आम आदमी है. अब तो पकड़ लूंगा.’

अर्थात किसी इंसान की सच्चाई पता चलने पर उसे मिलने वाले ट्रीटमेंट में फर्क आ जाता है।

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