Ghoul - Netflix Web Series Poster

घोउल: राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रवाद का फर्क बताता भूत

‘देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है. मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा.’

– रविंद्रनाथ टैगोर

[1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था]

अरबी दास्तानो में एक राक्षस/जिन्न्न के बारे में ज़िक्र है जो इंसानो की रूह के बदले उनका कोई काम कर देता है. इस राक्षस का नाम  “Ghoul” हैं। इसी राक्षस Ghoul के नाम पर Netflix ने एक horror mini-series बनाई है जो मात्र 3 एपिसोड की है। जिसे Patrick Graham ने निर्देशित किया है। घोउल एक राक्षस है जिसे मेटाफर की तरह भी इस्तेमाल किया गया है क्योंकि इस कहानी में मौजूद ज़्यादातर इंसान राक्षस ही हैं। घोउल उनके अंदर के राक्षस से उनका और हमारा सामना कराता है और उन्हें ज़िंदा चबा जाता है “रिवेल दियर गिल्ट, इट दियर फ़्लैश”। प्रत्यक्ष् में घोउल की कहानी जितनी भूतिया और काल्पनिक नज़र आती है, परोक्ष में उतनी ही यथार्त और प्रसांगिक है। आगे बढ़ने से पहले मै बता दूँ की जिसने भी ये series नहीं देखी है वह आगे की समीक्षा न पढ़ें क्योंकि इसमें बहुत से spoilers आएँगे। ‘घोउल’ की कहानी शुरू होती है निकट भविष्य से (जो हमारा वर्तमान है) जहाँ हमारे बुरे सपने यथार्थ बन चुके हैं। किताबें पढ़ना देशद्रोह है, सवाल करना देशद्रोह है, मानवाधिकार की बात करना देशद्रोह है। हमें बताया जा रहा है कि क्या खाना है और क्या नहीं।  हम क्या देख सकते है और क्या नहीं, हम क्या बोल सकते है और क्या नहीं। क्लास रूम में जहाँ कैमरे लगे हों, लोगो को देशद्रोही बोल कर उनके घरों से उठा लिया जाता हो। राष्ट्रवाद का चरम रूप हमारे सामने है। ये ठीक जॉर्ज ऑरवेल की किताब “1984” की काल्पनिक दुनियां है। जहाँ इंसानों के सोचने तक पर प्रतिबंध है। कितबा में एक Thought Police का ज़िक्र आता है, विचार पुलिस कह सकते हैं। ऑरवेल इस संस्था की कल्पना कर रहे हैं जो हर नागरिक के मन में उभर रहे विचार को जान लेती है। नज़र रखती है। कोई भी नागरिक पार्टी के ख़िलाफ़ सोच नहीं सकता है, बोल नहीं सकता है। जगह-जगह माइक्रोफोन लगे हैं। टेलीस्क्रीन लगा है जिसके पीछे से कोई आपको देख रहा है। कोई आपको सुन रहा है। विचार पुलिस नहीं चाहती कि एक नागरिक या इंसान के तौर पर आपके भीतर किसी प्रकार की कोई भी भावना ज़िंदा रहे। हर भावनाओं पार्टी का नियंत्रण है. इस काल्पनिक दुनियां में बिग ब्रदर के राज को तीन नारों से समझा जा सकता है: युद्ध ही शांति है, आजादी ही गुलामी है और अज्ञानता ही ताकत है। ऐसे में एक राष्ट्र-भक्त मुस्लिम लड़की निदा रहीम (राधिका आप्टे) अपने प्रोफेसर अब्बू शाहनवाज़ रहीम को सिर्फ इसलिए सेना के हवाले कर देती है क्योंकि वह कुछ ऐसी किताब पढ़ रहे थे जो सरकारी निसाब में शामिल नहीं थी और लोगों को सवाल पूछने के लिए उकसाते रहते थे।

Book Cover of George Orwell’s Fiction ‘1984’

