मुस्लिम स्वायत्तता या अशराफ़ नेतृत्व? शरजील इमाम के विचारों का पसमांदा जवाब
शरजील इमाम की मुस्लिम सियासी स्वायत्तता और आनुपातिक नुमाइंदगी की बहस पर पसमांदा नज़रिये से एक अहम सवाल उठता है—स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व का फ़ायदा समाज के किन तबक़ों तक पहुँचेगा? केवल मुस्लिम नुमाइंदगी बढ़ाना पर्याप्त नहीं; पसमांदा तबक़ों की बराबर हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। ऐसी स्वायत्तता, जिसमें फैसलों और संस्थानों पर प्रभावशाली अशराफ़ तबक़ों का दबदबा कायम रहे, सामाजिक इंसाफ़ और बराबरी की गारंटी नहीं दे सकती।
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