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अछूत लव जिहाद

जब मैं उम्र उस उठान पर आ गई की मैं किसी के मोह में गिरफ़्त हो जाती और घर वालों के ख़िलाफ़ धरना प्रदर्शन और उस एक व्यक्ति के लिए प्रेम प्रदर्शन करती। इस सबके होने से पहले ही मेरे लिबरल पिताश्री ने सामने बैठा कर हिदायत दे डाली ‘हमें सब मंज़ूर है बस लड़का दलित या मुस्लिम ना हो’। मैंने अपने सम्भावित प्रेमियों की फ़ेहरिस्त पर नज़र डाली और फिर पिताश्री पर। लिस्ट में सबसे ऊपर जो शख़्स था वह था पसमांदा – आ वेरी डेड्ली कॉम्बिनेशन ओफ़ रिलिजन एंड कास्ट बोथ। मेरी मुहब्बत जिहादी होने के साथ साथ अछूत भी थी ।

लव जिहाद एक ऐसा मिथ है जिससे धर्म का और धर्म के अंतर्गत आने वाले पुरुषों का गठ्ठर उस धर्म की औरतों पर डाल दिया जाता है क्योंकि इज़्ज़त का बांस महिलाओं के पीठ पर ही गाड़ा जाता है जहाँ परिवार नाम का पताका लहराता है। यह सुनिश्चत किया जाता है की आप का पेट्रीआर्की के अंतर्गत मुस्लिम पुरूषों/परिवार द्वारा उत्पीड़न ना हो परंतु अगर आपके अपने धर्म के पुरुषों/परिवार द्वारा ही आप शोषित हों तो ये चलेगा। विचार करने योग्य तथ्य यह है कि जिस देश के युवाओं को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के द्वारा सरकार चुनने योग्य माना जाता है उसी युवा द्वारा जब अपना जीवन साथी चुनने का निर्णय लिया जाता है तो सामान्यतः उसे ये निर्णय लेने लायक़ नहीं समझा जाता। एक प्रश्न ये भी है की अगर लव जिहाद मुस्लिम पुरुषों की कन्स्पिरसी है ग़ैर मुस्लिम औरतों को अपने झूठे प्रेम में फँसाने की तो ग़ैर मुस्लिम औरतों का उनकी निजी ज़िंदगी से जुड़े निर्णयों को लेने की क्षमता पर संदेह करना कहां तक उचित है? क्या अंतरजातिय विवाह पर प्रतिबंध हम औरतों के ख़िलाफ़ एक कन्स्पिरसी नहीं? अगर लव जिहाद एक षड्यंत्र है तो क्या ये जाति व्यवस्था कोई षड्यंत्र नहीं है? किसी भी सरकारी सर्वे या रिपोर्ट में लव जिहाद की सत्यता को लेकर कोई प्रमाण नहीं है (उत्तर प्रदेश की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की रिपोर्ट में भी ऐसे किसी मामले में लव जिहाद के कोई सुबूत नहीं मिले) पर जाति व्यवस्था के अंतर्गत किस प्रकार कौन सी शादी मान्य या अमान्य है ये सब हमारे धार्मिक पुस्तकों में सविस्तार लिखित है। फिर चाहे वो मनुस्मृति हो या कोई और हिन्दू-मुस्लिम की धार्मिक पुस्तक।जैसे बहिश्ते ज़ेवर या देवबंद की आधिकारिक वेबसाईट हो।

यह स्क्रीनशॉट देवबंद की आधिकारिक वेबसाईट से लिया गया है

चूँकि अब देश लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामवैधानिक ढाँचे पर चल रहा है और युवा इस नए आर्थिक सामाजिक बदलाव को स्वीकार करते हुए जब जीवन साथी के बारे में सोचते हैं तो धर्म से अधिक उस व्यक्ति के शैक्षणिक योग्यता, व्यवहार, आपसी मेल ताल इत्यादि पर ध्यान देते हैं। धार्मिक ठेकेदार अब धर्म का वास्ता देकर किसी को किसी से प्रेम करने से नहीं रोक सकते तो अपने नफ़रती कारोबार को क़ानूनी चोग़ा पहनाकर जबरन लोगों पर थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। वैसे भी कोई भी मिथ तथ्यों के अभाव में लम्बे अंतराल के बाद लोगों के दिमाग़ में विश्वास बनकर घर कर लेता है। जैसे हम मानते हैं की ब्राह्मण शाकाहारी होते हैं जबकि बंगाली ब्राह्मण के लिए मछली भात एक मुख्य आहार है।

