Author: Arif Aziz

लायन ऑफ द डेजर्ट: सिनेमा के पर्दे पर प्रतिरोध और उसूलों की अमर दास्तान

*लायन ऑफ द डेजर्ट* (1981) प्रतिरोध, उसूल और इंसानी गरिमा की अदम्य दास्तान है। मुस्तफा अक्काद की यह फिल्म उमर मुख्तार के संघर्ष के जरिए दिखाती है कि जब एक कौम आज़ादी ठान ले, तो साम्राज्यवादी ताकतें भी उसे झुका नहीं सकतीं। सादगी, यथार्थ और गहरे भावों से सजी यह कृति बताती है कि असली जीत हथियारों से नहीं, बल्कि अडिग इरादों और इंसाफ के जज़्बे से हासिल होती है।

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परंपरा से संस्थागत विज्ञान तक: भारत में होम्योपैथी की यात्रा

भारत में होम्योपैथी का सफर परंपरा, विश्वास और आधुनिक विज्ञान के संगम की कहानी है। सस्ती, सुलभ और समग्र दृष्टिकोण के कारण यह गाँवों से शहरों तक लोगों के जीवन का हिस्सा बनी। आज वैज्ञानिक शोध, डेटा और नियमों के साथ यह पद्धति खुद को साबित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जहाँ शरीर और मन दोनों की सेहत को समान महत्व दिया जाता है।

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तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी

तालिबान द्वारा लागू नया कानून न्याय नहीं, बल्कि एक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। घरेलू हिंसा की सीमित परिभाषा और न्यायिक प्रक्रियाओं में भेदभाव, इस्लामी मूल्यों—अदल (न्याय) और रहमत (दया)—के विपरीत है। यह स्पष्ट करता है कि कठोर कबीलाई परंपराओं को धर्म का रूप देकर समाज में असमानता को वैध ठहराया जा रहा है।

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Rick and Morty: एक दार्शनिक-वैज्ञानिक व्यंग्य

‘Rick and Morty’ केवल एक एनीमेशन नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन के संगम पर खड़ा गहरा विमर्श है। यह सीरीज़ शून्यवाद, अस्तित्ववाद और मानवीय अर्थ की खोज को चुनौती देती है, जहाँ रिक सांचेज़ का दृष्टिकोण ब्रह्मांड की निरर्थकता को उजागर करता है, जबकि मोर्टी जीवन के छोटे-छोटे पलों में अर्थ तलाशता है। अंततः, यह कहानी बताती है कि अर्थ हमें दिया नहीं जाता—हमें उसे स्वयं गढ़ना होता है।

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​सद्दाम के साये से अमेरिका की आमद तक: टर्टल्स कैन फ्लाई और कुर्द बच्चों की दास्तान

फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ के जरिए युद्ध की भयावह सच्चाई और उसके सबसे निर्दयी शिकार—बच्चों—की त्रासदी को बेहद मार्मिक ढंग से सामने लाता है। बहमन घोबादी की संवेदनशील प्रस्तुति दिखाती है कि कैसे बारूदी सुरंगों, हिंसा और असुरक्षा के बीच पलते ये बच्चे बचपन से पहले ही बड़े हो जाते हैं। सैटेलाइट, अग्रिन और हेंगोव जैसे किरदार उम्मीद, पीड़ा और टूटे भ्रम का प्रतीक बनकर उभरते हैं, जो अंततः यह सवाल छोड़ जाते हैं कि क्या किसी भी युद्ध की जीत इंसानियत की इस हार से बड़ी हो सकती है।

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