लेखिका ~ डॉ. उज़्मा खातून
मुफ़्ती शमाइल नदवी और जावेद अख़्तर के बीच हालिया बहस ने ख़ुदा के वजूद (अस्तित्व) पर एक पुरानी चर्चा को फिर से ज़िंदा कर दिया है। इस विमर्श को ईमान की ‘तार्किक ज़रूरत’ और सबूतों की ‘संदेहपूर्ण मांग’ के बीच एक टकराव की तरह दिखाया गया। हालाँकि यह बहस देखने में एकदम आधुनिक लगी, लेकिन हक़ीक़त में यह हमारी उस शानदार और ज़िंदा-दिल इस्लामी बौद्धिक परंपरा का हिस्सा है जो हज़ारों साल पुरानी है। तारीख़ गवाह है कि इस्लाम में ख़ुदा की तलाश कभी ‘अंधी पैरवी’ (Blind Obedience) का नाम नहीं रही, बल्कि यह विचारों का एक ऐसा मैदान था जहाँ ‘अक़्ल’ को अपने ख़ालिक (सृष्टिकर्ता) को पहचानने का सबसे बड़ा ज़रिया माना गया। आज के दौर के संशयवाद (Skepticism) से बहुत पहले, मुस्लिम उलेमा और दार्शनिक यूनानी, ईरानी और हिंदुस्तानी दर्शन के साथ संवाद कर रहे थे। यह इस बात का सबूत है कि माबूद (ईश्वर) की तलाश जितनी दिल से जुड़ी है, उतनी ही दिमाग़ से भी। ‘इल्म-अल-कलाम’ (Speculative Theology) का यह सफ़र सिखाता है कि इस्लाम में ईमान का मक़सद सवालों को कुचलना नहीं, बल्कि हक़ीक़त की गहराई में उतरकर उनके जवाब तलाशना है।
सियासी कशमकश से अक़्ल की बुनियाद तक
इस्लाम में ख़ुदा के वजूद पर सलीक़े से बहस करने का आगाज़ उमय्यद और अब्बासी दौर की सियासी और तहज़ीबी उथल-पुथल से हुआ। शुरुआत में यह बहस इंसानी इख़्तियार (Free Will) और अल्लाह के इंसाफ़ पर टिकी थी। उस दौर के हुक्मरान अक्सर ‘जब्रियों’ (Jabrites) का साथ देते थे, जिनका मानना था कि इंसान के बस में कुछ नहीं और सब कुछ पहले से तय है यह एक ऐसी सोच थी जिससे उनकी सत्ता को मज़बूती मिलती थी कि उनका राजा बनना भी ख़ुदा का तय किया हुआ फैसला है। इसके बरअक्स (विपरीत), ‘क़दरिया’ (Qadrites) इंसानी आज़ादी के अलमबरदार बनकर उभरे। उनका तर्क था कि एक इंसाफ़ करने वाला ख़ुदा इंसान को अपने अमल चुनने की ताक़त (क़द्र) ज़रूर देता है। यह बात कुरान के क़िस्सों में भी साफ़ दिखती है। जब अल्लाह ने इबलीस को आदम (अ.स.) के आगे सजदा करने का हुक्म दिया, तो इबलीस ने ‘इनकार’ को चुना। इसी तरह जब आदम (अ.स.) को उस पेड़ के पास जाने से रोका गया, तो उन्होंने अपनी मर्ज़ी का इस्तेमाल किया। ये वाक़ये इस बात की मिसाल हैं कि ख़ुदा ने अपनी मख़लूक (सृष्टि) को अपने हुक्म से हटने तक की आज़ादी दी है, ताकि ‘जवाबदेही’ और ‘इंसाफ़’ का कोई मतलब रहे। बिना इस आज़ादी के, जन्नत या जहन्नम के फैसले का कोई तर्क नहीं बचता।

जैसे-जैसे इस्लामी दुनिया एक आलमी साम्राज्य बनी, इसका सामना यूनान और ईरान जैसी मंझी हुई तहज़ीबों से हुआ। मुस्लिम विद्वानों को उन ‘दहरिया’ (नास्तिक/भौतिकवादी) दार्शनिकों के सवालों का जवाब देना था जो रूह और ख़ालिक को नहीं मानते थे। इसी चुनौती से ‘मुअतज़िला’ (Mu’tazila) विचारधारा पैदा हुई, जिन्हें हम इस्लाम के शुरुआती तर्कशास्त्री कह सकते हैं। उनका यक़ीन था कि अगर किसी के पास कोई आसमानी किताब न भी पहुँचे, तो भी इंसान सिर्फ़ अपनी अक़्ल के दम पर एक ख़ुदा (तौहीद) को पहचान सकता है। यह सिलसिला ख़लीफ़ा अल-मामून के दौर में ‘बैत-अल-हिक़मत’ (House of Wisdom) के साथ अपनी ऊंचाइयों पर पहुँचा। उस दौर में अरस्तू (Aristotle) के तर्कशास्त्र का इस्तेमाल ईमान के किले को मज़बूत करने के लिए किया गया। यह वह दौर था जब ब्रह्मांड को एक ‘अव्यवस्थित संयोग’ के बजाय एक ‘तयशुदा निज़ाम’ (Order) के रूप में देखा गया, जिसे इंसानी ज़हन समझ सकता है।
