Author: Arif Aziz

भावनाओं से आगे बढ़कर शिक्षा और प्रतिनिधित्व पर ध्यान दे पसमांदा समाज।

सामाजिक न्याय और समान अवसर की बहस में पसमांदा समाज की शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी अहम सवाल हैं। लंबे समय से सीमित अवसरों का सामना कर रहे इस समाज के लिए शिक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। छात्रवृत्ति, करियर मार्गदर्शन और उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के साथ युवाओं की प्रशासनिक, पेशेवर और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी मजबूत करनी होगी। शिक्षा, जागरूकता और प्रतिनिधित्व ही आत्मनिर्भरता, सम्मान और सामाजिक बदलाव की मजबूत नींव बन सकते हैं।

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10 अगस्त: अरजाल और गैर-हिंदू दलितों के लिए क्यों है काला दिवस

यह लेख अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति के दर्जे पर लगी धार्मिक पाबंदी और उसके अरजाल (दलित मुसलमानों) व अन्य गैर-हिंदू दलितों पर प्रभाव की पड़ताल करता है। इसमें डॉ. आंबेडकर के विचारों, मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव, विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों और सामाजिक संगठनों के संघर्ष के संदर्भ में समान अधिकार और धार्मिक पाबंदी हटाने की मांग को सामने रखा गया है।

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Challenging the Grand Mufti: Defending Women’s Public Agency

A recent controversy over regressive statements about women’s public participation highlights a deeper struggle within Muslim society over gender justice, religious interpretation, and constitutional rights. Drawing on Quranic principles, Islamic history, and contemporary examples, this article challenges patriarchal readings that confine women to domestic spaces. It also centers Pasmanda women, whose struggles with gender, caste, and economic inequality demand grassroots empowerment, education, dignity, and economic independence within India’s constitutional framework.

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शिक्षक दिवस: चाक की धूल, व्यवस्था के सवाल और कक्षा से खिलती उम्मीद

यह लेख एक सरकारी शिक्षक की नज़र से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों, बाज़ारीकरण और बदलावों की पड़ताल करता है। इसमें समान व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नई शिक्षा नीति, श्रम की गरिमा, पसमांदा और वंचित समुदायों के बच्चों की भागीदारी तथा दिल्ली के सरकारी स्कूलों के अनुभवों को रेखांकित किया गया है।

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नाजिर अली : चौरी चौरा विद्रोह का गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी

नाजिर अली, चौरी-चौरा विद्रोह के उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं, जिनका संघर्ष इतिहास के मुख्य पन्नों से लगभग गायब कर दिया गया। सरकारी अभिलेखों में दर्ज होने के बावजूद उनकी स्मृति और विरासत उपेक्षित रही। पसमांदा समाज के इस स्वतंत्रता सेनानी के परिवार की आज की मुफलिसी हमें सवाल करने पर मजबूर करती है—क्या आज़ादी के इतिहास में जाति और सामाजिक हैसियत ने भी तय किया कि किसे याद रखा जाएगा?

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