ए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया औ...
Posted by Arif Aziz | Mar 19, 2026 | Geo Politics, Movie Review, Political | 0 |
मध्य-पूर्व की राजनीति और पाकिस्तान का खेल...
Posted by Arif Aziz | Mar 16, 2026 | Culture and Heritage, Geo Politics | 0 |
थर्ड टेंपल और ग्रेटर इज़राइल...
Posted by Arif Aziz | Mar 11, 2026 | Geo Politics, Political | 0 |
क्या पितृसत्ता ने मर्दों से उनका सुकून छीन लिया है...
Posted by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Lega...
Posted by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Geo Politics | 0 |
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Popularपुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास
by Abdullah Mansoor | May 1, 2024 | Book Review | 0 |
मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।
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राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका: चुनौतियाँ और समाधान
by Abdullah Mansoor | Sep 7, 2024 | Education and Empowerment | 0 |
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पमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
by Arif Aziz | Apr 2, 2026 | Book Review, Culture and Heritage | 0 |
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ईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश
by Arif Aziz | Mar 24, 2026 | Geo Politics | 0 |
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Top Ratedफिल्म जो जो रैबिट: नाज़ी प्रोपेगेंडा की ताकत और बाल मनोविज्ञान
by Abdullah Mansoor | Jul 17, 2024 | Movie Review, Reviews | 0 |
जोजो रैबिट (Roman Griffin Davis) 10 साल का एक लड़का है। यह तानाशाह के शासनकाल (Totalitarian regime) में पैदा हुआ है। इसलिए जोजो के लिए स्वतंत्रता, समानता, अधिकार जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते क्योंकि उसने कभी इन शब्दों का अनुभव ही नहीं किया है। जोजो सरकार द्वारा स्थापित हर झूठ को सत्य मानता है। सरकार न सिर्फ डंडे के ज़ोर से अपनी बात मनवाती है बल्कि वह व्यक्तियों के विचारों के परिवर्तन से भी अपने आदेशों का पालन करना सिखाती है। आदेशों को मानने का प्रशिक्षण स्कूलों से दिया जाता है। स्कूल किसी भी विचारधारा को फैलाने के सबसे बड़े माध्यम हैं। हिटलर ने स्कूल के पाठ्यक्रम को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलवा दिया था। वह बच्चों के सैन्य प्रशिक्षण के पक्ष में था, इसके लिए वह बच्चों और युवाओं का कैंप लगवाता था। जर्मन सेना की किसी भी कार्रवाई पर सवाल करना देशद्रोह था। सेना का महिमामंडन किया जाता था ताकि जर्मन सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचार किसी को दिखाई न दे। बच्चों के अंदर अंधराष्ट्रवाद को फैलाया जाता था। इसी तरह जोजो भी खुद को हिटलर का सबसे वफादार सिपाही बनाना चाहता है
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Prophet Muhammad: A Life of Leadership and Teaching
by Azeem Ahmed | Oct 6, 2024 | Biography | 0 |
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पमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
by Arif Aziz | Apr 2, 2026 | Book Review, Culture and Heritage | 0 |
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Latestपमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
by Arif Aziz | Apr 2, 2026 | Book Review, Culture and Heritage | 0 |
डा० अयुब राईन की पुस्तक ‘पमरिया’ भारतीय लोक-संस्कृति के उस अनदेखे पक्ष को सामने लाती है, जहाँ मजहबी सीमाओं से परे साझा विरासत जीवित है। पमरिया समुदाय इस सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत उदाहरण है।
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ईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश
by Arif Aziz | Mar 24, 2026 | Geo Politics | 0 |
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ए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और अमेरिकी नैरेटिव
