जावेद अहमद ग़ामदी की किताब ‘मक़ामात’ की समीक्षा

जावेद अहमद ग़ामदी परम्परागत उलेमा के निशाने पर रहते हैं। इस की बड़ी वजह यह है कि ग़ामदी साहब का नज़रिया पुरानी रिवायतों और मान्यताओं की पुनर्व्याख्या करता है। इस में दिक्कत यह है कि इन मान्यताओं और रिवायतों को कई सम्प्रदायों ने अपना आधार बना रखा है। ऐसे में इन मान्यताओं की पुनर्व्याख्या करने से इन सम्प्रदायों की पूरी नींव हिल जाती है। आम तौर से जो उलेमा हैं वह किसी न किसी सम्प्रदाय से आते हैं। यही वजह है कि उन के पीछे उन का सम्प्रदाय खड़ा नज़र आता है, जैसे मौलाना तारिक़ जमील साहब के पीछे देवबंदी मसलक है तो ज़ाकिर नायक साहब के पीछे अहले हदीस मसलक पर ग़ामदी साहब के पीछे कोई सम्प्रदाय नज़र नहीं आता। ग़ामदी साहब से अगर कुछ एतराज़ है तो संवाद के माध्यम से उसे हल किया जा सकता है पर हमारे मुस्लिम समाज में वाद-विवाद संवाद की कोई परम्परा तो बची नहीं है। इसी वजह से मुस्लिम समाज हर नए सुधार को, हर नई बात को अपने लिए ख़तरा और साज़िश ही समझता है। मुस्लिम समाज में अब इल्मी बहसें शायद ही कभी होती हों, मुस्लिम समाज में सवाल करने को हमेशा ही दबाया जाता है। कोई ख़ुदा, क़ुरान या ईमान पर सवाल कर दे तो कहा जाता है कि ज़्यादा सवाल न करो वर्ना तुम्हारा ईमान चला जाएगा। जिस समाज में सोच-समझ पर ताला लगा दिया गया हो वहां जवाबन ग़ामदी साहब जैसे लोगों को गालियां ही दी जाएंगी, उनसे बात नहीं होगी। साथ ही पूरी कोशिश की जाती है कि मुस्लिम समाज में जावेद अहमद ग़ामदी जैसे लोगों की साख को, उन की विश्वसनीयता को ख़त्म किया जाए। हद तो तब हो गई जब जावेद अहमद ग़ामदी साहब के क़रीबी दोस्त और शागिर्द डॉक्टर फ़ारूक़, डॉक्टर मुजीब-उर-रहमान को क़त्ल कर दिया गया। उस के बाद ग़ामदी साहब पाकिस्तान छोड़ कर मलेशिया शिफ़्ट हो गए। ग़ामदी साहब कहते हैं कि इसमें भी अल्लाह की मस्लेहत थी यहां(मलेशिया) उन को वक़्त मिला और उन्होंने क़ुरान की तफ़्सीर लिखी जो अंग्रेज़ी और ऊर्दू में 5 जिल्दों में उपलब्ध है।

ग़ामदी साहब पर आरोप यही है क़ि 2000-2008-9 के दौरान जब पाकिस्तान में सैनिक तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ की हुकूमत थी। उस वक़्त मुशर्रफ़ ने ग़ामदी साहब का प्रयोग किया ताकि अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर हुए हमलों को सही साबित किया जा सके। आरोप यह भी है कि ग़ामदी साहब इस्लाम की व्याख्या पश्चिमी देशों के हिसाब से कर रहे हैं। इसी लिए ग़ामदी साहब का नज़रिया जिहाद, इस्लामिक हुकूमत, पर्दा, तलाक़ आदि पर रिवायती/परम्परागत उलेमा से अलग है।

