Author: Arif Aziz

ईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश

2026 में ईरान–इजराइल–अमेरिका तनाव केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि धर्म, सत्ता और नैरेटिव का जटिल गठजोड़ बन चुका है। आधुनिक हथियारों के बावजूद संघर्ष को “प्रकाश बनाम अंधकार” या ‘अर्मागेडन’ जैसी धार्मिक अवधारणाओं में ढाला जा रहा है। यह खतरनाक प्रवृत्ति युद्ध को नैतिक वैधता देती है, जहाँ मानवाधिकार पीछे छूट जाते हैं और विनाश को ‘पवित्र’ बना दिया जाता है।

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ए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और अमेरिकी नैरेटिव

कैथरीन बिगेलो की A House of Dynamite एक रोमांचक थ्रिलर होते हुए भी गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी फिल्म है। यह तकनीकी सटीकता और ‘रियल टाइम’ तनाव के जरिए दर्शक को बांधती है, लेकिन साथ ही अमेरिकी सुरक्षा नैरेटिव को वैध ठहराने का सूक्ष्म प्रयास करती है। फिल्म डर को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है, जिससे युद्ध और आक्रामकता को नैतिक ठहराया जाता है, यही इसे महज सिनेमा नहीं बल्कि एक विचारधारात्मक बयान बनाता है।

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मध्य-पूर्व की राजनीति और पाकिस्तान का खेल

मध्य-पूर्व की राजनीति अक्सर “मुस्लिम उम्मत” के नारों में लिपटी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत में यह राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और सत्ता की कठोर राजनीति से संचालित होती है। खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था, पश्चिमी ताकतों पर उनकी निर्भरता और पाकिस्तान की “सैन्य सेवा” वाली भूमिका इसी यथार्थ को उजागर करती है। अगर पाकिस्तान ईरान के खिलाफ किसी युद्ध में उतरता है, तो यह केवल दो देशों का टकराव नहीं होगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को झकझोर सकता है।

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थर्ड टेंपल और ग्रेटर इज़राइल

इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष केवल भू-राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि धार्मिक विचारधाराओं से भी प्रभावित है। क्रिश्चियन जायनिज्म, खासकर अमेरिका और यूरोप के कुछ इवेंजेलिकल ईसाइयों में प्रचलित, इज़राइल के अस्तित्व और विस्तार को बाइबिल की भविष्यवाणियों से जोड़कर देखता है। “ग्रेटर इज़राइल”, “थर्ड टेंपल” और मसीह के पुनरागमन जैसी अवधारणाएँ इस सोच का हिस्सा हैं, जिसने पश्चिमी राजनीति और मध्य-पूर्व की जटिल बहसों को गहराई से प्रभावित किया है।

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क्या पितृसत्ता ने मर्दों से उनका सुकून छीन लिया है?

हर साल 8 मार्च को महिला अधिकारों पर बहस होती है, लेकिन इस चर्चा में एक सच अक्सर छूट जाता है—पितृसत्ता सिर्फ औरतों को ही नहीं, मर्दों को भी कैद करती है। बचपन से ही लड़कों को सख्त और निडर बनने की सीख दी जाती है, जिससे उनकी भावनाएँ दब जाती हैं। यह व्यवस्था उन्हें ताकत का भ्रम तो देती है, मगर बदले में उनसे उनकी संवेदनशीलता, सुकून और इंसानियत छीन लेती है।

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