Category: Movie Review
Rick and Morty: एक दार्शनिक-वैज्ञानिक व्यंग्य...
Posted by Arif Aziz | Apr 25, 2026 | Movie Review | 0 |
सद्दाम के साये से अमेरिका की आमद तक: टर्टल्स कैन ...
Posted by Arif Aziz | Apr 19, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
तेहरान: सिनेमा के परदे पर कूटनीति और नैरेटिव का खे...
Posted by Arif Aziz | Apr 4, 2026 | Geo Politics, Movie Review | 0 |
ए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया औ...
Posted by Arif Aziz | Mar 19, 2026 | Geo Politics, Movie Review, Political | 0 |
स्वभाव से हत्यारा नहीं होते इंसान...
Posted by Arif Aziz | Feb 5, 2026 | Culture and Heritage, Movie Review, Political | 0 |
लायन ऑफ द डेजर्ट: सिनेमा के पर्दे पर प्रतिरोध और उसूलों की अमर दास्तान
by Arif Aziz | May 2, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
*लायन ऑफ द डेजर्ट* (1981) प्रतिरोध, उसूल और इंसानी गरिमा की अदम्य दास्तान है। मुस्तफा अक्काद की यह फिल्म उमर मुख्तार के संघर्ष के जरिए दिखाती है कि जब एक कौम आज़ादी ठान ले, तो साम्राज्यवादी ताकतें भी उसे झुका नहीं सकतीं। सादगी, यथार्थ और गहरे भावों से सजी यह कृति बताती है कि असली जीत हथियारों से नहीं, बल्कि अडिग इरादों और इंसाफ के जज़्बे से हासिल होती है।
Read MoreRick and Morty: एक दार्शनिक-वैज्ञानिक व्यंग्य
by Arif Aziz | Apr 25, 2026 | Movie Review | 0 |
‘Rick and Morty’ केवल एक एनीमेशन नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन के संगम पर खड़ा गहरा विमर्श है। यह सीरीज़ शून्यवाद, अस्तित्ववाद और मानवीय अर्थ की खोज को चुनौती देती है, जहाँ रिक सांचेज़ का दृष्टिकोण ब्रह्मांड की निरर्थकता को उजागर करता है, जबकि मोर्टी जीवन के छोटे-छोटे पलों में अर्थ तलाशता है। अंततः, यह कहानी बताती है कि अर्थ हमें दिया नहीं जाता—हमें उसे स्वयं गढ़ना होता है।
Read Moreसद्दाम के साये से अमेरिका की आमद तक: टर्टल्स कैन फ्लाई और कुर्द बच्चों की दास्तान
by Arif Aziz | Apr 19, 2026 | Movie Review, Reviews | 0 |
फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ के जरिए युद्ध की भयावह सच्चाई और उसके सबसे निर्दयी शिकार—बच्चों—की त्रासदी को बेहद मार्मिक ढंग से सामने लाता है। बहमन घोबादी की संवेदनशील प्रस्तुति दिखाती है कि कैसे बारूदी सुरंगों, हिंसा और असुरक्षा के बीच पलते ये बच्चे बचपन से पहले ही बड़े हो जाते हैं। सैटेलाइट, अग्रिन और हेंगोव जैसे किरदार उम्मीद, पीड़ा और टूटे भ्रम का प्रतीक बनकर उभरते हैं, जो अंततः यह सवाल छोड़ जाते हैं कि क्या किसी भी युद्ध की जीत इंसानियत की इस हार से बड़ी हो सकती है।
Read Moreतेहरान: सिनेमा के परदे पर कूटनीति और नैरेटिव का खेल
by Arif Aziz | Apr 4, 2026 | Geo Politics, Movie Review | 0 |