ग़ामदी साहब इस आरोप का जवाब यह कह कर देते हैं कि मेरा जो नज़रिया है वह 2010 में नहीं बना। मैं इस्लाम को जैसे देखता हूँ वह सब पहले से छपा हुआ मौजूद है, कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। जो मेरा विरोध करते हैं दरअसल उन में अधिकतर ऐसे हैं जिन्होंने मेरी कोई किताब नहीं पढ़ी। अगर मेरी बातों में वज़न न होता तो मुशर्रफ़ साहब के जाने के बाद मेरी सारी बातें बेमायनी हो जानी चाहिए थीं, मुझे सुनने वालों की संख्या घट जानी चाहिए थी। याद रहे वही बातें सुनी जाती हैं जिसे लोग किसी न किसी एतेबार से क़ाबिल-ए-क़बूल समझते हैं। आप यह बताएं वह कौन सा कमर्शियल चैनल है जो आज (परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर के बाद) मुझे प्राइम टाइम पर प्रोग्राम करने दे, यह जानते हुए कि मुझे अब कोई नहीं सुनता? अगर आप मेरी किताब पढ़ें तो पता चलेगा कि मैं कोई नई बात नहीं करता। मेरी बहुत सी बातें वही होती है जो मुझ से पहले के उलेमाओं ने की हैं। दीन (इस्लाम) का एक आलिम होने के नाते, दीन का विद्यार्थी होने के नाते अगर कोई मुझे दीन से जुड़ा कोई सवाल करता है तो मैं उस का जवाब बिना यह सोचे देता हूँ कि वह मेरे जवाब का इस्तेमाल किस तरह करेगा। 

किताब ‘मक़ामात’

जावेद अहमद ग़ामदी साहब ने बहुत कम किताबें लिखी हैं पर जिस किताब को वह अपनी पूरी ज़िंदगी का हासिल बताते हैं वह है ‘मीज़ान’। पर हम आज जिस किताब ‘मक़ामात’ की समीक्षा पढ़ रहे हैं वह दरअसल विभिन्न विषयों और रिवायतों पर कई बरसों में ग़ामदी साहब द्वारा लिखे गए लेख का संकलन है जो इन विषयों पर उन के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। इस किताब में बहुत से ऐसे विषय हैं जो आज भी मुस्लिम समाज में विवाद का कारण बने हुए हैं, जैसे-तलाक़, सूद, बीमा, जिहाद, इस्लामिक रियासत, ख़लीफ़ा, पर्दा, दाढ़ी, मदरसों की तालीम , बाल विवाह, औरतों का अकेले सफ़र करना आदि। यहाँ हम कुछ विषयों पर उनके दृष्टिकोण को संक्षिप्त में देख लेंगे ताकि आप को अंदाज़ा हो जाए की आपको इस किताब में क्या पढ़ने को मिलेगा? ऐसा नहीं है कि उन का दृष्टिकोण हमेशा एक जैसा रहा है। इसका आसान सा मतलब यह है कि उन की कही गई कोई भी बात आख़िरी नहीं है। ग़ामदी साहब अपने बारे में यही कहते हैं कि वह इस्लाम के एक विद्यार्थी हैं। वह लगातार इस्लाम का अध्ययन कर रहे हैं और जैसे-जैसे उन की समझ और ज्ञान बढ़ता है, उन का दृष्टिकोण भी उसी के अनुसार बदलता जाता है। इस बात का आसान सा मतलब यह है कि वह तक़लीद (अंधभक्ति) के ख़िलाफ़ हैं। अपने इसी नज़रिये कि वजह से उन्होंने अपने उस्ताद अमीन अहसन इस्लाही साहब से अलग अपनी राय बनाई है, जैसे-औरतों के पर्दे के ऊपर जहाँ ग़ामदी साहब और इस्लाही साहब इस बात से सहमत नज़र आते हैं कि औरतों के परदे का हुक्म एक विशेष परिस्थिति में सिर्फ़ नबी (स० अ०) के घर की औरतों के लिए आया था पर इस्लाही साहब यह कहते हैं कि आज अगर आम औरतें भी इस का पालन करें तो बेहतर होगा। वहीं ग़ामदी साहब क़ुरआन की सभी आयतों को उस की पृष्ठभूमि में रख कर देखते है। ग़ामदी साहब का कहना है कि विशेष परिस्थितियों में दिए गए आदेश उन परिस्थितिओं के समाप्त होते ही समाप्त हो जाते हैं जैसे सुरह तौबा में काफ़िरों के क़त्ल की जो आयत है क्या वह सामान्य परिस्थितियों में भी लागू होती हैं ? सारे उलेमा इस बात से सहमत हैं कि वह आयत विशेष परिस्थिति में जब जंग हो रही थी उस वक़्त के हुक्म हैं। मतलब वह इस बात से सहमत हैं कि क़ुरआन कुछ आयात स्थिति विशेष से जुड़ी हुई है।

