A still from Film Masaan

मसान: मन कस्तूरी रे,जग दस्तूरी रे!

सुबह सुबह माँ की आवाज़ बेटे के कानो में पड़ती है।
“दीपक आ गए क्या? चुलाह बारना है, ज़रा आग ले के आओ।”
दीपक चुप चाप घर से बाहर निकल के श्मशान की और चला जाता है। जहाँ उसके पिता और भाई चिता जलाने का काम कर रहे होते हैं। वो एक चिता से आग ले के आता है ताकि घर के चूल्हे की आग जल सके। कितनी खूबसूरती से यहाँ इस बात को समझा दिया कि किसी के चिता की आग कुछ जातियों के पेट की आग बुझाने का काम करती है।

‘मसान’ (श्मशान घाट) जितनी आपको दिखती है उसकी गहराई उससे ज़्यादा है। फ़िल्म में निर्देशक नीरज घेवन इशारों-इशारों में बहुत कुछ कह जाते हैं। फिल्म में कई कहानियां एक साथ चल रही होती हैं।

Masaan Film Poster
Masaan Film Poster – A must watch – Critically acclaimed

फिल्म की ये पहली कहानी है जिसमें दीपक (विक्की कौशल) बनारस का रहने वाला एक अछूत जाति का छोटा लड़का है। उसकी जाति के कारण वह गंगा के घाट पर काम करने के लिए मजबूर होता है जिसमें मृत शरीर को जलाना और क्रिया कर्म शामिल है। दीपक इस काम को पसंद नहीं करता है और इस काम से बाहर निकलना चाहता है। जिसमें उसके पिता भी सहयोग करने को तैयार हैं। इसी बीच उसकी मुलाकात उच्च जाति की लड़की शालु (श्वेता त्रिपाठी) से होती है। फिर धीरे धीरे इनमें प्यार हो जाता है। फिल्म में प्यार के इज़हार को बेहद खूबसूरती से बयाँ किया गया है। दीपक और शालू एक दूसरे से प्यार करते हैं पर अभी तक इज़हार नहीं किया है। बनारस के मेले में दीपक और शालू मिलते हैं पर उनके साथ उनके दोस्त हैं इसलिए वह बात नहीं कर पाते है।। एक दूकान से दोनों ही गुब्बारे खरीदते हैं। शालू को जाता देख कर दीपक गुब्बारा हवा में छोड़ देता है। शालू उस गुब्बारे को देखती है और अपना भी गुब्बारा उसके साथ हवा में छोड़ देती है जिससे दीपक उसके दिल की बात समझ जाता है। इसी दौरान बैकग्राउंड में दुष्यंत कुमार की कविता पर आधारित वरुण ग्रोवर का लिखा गीत बज रहा होता है “तू भले रत्ती भर ना सुनती है / मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ / तू किसी रेल सी गुज़रती है, / मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ “

Masaan Film trailer
A still from the film Masaan
दीपक इश्क़ का गुब्बारा छोड़ते हुए

शालू और दीपक का प्यार अभी परवान चढ़ ही रहा होता है कि दीपक को उसकी जाति का एहसास उसका एक दोस्त करा देता है। वह दीपक को समझाते हुए कहता है कि “ लड़की अपर कास्ट है दोस्त, ज्यादा सेंटी वेंटी मत होना”
शालू भी इस बात को जानती है की उसका परिवार कभी दीपक को स्वीकार नहीं करेगा इसलिए वह दीपक के साथ भाग के शादी करने को भी तैयार है। कहानी में नाटकीय मोड़ आता है और शालू की मौत हो जाती है और दीपक प्रेम की जगह दर्द में डूब जाता है।

दूसरी कहानी:

शायद इस प्रेम सम्बन्ध को एक साल हो गए थे। लगातर फोन और फेसबुक पे बात करते करते प्रेमी युगल में एक सहमती बनी की अब हमें ‘ सेक्स ‘ कर लेना चाहिए। ये युगल एक होटल जाते हैं कि तभी पुलिस की रेड पड़ जाती है। पुलिस उन प्रेमी युगल को इतना प्रताड़ित करती है कि लड़का डर और अपमान से आत्महत्या कर लेता है। ये घटना वाराणसी की है पर वास्तविक नहीं बल्कि ‘मसान’ फिल्म की एक कहानी है लेकिन यू.पी. में जहाँ रोमियों स्क्वाड के नाम पर प्रेमी युगलों को प्रताड़ित किया जाता है। वहाँ इस घटना की सम्भावना पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। ये घटना किसी के साथ भी, कभी भी, कहीं भी हो सकती है।

A still from the film Masaan
देवी अपने प्रेमी से होटल में मिलते हुए।

फिल्म यहीं से शुरू होती है और ये बताती है की जब सरकार और प्रशासन लोगो की निजी ज़िन्दगी में हस्तक्षेप करने लगेगी तो स्थिति कितनी भयावय हो जाएगी। मसान में ये कहानी देवी (रिचा चड्डा) की है। फिल्म देवी और उनके साथी छात्र पीयूष के एक होटल में एक साथ होने के दृश्य से शुरू होती है. पुलिस द्वारा पकड़े जाने और पुलिस इंस्पेक्टर मिश्रा द्वारा वीडियो बना के देवी और उनके पिता को ब्लैकमेल किए जाने पर आधारित है। फिल्म में देवी के पिता विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) को इंस्पेक्टर मिश्रा डराता है और अपमानित करता है तो वो ग्लानी और क्षोभ से वशीभूत हो कर अपनी बेटी को पीटते हैं और पूछते हैं कि उसने ये गन्दा काम क्यों किया ? पर देवी को इसमें कुछ भी गन्दा नज़र नहीं आता। वो एक आज़ाद ख्याल की लड़की है। अगर उसको किसी बात का अफ़सोस है तो सिर्फ अपने प्रेमी पियूष की मौत का; जिसका अफ़सोस न तो देवी के पिता को है न इंस्पेक्टर मिश्रा को। ये लड़की भारत की उस नई पीढ़ी को दर्शाती है जिसका यौन स्वतंत्रता को लेकर अपना निजी दृष्टिकोण है जो भारत की परम्परावादी सोच से काफी अलग है।

