Category: Social Justice and Activism
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धा...
Posted by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?...
Posted by Arif Aziz | Dec 12, 2025 | Culture and Heritage, Gender Equality and Women's Rights, Social Justice and Activism | 0 |
डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों...
Posted by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
बिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ̵...
Posted by Arif Aziz | Nov 12, 2025 | Casteism, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
गाली और आत्मसम्मान: शब्दों में छिपा अस्तित्व का सं...
Posted by Arif Aziz | Nov 3, 2025 | Casteism, Gender Equality and Women's Rights, Movie Review | 0 |
‘प्राउड आर ®’विवाद: एसी कमरों का ‘छद्म फेमिनिज्म’
by Arif Aziz | Jan 16, 2026 | Social Justice and Activism | 0 |
सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर दिविजा भसीन द्वारा शुरू किया गया “#ProudRandi” ट्रेंड एक खतरनाक डिजिटल भ्रम साबित हुआ। अपमानजनक शब्द “रंडी” को ‘रिक्लेम’ करने के नाम पर नाबालिग लड़कियों तक को अश्लील, वयस्क और शोषक भाषा अपनाने के लिए प्रेरित किया गया, जिससे POCSO तक के मामले दर्ज हुए। यह आंदोलन फेमिनिज्म नहीं, बल्कि रेज-बेटिंग और वायरलिटी का खेल था। इसने देह-व्यापार और जातिगत शोषण झेल रही हाशिए की महिलाओं के दर्द का मज़ाक बनाया। असली नारीवाद सम्मान, बराबरी और सामाजिक बदलाव की बात करता है—न कि गालियों को ‘सशक्तिकरण’ बनाकर बच्चों को यौनिककरण की ओर धकेलने की।
Read More“काफ़िर” शब्द की असलियत: सियासी गाली से क़ुरआनी संदर्भ तक
by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Culture and Heritage, Social Justice and Activism | 0 |
— डॉ. उज़्मा ख़ातून आज के सियासी माहौल में ‘काफ़िर’ शब्द को उसकी रूहानी और धार्मिक...
Read Moreबांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धांतों की एक परीक्षा
by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
लेखक – डॉ. उज़्मा खातून (नोट: यह लेख मूलतः अंग्रेजी में “Hindu Persecution in Bangladesh:...
Read Moreबहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?
by Arif Aziz | Dec 12, 2025 | Culture and Heritage, Gender Equality and Women's Rights, Social Justice and Activism | 0 |
भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।
Read Moreडी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका
by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।
Read Moreहिजाब: अशराफ़िया पितृसत्ता और पसमांदा पहचान का द्वंद्व
by Abdullah Mansoor | Dec 2, 2025 | Casteism, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
~ अब्दुल्लाह मंसूर एक तरफ ईरान में लड़कियाँ #FreeFromHijab का नारा बुलंद करते हुए हिजाब को हवा में...
Read Moreबिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ‘पसमांदा’ दावेदारी तक
by Arif Aziz | Nov 12, 2025 | Casteism, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
**सारांश (100 शब्दों में):**
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पसमांदा समाज अब मात्र ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का ‘गेम चेंजर’ बन चुका है। इस आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पहले मोमिन कॉन्फ्रेंस और अब्दुल कय्यूम अंसारी के राष्ट्रवादी संघर्ष में हैं। आज पसमांदा राजनीति रोजगार, शिक्षा और सम्मान की हिस्सेदारी पर केंद्रित है। मंडल युग से उभरी यह चेतना अब भाजपा, जदयू और महागठबंधन सभी को प्रभावित कर रही है। बिहार के 72% मुस्लिम पसमांदा हैं और उनकी नई पीढ़ी अशराफ वर्चस्व को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।
ज़ोहरान ममदानी: समाजवाद की नई व्याख्या
by Arif Aziz | Nov 10, 2025 | Culture and Heritage, Political, Social Justice and Activism | 0 |
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि न्यूयॉर्क के नए मेयर ज़ोहरान ममदानी की जीत अमेरिकी राजनीति में समानता और प्रतिस्पर्धा के नए संतुलन का प्रतीक है। उनका “डेमोक्रेटिक सोशलिज़्म” ऐसा मॉडल पेश करता है जो बाजार की दक्षता को बनाए रखते हुए नागरिकों को राहत और समान अवसर देता है। वे किराया नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन और चाइल्डकेयर जैसी नीतियों को तकनीकी सुधारों और जवाबदेही से जोड़ते हैं। प्रवासी अनुभव से उपजे ममदानी का समाजवाद आर्थिक असमानता मिटाकर नस्ल और धर्म के भेद खत्म करने की कोशिश है—एक ऐसा लोकतांत्रिक समाजवाद जो करुणा और कुशलता, दोनों को साथ लेकर चलता है।
Read Moreगाली और आत्मसम्मान: शब्दों में छिपा अस्तित्व का संघर्ष
by Arif Aziz | Nov 3, 2025 | Casteism, Gender Equality and Women's Rights, Movie Review | 0 |
~अब्दुल्लाह मंसूर गालियाँ हर समाज और हर ज़ुबान में मिलती हैं। उन्हें केवल गुस्से या अपमान का...
