Author: Arif Aziz

तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी

तालिबान द्वारा लागू नया कानून न्याय नहीं, बल्कि एक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। घरेलू हिंसा की सीमित परिभाषा और न्यायिक प्रक्रियाओं में भेदभाव, इस्लामी मूल्यों—अदल (न्याय) और रहमत (दया)—के विपरीत है। यह स्पष्ट करता है कि कठोर कबीलाई परंपराओं को धर्म का रूप देकर समाज में असमानता को वैध ठहराया जा रहा है।

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Rick and Morty: एक दार्शनिक-वैज्ञानिक व्यंग्य

‘Rick and Morty’ केवल एक एनीमेशन नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन के संगम पर खड़ा गहरा विमर्श है। यह सीरीज़ शून्यवाद, अस्तित्ववाद और मानवीय अर्थ की खोज को चुनौती देती है, जहाँ रिक सांचेज़ का दृष्टिकोण ब्रह्मांड की निरर्थकता को उजागर करता है, जबकि मोर्टी जीवन के छोटे-छोटे पलों में अर्थ तलाशता है। अंततः, यह कहानी बताती है कि अर्थ हमें दिया नहीं जाता—हमें उसे स्वयं गढ़ना होता है।

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​सद्दाम के साये से अमेरिका की आमद तक: टर्टल्स कैन फ्लाई और कुर्द बच्चों की दास्तान

फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ के जरिए युद्ध की भयावह सच्चाई और उसके सबसे निर्दयी शिकार—बच्चों—की त्रासदी को बेहद मार्मिक ढंग से सामने लाता है। बहमन घोबादी की संवेदनशील प्रस्तुति दिखाती है कि कैसे बारूदी सुरंगों, हिंसा और असुरक्षा के बीच पलते ये बच्चे बचपन से पहले ही बड़े हो जाते हैं। सैटेलाइट, अग्रिन और हेंगोव जैसे किरदार उम्मीद, पीड़ा और टूटे भ्रम का प्रतीक बनकर उभरते हैं, जो अंततः यह सवाल छोड़ जाते हैं कि क्या किसी भी युद्ध की जीत इंसानियत की इस हार से बड़ी हो सकती है।

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पसमांदा समाज: संघर्ष से सम्मान और विकास की नई राह

पसमांदा समाज, जो लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा, आज राष्ट्रीय विमर्श में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। यह बदलाव केवल राजनीतिक स्वीकार्यता का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और निरंतर संघर्ष की देन है। अब यह समाज शिक्षा, रोजगार और अधिकारों के प्रति सजग होकर विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

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शब्बीर अहमद अंसारी: पसमांदा चेतना के अग्रदूत

शब्बीर अहमद अंसारी का जीवन संघर्ष, संवैधानिक चेतना और सामाजिक न्याय की एक प्रेरक कथा है। साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जातीय असमानताओं को पहचानते हुए चार दशकों तक पसमांदा वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनका निधन केवल एक व्यक्ति की क्षति नहीं, बल्कि एक वैचारिक शून्य है, जिसे भरना आसान नहीं होगा। उनकी विरासत वंचितों के आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई में सदैव जीवित रहेगी।

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