Maulana Tariq Jameel

बेहयाई, वबाएँ और हमारी सज़ा

जो शख़्स यह दावा करता है कि वबाएँ (महामारी) क़ौम की इज्तेमाई (सामूहिक) बेहयाई  के नतीजे में नाज़िल (अवतरित) होती हैं तो इस आपसी तअल्लुक़ (बेहयाई और वबा) को साबित करना भी उसी का काम है। यह नहीं हो सकता है कि सिर्फ़ एक दावा कर के हम बैठ जाएं और उस के बाद लोगों से उम्मीद रखें कि वह इस दावे को बग़ैर दलील और तर्क के सिर्फ़ इस लिए मान लें कि यह बात फलाँ आलिम ने कही है और उन से ज़्यादा कोई इल्म नहीं रखता!

इस सिलसिले में जो दलील दी जाती है वह यह है कि क़ुरआन मजीद में जगह-जगह उन क़ौमों का ज़िक्र है जो ख़ुदा की नाफ़रमानी, बुरे आमाल (कार्य) और अपनी बेहयाई की वजह से ख़ुदा के अज़ाब का शिकार हुईं, इस लिये इस में बहस की क्या गुंजाइश! यह बात सही है कि क़ुरआन मजीद की बहुत सी आयात में ख़ुदा के अज़ाब का ज़िक्र है जो अलग-अलग क़ौमों पर नाज़िल हुआ लेकिन हम इन तमाम आयात को ग़ौर से पढ़ें तो मालूम होगा कि जब भी अलग-अलग क़ौमों पर अज़ाब आया तो उस में गेहूं के साथ घुन को नहीं पीस दिया गया बल्कि नेक लोगों को बचा लिया गया और ख़ुदा को न मानने वालों को सज़ा दी गई!

मिसाल के तौर पर –

“फिर जब हमारा हुक्म आ गया तो हम ने अपनी रहमत से हज़रत हूद (अ०) और उन लोगों को जो उन के साथ ईमान लाये थे, निजात दे दी और एक सख़्त अज़ाब से उन्हें बचा लिया।”

(सूरह हूद, आयत 58)

“आख़िरकार जब हमारे फ़ैसले का वक़्त आ गया तो हम ने अपनी रहमत से हज़रत सालेह (अ०) और उन लोगों को जो उन के साथ ईमान लाये थे, बचा लिया और उस दिन की बदनामी से उन को महफ़ूज़ रखा।”

(सूरह हूद, आयत 66)

“आख़िरकार जब हमारे फ़ैसले का वक़्त आ गया तो हम ने अपनी रहमत से हज़रत शोएब (अ०) और उन के साथी मोमिनों को बचा लिया और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया था उन लोगों को एक सख़्त धमाके ने ऐसा पकड़ा कि वह अपनी बस्तियों में बेहिस-ओ-हरकत पड़े के पड़े रह गये। लगता था कि वह लोग वहां कभी रहे-बसे ही न थे।”

(सूरह हूद, आयत 94)

यह सिर्फ़ नमूने की तीन आयात हैं। पूरी सूरह हूद में यह मिसालें ख़ुदा ने पूरी तफ़सील (विस्तार) के साथ खोल कर बयान कर दी हैं और इन आयात में रत्ती बराबर भी झोल नहीं। क़ुरआन खोलिए और ख़ुद पढ़ लीजिये।

यह ख़ुदा की शान और सिफ़ात (ख़ासियत) और उस के इंसाफ़ के तरीक़ों के ही ख़िलाफ़ है कि वह अपना अज़ाब नाज़िल करे और उस में उन लोगों को भी मार डाले जो उस पर ईमान (आस्था) रखते हों और नेक काम करते हों! इसलिए जिस वबा, आफ़त, ज़लज़ले (भूकम्प) और सैलाब में नेक और गुनाहगार, मुसलमान और ग़ैर मुस्लिम बिना किसी भेद भाव के मर जाएं वह किसी सूरत में ख़ुदा का अज़ाब नहीं हो सकता क्यों कि यह बात क़ुरआन के आसमानी पैग़ाम से मेल नहीं खाती।

यहां एक चीज़ की वज़ाहत (सफ़ाई) ज़रूरी है कि ख़ुदा ने आख़िरी बार अपना अज़ाब मक्का के काफ़िरों पर नाज़िल किया जिस की ख़बर नबी (स०अ०व०) ने दी। चूंकि मोहम्मद (स०अ०व०) के साथ ही नबूवत (पैग़म्बरों का दुनिया में आना) का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो गया इस लिए अब इस दुनिया में कोई अज़ाब भी नहीं आएगा। सिर्फ़ एक बार यह अज़ाब क़यामत के दिन बरपा होगा क्योंकि यही बात क़ुरआन में बयान की गयी है।

अगर ख़ुदा हर नाफ़रमानी, बेहयाई और फ़्रॉड की सज़ा फ़ौरन अज़ाब की सूरत में इस दुनिया में ही देने लगे तो फिर क़यामत के दिन जज़ा (ईनाम) और सज़ा का बन्दोबस्त किस लिए है! फिर तो इसी दुनिया में हिसाब चुकता हो गया! जबकि हर मुसलमान यह जानता है कि गुनहगारों और नेक लोगों का फ़ैसला आख़िरत में होगा, इस दुनिया में नहीं।

क़ुरआन की साफ़-साफ़ आयात के बाद अब किसी और दलील की क़तई ज़रूरत तो रह नहीं जाती लेकिन फिर भी अगर हम मान लें कि बेहयाई और अज़ाब का आपस में कोई तअल्लुक़ (सम्बन्ध) है जैसा कि 2005 (मुज़फ़्फ़राबाद,पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के ज़लज़ले के बारे में भी उस वक़्त कहा गया था कि यह ख़ुदा का अज़ाब है, तो सवाल यह उठता है कि इस तरह के ज़लज़ले आये दिन दूसरे सय्यारों (ग्रहों) पर भी आते हैं तो वहां कौन से टीवी सिरियल्स चल रहे हैं जिन के ज़रिए बेहयाई फैलाई जा रही है!

