भारत के दलित मुसलमान

भारत के दलित मुसलमान- किताब समीक्षा

पुस्तक : भारत के दलित मुसलमान; खंड 1-2

लेखक : डॉक्टर अयूब राईन

प्रकाशन :  खंड 1 हेरिटेज प्रकाशन, खंड-2 आखर प्रकाशन

मूल्य  :  300 रु (प्रति खंड)

भारत के दलित मुसलमान: वह जिनका ज़िक्र हाशिये पर भी नहीं

मुस्लिम समाज में जात-पात की बात की जाती है तो इसे सिरे से नकारते हुए इक़बाल का कोई शेर सुना दिया जाता है या कुरआन की कोई आयत सुना दी जाती है. मुस्लिम समाज के यथार्थ को इस्लाम के मसावात के आदर्श से मिला कर एक भ्रम  पैदा करने की कोशिश की जाती है कि मुस्लिम समाज में ज़ात-पात नाम की कोई चीज़ मौजूद ही नहीं है. ऐसे में ज़रूरत है कि इस विषय पर ठोस/तथ्यपरक काम हो. डॉक्टर अयूब राईन की किताब “भारत के दलित मुसलमान“[खंड 1-2] इस ओर एक सार्थक कदम है. इससे पहले भी अली अनवर साहब की “मसावात की जंग” और मसूद आलम फलाही साहब की किताब “हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान” इस विषय पर एक मील का पत्थर साबित हुई है. अयूब राईन साहब की किताब इस मायने में थोड़ी अलग है, इसमें उनके मुख्यत: बिहार राज्य में किए गए फ़ील्ड वर्क भी शामिल हैं. यहाँ ये समझना ज़रूरी है कि मुख्यत: पसमांदा मुसलमान में ओबीसी मुसलमान और दलित मुसलमान दोनों आते हैं पर ये किताब OBC मुसलमानों पर नहीं बल्कि दलित मुसलमानों पर केंद्रित है. सच्चर समिति की रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि मुस्लिम समाज तीन वर्गों में बटा हुआ है. पहला वर्ग ‘अशराफ’ का है जो हिन्दुओं के सवर्णो के समान है. फिर ‘अजलाफ़ (OBC) और ‘अरजाल’ (दलित) मुसलमान आते हैं. 

अगर जनसंख्या के हिसाब से देखें तो पिछड़े (अजलाफ़) और दलित (अरजाल) मुसलमान भारतीय मुसलमानों की कुल आबादी का कम-से-कम 85 फीसद होते हैं. फिर भी इनकी समस्याओं का कहीं पर भी ज़िक्र नहीं होता है. इसकी बड़ी वजह ये भी है कि इन समस्याओं पर बहुत ज़्यादा काम भी नहीं हुआ है. पसमांदा कार्यकर्त्ता ज़्यादातर अपने अनुभव को आधार बना कर अपनी व्यथा रखता है जिसे अशराफ बुद्धिजीवी ‘व्यक्तिगत अनुभव‘ कह कर सिरे से ख़ारिज कर देते हैं.

डॉक्टर अयूब राईन, ‘भारत के दलित मुसलमान’, खंड-1  में लिखते हैं कि “जब  भी दलित मुसलमान अपनी माँग उठाता है तो अशराफ वर्ग चालाकी से दलित मुसलमानों की मांगों के बीच रुकावट डालने लगता है. इतना ही नहीं बल्कि दलित मुसलमान नेताओं का उपहास भी उड़ाते हैं ताकि वह अपना रास्ता बदलने पर मजबूर हो जाएँ और अशराफ़ समूह के लिए रास्ता बिलकुल साफ़ रहे….मिस्टर राजेन्द्र सच्चर मुसलमानों के किस समूह के हालात को दलित से भी ख़राब बताया ये देखने कि ज़रूरत है… अशराफ़ कही जाने वाली मुस्लिम जातियों का प्रतिशत सिर्फ 15% है जबकि अरजाल और अजलाफ़ (OBC  औरSC/ST) मुसलमानों की संख्या 85% है. कई छोटी जातियां सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण खुद को “शेख” जाति का घोषित कर सकी हैं नहीं तो अशराफ जाति का प्रतिशत और भी कम होता. अशराफ़ जातियों में जो गरीब और अनपढ़ लोग हैं वह इन्हीं छोटी जातियों के हैं जो खुद को अशराफ़ जातियों में शामिल करते हैं. दूसरी तरफ 85% छोटी जातियों के मुसलमान समूह जो अरजाल और अजलाफ़ जिसका 80% हिस्सा अनपढ, गंवार, मजदूर और राजनीतिक रूप से हाशिए के नीचे की ज़िन्दगी गुज़ारने वाला है. 

