Author: Arif Aziz

मई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी

मई दिवस के संघर्ष से लेकर आज के भारत तक, मजदूरों की लड़ाई सिर्फ मजदूरी की नहीं बल्कि इज्जत, बराबरी और पहचान की भी रही है। यह लेख खास तौर पर पसमांदा मजदूरों की उस अनदेखी दुनिया को सामने लाता है, जहाँ जाति, पेशा और गरीबी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने हुनर खत्म हो रहे हैं, लेकिन नए मौके अब भी इन तबकों की पहुँच से दूर हैं।

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वाइस: अफगनिस्तान और ईराक को तबाह करने वाले डिक चेनी की कहानी

फिल्म *Vice* के बहाने यह लेख सत्ता, युद्ध और कॉर्पोरेट गठजोड़ की भयावह सच्चाई को उजागर करता है। डिक चेनी के किरदार के जरिए दिखाया गया है कि कैसे डर, मीडिया और राजनीति का इस्तेमाल कर युद्धों को मुनाफे के कारोबार में बदला गया। यह सिर्फ एक फिल्म समीक्षा नहीं, बल्कि लोकतंत्र, जनमत और हथियार उद्योग के खतरनाक गठबंधन पर गहरी वैचारिक पड़ताल है।

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लायन ऑफ द डेजर्ट: सिनेमा के पर्दे पर प्रतिरोध और उसूलों की अमर दास्तान

*लायन ऑफ द डेजर्ट* (1981) प्रतिरोध, उसूल और इंसानी गरिमा की अदम्य दास्तान है। मुस्तफा अक्काद की यह फिल्म उमर मुख्तार के संघर्ष के जरिए दिखाती है कि जब एक कौम आज़ादी ठान ले, तो साम्राज्यवादी ताकतें भी उसे झुका नहीं सकतीं। सादगी, यथार्थ और गहरे भावों से सजी यह कृति बताती है कि असली जीत हथियारों से नहीं, बल्कि अडिग इरादों और इंसाफ के जज़्बे से हासिल होती है।

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परंपरा से संस्थागत विज्ञान तक: भारत में होम्योपैथी की यात्रा

भारत में होम्योपैथी का सफर परंपरा, विश्वास और आधुनिक विज्ञान के संगम की कहानी है। सस्ती, सुलभ और समग्र दृष्टिकोण के कारण यह गाँवों से शहरों तक लोगों के जीवन का हिस्सा बनी। आज वैज्ञानिक शोध, डेटा और नियमों के साथ यह पद्धति खुद को साबित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जहाँ शरीर और मन दोनों की सेहत को समान महत्व दिया जाता है।

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तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी

तालिबान द्वारा लागू नया कानून न्याय नहीं, बल्कि एक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। घरेलू हिंसा की सीमित परिभाषा और न्यायिक प्रक्रियाओं में भेदभाव, इस्लामी मूल्यों—अदल (न्याय) और रहमत (दया)—के विपरीत है। यह स्पष्ट करता है कि कठोर कबीलाई परंपराओं को धर्म का रूप देकर समाज में असमानता को वैध ठहराया जा रहा है।

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