ग़ामदी साहब का मानना है कि हमें अंधी तक़लीद नहीं करनी चाहिए,पर यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि हर मुसलामन तो इस्लाम पर शोध का काम नहीं कर रहा है और न ही शोध का यह काम सारे मुसलमानों की ज़िमेदारी है। हर शक़्स किसी न किसी मौलाना या मसलक को मानता है। ऐसे में तक़लीद को सिरे से ख़ारिज करना कहाँ तक सही होगा? इस के जवाब में ग़ामदी साहब का कहना है कि आप जिस भी मसलक को मानते है माने। हम नया मसलक, नई मस्जिद बनाने नहीं उठे हैं। एक इंसान होने के नाते जैसे मुझे कोई ग़लती हो सकती है, इस्लाम को देखने और समझने में वैसे आप को या दूसरे किसी को भी गलती हो सकती है।  अगर कोई बात दलील के साथ आप के सामने आए तो आप उसे सुनने और समझने का हौसला दिखाएं।

 किताब के शुरुआत में ही वह अपने तख़ल्लुस (क़लमी नाम) ‘ग़ामदी‘ रखने की कहानी बयान करते हुए कहते हैं कि मेरे यहां तख़ल्लुस रखने का रिवाज था। एक वक़्त में मेरे ऊपर भी तख़ल्लुस खोजने की धुन सवार थी। मेरी कोशिश थी कि मेरे तख़ल्लुस की निस्बत मेरे दादा से हो, मेरे दादा को गाँव में आपसी झगड़े सुलझाने वाले समाज सुधारक के रूप में जाने जाते थे। एक दिन उन्हें अरब के एक क़बीले बनु ग़ामद के बारे में पता चला जिन्होंने किसी मामले में पर्दा डाला था और समाज में इस्लाह/सुधार की कोशिश की थी। इसी वजह से उन्हें ‘ग़ामद’ का लक़ब दिया गया। जिसे बाद में अरबी ज़बान में ‘सुधार करने वाले’ के अर्थ में इस्तेमाल किया जाने लगा। यह तख़ल्लुस मुझे बहुत अच्छा जान पड़ा जिसे मैंने अपना लिया।

ग़ामदी साहब के पिता चाहते थे कि स्कूली शिक्षा के साथ इन को अरबी-फ़ारसी और संस्कृत की तालीम भी मिले। शुरूआती तालीम मौलवी नूर अहमद साहब ने दी, 6-7वीं कक्षा में नसरुद्दीन साहब ने उन को मौलाना मौदूदी के बारे में पढ़ने के लिए दिया। ग़ामदी साहब लिखते हैं कि उन की किताबें बिलकुल नई दुनिया थीं। 10 वीं कक्षा में इन की दिलचस्पी फ़लसफ़े और तसव्वुफ़ की ओर हुई। 10वीं के बाद लाहौर कॉलेज में दाख़िला लिया, दर्शन और अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई शुरू की। एक दिन जावेद अहमद ग़ामदी साहब को इमाम हमीद-उद-दीन फ़राही साहब की किताब पढ़ने को मिली और इस किताब ने उन के सोचने का तरीक़ा बदल दिया। इन्हीं किताबों में से किसी किताब में उन्हें फ़राही साहब के शागिर्द मौलाना अमीन अहसन इस्लाही साहब का ज़िक्र मिला। ग़ामदी साहब लिखते हैं कि वह लाहौर के बहार कहीं रहते थे, मैं लाइब्रेरी से उठा और पता पूछते-पूछते उन के घर पहुंच गया। बाद में ग़ामदी साहब ने उन की शागिर्दगी अख़्तियार की। अपने उस्ताद की तारीफ़ और उन के नज़रिये को वह हर जगह पेश करते हैं। ज़्यादातर मामले में वह अपने उस्ताद के नज़रिये से ही सहमत नज़र आते हैं। 

इस्लामी देशों में जो क़ानून बनाए जाते हैं उन का मुख्य आधार क़ुरआन और हदीस होती है। इस हिसाब से क़ुरआन के साथ हदीस का महत्व बहुत अधिक हो जाता है। आज हम कई ‘इस्लामी देशों‘ में देखते हैं कि वहां बाल विवाह को इस्लामी मान्यता प्राप्त है जिस का आधार वह सही बुख़ारी और सही मुस्लिम की उस हदीस को बनाते हैं जहाँ बताया गया है कि पैग़म्बर मुहम्मद (स०अ०व०) के साथ निकाह के वक़्त उम्म-उल-मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) सैय्यदा आइशा (रज़ि०) की उम्र 6 साल थी। ग़ामदी साहब अपनी किताब मक़ामात में एतेहासिक दस्तावेज़ और क़ुरआन की गाइड लाइन को सामने रखते हुए इस हदीस/रिवायत की गलती ब्यान करते हैं और बताते हैं कि इस हदीस को किसी भी तर्क से सही नहीं माना जा सकता।