मरीख़ (मंगल ग्रह) पर कौन से क्लब और डिस्को खुले हैं? उतारिद (बुध ग्रह) पर कौन सी औरतें खुले गले के कपड़े पहन कर घूम-फिर रही हैं? मुश्तरी (बृहस्पति ग्रह) पर कौन ‘हम जिन्स परस्ती’ (समलैंगिकता) कर रहा है? चलें इन सय्यारों से वापस ज़मीन (पाकिस्तान) पर आते हैं। ख़ुदा झूठ न बुलवाये तो साठ और सत्तर की दहाई में यहां ज़्यादा ‘बेहयाई’ थी, उस वक़्त कोई वबा क्यों नहीं फैली? 1935 में क़्वेटा जैसे शहर में ऐसा क्या ‘गुनाह’ हो रहा था कि पूरे शहर को ज़लज़ले ने मलियामेट कर दिया? और बांग्लादेश के भूखे-नंगे और ग़रीब लोग ऐसी क्या ‘बेहयाई’ करते थे कि उन पर हर साल सैलाब का अज़ाब आ जाता था?

इन तमाम बातों को छोड़ें, इस बात का फ़ैसला कौन करेगा कि अब मुल्क में बेहयाई, फ़हहाशी (अश्लीलता) और उरियानी (नंगा पन) ख़त्म हो गयी? क्या कोई जनरल ज़ियाउल हक़ बताएगा? वैसे उस ज़माने में तो बेहयाई नाम की भी नहीं थी।

माह पारा सफ़दर (पाकिस्तान की मशहूर टीवी पत्रकार) सर पर दुपट्टा ले कर ख़बरें पढ़ती थीं और ख़ालिदा रियासत (मशहूर पाकिस्तानी टीवी अदाकारा) ड्रामों में चादर ओढ़ कर सोती थीं। इस के बावजूद ओजड़ी कैम्प (10 अप्रैल 1988 में पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर के आर्मी कैम्प में एक भयानक हादसा हुआ था जिस में 103 लोग हलाक और हज़ारों ज़ख्मी हो गए थे) का हादसा हो गया। मुमकिन है कि उस दिन माह पारा सफ़दर का दुपट्टा खिसक गया हो या ख़ालिदा रियासत पलंग पर सोते वक़्त चादर लेना भूल गयी हों!

हज़रत उमर (र०अ०) के दौर-ए-ख़िलाफ़त में सीरिया, इराक़ और मिस्र के इलाक़ों में ताऊन (प्लेग) की वबा फैल गयी। एक अंदाज़े के मुताबिक़ इस महामारी में कम से कम पचीस हज़ार मुसलमान फ़ौजी इंतेक़ाल कर गये, उन में सहाबा-ए-कराम (र०अ०) भी थे। प्लेग के बाद क़हत (सूखा) भी पड़ा और यह सब हज़रत उमर (र०अ०) के ज़माने में हुआ जो ख़िलाफ़त का सब से आइडियल दौर था। अब क्या (नऊज़-ओ-बिल्लाह) हम कह सकते हैं कि उस वक़्त बेहयाई या फ़हहाशी थी जिस की वजह से प्लेग फैला और सूखा पड़ा!

हमें ख़ुदा का ख़ौफ़ करना चाहिए, क्यों हम दुनिया में अपना मज़ाक़ बनवाने पर तुले हैं! पूरी दुनिया में बायोलॉजी (जीव विज्ञान) और वायरलॉजी (विषाणु विज्ञान) में रिसर्च हो रही है और हम इस बहस में उलझे हुए हैं कि यह वबा हमारी बेहयाई (आम तौर पर जिस का इल्ज़ाम औरतों के सर मढ़ दिया जाता है) की वजह से फैली। हाँ बेहयाई की सज़ा तो हमें क़यामत के दिन ज़रूर मिलेगी अलबत्ता अपनी जहालत की सज़ा हम इसी दुनिया में ही भुगत रहे हैं।

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नोट:- यह आर्टिकल मूल रूप से पाकिस्तान के अख़बार ‘रोज़नामा जंग’ में 29 अप्रैल 2020 को छपा था जिस के लेखक यासिर पीरज़ादा साहब हैं।

मोहम्मद अलतमश, हुनरमंदों के शहर मऊ, उत्तर प्रदेश से तअल्लुक़ रखते हैं। 'एन्टी नेशनल यूनिवर्सिटी' जेएनयू से पढ़ाई की है। पहले तबलीग़, फिर कम्युनिस्टों का झण्डा उठाया और आख़िरकार पसमांदा आंदोलन की अलख जगा रहे हैं.... मतलब कि दैर-ओ-हरम से हो कर मैख़ाने आये हैं!

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