फिल्म ‘तेहरान’ केवल एक जासूसी थ्रिलर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और नैरेटिव की जटिल परतों को उजागर करने का माध्यम बनती है। यह दिल्ली 2012 धमाके को आधार बनाकर ईरान, इज़राइल और अमेरिका के रिश्तों को एक खास नजरिए से प्रस्तुत करती है, जहाँ सिनेमा ‘सॉफ्ट पावर’ बनकर दर्शकों की सोच को प्रभावित करता है। ऐसे में जरूरी है कि दर्शक मनोरंजन के साथ इसके वैचारिक पक्ष को भी समझें।
Read Moreए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और अमेरिकी नैरेटिव
by Arif Aziz | Mar 19, 2026 | Geo Politics, Movie Review, Political | 0 |
कैथरीन बिगेलो की A House of Dynamite एक रोमांचक थ्रिलर होते हुए भी गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी फिल्म है। यह तकनीकी सटीकता और ‘रियल टाइम’ तनाव के जरिए दर्शक को बांधती है, लेकिन साथ ही अमेरिकी सुरक्षा नैरेटिव को वैध ठहराने का सूक्ष्म प्रयास करती है। फिल्म डर को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है, जिससे युद्ध और आक्रामकता को नैतिक ठहराया जाता है, यही इसे महज सिनेमा नहीं बल्कि एक विचारधारात्मक बयान बनाता है।
Read Moreस्वभाव से हत्यारा नहीं होते इंसान
by Arif Aziz | Feb 5, 2026 | Culture and Heritage, Movie Review, Political | 0 |
यह लेख ब्लैक मिरर के एपिसोड “मेन अगेंस्ट फायर” के ज़रिये सत्ता, तकनीक और हिंसा के रिश्ते की पड़ताल करता है। यह दिखाता है कि इंसान स्वभाव से हिंसक नहीं होता, बल्कि भाषा, विचारधारा और तकनीक के माध्यम से उसे ऐसा बनाया जाता है। जब शब्द इंसान को “कीड़ा”, “आतंकी” या “कोलैटरल डैमेज” में बदल देते हैं, तब हत्या नैतिक अपराध नहीं, बल्कि “ज़रूरी काम” बन जाती है। लेख इतिहास और समकालीन उदाहरणों के सहारे बताता है कि अमानवीकरण की यही प्रक्रिया युद्ध, भीड़-हिंसा और नरसंहार की ज़मीन तैयार करती है। अंततः यह चेतावनी देता है कि सबसे ख़तरनाक हथियार मिसाइल नहीं, बल्कि वह सोच है जो इंसान को दूसरे का कत्ल जायज़ लगने लगे।
Read Moreक्या आप भी खत्म हुई जंग लड़ रहे?
by Arif Aziz | Dec 9, 2025 | Movie Review, Reviews | 0 |
लेख हिरू ओनोदा की सच्ची कहानी के जरिए जिद, भ्रम और गलत वफादारी के खतरों को दिखाता है। 1944 में युद्ध पर भेजे गए ओनोदा ने अपने अधिकारी के आदेश को सच मानते हुए 29 साल तक जंगल में छिपकर जीवन बिताया, जबकि युद्ध 1945 में ही खत्म हो चुका था। वह भ्रम में निर्दोष लोगों को दुश्मन समझता रहा और अपनी जवानी गँवा बैठा। 1974 में सच सामने आने पर उसे अहसास हुआ कि वह एक गैर-मौजूद युद्ध लड़ रहा था। यह कहानी सिखाती है कि अंधी जिद नहीं, सही समय पर जागरूकता और छोड़ देना ही सच्ची समझदारी है।
Read MoreWhy India’s Syncretic Past Matters Now More Than Ever
by Arif Aziz | Nov 14, 2025 | Movie Review | 0 |
~Dr. Uzma Khatoon When history is used as a weapon to divide, it’s crucial to remember...
Read Moreगाली और आत्मसम्मान: शब्दों में छिपा अस्तित्व का संघर्ष
by Arif Aziz | Nov 3, 2025 | Casteism, Gender Equality and Women's Rights, Movie Review | 0 |
~अब्दुल्लाह मंसूर गालियाँ हर समाज और हर ज़ुबान में मिलती हैं। उन्हें केवल गुस्से या अपमान का...
