लेखक: अब्दुल्लाह मंसूर

इक्कीसवीं सदी के भू-राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में, कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बनकर उभरे हैं। जब भी आतंकवाद या धार्मिक कट्टरपंथ की चर्चा होती है, तो अक्सर दुनिया भर की नजरें मदरसों की ओर मुड़ जाती हैं। 9/11 के बाद से बने वैश्विक माहौल ने मदरसों को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। इसकी एक बड़ी वजह पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में मदरसों का ‘जिहाद की फैक्टरी’ के रूप में इस्तेमाल होना रहा है। मीडिया और सुरक्षा विमर्श में उन्हें अक्सर ‘कट्टरपंथ की नर्सरी’ या पुरातनपंथी सोच का केंद्र माना जाता है। लेकिन, अगर हम पूर्वाग्रहों के चश्मे को उतारकर जमीनी हकीकत का विश्लेषण करें, तो एक विरोधाभासी तस्वीर सामने आती है। वह तस्वीर यह है कि कट्टरपंथ के खिलाफ इस लड़ाई में मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी, उसका सबसे प्रभावी समाधान बन सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियां केवल हिंसा की घटनाओं को रोक सकती हैं, लेकिन विचारधाराओं के युद्ध में जीत केवल एक ज्ञानी और सुधारवादी शिक्षक ही दिला सकता है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ करोड़ों मुस्लिम युवा अपनी बुनियादी शिक्षा मदरसों से प्राप्त करते हैं, वहाँ शिक्षकों की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता। कट्टरपंथ कोई एक रात में होने वाली घटना नहीं है; यह एक धीमी मानसिक प्रक्रिया है। यह “ब्रेनवॉशिंग” की एक ऐसी यात्रा है जिसमें एक युवा को यह विश्वास दिलाया जाता है कि हिंसा ही न्याय पाने का एकमात्र रास्ता है। इस प्रक्रिया को तोड़ने की क्षमता अगर किसी के पास है, तो वह केवल मदरसा शिक्षक या ‘उलेमा’ के पास है। यह लेख इस बात का गहरा विश्लेषण करता है कि कैसे मदरसा शिक्षक अपनी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर, पाठ्यक्रम में सुधार और ‘यूनिवर्सल एजुकेशन’ के मॉडल को अपनाकर समाज के रक्षक बन सकते हैं।

हमने वही किया जो आपने पढ़ाया

कट्टरपंथ और आतंकवाद की समस्या की जड़ में केवल बाहरी भटकाव नहीं, बल्कि कभी-कभी स्वयं शिक्षण संस्थानों के भीतर मौजूद ‘विकृत धर्मशास्त्र’ (Distorted Theology) और ‘राजनीतिक इस्लाम’ की अवधारणाएं होती हैं। पाकिस्तान के मुहम्मद हसन इलियास जैसे विद्वानों ने एक बहुत ही कड़वा लेकिन जरूरी सत्य उजागर किया है। पाकिस्तान के संदर्भ में एक घटना का जिक्र मिलता है कि जब वहां आतंकवाद (टीटीपी) चरम पर था, तो उलेमाओं ने उन चरमपंथियों को पत्र लिखकर हिंसा रोकने को कहा। इसके जवाब में आतंकवादियों ने जो कहा, वह किसी भी मदरसा शिक्षक के लिए आत्म-मंथन का विषय होना चाहिए। उन्होंने कहा: “हम कुछ अलग नहीं कर रहे, हम वही कर रहे हैं जो आपने हमें मदरसों की किताबों में पढ़ाया है। फर्क सिर्फ इतना है कि आप डर या मसलहत (परिस्थिति) की वजह से रुक गए हैं, और हम उस सबक को लागू कर रहे हैं।”

यह तर्क हमें बताता है कि समस्या केवल “संदर्भ से काटकर” (Out of Context) पढ़ाने की नहीं है, बल्कि कभी-कभी मूल ‘टेक्स्ट’ और उसे पढ़ाने के नजरिए में भी है। यहाँ मदरसा शिक्षक की भूमिका एक क्रांतिकारी सुधारक की होनी चाहिए। उसे यह साहस दिखाना होगा कि वह छात्रों को बताए कि मध्यकालीन दौर के फतवे और राजनीतिक निर्णय आज के लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य (Nation State) में लागू नहीं होते। एक ‘आलिम’ के पास वह ‘धार्मिक वैधता’ (Religious Legitimacy) होती है जो किसी प्रोफेसर या पुलिस अधिकारी के पास नहीं होती। जब वह शिक्षक कहता है कि ‘खिलाफत’ या ‘वर्चस्व’ की लड़ाई इस्लाम का मकसद नहीं है, बल्कि एक अच्छा इंसान बनना मकसद है, तो छात्र की वैचारिक दिशा बदल जाती है। दारुल उलूम देवबंद द्वारा 2008 में आतंकवाद के खिलाफ जारी किया गया फतवा एक सकारात्मक कदम था, लेकिन शिक्षकों को अब कक्षाओं में यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्र ‘धार्मिक श्रेष्ठता’ के दंभ में न फंसें।

