Category: Geo Politics

Challenging the Grand Mufti: Defending Women’s Public Agency

A recent controversy over regressive statements about women’s public participation highlights a deeper struggle within Muslim society over gender justice, religious interpretation, and constitutional rights. Drawing on Quranic principles, Islamic history, and contemporary examples, this article challenges patriarchal readings that confine women to domestic spaces. It also centers Pasmanda women, whose struggles with gender, caste, and economic inequality demand grassroots empowerment, education, dignity, and economic independence within India’s constitutional framework.

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तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी

तालिबान द्वारा लागू नया कानून न्याय नहीं, बल्कि एक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। घरेलू हिंसा की सीमित परिभाषा और न्यायिक प्रक्रियाओं में भेदभाव, इस्लामी मूल्यों—अदल (न्याय) और रहमत (दया)—के विपरीत है। यह स्पष्ट करता है कि कठोर कबीलाई परंपराओं को धर्म का रूप देकर समाज में असमानता को वैध ठहराया जा रहा है।

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तेहरान: सिनेमा के परदे पर कूटनीति और नैरेटिव का खेल

फिल्म ‘तेहरान’ केवल एक जासूसी थ्रिलर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और नैरेटिव की जटिल परतों को उजागर करने का माध्यम बनती है। यह दिल्ली 2012 धमाके को आधार बनाकर ईरान, इज़राइल और अमेरिका के रिश्तों को एक खास नजरिए से प्रस्तुत करती है, जहाँ सिनेमा ‘सॉफ्ट पावर’ बनकर दर्शकों की सोच को प्रभावित करता है। ऐसे में जरूरी है कि दर्शक मनोरंजन के साथ इसके वैचारिक पक्ष को भी समझें।

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ईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश

2026 में ईरान–इजराइल–अमेरिका तनाव केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि धर्म, सत्ता और नैरेटिव का जटिल गठजोड़ बन चुका है। आधुनिक हथियारों के बावजूद संघर्ष को “प्रकाश बनाम अंधकार” या ‘अर्मागेडन’ जैसी धार्मिक अवधारणाओं में ढाला जा रहा है। यह खतरनाक प्रवृत्ति युद्ध को नैतिक वैधता देती है, जहाँ मानवाधिकार पीछे छूट जाते हैं और विनाश को ‘पवित्र’ बना दिया जाता है।

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ए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और अमेरिकी नैरेटिव

कैथरीन बिगेलो की A House of Dynamite एक रोमांचक थ्रिलर होते हुए भी गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी फिल्म है। यह तकनीकी सटीकता और ‘रियल टाइम’ तनाव के जरिए दर्शक को बांधती है, लेकिन साथ ही अमेरिकी सुरक्षा नैरेटिव को वैध ठहराने का सूक्ष्म प्रयास करती है। फिल्म डर को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है, जिससे युद्ध और आक्रामकता को नैतिक ठहराया जाता है, यही इसे महज सिनेमा नहीं बल्कि एक विचारधारात्मक बयान बनाता है।

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मध्य-पूर्व की राजनीति और पाकिस्तान का खेल

मध्य-पूर्व की राजनीति अक्सर “मुस्लिम उम्मत” के नारों में लिपटी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत में यह राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और सत्ता की कठोर राजनीति से संचालित होती है। खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था, पश्चिमी ताकतों पर उनकी निर्भरता और पाकिस्तान की “सैन्य सेवा” वाली भूमिका इसी यथार्थ को उजागर करती है। अगर पाकिस्तान ईरान के खिलाफ किसी युद्ध में उतरता है, तो यह केवल दो देशों का टकराव नहीं होगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को झकझोर सकता है।

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थर्ड टेंपल और ग्रेटर इज़राइल

इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष केवल भू-राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि धार्मिक विचारधाराओं से भी प्रभावित है। क्रिश्चियन जायनिज्म, खासकर अमेरिका और यूरोप के कुछ इवेंजेलिकल ईसाइयों में प्रचलित, इज़राइल के अस्तित्व और विस्तार को बाइबिल की भविष्यवाणियों से जोड़कर देखता है। “ग्रेटर इज़राइल”, “थर्ड टेंपल” और मसीह के पुनरागमन जैसी अवधारणाएँ इस सोच का हिस्सा हैं, जिसने पश्चिमी राजनीति और मध्य-पूर्व की जटिल बहसों को गहराई से प्रभावित किया है।

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Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Legal Claims

The Taliban’s new “Criminal Procedure Code for Courts” has raised serious concerns among human rights observers, particularly regarding women’s rights and legal equality in Afghanistan. Critics argue that the framework normalizes domestic abuse, imposes unfair evidentiary burdens on women, and reflects tribal customs rather than broader Islamic principles. From an Islamic scholarly perspective, the debate highlights the urgent need to distinguish between divine ethical teachings and human interpretations, reaffirming justice, compassion, and education as core Islamic values.

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तेहरान का अंधेरा: तानाशाही के दमन और विदेशी साम्राज्यवाद के बीच पिसता ईरान

ईरान जनवरी 2026 में गंभीर संकट से गुजर रहा है—इंटरनेट बंद है, सड़कों पर दमन जारी है और 500 से अधिक मौतों व हजारों गिरफ्तारियों ने हालात को गृहयुद्ध जैसी स्थिति बना दिया है। जनता महंगाई, मुद्रा गिरावट और अमेरिकी प्रतिबंधों से उत्पन्न आर्थिक तबाही के खिलाफ भूख के विद्रोह में उतर आई है। दूसरी ओर अमेरिका और इज़रायल इस अस्थिरता को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए भुनाना चाहते हैं, ताकि ईरान को कमजोर कर सत्ता परिवर्तन कराया जा सके। ईरानी अवाम मौजूदा शासन और बाहरी हस्तक्षेप—दोनों के बीच पिस रही है, जबकि देश की संप्रभुता खतरे में है।

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