Tag: DalitMuslims
10 अगस्त: अरजाल और गैर-हिंदू दलितों के लिए क्यों ह...
Posted by Arif Aziz | Sep 17, 2026 | Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
अशराफी आधिपत्य के बरक्स पसमांदा अस्मिता का घोषणापत...
Posted by Arif Aziz | Jul 28, 2026 | Book Review, Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
पमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का ब...
Posted by Arif Aziz | Apr 2, 2026 | Book Review, Culture and Heritage | 0 |
समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस...
Posted by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
गांधी को समझे बिना गांधी की प्रासंगिकता नहीं समझी जा सकती
by Arif Aziz | Oct 2, 2026 | Biography, Political, Social Justice and Activism | 0 |
महात्मा गांधी को याद करना और गांधी को समझना दो अलग बातें हैं। आज तकनीक, AI, आर्थिक असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और नफरत भरी भाषा के दौर में उनके सत्य, अहिंसा, स्वराज, सर्वोदय और साधन-साध्य के विचार नए सवाल खड़े करते हैं। गांधी हर आधुनिक समस्या का तैयार समाधान नहीं देते, लेकिन वे हमें अपने उद्देश्य, साधनों और व्यवहार की नैतिक जांच करने के लिए प्रेरित करते हैं।
Read More10 अगस्त: अरजाल और गैर-हिंदू दलितों के लिए क्यों है काला दिवस
by Arif Aziz | Sep 17, 2026 | Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति के दर्जे पर लगी धार्मिक पाबंदी और उसके अरजाल (दलित मुसलमानों) व अन्य गैर-हिंदू दलितों पर प्रभाव की पड़ताल करता है। इसमें डॉ. आंबेडकर के विचारों, मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव, विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों और सामाजिक संगठनों के संघर्ष के संदर्भ में समान अधिकार और धार्मिक पाबंदी हटाने की मांग को सामने रखा गया है।
Read Moreअशराफी आधिपत्य के बरक्स पसमांदा अस्मिता का घोषणापत्र: ‘भारत के दलित मुसलमान’
by Arif Aziz | Jul 28, 2026 | Book Review, Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
डॉ. मो. अयुब राईन की पुस्तक *भारत के दलित मुसलमान* भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जातिगत असमानता, सामाजिक बहिष्कार और पसमांदा समुदाय के ऐतिहासिक उत्पीड़न का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक अशराफ़ी वर्चस्व, धर्मांतरण के बाद भी जारी जातिगत भेदभाव और सामाजिक न्याय के सवालों को तथ्यात्मक ढंग से सामने लाती है। साथ ही, यह पसमांदा समाज की गरिमा, अधिकार और समान भागीदारी के लिए वैचारिक चेतना तथा व्यापक बहुजन एकजुटता की आवश्यकता पर बल देती है।
Read Moreमुस्लिम समाज की जाति व्यवस्था: आखिर कितनी कठोर?
by Arif Aziz | Jul 14, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा आंदोलन भारतीय मूल के पिछड़े और दलित मुसलमानों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का आंदोलन है। इसका उद्देश्य उन्हें लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व के प्रति जागरूक करना है। यह आंदोलन सामाजिक बहिष्कार और वर्चस्व की राजनीति के विरुद्ध समान अवसर, न्याय और आत्मसम्मान की आवाज़ बुलंद करता है, ताकि पसमांदा समाज मुख्यधारा में अपनी उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सके।
Read Moreपसमांदा समाज: संघर्ष से सम्मान और विकास की नई राह
by Arif Aziz | Apr 16, 2026 | Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा समाज, जो लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा, आज राष्ट्रीय विमर्श में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। यह बदलाव केवल राजनीतिक स्वीकार्यता का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और निरंतर संघर्ष की देन है। अब यह समाज शिक्षा, रोजगार और अधिकारों के प्रति सजग होकर विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
Read Moreशब्बीर अहमद अंसारी: पसमांदा चेतना के अग्रदूत
