शरीयत, संवैधानिक समानता और पसमांदा समाज का भविष्य
लेख समान नागरिक संहिता (UCC) को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के संदर्भ में देखता है। लेखक तर्क देते हैं कि विविधता के नाम पर भेदभावपूर्ण पर्सनल लॉ को जारी रखना गलत है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा महिलाओं को होता है। वे बताते हैं कि शरीयत अपरिवर्तनीय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से समयानुकूल व्याख्याओं से बदली है। मुस्लिम देशों और भारतीय न्यायपालिका के उदाहरण सुधार की संभावना दिखाते हैं। लेख में अशराफ नेतृत्व द्वारा बहुसंस्कृतिवाद और ‘कफू’ के जातिवादी ढांचे को ढाल की तरह इस्तेमाल करने की आलोचना है। लेखक के अनुसार UCC पसमांदा महिलाओं के लिए समानता, गरिमा और संवैधानिक नागरिकता की दिशा में आवश्यक कदम है।
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