निदा रहीम को लगता है कि सेना उसके अब्बू का mind wash कर के दुबारा उन्हें “अच्छा नागरिक” बना देगी। ऐसा नागरिक जो सत्ता से सवाल नहीं करता। राष्ट्रवाद के नाम पर हर अपराध हर गुनाह को माफ़ कर देता है। इसी दौरान एक खूंखार आतंकवादी “अली सईद” (महेश बलराज) सेना द्वारा पकड़ा जाता है। सेना उसे पूछताछ के लिए ‘मेघदूत – 31’ नाम का एक एडवांस इंट्रोगेशन सेंटर ले जाती है। ये सेंटर कभी परमाणु हमले से बचने के लिए बनाया गया होता है। 

A still from the Netflix web series Ghoul

इधर निदा रहीम सेना कि एक “high level interrogation unit ” में ट्रेनिंग ले रही होती है।  निदा रहीम को उसकी ट्रेंनिग खत्म होने से पांच हफ्ते पहले ही इस सेंटर में बुला लिया जाता है। इस सेंटर में 5 कैदी और 12 स्टाफ मेंबर्स हैं। इस स्टाफ का हेड है सुनील डाकुन्हा (मानव कौल) हैं। सेंटर में पहुँचने के बाद एक इंट्रोगेटर, लक्ष्मी (रत्नाबली भट्टाचार्जी) निदा से सवाल करती है कि ‘तुम यहाँ कम्फर्टेबल तो हो न , वह क्या है कि यहाँ आने वाले सभी आतंकवादी तुम्हरे ही धर्म से हैं?” लक्ष्मी का ये सवाल भारत में ख़ुफ़िया एजेंसियों की मानसिकता को दिखता है। यूँही ये सवाल नहीं पूछा गया है। इस भावना को आम इंसानों के मस्तिषक में गढ़ा गया है। यह सच है कि मुसलमानों के कई आतंकवादी संगठन हैं। यह भी सच है कि इस आतंकवाद का कोई धर्म नही होता है। श्रीलंका में आतंकवादी हिन्दू थे, म्यांमार में बौद्ध, उत्तरपूर्व में ईसाई, पंजाब में सिख। पर आतंकवाद को एक धर्म विशेष के तौर पर पेश किया जाता है, जिसे “इस्लामिक आतंकवाद” के नाम से जाना जाता है। पहला सवाल यही है कि ये इस्लामी आतंकवाद क्या है? क्या कोई मुसलमान शराब की दुकान खोले तो उसे “इस्लामी शराब” की दुकान कहा जाएगा? जवाब है नहीं, क्योंकि शराब दोनों ही इस्लाम में हराम हैं। जब आप इस्लामी आतंकवाद कहते हैं तो दरसल आप इस झूठ को बढ़ावा दे रहे होते हैं कि इस्लाम आतंकवाद को बढ़ावा देता है। ऐसा करके आप इन कट्टरपंथियों और आतंकवादियों के हाथों को मजबूत करते हैं क्योंकि ये संगठन तो चाहते ही हैं कि उनकी हिंसा को इस्लाम सम्मत माना जाए ताकि उनकी साथ मुस्लिम नौजवान जुड़ें। उनके इस मकसद को मीडिया और सांप्रदायिक संगठनों द्वारा पाला-पोसा जा रहा है कि ‘सभी मुस्लमान आतंकवादी नहीं होते पर सभी आतंकवादी मुस्लमान हैं.’। ऐसा करते ही उनके लिए भी चीज़ें आसान हो जाती है। अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए, धार्मिक धुर्वीकरण को बढ़ावा देने के लिए, सभी को अपना एक दुश्मन मिल जाता है। अब यह माना जाता है की जब तक कोई मुसलमान “गुड” साबित नहीं होता तब तक वह “बेड” है. निदा रहमान पर भी यही दबाव है कि जब तक वह अपनी प्रतिबद्धता आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शरीक होकर, आरोपियों को प्रताड़ना देकर उन्हें मार कर साबित नहीं कर लेती तब तक वह “बेड मुस्लिम” मानी जाएगी.