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यहां ग़ामदी साहब कहते हैं कि अक्सर सुन्नत और हदीस दोनों शब्दों को पर्यायवाची या एक ही चीज़ समझा जाता है, लेकिन दोनों की प्रमाणिकता (सच्चाई) और विषय-वस्तु (मौज़ू) में बहुत अंतर है। रसूलुल्लाह (स०अ०व०) के कथन (क़ौल), कार्य (फ़ेअल) और स्वीकृति एवं पुष्टि (इजाज़त और तस्दीक़) की रिवायतों (लिखित परंपरा) या ख़बरों को इस्लामी परिभाषा में ‘हदीस’ कहा जाता है। हदीस के विद्वानों (आलिमों) का कहना है कि एक हदीस सही भी हो सकती है और गलत भी। [मुल्लाह अली अल-क़ारी, शरह नुख़बह-अल-फ़िक्र, भाग. 1, 155] इसी वजह से हदीसों को ज़न्नी (अनुमानिक अथवा अनिश्चित) भी कहा जाता है। दूसरी तरफ़ सुन्नत शब्द का अर्थ है ‘व्यस्त मार्ग’ या वह रास्ता जिस पर कसरत से चला गया हो। दीन में इस का मतलब है अल्लाह के पैग़म्बर इब्राहीम (अ०) से चली आ रही वह प्रथाएं या कार्य (अमल) जिन को अल्लाह के आख़िरी पैग़म्बर मुहम्मद (स०अ०व०) ने फिर से ज़िन्दा किया और जो कुछ बिगाड़ उन में आ गया था उसे सुधार कर कुछ इज़ाफ़े के साथ अपने मानने वालों के लिए दीन के रूप में जारी कर दिया। ग़ामदी साहब का यह स्पष्ट मानना है कि आखिरी रसूल (स.व) के बाद अब किसी को भी ये हक हासिल नहीं की वह दीन में कुछ नया शामिल कर दे या किसी उस चीज़ को हराम करार दे जो की दीन ने हराम नहीं की। अगर ऐसा कोई करता है तो इसे भी शिर्क कहा जायेगा:-उन लोगों (यहूदियों और ईसाइयों) ने अल्लाह को छोड़कर अपने उलेमा (धर्मगुरुओं) को अपना रब बना लिया था। कुरआन [सूरेह तौबा, आयत 31]

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यही बात है कि ग़ामदी साहब उलेमा से हदीस की किताब (बुखारी, मुस्लिम आदि) बहुत सी हदीसों पर दुबारा शोध करने कि बात करते हैं क्योंकि इन हदीसों को आधार बना कर बहुत सी प्रथाएं मुस्लिम समाज में मौजूद है। जैसे अभी कुछ साल पहले सऊदी अरब जैसे इस्लामी देश ने औरतों को गाड़ी चलाने की तो इजाज़त दी पर आज भी औरतों को अकेले सफ़र करने कि इजाज़त नहीं दी गई है। उन के साथ कोई महरम (कोई ऐसा रिश्तेदार जिसके साथ शादी नहीं की जा सकती) या शौहर का होना ज़रूरी है। इस लिए उन्हें किसी यात्रा, जैसे की हज पर भी अकेले जाने की इजाज़त नहीं है। इस का आधार भी वह सही मुस्लिम को बनाते हैं [भाग-2, 977, (न०1339)]।  इस सम्बन्ध में ग़ामदी साहब लिखते हैं जिस समय अरब समाज संघर्ष और अराजकता (anarchy) में डूबा हुआ था तब रसूलुल्लाह (स०अ०व०) ने महिलाओं के सफ़र को सुरक्षित बनाने और उन्हें किसी भी तरह के बदनाम करने वाला आरोपों से बचाने के लिए यह निर्देश दिया कि वह किसी महरम के साथ ही यात्रा करें। आज के बदले हुए आधुनिक दौर में सफ़र का तरीक़ा पूरी तरह बदल गया है। सफ़र के ऐसे ज़रिये मौजूद हैं जिन में औरतें शारीरिक और नैतिक दोनों तरह से सुरक्षित हैं। इस तरह के मामलों में महरम साथ होने का निर्देश लागू नहीं होता। 