कृष्णा कांत जी लिखते हैं :-‘लव जिहाद’ देश को उल्लू बनाने का एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है. ये ऐसा काल्पनिक जिन्न है जिसके बारे में आजतक कोई तथ्य कहीं भी मौजूद नहीं है. अगर देश भर में ​किसी एक समुदाय को दूसरे समुदाय से ऐसा बड़ा खतरा पैदा हो गया है तो उसके कोई सबूत क्यों नहीं हैं? क्या इसका मकसद सिर्फ लोगों को एक-दूसरे से डराना और आपस में लड़ाना है? फरवरी 2020 में सरकार ने लोकसभा को बताया कि भारत के मौजूदा कानून में 'लव जिहाद' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है और किसी भी केंद्रीय एजेंसी की ओर से 'लव जिहाद' का कोई मामला सूचित नहीं किया गया है. यानी जिस लव जिहाद का हल्ला सालों से मचा है, नौ महीने पहले तक सरकार की नजर में वैसा कुछ नहीं था. इस संदर्भ में जो भी मामले उठाए गए, वे या तो विशुद्ध अपराध थे या काल्पनिक थे. केरल के हादिया मामले में एनआईए तक लगा दी गई, लेकिन बाद में एजेंसी ने कहा कि लव जिहाद के कोई सबूत नहीं हैं.हाल ही में उत्तर प्रदेश के कानपुर में ‘लव जिहाद’ की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई. एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जांच में किसी तरह की साजिश या फंडिंग या सुनियोजित धर्म-परिवर्तन कराने के सबूत नहीं मिले हैं.
हालांकि, इस रिपोर्ट के तुरंत बाद यूपी ने कानून भी बना दिया है.यूपी के कानून बनाने के ठीक पहले ऐसा ही एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि दो वयस्कों को साथ रहने का अधिकार है. इसमें राज्य कोई दखल नहीं दे सकता.जिस कथित 'लव जिहाद' को लेकर देश में एक भी पुख्ता केस सामने नहीं आया हो, उसे लेकर कई राज्य कानून बना रहे हैं. साफ है कि ये धार्मिक विभाजन की एक कोशिश है जिसके तहत एक समुदाय से दूसरे समुदाय को डराया जा रहा है. यह 'बांटो और राज करो' कार्यक्रम की ही एक अगली कड़ी है.

उत्तर प्रदेश कैबिनेट द्वारा अभी हाल ही में ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 पास किया गया है जिसमें तर्क दिया जा रहा है की महिलाओं को और विशेषतः दलित/आदिवासी महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने के लिए ये क़ानून लाया जा रहा है।अब अगर आप दूसरे धर्म में शादी करते हैं तो ज़िलाधिकारी को २ महीने का नोटिस देना पड़ेगा। और बिना अनुमति शादी करने या धर्म परिवर्तन करने पर 6 महीने से लेकर 3 साल तक की सजा के साथ १० हजार का जुर्माना भी देना पड़ सकता है। यही नहीं अगर आप इस तरह की शादी नाम छिपा कर करते हैं तो इसके लिए १० साल तक की सजा का भी प्रावधान रखा गया है। और भी राज्य इस तरह के क़ानून प्रस्तावित करने की राह पर हैं पर क्या वाक़ई हमें ऐसे किसी क़ानून की ज़रूरत है? जो न्यायिक प्रशासन लोगों को खाप पंचायतों से सुरक्षा प्रदान करता था वो खुद एक खाप पंचायत बन उनके अधिकारों की हत्या में शामिल हो जाएगा ? यहां यह बात स्पष्ट करना ज़रूरी है कि अगर कोई व्यक्ति छल कपट और फेक आइडेंटिटी के माध्यम से कोई स्त्री पुरूष किसी दूसरे धर्म के स्त्री पुरूष के साथ विवाह करे और बाद में जबरदस्ती उसका धर्म परिवर्तन करा दे। इसके लिए IPC, CPC,CrPC में कई धाराएँ हैं