Read Moreअशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’: पसमांदा यथार्थ की कहानियाँ
by Arif Aziz | Oct 29, 2025 | Book Review, Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
सुहैल वहीद द्वारा संपादित ‘तश्तरी’ उर्दू साहित्य में पसमांदा समाज की आवाज़ को सामने लाने वाला ऐतिहासिक संग्रह है। यह पुस्तक मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और उर्दू साहित्य की चुप्पी को चुनौती देती है। अब्दुल्लाह मंसूर बताते हैं कि प्रगतिशील और अशराफ़ लेखक अपने वर्गीय हितों के कारण इस अन्याय पर मौन रहे। ‘तश्तरी’ उन कहानियों का संग्रह है जो इस मौन को तोड़ती हैं, मुस्लिम समाज के भीतर छुआछूत और सामाजिक पाखंड को उजागर करती हैं। यह किताब पसमांदा साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और आत्मसम्मान की लड़ाई का प्रतीक बनती है।
Read Moreमक्का चार्टर: इस्लाम की असली सोच की ओर वापसी
by Arif Aziz | Oct 22, 2025 | Culture and Heritage, Political, Social Justice and Activism | 0 |
मक्का चार्टर (2019) इस्लाम के मूल पैगाम—शांति, बराबरी और सह-अस्तित्व—की पुनःस्थापना है, न कि कोई नया सुधार। यह पैगंबर मुहम्मद के मदीना संविधान से प्रेरित है, जिसने विभिन्न धर्मों और कबीलों को ‘उम्मा’ के रूप में एकजुट किया। 139 देशों के 1200 से अधिक विद्वानों द्वारा स्वीकृत इस चार्टर ने धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता, अतिवाद का विरोध, महिलाओं और युवाओं के सशक्तीकरण, और पर्यावरण की रक्षा पर ज़ोर दिया। यह कुरान व इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित एक नैतिक संविधान है जो मुस्लिम दुनिया को एकजुट कर मानवाधिकार, न्याय और दया के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रस्तुत करता है।
Read Moreकौन थे श्री नियामतुल्लाह अंसारी और क्या था रज़ालत टैक्स?
by Arif Aziz | Sep 30, 2025 | Biography, Culture and Heritage, Education and Empowerment, Pasmanda Caste, Social Justice and Activism | 0 |
श्री नियामतुल्लाह अंसारी (1903–1970) स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक न्याय के योद्धा थे। गोरखपुर में जन्मे, उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़कर आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। वे कांग्रेस और मोमिन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति का विरोध करते रहे। उनका सबसे बड़ा योगदान “रज़ालत टैक्स” के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई थी, जो पसमांदा मुसलमानों पर थोपे गए अपमानजनक कर का अंत कर गई। 1939 में अदालत ने उनके पक्ष में ऐतिहासिक फ़ैसला दिया। अंसारी ने दबे-कुचले समाज को सम्मान दिलाया और समानता की मशाल जलाकर सामाजिक क्रांति की राह प्रशस्त की।
Read More