ईशनिंदा भी ऐसा ही एक मामला है। ईशनिंदा को आधार बना कर मुस्लिम देशों विशेषत: पाकिस्तान में कई मासूमों की जान ले ली गई है। स्टेज से मौलाना खुल कर ऐसे लोगों को कत्ल करने का आहान करते हैं जिन्होंने मोहम्मद(स अ) के बारे में कोई अभद्र टिप्पणी की हो। फेसबुक पर मुसलमानों की ऐसी पूरी जमात मौजुद है जो ऐसे कातिलों को गाज़ी कहती घूमती है। उनकी शान में कसीदे पढ़े जाते हैं। अगर इन कातिलों को सज़ा हो जाती है तो इनके जनाज़े में लाखों की तादाद में लोग इखट्टा हो कर दूसरे कातिलों का हौसला बढ़ाते हैं। अभी हाल में भारत (बंगलौर) में भी दंगे जैसे हालत बन गए थे। जहाँ कई लोगों की मौत हो गई। ऐसा क्यों है ? क्योंकि हमारे रिवायती उलेमा ने यह बता दिया है कि ईशनिंदा की सज़ा सज़ा-ए-मौत है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मारेगा वह जन्नत में चला जाएगा। जावेद अहमद गामदी साहब का कहना है कि इस्लाम में ईशनिंदा की कोई सज़ा ही नहीं है। मुस्लिम देशों की सरकारें चाहे तो इस पर कानून बना सकती हैं जैसे और किसी मामले में कानून बना सकती हैं पर उन कानून की भी हद होगी जो हद कुरआन ने हम को दी है अर्थात सिर्फ दो ही मामलों में सज़ा-ए-मौत दिया जा सकता है। कत्ल की सज़ा पर या फ़साद फ़ैलाने की सज़ा पर।

एक दूसरा विवादित विषय, जिहाद और इस्लामी स्टेट की स्थापना से जुड़ा हुआ है। हम यह देखते हैं की देश और राजनेता जिहाद का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत हित के लिए करते रहे हैं। सदियों से वह जिहाद की ग़लत व्याख्या करते रहे हैं। जैसे ग़ज़वा-ए-हिन्द की हदीसों का इस्तेमाल पकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए किया गया। जावेद अहमद ग़ामदी लिखते हैं “ग़ज़वा-ए-हिन्द” के नाम से यह रिवायात कुरआन मजीद के भी खिलाफ हैं, दूसरी ‘सहीह’ हदीसों के भी खिलाफ है और तारीख (इतिहास) के भी खिलाफ है। ग़ामदी साहब का कहना है कि क़ुरआन अपने मानने वालों से यह चाहता है कि यदि उन के पास सामर्थ्य हो तो वह अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करें। क़ुरआन में जिहाद का यह निर्देश मूल रूप से ‘persecution’ उत्पीड़न  के ख़त्म करने के लिए दिया गया है। यह निर्देश उन को उन की सामूहिक क्षमता में दिया गया है। इस निर्देश से संबन्धित जो आयतें क़ुरआन में आई हैं, उन पर कारवाई का अधिकार केवल मुसलमानों की सामूहिक व्यवस्था को है। किसी व्यक्ति या गुट को सारे मुसलमानों की तरफ़ से यह निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। क़ुरआन कहता है, “अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुम से लड़ें, लेकिन ज़्यादती न करो। निःसंदेह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसन्द नहीं करता” [सूरह 2; आयत 190]।