यह फोटो फेसबुक से लिया गया है

प्रेम की अभिव्यक्ति बहुत ही निजी मामला है और इस पर रोक लगाना किसी भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास को प्रतिबंधित करता है। इस आधार पर ये हमारे मौलिक अधिकारो का हनन ही नहीं है बल्कि ये हमारे मौलिक कर्तव्यों के विरुद्ध भी है जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की बात की गई है। यही नहीं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी धर्म विशेष के पक्ष या विपक्ष में बना कोई भी क़ानून हमारे संविधान के धर्म निरपेक्ष सिद्धांत के ख़िलाफ़ भी है। जहाँ तक बात धर्म परिवर्तन की है तो भारतीय इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिसके एक ही परिवार में अलग अलग धर्म के मानने वाले हो। जैसे कि चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुसरण करते थे, उनके पुत्र बिंदुसार आजीवक सम्प्रदाय का जबकि बिंदुसार के पुत्र सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था। अपने धर्म या सम्प्रदाय से जुड़े जनसंख्या को बनाए रखना अनुचित नहीं है परंतु औरतों को सिर्फ़ वंश बढ़ाने की मशीन समझ लेना ना केवल दक़ियानूसी विचार है वरन अमानवीय भी है। हालाँकि हम अपने गौरवशाली इतिहास का ढिंढोरा पिटते हैं गार्गी, लोपामुद्रा आदि विदुषी स्त्रियों के नाम पर लेकिन आज की औरत को इतना बुद्धु मान कर चलते हैं की उन्हें कोई गुमराह कर ले जाएगा। एक सवाल ये भी है की उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ऐसे क़ानून का क्या औचित्य है जहाँ ७१ में से ७० ज़िले में हिंदू मजॉरिटी है और मुस्लिम जनसंख्या मात्र 3.85 करोड़ (19.26%) है ।

हिंदू मुस्लिम का ये सारा माज़रा सिर्फ़ और सिर्फ़ सवर्ण और अशराफ की राजनीति है, ठीक इसी तरह लव जिहाद
का इस्तेमाल समाज में उस दबे कुचले वर्ग को प्रताड़ित करने के लिए ही किया जायेगा जिनके पास किसी तरह की राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं हासिल है फिर चाहे वो दलित बहुजन वर्ग हो या पसमाँदा। हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था आधारित शादी का प्रचलन तो सभी जानते हैं और आज तक अंतर्जाति विवाह एक सामान्य बात नहीं है। इस पर क़ानून भी बनाने की ज़रूरत नहीं है क्यूँकि समाज ऐसे शादियों पर खुद क़ानून को अपने हाथ में लेने को इज़्ज़त और शान की बात समझता है। जाति के आधार पर शादी मुस्लिम समाज में भी ज्यों की त्यों देखने को मिलती है, सैयद, शेख़ या पठान अपने घर की शादी किसी निचली जाति में नहीं करते, हालाँकि ये इस्लाम में किसी भी तरह की जाति के अस्तित्व को भी खुले तौर पर स्वीकार नहीं करते। ये अलग बात है की सवर्ण और अशराफ आपस में शादी के रिश्ते करते आए हैं, उदाहरण के लिए सुब्रमण्यम स्वामी की बेटी सुहासिनी हैदर की शादी सलमान हैदर के साथ हुई है। इस तरह उनका जातिय वरचस्व भी क़ायम रहता है और हिंदू मुस्लिम की राजनीति करके वोट बैंक भी मजबूत बना रहता है।

