Author: Arif Aziz

एपस्टीन फाइल्स : आधुनिक लोकतंत्र की नैतिक विफलता

यह लेख जेफ्री एपस्टीन केस को एक व्यक्ति के अपराध से आगे, सत्ता-पैसा-न्याय व्यवस्था के पूरे सिस्टम की विफलता के रूप में देखता है। लेखक बताता है कि कैसे पावर एलीट, संस्थाएं, मीडिया और न्याय व्यवस्था ने अपराध को वर्षों तक संरक्षण दिया। असली समस्या व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस ढांचे की है जो अमीर और ताक़तवर लोगों को बचाता है। समाधान सिस्टम की जवाबदेही और सतत निगरानी में है।

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स्वभाव से हत्यारा नहीं होते इंसान

यह लेख ब्लैक मिरर के एपिसोड “मेन अगेंस्ट फायर” के ज़रिये सत्ता, तकनीक और हिंसा के रिश्ते की पड़ताल करता है। यह दिखाता है कि इंसान स्वभाव से हिंसक नहीं होता, बल्कि भाषा, विचारधारा और तकनीक के माध्यम से उसे ऐसा बनाया जाता है। जब शब्द इंसान को “कीड़ा”, “आतंकी” या “कोलैटरल डैमेज” में बदल देते हैं, तब हत्या नैतिक अपराध नहीं, बल्कि “ज़रूरी काम” बन जाती है। लेख इतिहास और समकालीन उदाहरणों के सहारे बताता है कि अमानवीकरण की यही प्रक्रिया युद्ध, भीड़-हिंसा और नरसंहार की ज़मीन तैयार करती है। अंततः यह चेतावनी देता है कि सबसे ख़तरनाक हथियार मिसाइल नहीं, बल्कि वह सोच है जो इंसान को दूसरे का कत्ल जायज़ लगने लगे।

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ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल

ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।

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भारतीय संविधान: पसमांदा समाज की ढाल और हमारे वजूद का दस्तावेज

26 जनवरी वह दिन है जब भारत ने संविधान के ज़रिये बराबरी, आज़ादी और न्याय पर आधारित नया सामाजिक समझौता अपनाया। संविधान ने सत्ता को जनता के अधीन किया, बहुमत और सरकार पर कानून की लगाम लगाई और जाति-धर्म आधारित अन्याय तोड़ा। इसी ने पसमांदा समाज को नागरिक अधिकार, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और न्यायिक सुरक्षा दी। संविधान से ही पसमांदा सुरक्षित है, और पसमांदा की सुरक्षा से भारत मज़बूत।

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तेहरान का अंधेरा: तानाशाही के दमन और विदेशी साम्राज्यवाद के बीच पिसता ईरान

ईरान जनवरी 2026 में गंभीर संकट से गुजर रहा है—इंटरनेट बंद है, सड़कों पर दमन जारी है और 500 से अधिक मौतों व हजारों गिरफ्तारियों ने हालात को गृहयुद्ध जैसी स्थिति बना दिया है। जनता महंगाई, मुद्रा गिरावट और अमेरिकी प्रतिबंधों से उत्पन्न आर्थिक तबाही के खिलाफ भूख के विद्रोह में उतर आई है। दूसरी ओर अमेरिका और इज़रायल इस अस्थिरता को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए भुनाना चाहते हैं, ताकि ईरान को कमजोर कर सत्ता परिवर्तन कराया जा सके। ईरानी अवाम मौजूदा शासन और बाहरी हस्तक्षेप—दोनों के बीच पिस रही है, जबकि देश की संप्रभुता खतरे में है।

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