आधुनिक समाज, अकेलापन और खुशी की असली परिभाषा...
Posted by Arif Aziz | May 17, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
मई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी...
Posted by Arif Aziz | May 12, 2026 | Casteism, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
वाइस: अफगनिस्तान और ईराक को तबाह करने वाले डिक चेन...
Posted by Arif Aziz | May 10, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
लायन ऑफ द डेजर्ट: सिनेमा के पर्दे पर प्रतिरोध और उ...
Posted by Arif Aziz | May 2, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
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Popularपुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास
by Abdullah Mansoor | May 1, 2024 | Book Review | 0 |
मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।
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राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका: चुनौतियाँ और समाधान
by Abdullah Mansoor | Sep 7, 2024 | Education and Empowerment | 0 |
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मुस्लिम समाज की जाति व्यवस्था: आखिर कितनी कठोर?
by Arif Aziz | Jul 14, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
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क्यों नींद का त्याग कर्मठता नहीं, अज्ञानता है
by Arif Aziz | Jul 9, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
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Top Ratedफिल्म जो जो रैबिट: नाज़ी प्रोपेगेंडा की ताकत और बाल मनोविज्ञान
by Abdullah Mansoor | Jul 17, 2024 | Movie Review, Reviews | 0 |
जोजो रैबिट (Roman Griffin Davis) 10 साल का एक लड़का है। यह तानाशाह के शासनकाल (Totalitarian regime) में पैदा हुआ है। इसलिए जोजो के लिए स्वतंत्रता, समानता, अधिकार जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते क्योंकि उसने कभी इन शब्दों का अनुभव ही नहीं किया है। जोजो सरकार द्वारा स्थापित हर झूठ को सत्य मानता है। सरकार न सिर्फ डंडे के ज़ोर से अपनी बात मनवाती है बल्कि वह व्यक्तियों के विचारों के परिवर्तन से भी अपने आदेशों का पालन करना सिखाती है। आदेशों को मानने का प्रशिक्षण स्कूलों से दिया जाता है। स्कूल किसी भी विचारधारा को फैलाने के सबसे बड़े माध्यम हैं। हिटलर ने स्कूल के पाठ्यक्रम को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलवा दिया था। वह बच्चों के सैन्य प्रशिक्षण के पक्ष में था, इसके लिए वह बच्चों और युवाओं का कैंप लगवाता था। जर्मन सेना की किसी भी कार्रवाई पर सवाल करना देशद्रोह था। सेना का महिमामंडन किया जाता था ताकि जर्मन सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचार किसी को दिखाई न दे। बच्चों के अंदर अंधराष्ट्रवाद को फैलाया जाता था। इसी तरह जोजो भी खुद को हिटलर का सबसे वफादार सिपाही बनाना चाहता है
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Prophet Muhammad: A Life of Leadership and Teaching
by Azeem Ahmed | Oct 6, 2024 | Biography | 0 |
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मुस्लिम समाज की जाति व्यवस्था: आखिर कितनी कठोर?
by Arif Aziz | Jul 14, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
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Latestमुस्लिम समाज की जाति व्यवस्था: आखिर कितनी कठोर?
by Arif Aziz | Jul 14, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा आंदोलन भारतीय मूल के पिछड़े और दलित मुसलमानों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का आंदोलन है। इसका उद्देश्य उन्हें लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व के प्रति जागरूक करना है। यह आंदोलन सामाजिक बहिष्कार और वर्चस्व की राजनीति के विरुद्ध समान अवसर, न्याय और आत्मसम्मान की आवाज़ बुलंद करता है, ताकि पसमांदा समाज मुख्यधारा में अपनी उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सके।
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क्यों नींद का त्याग कर्मठता नहीं, अज्ञानता है
by Arif Aziz | Jul 9, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
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आधुनिक समाज, अकेलापन और खुशी की असली परिभाषा
by Arif Aziz | May 17, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
मुस्लिम समाज की जाति व्यवस्था: आखिर कितनी कठोर?