अब बात आती है औरतों के जीवन साथी चुनने के अधिकार की और साथ ही साथ शादी ना करने और तलाक़ लेने के अधिकार की भी। बेहतर होगा कि हम औरतों की आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में ध्यान दे जिससे वो बिना दबाव के अपने अच्छे बुरे का फ़ैसला ले सके। आदिवासी समाज को ही देख ले तो ज़्यादातर वहाँ अपना जीवन साथी चुनने की पूरी आज़ादी होती है। शायद स्वयमवर की परम्परा भी ऐसी किसी आदिवासी परंपरा से प्रेरित रही हो जिसका वर्णन हिंदू कथाओं में सुनने को मिलता है। और हमें ध्यान रखना चाहिए कि नारीवाद के विरोध में जो तबका सबसे आगे खड़ा रहा है तो वो सवर्ण पुरुष ही है जबकि बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिंदू कोड बिल के लिए ना केवल सवर्ण जाति के विरोध में खड़े रहे बल्कि बाद में उन्होंने त्यागपत्र तक दे दिया । फिर आज जब ये हिंदुत्व समर्थक औरतों के लिए इंसाफ़ की बात करते हैं तो ये खुद में हास्यास्पद सा लगता है।

और जब मैं हँस ही रही थी की पिताश्री ने कहा पहले पढ़ लो, शादी तो होती रहेगी। मैंने हँसी रोक ली और कबीर के दोहे पढ़ने लगी –
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ , पंडित भया ना कोई
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ।

अनाया तत्कालीन भारतीय राजनीतिक परिसर में फैली हिटलरशाही मूर्खता से आजीज़ आकर एक लेखक और विचारक बन पड़ी हैं। प्रोफेशनली ये मार्केटिंग फ़ील्ड में अनुभव रखती हैं सम्पर्क : [email protected]

4 comments On अछूत लव जिहाद

  • पूरे लेख कानून का तो कहीं संदर्भ नहीं एक भी लाइन नहीं ये नहीं समझाती के ये देखे इस के अनुसार आप दूसरे धर्म या समुदाय से शादी करने से रोक दिये गये हैं
    उसमें बस ये है के आप जिस भी जाति या वर्ग से हैं लड़की को पता है या नहीं पहचान बदल कर धोखा तो नही हो रहा
    जरा वो धाराएँ बतायें जिस में लिखा है के आप दूसरे वर्ग में शादी ही नहीं कर सकते
    कुछ लोग पैदा ही जहर फैलाने के लिए होते हैं और वो खुद को सेकूलर लिबरल आदि नाम से परिचय देते हैं

  • भाई ये अपना अधिकार नही चाहते हैं ये हरामखोर सिर्फ राजनीति ही कर रहे हैं दलित मुस्लिम की आवाज तो ये चुपके से उठाते हैं लेकिन ये नही कहते कि 800 साल मुगलों ने तलवारों के बल पर इनके धर्मपरिवर्तन कराए और इनकी अम्मियों ने अपने सलवार खोल दिए सभी धर्मपरिवर्तन करने वाले हिन्दुओ को मुस्लिम नही बल्कि दलित मुस्लिम बनाया गया ये वही हैं लेकिन जब ये कहते हैं कि ये दबे कुचले हैं तो खुद को मजबूत बनाने की जगह इनके लोग दूसरों की बहन बेटियों को कैसे फाँस रहे हैं मतलब कथित प्यार कर रहे हैं नाम बदलकर , इसके सारे लेखों या पोस्ट में ब्राहमणों और हिन्दुओ को कहा जाता है उनकी वजह से इनका शोषण हुआ जबकि ये अपना इतिहास टटोलने लगे तो ये चाहे ब्राहमण रहे हो या ठाकुर या बनिया ,धर्मपरिवर्तन करके मुस्लिम दलित बने घूम रहे हैं लेकिन किसी मुगल शासक जिसके इनकी अम्मी का सैकड़ों आक्रमणकरियो से बलात्कार करवाया , भिमराव जिसने इनको कोई अधिकार नही दिया , मुस्लिम राजनेता जो इनकी आवाज नही उठाते उनके खिलाफ इन्हें कुछ नही बोलना है इनको न्याय चाहिए लेकिन विरोध पिछवाड़े में बांस खोसने वाले का नही करेंगे सिर्फ उसका करेंगे जिससे कोई मतलब नही है
    बहती राजनीति में हाथ धो रहे हैं जिसका विरोध सब कर रहे हैं उसका ये भी करते हैं अपनी अप्पी के साथ सोने वाले ये अप्पीचोद , ब्राहमणों ने ये लिखा वो लिखा इनको मादरचोद को को संस्कृत या तमिल आती नही है जब वो सब लिखा गया तो इनका लोगों की हत्या करने वाला मजहब पेदा ही नही हुआ था लेकिन इनके खिलाफ उसमे लिखा है