इसी विमर्श के बीच ‘हिस्स-ए-अख़लाक़ी’ (Moral Sense) की बात आती है। विद्वानों का मानना है कि इंसान के भीतर एक कुदरती कूपस (दिशा-सूचक) है जो सही-गलत को पहचानता है। अक्सर ‘बुराई की समस्या’ (Problem of Evil) को लेकर यह सवाल उठाया जाता है कि दुनिया में दुख और ज़ुल्म क्यों है? इस्लाम इसका जवाब ‘इरादा-ओ-इख़्तियार’ और ‘आज़माइश’ (परीक्षा) के फ़र्क़ से देता है। इंसान को आज़ादी और अक़्ल का बोझ दिया गया है, जबकि जानवर इस ज़िम्मेदारी से बाहर हैं। इस्लाम मुकम्मल त्याग के बजाय ‘रहम’ (Kindness) पर ज़ोर देता है। एक इंसान बिल्ली पर ज़ुल्म करके जहन्नम जा सकता है और प्यासे कुत्ते को पानी पिलाकर जन्नत पा सकता है। यह ‘हिक़मत’ (Hidden Wisdom) का निज़ाम है जिसे समझना ज़रूरी है।
दार्शनिक दलीलें और आज का दौर
भौतिकवादियों को जवाब देने के लिए मुस्लिम मुतकल्लिमीन (Theologians) ने कुछ ऐसी दलीलें दीं जो आज भी उतनी ही मज़बूत हैं:

* दलील-अल-हुदूद: इमाम ग़ज़ाली जैसे विद्वानों का तर्क था कि जो चीज़ शुरू होती है, उसका कोई न कोई कारण (Cause) ज़रूर होता है। चूंकि कायनात (ब्रह्मांड) वक़्त के साथ बदल रही है, इसलिए इसका कोई ‘आदि कारण’ यानी ख़ुदा ज़रूर होगा।
* वाजिब-अल-वजूद: इब्न सीना ने कहा कि यह दुनिया ‘मुमकिन’ है (यह हो भी सकती थी और नहीं भी)। इसलिए इसे वजूद में लाने के लिए एक ऐसी हस्ती चाहिए जो ‘स्वतंत्र’ और ‘अटल’ हो।
* दलील-अल-इनाया: इब्न रुश्द ने कायनात के बारीक निज़ाम और उसकी बनावट (Design) को एक अक़्लमंद बनाने वाले के सबूत के तौर पर पेश किया।
इन विचारकों ने अक़्ल को ईमान का दुश्मन नहीं, बल्कि वह ‘अंदरूनी नबी’ माना जो बाहर के नबी की बात पर मुहर लगाता है। इसके अलावा, इंसान के अंदर की आवाज़ (नफ़्स-अल-लव्वामा) भी उस रचयिता की तरफ़ इशारा करती है।
हमें आज के ‘नए नास्तिकवाद’ (New Atheism) से होशियार रहना चाहिए, जो अक्सर एक खास राजनीतिक एजेंडे के तहत सिर्फ़ इस्लाम को निशाना बनाता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया की बड़ी जंगें ज़मीन और ताक़त की हवस के लिए लड़ी गईं, मज़हब के लिए नहीं। हमें धर्म की उस ‘बुनियादी क्रांतिकारी रूह’ को फिर से ज़िंदा करना होगा जो मजलूमों और गरीबों के साथ खड़ी होती थी। विज्ञान हमें यह तो बता सकता है कि दुनिया ‘कैसे’ बनी, लेकिन दुनिया ‘क्यों’ बनी, इसका जवाब सिर्फ़ रूहानियत और ख़ुदा के पास है। इस्लाम का ख़ुदा हमें प्रकृति की ‘ख़ामोश किताब’ और कुरान की ‘बोलती किताब’ दोनों को पढ़ने और अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करने की दावत देता है।
लेखिका परिचय: डॉ. उज़मा ख़ातून, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व संकाय सदस्य, एक लेखिका, स्तंभकार और सामाजिक विचारक हैं।