Author: Arif Aziz

उर्दू: एक सांप्रदायिक पहचान,सांप्रदायिक विभाजन से लेकर सामाजिक न्याय तक

यह लेख उर्दू भाषा के सांप्रदायिककरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, हिंदी-उर्दू विवाद और औपनिवेशिक नीतियों की पड़ताल करता है। साथ ही यह दिखाता है कि पसमांदा आंदोलन उर्दू को केवल मुस्लिम पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, साझा सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक अधिकारों की भाषा के रूप में पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। लेख उर्दू के भविष्य को समावेशी और बहुलवादी दृष्टि से देखने की वकालत करता है।

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Gen Z का ऐतिहासिक आंदोलन: अपमान से उठी चिंगारी और सत्ता की जवाबदेही

NEET-UG 2026 के कथित पेपर लीक के बाद शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ आंदोलन भारत के छात्र इतिहास का एक अनोखा अध्याय बन गया। व्यंग्य से शुरू हुई यह मुहिम लाखों युवाओं की आवाज़ बनकर परीक्षा सुधार, जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता की मांग तक पहुँची। 37 दिनों के लोकतांत्रिक संघर्ष ने दिखाया कि Gen Z मीम्स, सोशल मीडिया और अहिंसक प्रतिरोध के ज़रिए भी सत्ता को जवाबदेह बनाने की क्षमता रखती है।

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जनादेश, डिजिटल विरोध और भारतीय राजनीति का नया ग्रामर

NEET-UG विवाद ने सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की खामियों को नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता, युवाओं के बढ़ते आक्रोश और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। डिजिटल दौर में Gen Z ने मीम्स और सोशल मीडिया के ज़रिए विरोध की नई शैली गढ़ी, जिसने पारंपरिक आंदोलनों से अलग पहचान बनाई। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि पारदर्शिता, त्वरित सुधार और जनता से संवाद ही संस्थाओं में विश्वास बनाए रखने की सबसे मजबूत नींव हैं।

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अशराफी आधिपत्य के बरक्स पसमांदा अस्मिता का घोषणापत्र: ‘भारत के दलित मुसलमान’

डॉ. मो. अयुब राईन की पुस्तक *भारत के दलित मुसलमान* भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जातिगत असमानता, सामाजिक बहिष्कार और पसमांदा समुदाय के ऐतिहासिक उत्पीड़न का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक अशराफ़ी वर्चस्व, धर्मांतरण के बाद भी जारी जातिगत भेदभाव और सामाजिक न्याय के सवालों को तथ्यात्मक ढंग से सामने लाती है। साथ ही, यह पसमांदा समाज की गरिमा, अधिकार और समान भागीदारी के लिए वैचारिक चेतना तथा व्यापक बहुजन एकजुटता की आवश्यकता पर बल देती है।

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मुस्लिम समाज की जाति व्यवस्था: आखिर कितनी कठोर?

पसमांदा आंदोलन भारतीय मूल के पिछड़े और दलित मुसलमानों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का आंदोलन है। इसका उद्देश्य उन्हें लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व के प्रति जागरूक करना है। यह आंदोलन सामाजिक बहिष्कार और वर्चस्व की राजनीति के विरुद्ध समान अवसर, न्याय और आत्मसम्मान की आवाज़ बुलंद करता है, ताकि पसमांदा समाज मुख्यधारा में अपनी उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सके।

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