  • इनको अपने समाज और लोगों को अधिकार नही दिलाना है पहले दूसरों की बहन बेटियों को फर्जी तरीके से फांसकर धर्मपरिवर्तन करना है ,अगर लड़की तुमसे प्यार करती है तो 1 महीने पहले DM को जानकारी क्यो नही दी जाए ?? क्या वो 1 महीने बाद तुमसे प्यार नही करेगी क्या ?? हरामखोर
    इसमें महिलाओं का अपमान नही है जिसका अपहरण किया जाता है जबरन निकाह किया जाता है
    उसमे तुम्हारी बेटियाँ भी हैं जिन्हें सवर्ण मुस्लिम अगवा कर लेते हैं उन्हें बचाया जा सकेगा
    अगर लड़की तुमसे प्यार ही करती है जैसे तुम कथित तौर पर बता रहे हो तो तुम्हे निकाह से कौन रोक सकता है ?
    तुम्हें महिलाओं को नही बचाना है तुम्हारी रगों में मुस्लिम सवर्णों का खून दौड़ता है उन्होंने तुम्हारी अम्मी का रेप किया तो कुछ तो असर होगा ही तुम भी उन्ही की तरह सोचते हो काफ़िर औरतों का रेप ,धर्मपरिवर्तन , उन्हें खेती समझो उन्हें बेंचो

  • Those who close their eyes would never see.
    The UP SIT report which found no organised consipiracy, found criminality in 11 out 14 cases it probed involving not only fraud but repeated rapes even of minor hindu girls, it only probed 14 cases in the Juhi colony, not of all the U.P. or of the whole country. Even if it is not organised there is clearly a pattern involving men from a particular community and NOT vice versa

    Make this clear, a person may choose anyone as his/her life partner, Love Jihad is when a man DUPES a girl of other religion and then pressurizes her to convert for marriage, this DUPING may involve hiding the original identity initially or targeting a girl just because her religion to teach them a lesson or showing his superiority and having no love at all, actually not out of love but out of hate for her religion targeting the girl, and mind you no organised network is required,

    There was opposition to the hindu laws reforms and codification, there will always be, when some reform comes, not surprising that some people oppose it, just to suit your argument you use it to discredit those calling for refoms for muslim, as if you personally know these are those very people, anyways that is not the issue. Triple talaq was criminalized, the measure would help some if not all. When someone calls for reform you cry their motives, and when someone exploits girls motives does not count for you, its just another crime. Very conveniently when it suits the narrative.

    Islasmists and their sympathsizers should be last persons to talk about Kabir or his prem.
    For finding out how much hate you have against whom you are trying to set narrative. Please ponder Kabir’s :
    Bura jo dekhan main chala bura no milaya koe
    Jo dekha dil apna mujhse bura no koe.
    Kabira kahda bazar mein sabki mange khair
    No kaho se dosti no kaho se ber

    This hate is your bread and butter for body and soul.

    Nothing for love jihad victims or hindu boys who get killed for friendship with muslim girls, as it just do not suits the narrative.

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