Category: Social Justice and Activism

खिलाफत आंदोलन का पसमांदा विश्लेषण

खिलाफत आंदोलन ने भारतीय मुस्लिम राजनीति की दिशा को गहराई से प्रभावित किया और धार्मिक भावनाओं को सियासत के केंद्र में ला दिया। इस लेख के अनुसार, इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा समाज को हुआ, जिसे उसके वास्तविक सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से हटाकर धार्मिक नारों की राजनीति में उलझाया गया। हिजरत और मोपला विद्रोह जैसी घटनाओं के बाद पसमांदा नेताओं ने अशराफ़-प्रधान राजनीति का विरोध करते हुए सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और साझा भारत की वकालत की।

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मई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी

मई दिवस के संघर्ष से लेकर आज के भारत तक, मजदूरों की लड़ाई सिर्फ मजदूरी की नहीं बल्कि इज्जत, बराबरी और पहचान की भी रही है। यह लेख खास तौर पर पसमांदा मजदूरों की उस अनदेखी दुनिया को सामने लाता है, जहाँ जाति, पेशा और गरीबी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने हुनर खत्म हो रहे हैं, लेकिन नए मौके अब भी इन तबकों की पहुँच से दूर हैं।

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‘प्राउड आर ®’विवाद: एसी कमरों का ‘छद्म फेमिनिज्म’

सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर दिविजा भसीन द्वारा शुरू किया गया “#ProudRandi” ट्रेंड एक खतरनाक डिजिटल भ्रम साबित हुआ। अपमानजनक शब्द “रंडी” को ‘रिक्लेम’ करने के नाम पर नाबालिग लड़कियों तक को अश्लील, वयस्क और शोषक भाषा अपनाने के लिए प्रेरित किया गया, जिससे POCSO तक के मामले दर्ज हुए। यह आंदोलन फेमिनिज्म नहीं, बल्कि रेज-बेटिंग और वायरलिटी का खेल था। इसने देह-व्यापार और जातिगत शोषण झेल रही हाशिए की महिलाओं के दर्द का मज़ाक बनाया। असली नारीवाद सम्मान, बराबरी और सामाजिक बदलाव की बात करता है—न कि गालियों को ‘सशक्तिकरण’ बनाकर बच्चों को यौनिककरण की ओर धकेलने की।

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बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?

भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।

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डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका

यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।

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बिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ‘पसमांदा’ दावेदारी तक

**सारांश (100 शब्दों में):**
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पसमांदा समाज अब मात्र ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का ‘गेम चेंजर’ बन चुका है। इस आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पहले मोमिन कॉन्फ्रेंस और अब्दुल कय्यूम अंसारी के राष्ट्रवादी संघर्ष में हैं। आज पसमांदा राजनीति रोजगार, शिक्षा और सम्मान की हिस्सेदारी पर केंद्रित है। मंडल युग से उभरी यह चेतना अब भाजपा, जदयू और महागठबंधन सभी को प्रभावित कर रही है। बिहार के 72% मुस्लिम पसमांदा हैं और उनकी नई पीढ़ी अशराफ वर्चस्व को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।

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ज़ोहरान ममदानी: समाजवाद की नई व्याख्या

अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि न्यूयॉर्क के नए मेयर ज़ोहरान ममदानी की जीत अमेरिकी राजनीति में समानता और प्रतिस्पर्धा के नए संतुलन का प्रतीक है। उनका “डेमोक्रेटिक सोशलिज़्म” ऐसा मॉडल पेश करता है जो बाजार की दक्षता को बनाए रखते हुए नागरिकों को राहत और समान अवसर देता है। वे किराया नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन और चाइल्डकेयर जैसी नीतियों को तकनीकी सुधारों और जवाबदेही से जोड़ते हैं। प्रवासी अनुभव से उपजे ममदानी का समाजवाद आर्थिक असमानता मिटाकर नस्ल और धर्म के भेद खत्म करने की कोशिश है—एक ऐसा लोकतांत्रिक समाजवाद जो करुणा और कुशलता, दोनों को साथ लेकर चलता है।

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अशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’: पसमांदा यथार्थ की कहानियाँ

सुहैल वहीद द्वारा संपादित ‘तश्तरी’ उर्दू साहित्य में पसमांदा समाज की आवाज़ को सामने लाने वाला ऐतिहासिक संग्रह है। यह पुस्तक मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और उर्दू साहित्य की चुप्पी को चुनौती देती है। अब्दुल्लाह मंसूर बताते हैं कि प्रगतिशील और अशराफ़ लेखक अपने वर्गीय हितों के कारण इस अन्याय पर मौन रहे। ‘तश्तरी’ उन कहानियों का संग्रह है जो इस मौन को तोड़ती हैं, मुस्लिम समाज के भीतर छुआछूत और सामाजिक पाखंड को उजागर करती हैं। यह किताब पसमांदा साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और आत्मसम्मान की लड़ाई का प्रतीक बनती है।

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