‘मेघदूत – 31’ नाम का एक एडवांस इंट्रोगेशन सेंटर में मौजूद सभी इसी सोच के हैं। जिनकी नज़र में अल्पसंख्यक होना गद्दार होना है। निदा रहीम को भी यहाँ इसलिए बुलाया जाता है की उन्हें शक है कि निदा रहीम और अल सईद के बीच कोई सम्बन्ध है पर सबूत के अभाव में वह सीधे निदा को आरोपी नहीं बनाना चाहते हैं। निदा रहीम को इंट्रोगेशन सेंटर घूमते हुए ये अहसास हो जाता है कि ये सेंटर अमानवीयता कि चरम प्रकाष्ठा  है। पर उनके स्टाफ के हेड सुनील डाकुन्हा कहते हैं कि ‘यहाँ पर तुम सब सुरक्षा भी कर रहे हो और न्याय भी’ अर्थात तुम किसी को पकड़ भी सकते हो और मार भी सकते हो बिना उसका पक्ष सुने। कितनी खतरनाक कल्पना है ये जब सेना सुरक्षा के साथ न्याय भी करने लगे। नाज़ीवाद और फांसीवाद का दौर अभी बहुत पुराना नहीं हुआ जब सेना न्याय भी करती थी। लाखों यहूदियों का नरसंहार हमें याद है। अभी पिछली साल ही म्यांमार के सैनिक तानाशाहों ने रोहिंगिया मुसलमानों का नरसंहार किया था इसके बावजूद भी जब हम ये कहते हैं कि सेना के कार्यों पर सवाल नहीं किया जा सकता तो दरसल हम सेना को निरंकुश बनाने की बात कर रहे होते हैं। ये इतिहास रहा है की सेना जब भी जहाँ भी निरंकुश हुई है  वह अमानवीय बन गई है। यहाँ बात हम किसी देश विशेष: की सेना की नहीं कर रहे बल्कि एक संस्था के रूप में सेना की प्रकृति के बारे में बात कर रहे हैं । मेघदूत – ३१ में भी सेना का वही अमानवीय चेहरा नज़र आता है। यहाँ एक कैदी को तीन हफ़्तों से ज़्यादा नहीं रखा जाता, नहीं-नहीं उन्हें छोड़ा नहीं जाता बल्कि मार दिया जाता है। मेघदूत – ३१ में एक कैदी है “अहमद” जिससे सच उगलवाने के लिए उसकी बीवी बच्चों को उसके सामने गोली मार दी जाती है और इन सैनिकों को अफ़सोस नहीं है क्योंकि इनका मानना है कि मुसलमानों की नस्लें ही ख़राब है। आप ने “सोनी सूरी” के बारे में पड़ा होगा कि कैसे उनके गुप्तांगों में पत्थर ठूस दिए गए राष्ट्री सुरक्षा के नाम पर, हमने ये भी देखा है कि कैसे भारतीय माँओं ने नंगे हो कर सेना के सामने प्रदर्शन किया। कश्मीर की “आधी बेवाओं” के बारे में हम जानते हैं जिनके शौहर लापता हो गए. अभी हाल में आई ऑस्ट्रेलिया की ABC रिपोर्ट में हमने देखा कि कैसे अफगानिस्तान में ऑस्ट्रेलिया और मित्रराष्ट्रों के सैनिक आम लोगों की हत्याएं करते हैं।

