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पुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास

मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।

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लापता हमारी कहानियाँ

किरण राव द्वारा निर्देशित "लापता लेडीज़" महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण भारत में महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले असंख्य सामाजिक मुद्दों के विषयों पर आधारित है। फिल्म की कहानी दो युवा दुल्हनों के इर्द-गिर्द घूमती है जो ट्रेन यात्रा के दौरान रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती हैं, जिससे घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है जो महिलाओं के दैनिक जीवन में आने वाली जटिलताओं और चुनौतियों को उजागर करती है। लापता दुल्हनों की खोज के माध्यम से, कहानी ग्रामीण समाज की जटिल गतिशीलता को उजागर करती है, महिलाओं की लचीलापन और ताकत को उजागर करती है क्योंकि वे विभिन्न सामाजिक दबावों और बाधाओं से गुजरती हैं। यह मार्मिक अन्वेषण पारंपरिक रूप से पितृसत्तात्मक सेटिंग्स में लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए चल रहे संघर्ष पर प्रकाश डालता है।

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सामाजिक  अस्पृश्यता और बहिष्करण से लड़ती मुस्लिम हलालखोर जाति

'हलालखोर' यानी हलाल का खाने वाला, यह सिर्फ एक अलंकार नहीं है बल्कि मुस्लिम समाज में मौजूद एक जाति का नाम है। जिनका पेशा नालों, सड़कों की सफाई करना, मल-मूत्र की सफाई करना, बाजा बजाना, और सूप बनाना है। हलालखोर जाति के अधिकतर व्यक्ति मुस्लिम समाज के सुन्नी संप्रदाय के मानने वाले हैं। यह लोग अपनी मेहनत द्वारा कमाई गई रोटी के कारण हलालखोर कहलाए होंगे। वहीं, कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि धर्म परिवर्तन के बाद जब इस जाति ने सूअर का गोश्त खाना छोड़ दिया तो इस जाति को हलालखोर के नाम से जाना जाने लगा।

सामाजिक  अस्पृश्यता और बहिष्करण से लड़ती मुस्लिम हलालखोर जाति

‘हलालखोर’ यानी हलाल का खाने वाला, यह सिर्फ एक अलंकार नहीं है बल्कि मुस्लिम समाज में मौजूद एक जाति का नाम है। जिनका पेशा नालों, सड़कों की सफाई करना, मल-मूत्र की सफाई करना, बाजा बजाना, और सूप बनाना है। हलालखोर जाति के अधिकतर व्यक्ति मुस्लिम समाज के सुन्नी संप्रदाय के मानने वाले हैं। यह लोग अपनी मेहनत द्वारा कमाई गई रोटी के कारण हलालखोर कहलाए होंगे। वहीं, कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि धर्म परिवर्तन के बाद जब इस जाति ने सूअर का गोश्त खाना छोड़ दिया तो इस जाति को हलालखोर के नाम से जाना जाने लगा।

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पर्वत और समुद्र के बीच:घुमक्कड़ी की आज़ादी

हम भी खुद को अपने शरीर की आज़ादी से जुड़ी पहचान तक सीमित कर लेते हैं। शरीर को सजाना, सँवारना, कपड़े पहनाना, उतारना मात्र ही आज़ादी है, तो हम कहीं न कहीं अपने शरीर का ऑब्जेक्टिफ़िकेशन करने में खुद ही लगे हुए हैं, और यही तो पुरुष समाज चाहता है। अगर हम सेक्स को लेकर खुलेपन पर बात करते हैं, तो भी हम नारी सशक्तिकरण की कोई लड़ाई नहीं जीत रहे जब तक कि हम लड़कियों को भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर सुरक्षित नहीं कर लेते। सेक्स करने की आज़ादी से पहले अगर आप अपने पार्टनर का कुल-गोत्र ढूँढ रहे हैं, तो शायद आप पहले ही मानसिक ग़ुलाम और (जाने या अनजाने) जातिवादी हैं। सेक्स और शरीर से जुड़ी आज़ादी ज़रूरी है क्योंकि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के अंतर्गत हम औरतों के शरीर को एक इंसान के स्तर पर न देखकर पुरुष की संपत्ति के तौर पर देखते हैं। औरत के शरीर पर जाति व परिवार की इज्जत को थोप दिया है और इस तरह औरत की पूरी पहचान उसके शरीर पर ही केंद्रित होकर रह जाती है। लेकिन क्या समस्या-स्थल से पलायन कर जाना आज़ादी है? क्या कहीं दूर किसी आज़ाद जगह पर बस जाना आज़ादी है? उनका क्या जो दूर नहीं जाना चाहते, क्या आज़ादी उनकी है ही नहीं?

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दलित-दलित एक समान हिन्दू हो या मुसलमान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 341 वर्तमान में दलित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) के लाभ प्राप्त करने की अनुमति नहीं देता है। इसमें केवल हिंदू, सिख और बौद्ध दलित शामिल हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अस्पृश्यता केवल हिंदू धर्म में ही मौजूद है। हालाँकि, साक्ष्य बताते हैं कि दलित मुसलमानों और ईसाइयों को भी इसी तरह के भेदभाव और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें एससी श्रेणी में शामिल करने से उन्हें महत्वपूर्ण सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक सहायता मिलेगी। अनुच्छेद 341 में संशोधन का उद्देश्य सभी दलितों के लिए समानता और न्याय सुनिश्चित करना है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, उनके संघर्षों को मान्यता देकर और उन्हें समान कानूनी अधिकार देकर।

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लापता हमारी कहानियाँ

किरण राव द्वारा निर्देशित “लापता लेडीज़” महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण भारत में महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले असंख्य सामाजिक मुद्दों के विषयों पर आधारित है। फिल्म की कहानी दो युवा दुल्हनों के इर्द-गिर्द घूमती है जो ट्रेन यात्रा के दौरान रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती हैं, जिससे घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है जो महिलाओं के दैनिक जीवन में आने वाली जटिलताओं और चुनौतियों को उजागर करती है। लापता दुल्हनों की खोज के माध्यम से, कहानी ग्रामीण समाज की जटिल गतिशीलता को उजागर करती है, महिलाओं की लचीलापन और ताकत को उजागर करती है क्योंकि वे विभिन्न सामाजिक दबावों और बाधाओं से गुजरती हैं। यह मार्मिक अन्वेषण पारंपरिक रूप से पितृसत्तात्मक सेटिंग्स में लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए चल रहे संघर्ष पर प्रकाश डालता है।

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ज़ातत-पात (जातिवाद) की जड़ें

मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) पिछड़ी बिरादरियों को शिक्षा का अधिकार दिए जाने कि बात दूर की है. धार्मिक दृष्टिकोण से सभी मुसलमानों को बराबर नहीं समझा गया. इस का एक उदाहरण मौलाना अशरफ़ अली थानवी (र०अ०) की किताब ‘अशरफ़-उल-जवाब’ में मिलता है. उस के अन्दर है कि-

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