शब्बीर अहमद अंसारी का जीवन संघर्ष, संवैधानिक चेतना और सामाजिक न्याय की एक प्रेरक कथा है। साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जातीय असमानताओं को पहचानते हुए चार दशकों तक पसमांदा वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनका निधन केवल एक व्यक्ति की क्षति नहीं, बल्कि एक वैचारिक शून्य है, जिसे भरना आसान नहीं होगा। उनकी विरासत वंचितों के आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई में सदैव जीवित रहेगी।
Read Moreपमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
by Arif Aziz | Apr 2, 2026 | Book Review, Culture and Heritage | 0 |
डा० अयुब राईन की पुस्तक ‘पमरिया’ भारतीय लोक-संस्कृति के उस अनदेखे पक्ष को सामने लाती है, जहाँ मजहबी सीमाओं से परे साझा विरासत जीवित है। पमरिया समुदाय इस सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत उदाहरण है।
Read Moreसमीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद
by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।
मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।
Read Moreपसमांदा आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास
by pasmanda_admin | Mar 12, 2025 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
पसमांदा एक उर्दू शब्द है, जिसका अर्थ “जो पीछे रह गया” होता है। यह मुस्लिम धर्मावलंबी दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका इतिहास संत कबीर से जुड़ता है, जिन्होंने इस्लाम में जातिवाद का विरोध किया। बाद में, मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ने मोमिन कॉन्फ्रेंस की स्थापना की, जो एक संगठित पसमांदा आंदोलन बना। बंगाल में हाजी शरीयतुल्लाह के फरायज़ी आंदोलन और पंजाब में अगरा सहूतरा के प्रयास भी महत्वपूर्ण रहे। महाराष्ट्र में शब्बीर अंसारी ने ओबीसी सूची में पसमांदा जातियों को शामिल कराने की लड़ाई लड़ी। असम में फैय्याजुद्दीन अहमद ने मछुआरा समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। अली अनवर, डॉ. अय्यूब राईन और अन्य पसमांदा नेताओं ने सामाजिक न्याय के लिए काम किया। आज भी कई संगठन पसमांदा अधिकारों के लिए सक्रिय हैं, और डिजिटल मीडिया के माध्यम से यह विमर्श मुख्यधारा में आ रहा है।
Read Moreक्या है मुस्लिम तुष्टिकरण का असली सच? एक विचारोत्तेजक पड़ताल
by Abdullah Mansoor | Feb 11, 2025 | Casteism, Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
इस नीति की चपेट में सबसे ज़्यादा वे लोग आये जिन्होंने कालांतर में किन्हीं कारणों से अपना मतांतरण करके मुस्लिम धर्म अपनाया था। जो कभी भी सत्ता और शासन के निकट नहीं रहे या रहने नहीं दिया गया, जिन्हें देशज पसमांदा मुस्लिम के नाम से जानते हैं, जिनकी ज़िन्दगियों में मतांतरण का कोई विशेष लाभ दृष्टिगोचर नहीं होता है और ये अपने पूर्ववर्ती सभ्यता, संस्कृति भाषा एवम् सामाजिक संरचनाओं से जुड़े हुए रहे।
Read Moreबंदिश बैंडिट्स का माही – एक समाज की आवाज़ या आवाज़ का बाज़ारीकरण?
by Abdullah Mansoor | Feb 2, 2025 | Movie Review | 0 |
एंटी-कास्ट सिनेमा में बहुजन समाज का अनुभव, उनकी जीवन-शैली, संस्कृति केंद्र बिंदु पर होता है जिसे उनकी भाषा, भोजन, भाव-भंगिमा से चित्रित किया जाता है। अंबेडकरवादी विचारधारा को बोलकर नहीं बल्कि उनके कार्यों, निर्णयों, अन्याय के प्रति उनकी सोच में दिखाया जाता है। अंबेडकर, बुद्ध, कबीर, इलयाराजा का संगीत, सावित्री-ज्योतिबा फुले इत्यादि के प्रतीक चिन्ह आपको एंटी-कास्ट पात्र के आस-पास देखने को मिलते हैं जो इंगित करते हैं कि वो समाज की पहचान, इतिहास और संघर्षों के प्रति जागरूक है।
Read Moreवो नक़्शे-कदम जो तारीख में कभी मद्धम नहीं पड़ते
by pasmanda_admin | Jan 31, 2025 | Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment, Pasmanda Caste, Social Justice and Activism | 0 |
अपने ज़िन्दगी के तमाम उतार-चढाव के बावजूद दलितों पिछड़ों और पसमांदा के संघर्ष से अपना नाता नही तोड़ा. पैसे-रुपयों की कमी या घरेलू हालात अथवा परेशानियाँ भी आप को अपने मकसद से डिगा न सकी. आप ने कांशीराम और उनकी तहरीक (आन्दोलन) को उस समय गले लगाया था जब बड़े से बड़ा सामाजिक कार्यकर्ता भी उधर मुंह करके खड़ा होने से घबराता था कि कहीं अछूत न समझ लिया जाऊं।
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