घोउल की कहानी आगे बढ़ती है तो हमें पता चलता है की घोउल को निदा रहीम के अब्बू ने ही बुलाया होता हैं ताकि वह निदा को कुछ दिखा सके कुछ सीखा सके जिसे निदा राष्ट्रवादी चश्मा लगा कर न देख पा रही है और न सीख पा रही है. जैसे हैमलेट में पिता का प्रेत आता है हैमलेट को सन्देश देने, हैदर में रूह (रुहदार, इरफ़ान खान) हैदर (शहीद कपूर) को सन्देश देने तो घोउल में राक्षस (घोउल) निदा को उसके अब्बू का सन्देश देने आता है और राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रवाद के बिच फर्क को समझाता है। निदा घोउल द्वारा दिए गए सन्देश को समझती है। निदा जब राक्षस को मारने के लिए उसके सर पर बंदूक रखती है तो वह राक्षस कहता है कि मैं इंसान हूँ राक्षस नही। निदा उसकी ओर देखती है और कहती है “नही तुम राक्षस ही हो” और गोली चला देती है। निदा समझ चुकी होती है कि इस यातना शिवर में कोई इंसान नही है न कभी कोई इंसान यहाँ था। इन्होनें जो भी किया वह सिर्फ शैतान ही कर सकता है। अंत में जब निदा रहीम ‘मेघदूत – ३१’ में होने वाली गैर-क़ानूनी गतिविधियों के बारे में बताती है तो उसके सीनियर उसकी बात नहीं सुनते और कहते हैं ‘मेघदूत – ३१’  में कुछ गलत था तो वह तुम थी, फिर सवाल करते हैं निदा से “अब क्या करोगी तुम ? पुरे स्टेट से लडोगी ?”. ये सीरीज बस यहीं संकीर्ण राष्ट्रवाद पर समाप्त हो जाती है जहाँ राष्ट्रवाद जनित संकीर्णता मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा है।. यही वजह है कि टैगोर राष्ट्रवाद को पसंद नहीं करते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखते हैं –

“राष्ट्रवाद को युद्धोन्मादवर्धक एवं समाजविरोधी हैं, क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है.”

घोउल अलग-अलग तरह के डर का सामना कराता है हमसे, पर आप को महसूस होता है कि सिर्फ 3 एपिसोड में सीरीज अपनी कहानी के साथ इन्साफ नहीं करती बहुत से किरदार पूरी तरह खुल नहीं पाते, बहुत सी बातें बता कर बस आगे बढ़ गए हैं जैसे अहमद के बीवी-बच्चों का कत्ल नहीं दिखाया, निदा के अब्बू की यातना नहीं दिखाई। अभिनय की दृष्टि से सभी ने बहुत अच्छा काम किया है मानव कौल ,रत्नावली भट्टाचार्जी, महेश बलराज, राधिका आप्टे अपने-अपने किरदारों में बेहद सहज हैं। फिल्म का ट्रीटमेंट डार्क है और इसमें किसी भी तरह की अश्लीलता या फूहड़ जोक नहीं डाला गया है जैसा की डरावनी फिल्मों के साथ किया जाता है। इसमें डर दिखाने के लिए फनी ट्रिक्स और इफेक्ट्स का इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिल्म का ट्रीटमेंट पूरी तरह डार्क है जो आप के दिमाग में गहरे तक घुस जाती है। ये इस सीरीज की सबसे खास बात है। हम उम्मीद करते हैं की आने वाला सीज़न मिनी सीरीज़ का न हो ताकि कहानी में आने वाले ट्विस्ट एंड टर्न्स शुरू होते ही खत्म न हो जाएं। अंत में मैं आपको राजेश जोशी की कविता के साथ छोड़े जा रहा हूँ। इस कविता को पढ़ने से ज़्यादा समझने की कोशिश करें..

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे

कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे

बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्‍यादा सफ़ेद
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएँगे

धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर
जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे

धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफ़िर करार दिये जाएँगे

सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे

Trailer of Netflix Web Series ‘Ghoul’

1 comments On घोउल: राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रवाद का फर्क बताता भूत

  • अंधराष्ट्रवाद,युद्धोन्माद किसी भी देश के अस्तित्व के लिए अत्यंत घातक है।भारत इसी भयंकर संक्रामक जानलेवा रोग से ग्रस्त है। नाकारापन के लिए कोई सरकार से प्रश्न नही पूछेगा…. यही अंधराष्ट्रवाद है।

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