by Arif Aziz | Jul 14, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा आंदोलन भारतीय मूल के पिछड़े और दलित मुसलमानों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का आंदोलन है। इसका उद्देश्य उन्हें लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व के प्रति जागरूक करना है। यह आंदोलन सामाजिक बहिष्कार और वर्चस्व की राजनीति के विरुद्ध समान अवसर, न्याय और आत्मसम्मान की आवाज़ बुलंद करता है, ताकि पसमांदा समाज मुख्यधारा में अपनी उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सके।
Read Moreक्यों नींद का त्याग कर्मठता नहीं, अज्ञानता है
by Arif Aziz | Jul 9, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
यह लेख आधुनिक समाज में कम नींद को मेहनत का प्रतीक मानने वाली सोच पर सवाल उठाता है। लेखक अपने अनुभव और आधुनिक स्लीप साइंस के आधार पर बताते हैं कि पर्याप्त नींद मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की अनिवार्य शर्त है। शिक्षा व्यवस्था और जीवनशैली में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए वे कहते हैं कि सफलता नींद की बलि देकर नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों के साथ तालमेल बिठाकर ही हासिल की जा सकती है।
Read Moreडिजिटल बनाम ज़मीन: क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भी अगली ‘आप’ बनेगी?
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का उभार केवल एक डिजिटल मज़ाक नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर बढ़ते असंतोष, बेरोज़गारी और संस्थागत उपेक्षा का प्रतीक है। जंतर-मंतर पर सीमित भीड़ ने इसकी संगठनात्मक कमजोरी उजागर की, लेकिन इसके पीछे मौजूद आक्रोश को नकारा नहीं जा सकता। यह घटनाक्रम बताता है कि सोशल मीडिया की ताकत और ज़मीनी राजनीति के बीच बड़ा अंतर है, फिर भी युवाओं की आकांक्षाओं और सामाजिक न्याय की मांगों को गंभीरता से समझना आवश्यक है।
Read Moreआधुनिक समाज, अकेलापन और खुशी की असली परिभाषा
by Arif Aziz | May 17, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
यह लेख दो फिल्मों — Into the Wild और Perfect Days — के जरिए खुशी, अकेलेपन और आत्म-खोज की गहरी पड़ताल करता है। एक ओर क्रिस्टोफर है, जो समाज से दूर प्रकृति में सच्ची आज़ादी तलाशता है, तो दूसरी ओर हिरायामा है, जो रोज़मर्रा की साधारण जिंदगी में सुकून ढूंढ़ लेता है। लेख बताता है कि असली खुशी किसी दूर मंज़िल में नहीं, बल्कि रिश्तों, छोटे पलों और वर्तमान को स्वीकार करने में छिपी होती है।
Read Moreमई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी
by Arif Aziz | May 12, 2026 | Casteism, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
मई दिवस के संघर्ष से लेकर आज के भारत तक, मजदूरों की लड़ाई सिर्फ मजदूरी की नहीं बल्कि इज्जत, बराबरी और पहचान की भी रही है। यह लेख खास तौर पर पसमांदा मजदूरों की उस अनदेखी दुनिया को सामने लाता है, जहाँ जाति, पेशा और गरीबी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने हुनर खत्म हो रहे हैं, लेकिन नए मौके अब भी इन तबकों की पहुँच से दूर हैं।
Read Moreवाइस: अफगनिस्तान और ईराक को तबाह करने वाले डिक चेनी की कहानी
by Arif Aziz | May 10, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
फिल्म *Vice* के बहाने यह लेख सत्ता, युद्ध और कॉर्पोरेट गठजोड़ की भयावह सच्चाई को उजागर करता है। डिक चेनी के किरदार के जरिए दिखाया गया है कि कैसे डर, मीडिया और राजनीति का इस्तेमाल कर युद्धों को मुनाफे के कारोबार में बदला गया। यह सिर्फ एक फिल्म समीक्षा नहीं, बल्कि लोकतंत्र, जनमत और हथियार उद्योग के खतरनाक गठबंधन पर गहरी वैचारिक पड़ताल है।
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