ऐसे में तुलनात्मक रूप से देखा जा सकता है कि किन मुसलमानों के हालात दलितों से भी ख़राब हैं “पर दिक्कत ये है कि एक हिन्दू धोबी को तो आरक्षण का लाभ मिलता है पर एक मुस्लिम धोबी को नहीं जबकि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति एक जैसी ही होती है. डॉक्टर अयूब राईन साहब अपनी किताब “भारत के दलित मुसलमान” खंड-१ के पेज 9 पर  लिखते हैं कि “जिस प्रकार बहुसंख्यक वर्ग हिन्दू धोबी को अछूत समझता है और उसे अपने घर के अन्दर नहीं आने देता बल्कि दरवाज़े पर ही कपड़े धोने को देता है और दरवाज़े से ही धुले हुए कपड़ा लेता है. ठीक उसी प्रकार का व्यवहार मुस्लिम धोबी के साथ मुस्लिम अशराफ़ वर्ग का होता है. इसके बावजूद पसमांदा समाज ने आज़ादी के बाद उस तरह से अपनी समस्याओं को नहीं उठाया जिस तरह से हिन्दू दलितों की समस्या को पुरजोर ढंग से अंबेडकर उठा रहे थे और उनको आरक्षण दिलाने में भी सफल होते हैं. इसकी एक वजह ये भी है कि इस समाज में एकता नहीं है और आरक्षण की लड़ाई दर्जनों बिखरी हुई जातियां अलग-अलग लड़ कर नहीं जीत सकतीं. उन्हें एक प्लेटफार्म पर आना होगा. कोई भी अपने जातिये हित से ऊपर नहीं उठना चाहता. अगर कोई ऐसा नेता पैदा भी होता है तो उसे एक जाति विशेष से जोड़ दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि अम्बेडकर के साथ ये नहीं हुआ पर दलित समाज ने सवर्णों की चाल को वक़्त रहते विफल कर दिया.”

The Wire’s interview of Dr. Ayub on his Book “भारत के दलित मुसलमान”

डॉक्टर साहब इस  किताब में दर्जनों मुस्लिम जातियों के बारे में  ज़िक्र करते हैं  जो मुस्लिम दलित समाज से आती हैं. इन जातियों में राईन, मीरशिकार, शिकलगर, पमरिया, फ़क़ीर, मिरासी, चूड़ीहारा, दफाली और धोबी, पमरिया, बक्खो, गदेहडी आदि हैं. अयूब साहब ने इनमें से अधिकतर जातियों के अरबी नामों और इनकी उतपत्ति की पड़ताल की है और ये बताने की कोशिश की है क़ि कैसे इन जातियों के काम की वजह से इनको हीन मान लिया गया जैसे अयूब साहब “राईन जाति” का ज़िक्र करते हुए कहते हैं क़ि इस जाति को अशराफ तबकों ने कुंजड़ा कह कर पुकारा इस जाति का काम सब्ज़ी बेचना है. ‘राईन’‘ शब्द अरबी भाषा के ‘राई’ शब्द से बना है जिसका शब्दिक अर्थ पहलवान, लड़ाकू और चरवाहा होता है. ये जाति लड़ाकू और मेहनत  करने वाली जाति रही है. मोहम्मद बिन कासिम के साथ 6000 यमनी फौजी के साथ इस समुदाय के लोगों ने भारत में कदम रखा. ‘अरिहार’ नाम का यमन में एक विख्यात कबीला था, ये लोग कृषि और पशुपालन का काम करते थे. इस कबीले के नाम पर राइन को “आलराई” के नाम से भी पुकारा जाता था. कालांतर में जब राईन समुदाय के लोग भारत में बस गए तो उन्हें उनके और उनके जैसे काम करने वाले सभी लोगों को राईन कहा गया. बाद में इन्होंने मुग़ल सत्ता के साथ संघर्ष किया जिनसे इनकी स्थिति कमज़ोर हो गई अंग्रेज़ों के आते आते ये बागान के कुली और मज़दूर बन गए. अयूब राईन साहब इन जीतियों के स्वर्ण अतीत को दिखा कर इन जातियों में आत्मसम्मान जगाना चाहते हैं. अयूब राईन साहब इस किताब में कुछ पसमांदा सूफ़ियों का भी ज़िक्र करते हैं जैसा कि हम जानते हैं कि ज़्यादातर सूफी अशराफ जाति से आते हैं. पूरे हिंदुस्तान में आपको “सैयद बाबा” की मज़ार नज़र आ जाएगी पर राईन, धोबी, अंसारी आदि पसमांदा जातियों के कोई सूफी नज़र नहीं आते. अयूब राईन साहब अपनी किताब में कुछ ऐसे पसमांदा सूफ़ियों को खोजकर दर्ज करते हैं, जैसे मीरशिकार (चिड़ीमार) जाति के एक बुज़ुर्ग “दाता शाह लियाकत हुसैन” को वली माना जाता है. उनकी मज़ार बिहार के सीतामढ़ी जिला के “पुपरी” में स्थित है. 