by Arif Aziz | Mar 19, 2026 | Geo Politics, Movie Review, Political | 0 |
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मध्य-पूर्व की राजनीति और पाकिस्तान का खेल
by Arif Aziz | Mar 16, 2026 | Culture and Heritage, Geo Politics | 0 |
पमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
by Arif Aziz | Apr 2, 2026 | Book Review, Culture and Heritage | 0 |
डा० अयुब राईन की पुस्तक ‘पमरिया’ भारतीय लोक-संस्कृति के उस अनदेखे पक्ष को सामने लाती है, जहाँ मजहबी सीमाओं से परे साझा विरासत जीवित है। पमरिया समुदाय इस सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत उदाहरण है।
Read Moreईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश
by Arif Aziz | Mar 24, 2026 | Geo Politics | 0 |
2026 में ईरान–इजराइल–अमेरिका तनाव केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि धर्म, सत्ता और नैरेटिव का जटिल गठजोड़ बन चुका है। आधुनिक हथियारों के बावजूद संघर्ष को “प्रकाश बनाम अंधकार” या ‘अर्मागेडन’ जैसी धार्मिक अवधारणाओं में ढाला जा रहा है। यह खतरनाक प्रवृत्ति युद्ध को नैतिक वैधता देती है, जहाँ मानवाधिकार पीछे छूट जाते हैं और विनाश को ‘पवित्र’ बना दिया जाता है।
Read Moreए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और अमेरिकी नैरेटिव
by Arif Aziz | Mar 19, 2026 | Geo Politics, Movie Review, Political | 0 |
कैथरीन बिगेलो की A House of Dynamite एक रोमांचक थ्रिलर होते हुए भी गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी फिल्म है। यह तकनीकी सटीकता और ‘रियल टाइम’ तनाव के जरिए दर्शक को बांधती है, लेकिन साथ ही अमेरिकी सुरक्षा नैरेटिव को वैध ठहराने का सूक्ष्म प्रयास करती है। फिल्म डर को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है, जिससे युद्ध और आक्रामकता को नैतिक ठहराया जाता है, यही इसे महज सिनेमा नहीं बल्कि एक विचारधारात्मक बयान बनाता है।
Read Moreमध्य-पूर्व की राजनीति और पाकिस्तान का खेल
by Arif Aziz | Mar 16, 2026 | Culture and Heritage, Geo Politics | 0 |
मध्य-पूर्व की राजनीति अक्सर “मुस्लिम उम्मत” के नारों में लिपटी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत में यह राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और सत्ता की कठोर राजनीति से संचालित होती है। खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था, पश्चिमी ताकतों पर उनकी निर्भरता और पाकिस्तान की “सैन्य सेवा” वाली भूमिका इसी यथार्थ को उजागर करती है। अगर पाकिस्तान ईरान के खिलाफ किसी युद्ध में उतरता है, तो यह केवल दो देशों का टकराव नहीं होगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को झकझोर सकता है।
Read Moreथर्ड टेंपल और ग्रेटर इज़राइल
by Arif Aziz | Mar 11, 2026 | Geo Politics, Political | 0 |
इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष केवल भू-राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि धार्मिक विचारधाराओं से भी प्रभावित है। क्रिश्चियन जायनिज्म, खासकर अमेरिका और यूरोप के कुछ इवेंजेलिकल ईसाइयों में प्रचलित, इज़राइल के अस्तित्व और विस्तार को बाइबिल की भविष्यवाणियों से जोड़कर देखता है। “ग्रेटर इज़राइल”, “थर्ड टेंपल” और मसीह के पुनरागमन जैसी अवधारणाएँ इस सोच का हिस्सा हैं, जिसने पश्चिमी राजनीति और मध्य-पूर्व की जटिल बहसों को गहराई से प्रभावित किया है।
Read Moreक्या पितृसत्ता ने मर्दों से उनका सुकून छीन लिया है?
by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
हर साल 8 मार्च को महिला अधिकारों पर बहस होती है, लेकिन इस चर्चा में एक सच अक्सर छूट जाता है—पितृसत्ता सिर्फ औरतों को ही नहीं, मर्दों को भी कैद करती है। बचपन से ही लड़कों को सख्त और निडर बनने की सीख दी जाती है, जिससे उनकी भावनाएँ दब जाती हैं। यह व्यवस्था उन्हें ताकत का भ्रम तो देती है, मगर बदले में उनसे उनकी संवेदनशीलता, सुकून और इंसानियत छीन लेती है।
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