Read Moreसमीक्षा: The Terminal List: Dark Wolf
by Arif Aziz | Aug 31, 2025 | Movie Review, Reviews | 0 |
Amazon Prime Video पर 27 अगस्त 2025 को रिलीज़ हुई The Terminal List: Dark Wolf लोकप्रिय सीरीज़ The Terminal List का प्रीक्वल है। यह नेवी सील बेन एडवर्ड्स की कहानी है, जो सीआईए से जुड़कर मिशनों और युद्ध की सच्चाई से जूझता है। आलोचकों के अनुसार, शो हॉलीवुड के पुराने फॉर्मूले पर बना है, जिसमें अमेरिकी सैनिकों को नायक और अरब देशों को खलनायक दिखाया जाता है। इसमें इराक युद्ध, नागरिक मौतों और अमेरिकी हितों पर सवाल नहीं उठते, बल्कि दर्शकों को भावनात्मक हीरोइज़्म में उलझा दिया जाता है। विशेषज्ञ इसे मनोरंजन से अधिक सांस्कृतिक प्रोपेगेंडा और पश्चिमी हस्तक्षेप को नैतिक ठहराने का साधन मानते हैं।
Read Moreबुनकर : करघे से संघर्ष तक, ताने-बाने में भविष्य की तलाश
by Arif Aziz | Aug 29, 2025 | Movie Review | 0 |
बनारसी साड़ी भारत की शान है, लेकिन इसे बुनने वाले अंसारी बुनकर गरीबी और उपेक्षा में जीते हैं। पीढ़ियों से करघों से जुड़ी यह बिरादरी आर्थिक शोषण, सामाजिक भेदभाव और राजनीतिक उपेक्षा झेल रही है। मेहनत के बावजूद उन्हें उचित दाम नहीं मिलता और अशिक्षा व बेरोज़गारी हालात और कठिन बनाते हैं। व्यापारी मुनाफ़ा कमाते हैं, जबकि बुनकर कर्ज़ और भूख से जूझते हैं। राजनीतिक दलों ने भी इनके मुद्दों को कभी गंभीरता से नहीं उठाया। फिर भी उनकी कला विश्वप्रसिद्ध है। पसमांदा आंदोलन उनके सम्मान, शिक्षा और बराबरी की लड़ाई को मजबूती दे रहा है।
Read Moreदेश की आज़ादी: भारतीय समाज और सिनेमा में विभाजन के दृश्य
by Arif Aziz | Aug 26, 2025 | Movie Review, Reviews, Social Justice and Activism | 0 |
15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी के साथ ही भारत ने विभाजन का ज़हर भी झेला। साहित्य और सिनेमा ने इस त्रासदी को दर्ज किया, लेकिन हिंदी फिल्मों में इसका चित्रण अधूरा रहा। शुरुआती दौर की फिल्में सतही रहीं, जबकि गर्म हवा, तमस, पिंजर और मंटो जैसी कृतियों ने कुछ संवेदनशील दृष्टिकोण दिए। फिर भी पसमांदा मुसलमान—जो सबसे अधिक हिंसा, विस्थापन और भुखमरी के शिकार थे—लगभग ग़ायब रहे। सिनेमा ने उन्हें न पीड़ित, न नायक के रूप में स्थान दिया। यदि सिनेमा को सचमुच ऐतिहासिक दस्तावेज़ बनना है, तो उसे पसमांदा समाज की आवाज़ भी सामने लानी होगी।
Read More
Recent Posts
- लायन ऑफ द डेजर्ट: सिनेमा के पर्दे पर प्रतिरोध और उसूलों की अमर दास्तान
- परंपरा से संस्थागत विज्ञान तक: भारत में होम्योपैथी की यात्रा
- तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी
- Rick and Morty: एक दार्शनिक-वैज्ञानिक व्यंग्य
- सद्दाम के साये से अमेरिका की आमद तक: टर्टल्स कैन फ्लाई और कुर्द बच्चों की दास्तान