विशेषज्ञता का भ्रम और ‘भीड़’ का मनोविज्ञान

आज मदरसों और कट्टरपंथ के बीच के संबंध को समझने के लिए हमें शिक्षा के ढांचे को समझना होगा। वर्तमान मदरसा प्रणाली की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह हर बच्चे को ‘दीन का विशेषज्ञ’ (Specialized Scholar) बनाने की कोशिश कर रही है। यह मानव स्वभाव और मानवाधिकारों के खिलाफ है। जिस तरह समाज का हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता, उसी तरह हर बच्चा ‘मुफ्ती’ या ‘आलिम’ नहीं बन सकता। इसके लिए एक खास बौद्धिक रुझान (Aptitude) की जरूरत होती है।

मुहम्मद हसन इलियास यहाँ एक ज़रूरी बात समझाते हैं कि जब मदरसे हजारों छात्रों को जिनमें से 95% में वह विशेष योग्यता नहीं है एक ही सांचे में ढालते हैं, तो परिणाम घातक होते हैं। ये छात्र न तो अच्छे विद्वान बन पाते हैं और न ही आधुनिक दुनिया के लिए रोजगार योग्य। परिणामस्वरूप, वे ‘पहचान के संकट’ (Identity Crisis) का शिकार हो जाते हैं। अपनी अहमियत साबित करने के लिए, ये दिशाहीन युवा ‘भीड़’ का हिस्सा बन जाते हैं। चूंकि कक्षा में उनमें ‘आलोचनात्मक चिंतन’ (Critical Thinking) विकसित नहीं किया गया, वे भावुकता के शिकार हो जाते हैं। यही वह वर्ग है जो ईशनिंदा के आरोपों पर गला काटने को तैयार हो जाता है या राजनीतिक इस्लाम का प्यादा बन जाता है।

यहाँ मदरसा शिक्षकों को ‘यूनिवर्सल एजुकेशन’ (सार्वभौमिक शिक्षा) के मॉडल को अपनाना होगा। मदरसों के पास अरबों का इंफ्रास्ट्रक्चर और इमारते हैं। शिक्षकों को चाहिए कि वे इन संसाधनों का उपयोग केवल धार्मिक विशेषज्ञ बनाने के लिए न करें, बल्कि इसे ‘ब्रॉड-बेस्ड एजुकेशन’ का केंद्र बनाएं। छात्रों को भाषा (अरबी, उर्दू, अंग्रेजी) एक ‘टूल’ के रूप में सिखाई जाए, न कि रटाई जाए। जब छात्र भाषा सीखेगा, तो वह कुरान और हदीस को खुद पढ़ेगा और बिचौलियों की व्याख्याओं से मुक्त होगा। शिक्षक का दायित्व है कि वह छात्रों को हुनरमंद बनाए ताकि वे समाज पर बोझ या ‘विस्फोटक सामग्री’ न बनें, बल्कि उत्पादक नागरिक बनें।

‘ब्रिज-मेकर’ के रूप में उलेमा: दीन और दुनिया का संतुलन

कट्टरपंथ की प्रक्रिया में ‘अलगाव’ (Alienation) और ‘पीड़ित होने का भाव’ (Victimhood) ईंधन का काम करते हैं। ‘पॉलिटिकल इस्लाम’ की विचारधारा छात्रों को यह समझाती है कि मुसलमानों ने अपनी सत्ता खो दी है और उसे वापस पाना ही जीवन का लक्ष्य है। यह नैरेटिव उन्हें हताशा की ओर धकेलता है। यहाँ मदरसा शिक्षक एक ‘पुल’ (Bridge) का काम कर सकते हैं।