पसमांदा जातियों के आत्मसम्मान पाने के इस प्रकार के प्रयास को हम संस्कृतिकरण से जोड़ सकते हैं. M.S  श्रीनिवासन ने संस्कृतिकरण की अवधारणा दी थी जिसमें उन्होंने ये समझाया था कि संस्कृतिकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत निम्न हिंदू जातियां या जनजातियां अपने से उच्च जाति के रहन सहन को अपनाकर जातिय असमानता में अपनी प्रस्थिति को ऊंचा उठाने का प्रयास करती हैं. समाजशास्त्री खालिद अनीस अंसारी इसी की तर्ज पर “अशराफिकरण” की बात करते हैं. वह बताते हैं कि पहले “कौम” शब्द अशराफ जातियों शेख, सैयद, मुगल, पठान आदि के लिए इस्तेमाल होता था. इस हीन भावना से निकलने के लिए मुसलमानों की “छोटी जातियों” ने भी अपना रिश्ता अरब से जोड़ा और अपने जाति के नाम को भी बदला जैसा जुलाहों ने खुद को अंसारी कहा, कसाइयों ने खुद को कुरैशी. इन जातियों ने अपने पक्ष में कहानियां भी गढ़ीं. अशराफों की तरह इन्होंने भी खुद को विदेशी मूल का साबित करने की कोशिश की. जिसका सबसे तीव्र विरोध अशराफ उलेमाओं ने किया. इन उलेमाओं ने “कफू” के सिद्धांत (ये शादी से संबंधित सिद्धांत है कि कौन सी जाति किस जाति से शादी कर सकती है और कौन सी जाति नहीं कर सकती है) को स्थापित करके मुस्लिम समाज में जातिय वर्गीकरण को बनाए रखा पर “इलेक्टोरल  पॉलिटिक्स” ने वोट के महत्व को बढ़ा दिया. अशराफ ये समझ गए थे कि वह सिर्फ अपने वोट के ज़रिये एक प्रधान का भी चुनाव नहीं जीत सकते. यहीं से “कौम” शब्द में पसमांदा भी शामिल कर लिए गए. अब इस कौम शब्द के अंदर चुनाव लड़ने की ज़िम्मेदारी अशराफों ने ले ली और वोट करने का कर्तव्य पसमांदा ने. अगर हमें अशराफों के इस राजनीतिक समीकरण को तोड़ना है तो हमें अपनी जड़ें भारत में ही खोजनी होंगी, अपनी पहचान “भारत के मूलनिवासी” के रूप में करनी होगी. पहचान की इस राजनीती में अगर हमें अशराफ-सवर्णो के समीकरण को तोड़ना है तो पसमांदा-बहुजन का समीकरण बनाना ही होगा.

यह लेख 18 मार्च 2019 को hindi.roundtableindia.co.in पर प्रकाशित हो चुका है।

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