Author: Arif Aziz

मुस्लिम स्वायत्तता या अशराफ़ नेतृत्व? शरजील इमाम के विचारों का पसमांदा जवाब

शरजील इमाम की मुस्लिम सियासी स्वायत्तता और आनुपातिक नुमाइंदगी की बहस पर पसमांदा नज़रिये से एक अहम सवाल उठता है—स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व का फ़ायदा समाज के किन तबक़ों तक पहुँचेगा? केवल मुस्लिम नुमाइंदगी बढ़ाना पर्याप्त नहीं; पसमांदा तबक़ों की बराबर हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। ऐसी स्वायत्तता, जिसमें फैसलों और संस्थानों पर प्रभावशाली अशराफ़ तबक़ों का दबदबा कायम रहे, सामाजिक इंसाफ़ और बराबरी की गारंटी नहीं दे सकती।

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आलस नहीं, परेशानी का संकेत भी हो सकती है ‘बेड-रोटिंग’

‘बेड-रोटिंग’ यानी लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना और फोन, रील्स या ऑनलाइन कंटेंट में समय बिताना आजकल चर्चा में है। आराम और बेड-रोटिंग में फर्क समझना ज़रूरी है। जब यह आदत जिम्मेदारियों से बचने, काम टालने या रोज़मर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो यह चिंता का कारण बन सकती है। जानिए बेड-रोटिंग की वजहें, सोशल मीडिया की भूमिका और इससे बाहर निकलने के आसान तरीके।

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गांधी को समझे बिना गांधी की प्रासंगिकता नहीं समझी जा सकती

महात्मा गांधी को याद करना और गांधी को समझना दो अलग बातें हैं। आज तकनीक, AI, आर्थिक असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और नफरत भरी भाषा के दौर में उनके सत्य, अहिंसा, स्वराज, सर्वोदय और साधन-साध्य के विचार नए सवाल खड़े करते हैं। गांधी हर आधुनिक समस्या का तैयार समाधान नहीं देते, लेकिन वे हमें अपने उद्देश्य, साधनों और व्यवहार की नैतिक जांच करने के लिए प्रेरित करते हैं।

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत

नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ग्लोबल साउथ की भूमिका और भारत की विदेश नीति को लेकर कई महत्वपूर्ण सवालों को सामने रखा। लेख में ब्रिक्स के विस्तार, भारत के ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ दृष्टिकोण, आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों की चर्चा की गई है। साथ ही, बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की कूटनीतिक भूमिका का विश्लेषण किया गया है।

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भावनाओं से आगे बढ़कर शिक्षा और प्रतिनिधित्व पर ध्यान दे पसमांदा समाज।

सामाजिक न्याय और समान अवसर की बहस में पसमांदा समाज की शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी अहम सवाल हैं। लंबे समय से सीमित अवसरों का सामना कर रहे इस समाज के लिए शिक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। छात्रवृत्ति, करियर मार्गदर्शन और उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के साथ युवाओं की प्रशासनिक, पेशेवर और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी मजबूत करनी होगी। शिक्षा, जागरूकता और प्रतिनिधित्व ही आत्मनिर्भरता, सम्मान और सामाजिक बदलाव की मजबूत नींव बन सकते हैं।

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