A Still from the movie Masaan
इंस्पेक्टर मिश्रा,विद्याधर पाठक को ब्लैकमेल करते हुए.

वहीं देवी का किरदार भारत की उस घिनौनी मानसिकता को दिखता है; जहाँ बलात्कार या ‘सेक्स स्कैंडल’ होने पर बलात्कारी पुरुष की तुलना में उस महिला या बलत्कार पीड़िता को शर्मशार होना पड़ता है। फिल्म के एक दृश्य में देवी का बॉस देवी से कहता है “ सीधे-सीधे पूछते हैं देगी क्या ? बोल न , किसी से नहीं कहेंगे उसको भी तो दिया था”।
ये सीधा सपाट संवाद पुरुषों की उस लिजलिजी नज़र को दिखता है जो स्त्री को सिर्फ एक शरीर समझती है। देवी का किरदार हमारे पुरुषवादी समाज से एक सवाल करता है कि आखिर जब पुरुष अपने बल पर सभी अंदरूनी और बाहरी सुख भोगने को स्वतंत्र है तो यह आजादी स्त्रियों को क्यों और किसलिए नहीं दी जाती? क्या इच्छाएं सिर्फ पुरुषों की ही गुलाम होती हैं, स्त्रियों की नहीं? फिल्म में देवी और उसके पिता के सम्बन्ध को बहुत अच्छे से दिखया गया है। जहाँ पिता अपनी बेटी से नाराज़ होने के बावजूद उसपे अपनी जान छिड़कता है और नहीं चाहता की उसकी बेटी उसको छोड़ के कहीं चली जाए ।

इस तरह निर्देशक नीरज घेवन फिल्म में दो मुख्य कहानियों के ज़रिये दो बेहद ज़रूरी सवाल उठाते है। कहानियां एक दुसरे से अलग होने के बावजूद आपस में जुडी हुई हैं। हम देखते हैं कि फिल्म के मुख्य किरदारों की ज़िंदगी में कुछ ना कुछ ऐसा है जो मर चुका है लेकिन अभी तक मसान (श्मशान घाट) पर नहीं पहुंचा है अर्थात उनको अब तक मोक्ष नहीं मिला है और वो तड़प रहे हैं। इन किरदारों की ज़िन्दगी में अन्दर से बाहर की ओर और बाहर से अन्दर की ओर एक सफ़र है जो लगातार चल रहा है। एक तरफ परम्परागत मूल्य हैं तो दूसरी तरफ युवा मन की आकांक्षा, जो इन दकियानुस परम्पराओं को तोड़ देना चाहती है। इसका अर्थ ये नहीं है कि सारे युवा प्रगतिशील हैं। दरसल आज भी अधिकांश युवा पीढ़ी उसी दकियानुस परम्परा को अपनी संस्कृति मान के जीती आ रही है जो शोषण और असमानता पर आधारित है। भले ही बाबा साहब के प्रयासों से छुआ-छुत में थोड़ी कमी आई है। जाति व्यवस्था की जड़ें आज भी भारतीय समाज में घहरी धसी हुई है। मसान फिल्म में एक जाति की सदियों से झेल रही अमानवीय स्थिति को दर्शाया गया है . ये बताने की कोशिश की गई है कि कैसे एक जाति को चिता जलने के अमानवीय काम में लगा दिया गया ?

इस कार्य में सवर्णों को आरक्षण नहीं चाहिए? फिल्म में जब शालू , दीपक से बार बार पूछती है की तुम कहाँ रहते हो तो दीपक झल्ला के बोलता है –

“जानना है की हम कहाँ रहते हैं। आओ चलो हम तुमको दिखाते हैं की हम कहाँ रहते हैं, हरीशपुर घाट पे हम रहते हैं, पैदा भी वहीं हुए थे, लकड़ी उठाना, मुर्दा जलाना यही काम है हमारा। हम क्या हमारे बाप-भाई, चाचा सभी यही काम करते हैं। कभी किसी को जलता हुआ देखी हो क्या तुम ? देखी हो क्या ? हम साला रोज़ यही देखते हैं, रोज़ यही करते हैं, सुबह से ले के शाम तक यही करते हैं . जब साला कोई जल जाता है न तो चमड़ा जल के कंकाल बच जाता है।कंकाल को बांस से मार के खोपड़ी तोडना पड़ता है। उसकी राख को गंगा जी में घुलाना पड़ता है । ये सब देख पाओगी क्या तुम ?”

सवाल बहुत वाजिब है। हमें ये सवाल खुद से और अपने जातिवादी समाज से पूछना चाहिए कि क्या ये सब देख पाओगे तुम ? जो सदियों से एक जाति देखती और भोगती आ रही है ।

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