तालिबान क्या कर रहे थे/हैं? मौलाना हसन जान, डॉ. सरफ़राज़ नईमी और डॉ. मुहम्मद फ़ारूक़ ख़ान जैसे आलिम (विद्वान) कभी तालिबान के विरुद्ध लड़ने के लिए नहीं निकले थे। मलाला यूसुफ़ज़ई एक मासूम बच्ची है, उस ने भी कभी उन पर बंदूक नहीं उठाई। इस के बावजूद तालिबन का आग्रह है यह सब मार डालने के लायक़ (वाजिबुल क़त्ल) हैं। क्या यह केवल इस लिए कि इन लोगों ने तालिबान से मतभेद का साहस किया? ISIS के शुरुआती दौर में इस्लामिक स्टेट बनाने का पागलपन मुस्लिम दुनिया पर सवार हुआ था। कई देशों के मुस्लिम नौजवान इन संगठनों में शामिल होने चले गए। इसी तरह देखें तो ‘क़ौम’ पर आज कल ख़िलाफ़त-ए-उस्मानिया का भूत सवार हुआ है। ग़ामदी साहब लिखते हैं इस्लाम में राष्ट्रीयता (क़ौमियत) की बुनियाद भी इस्लाम ही है, किसी तरह भी सही साबित नहीं होती है। क़ुरआन ने किसी जगह यह नहीं कहा कि मुसलमान एक ही राष्ट्र हैं या उन्हें एक ही राष्ट्र होना चाहिए। मुसलमानों के अलग-अलग राष्ट्र के अस्तित्व को क़ुरआन स्वीकार करता है। क़ुरआन ने जो बात कही है वह यह है कि मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं। रही यह बात कि दुनिया में मुसलमानों की एक ही हुकूमत होनी चाहिए और यह इस्लाम का हुक्म है तो क़ुरआन से परिचित हर विद्वान जानता है कि वह इस तरह के किसी हुक्म से पूरी तरह ख़ाली है। दो हदीसें, वैसे इस के प्रमाण में पेश की जाती हैं: उनमें से एक यह है कि रसूलुअल्लाह (स०अ०व०) ने फ़रमाया: बनी इसराईल पर नबी हुकूमत करते थे। इस लिए एक नबी दुनिया से सिधार जाते तो दूसरे नबी उन की जगह ले लेते थे, लेकिन मेरे बाद कोई नबी नहीं है, हुकमरान, वैसे तो होंगे और बहुत होंगे। पूछा गया: उनके बारे में आप हमें क्या हुक्म देते हैं? आपने फ़रमाया: पहले उस के साथ निष्ठा के वचन को पूरा करो, फिर उस के साथ जो उस के बाद पहला हो। [सही बुख़ारी, हदीस नंबर 3455; सही मुस्लिम हदीस नंबर 1842]

अधीक जानकारी के लिए यूट्यूब का यह लिंक देखें : Javed Ahmad Ghamidi & Dr Israr – Islamic System

‘ख़िलाफ़त’ कोई धार्मिक परिभाषिक शब्द (religious terminology) नहीं है और न ही दुनिया के स्तर पर इस को क़ायम करना इस्लाम का कोई हुक्म है। वह लिखते हैं कि अगर एक इस्लामी हुकूमत बनाना मक़सद होता तो पहली सदी हिज्री के बाद ही, जब मुस्लमानों के प्रसिद्ध इस्लामी शरीयत के जानकार (फुक़हा) उन के बीच मौजूद थे उन की दो सल्तनतें, सल्तनत-ए-अब्बासिया बग़दाद और सल्तनत-ए-उमय्या उनदलिस (स्पेन) के नाम से क़ायम हो चुकी थीं और कई सदीयों तक क़ायम रहीं। मगर उन में से किसी ने उसे इस्लामी शरीयत के किसी हुक्म की ख़िलाफ़ वरज़ी क़रार नहीं दिया। इस लिए कि इस मुआमले में सिरे से कोई हुक्म क़ुरआन और हदीस में मौजूद ही नहीं है। मुसलमानों की हुकूमत अगर किसी जगह क़ायम हो तो आम तौर पर उस से शरीयत की पाबंदी की मांग की जाती है। यह व्याख्या ठीक नहीं है, इस लिए कि इस से यह ग़लत फ़हमी पैदा होती है कि इस्लाम में हुकूमत को यह हक़ दिया गया है कि वह शरीयत के तमाम तक़ाज़ों को रियासत की ताक़त से लोगों पर नाफ़िज़ (लागू) कर दे, लेकिन क़ुरआन और हदीस में ये हक़ किसी हुकूमत के लिए भी साबित नहीं है। फिर इस के बाद वह एक लम्बी फ़ेहरिस्त गिनवाते हैं कि ऐसे हुकूमतें क्या कर सकती हैं और क्या नहीं कर सकती! इस वक़्त जो उलेमा (धर्म के विद्वान) इस विषय पर अपने तर्क दे रहे हैं उन्हें सब से पहले इस सवाल का जवाब देना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि रिवायात का ये तज़ाद (अन्तर्विरोध) किस तरह दूर किया जा सकता है!

ग़ामदी साहब से सहमत होना ज़रूरी नहीं है, ज़रूरी यह है कि हम विरोधी तर्कों को सुनना शुरू करें। यह मानें कि जिस तरह जावेद अहमद ग़ामदी एक विद्वान होने के बावजूद आम इंसान है और उन से ग़लती हो सकती है। ठीक उसी तरह दूसरे उलेमा से भी ग़लती हो सकती है। अंधभक्ति किसी की भी हो, सही नहीं होती। आप को जावेद अहमद गामदी से असहमत होने उनकी आलोचना करने के लिए भी उनकी किताब पढ़नी चाहिए।

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