Author: Arif Aziz

क्यों नींद का त्याग कर्मठता नहीं, अज्ञानता है

यह लेख आधुनिक समाज में कम नींद को मेहनत का प्रतीक मानने वाली सोच पर सवाल उठाता है। लेखक अपने अनुभव और आधुनिक स्लीप साइंस के आधार पर बताते हैं कि पर्याप्त नींद मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की अनिवार्य शर्त है। शिक्षा व्यवस्था और जीवनशैली में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए वे कहते हैं कि सफलता नींद की बलि देकर नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों के साथ तालमेल बिठाकर ही हासिल की जा सकती है।

Read More

डिजिटल बनाम ज़मीन: क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भी अगली ‘आप’ बनेगी?

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का उभार केवल एक डिजिटल मज़ाक नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर बढ़ते असंतोष, बेरोज़गारी और संस्थागत उपेक्षा का प्रतीक है। जंतर-मंतर पर सीमित भीड़ ने इसकी संगठनात्मक कमजोरी उजागर की, लेकिन इसके पीछे मौजूद आक्रोश को नकारा नहीं जा सकता। यह घटनाक्रम बताता है कि सोशल मीडिया की ताकत और ज़मीनी राजनीति के बीच बड़ा अंतर है, फिर भी युवाओं की आकांक्षाओं और सामाजिक न्याय की मांगों को गंभीरता से समझना आवश्यक है।

Read More

आधुनिक समाज, अकेलापन और खुशी की असली परिभाषा

यह लेख दो फिल्मों — Into the Wild और Perfect Days — के जरिए खुशी, अकेलेपन और आत्म-खोज की गहरी पड़ताल करता है। एक ओर क्रिस्टोफर है, जो समाज से दूर प्रकृति में सच्ची आज़ादी तलाशता है, तो दूसरी ओर हिरायामा है, जो रोज़मर्रा की साधारण जिंदगी में सुकून ढूंढ़ लेता है। लेख बताता है कि असली खुशी किसी दूर मंज़िल में नहीं, बल्कि रिश्तों, छोटे पलों और वर्तमान को स्वीकार करने में छिपी होती है।

Read More

मई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी

मई दिवस के संघर्ष से लेकर आज के भारत तक, मजदूरों की लड़ाई सिर्फ मजदूरी की नहीं बल्कि इज्जत, बराबरी और पहचान की भी रही है। यह लेख खास तौर पर पसमांदा मजदूरों की उस अनदेखी दुनिया को सामने लाता है, जहाँ जाति, पेशा और गरीबी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने हुनर खत्म हो रहे हैं, लेकिन नए मौके अब भी इन तबकों की पहुँच से दूर हैं।

Read More

वाइस: अफगनिस्तान और ईराक को तबाह करने वाले डिक चेनी की कहानी

फिल्म *Vice* के बहाने यह लेख सत्ता, युद्ध और कॉर्पोरेट गठजोड़ की भयावह सच्चाई को उजागर करता है। डिक चेनी के किरदार के जरिए दिखाया गया है कि कैसे डर, मीडिया और राजनीति का इस्तेमाल कर युद्धों को मुनाफे के कारोबार में बदला गया। यह सिर्फ एक फिल्म समीक्षा नहीं, बल्कि लोकतंत्र, जनमत और हथियार उद्योग के खतरनाक गठबंधन पर गहरी वैचारिक पड़ताल है।

Read More