शिक्षक एक ‘सांस्कृतिक अनुवादक’ की भूमिका निभाते हुए छात्रों को समझा सकते हैं कि ‘इकामते-दीन’ (धर्म की स्थापना) का अर्थ राजनीतिक सत्ता हथियाना नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता स्थापित करना है। वे छात्रों को यह समझाने में सक्षम हैं कि भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्षता इस्लाम के विरोधी नहीं हैं, बल्कि ये वे तंत्र हैं जो भारत में पसमांदा और मुस्लिम समाज को सुरक्षा देते हैं।

‘मीसाक-ए-मदीना’ (मदीना का संविधान) का ऐतिहासिक संदर्भ देकर शिक्षक बता सकते हैं कि पैगंबर ने भी बहु-धार्मिक समाज में नागरिक समझौते के तहत जीवन व्यतीत किया था। यह ऐतिहासिक उदाहरण छात्रों के मन में ‘काफिर बनाम मोमिन’ की बाइनरी (द्वैतवाद) को तोड़ता है और उन्हें सहिष्णु बनाता है।

इसके अलावा, क्योंकि मदरसों में आवासीय व्यवस्था होती है, शिक्षक छात्रों के मनोविज्ञान को समझने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में होते हैं। वे छात्रों के ‘संरक्षक’ होते हैं। वे छात्रों के व्यवहार में आने वाले किसी भी सूक्ष्म बदलाव को—जैसे हिंसात्मक बातें करना या संदिग्ध साहित्य पढ़ना—तुरंत पहचान सकते हैं। यह एक मानवीय ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ है। एक संवेदनशील शिक्षक ऐसे छात्र को डांटने या पुलिस को सौंपने के बजाय, उसे पास बुलाकर, उसकी शंकाओं का समाधान कर सकता है। वह उसे बता सकता है कि जज्बात में आकर हिंसा करना बहादुरी नहीं, बल्कि धर्म की मूल आत्मा के खिलाफ है।

शिक्षक सशक्तिकरण और आगे की राह

यद्यपि मदरसा शिक्षक डी-रेडिकलाइजेशन की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, लेकिन वर्तमान में वे कई प्रणालीगत चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अशराफ नेतृत्व द्वारा संचालित मदरसा प्रबंधन अक्सर गरीब पसमांदा शिक्षकों और छात्रों की आधुनिक जरूरतों की अनदेखी करता है। सबसे बड़ी चुनौती ‘संसाधनों का अभाव’ और ‘सम्मान की कमी’ है।

अगर हम चाहते हैं कि मदरसा शिक्षक कट्टरपंथ के खिलाफ ढाल बनें, तो हमें उन्हें सशक्त बनाना होगा।

* वेतन और सम्मान: जब आधुनिक विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों को समय पर वेतन नहीं मिलता, तो छात्रों को लगता है कि आधुनिक शिक्षा का कोई महत्व नहीं है। इसे बदलना होगा।

* प्रशिक्षण: उलेमा को आधुनिक दुनिया की चुनौतियों और ‘डिजिटल साक्षरता’ में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। कट्टरपंथ का जहर अब किताबों से ज्यादा इंटरनेट के माध्यम से फैलता है। शिक्षकों को पता होना चाहिए कि ऑनलाइन प्रोपेगेंडा कैसे काम करता है।

* पाठ्यक्रम में सुधार: शिक्षकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाने वाली चीजें आज के दौर के लिए प्रासंगिक हों। जो हिस्से (जैसे युद्ध कालीन आदेश) आज गलत संदर्भ दे सकते हैं, उन्हें ऐतिहासिक संदर्भ के साथ ही पढ़ाया जाए।

यह स्वीकार करना होगा कि मदरसे की चारदीवारी के भीतर, शिक्षक की आवाज सबसे बुलंद होती है। कोई भी बाहरी शोर उस आवाज को नहीं दबा सकता। हमें मदरसों को बंद करने की वकालत करने के बजाय, उनके ‘उद्देश्य’ को बदलने की वकालत करनी चाहिए। उन्हें धार्मिक कट्टरता की नर्सरी से बदलकर ‘मानवता और कौशल’ के केंद्रों में तब्दील करना होगा। जब एक मदरसा शिक्षक अपनी कक्षा में खड़े होकर कहता है कि “एक सच्चा मुसलमान वही है जिसके हाथ और जुबान से दूसरे इंसान सुरक्षित रहें” और साथ ही वह छात्र को विज्ञान और तर्क की कसौटी पर परखना सिखाता है, तो वह देश की सुरक्षा में एक सैनिक जितना ही बड़ा योगदान दे रहा होता है। यह वैचारिक लड़ाई हथियारों से नहीं, बल्कि एक सही और समावेशी शिक्षा से ही जीती जा सकती है।

अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं