Author: Arif Aziz

सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौता और भारत का संतुलनकारी रास्ता

पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य हाल में बड़े बदलाव से गुज़रा है। पहले जहां अरब देशों का सुरक्षा फोकस ईरान पर था, अब इज़राइल की आक्रामक नीतियाँ और गाज़ा संघर्ष चिंता का केंद्र बन गई हैं। दोहा पर इज़राइली हमले और अमेरिकी निष्क्रियता ने खाड़ी देशों को अमेरिका पर अविश्वास की ओर धकेला। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब–पाकिस्तान सामरिक रक्षा समझौता (SMDA) हुआ, जिससे पाकिस्तान को आर्थिक-सैन्य सहयोग और सऊदी को सुरक्षा विकल्प मिला। भारत के लिए यह चुनौती और अवसर दोनों है। फिलिस्तीन पर भारत का समर्थन उसे अरब देशों में नैतिक व रणनीतिक बढ़त दिला रहा है।

Read More

कौन थे श्री नियामतुल्लाह अंसारी और क्या था रज़ालत टैक्स?

श्री नियामतुल्लाह अंसारी (1903–1970) स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक न्याय के योद्धा थे। गोरखपुर में जन्मे, उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़कर आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। वे कांग्रेस और मोमिन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति का विरोध करते रहे। उनका सबसे बड़ा योगदान “रज़ालत टैक्स” के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई थी, जो पसमांदा मुसलमानों पर थोपे गए अपमानजनक कर का अंत कर गई। 1939 में अदालत ने उनके पक्ष में ऐतिहासिक फ़ैसला दिया। अंसारी ने दबे-कुचले समाज को सम्मान दिलाया और समानता की मशाल जलाकर सामाजिक क्रांति की राह प्रशस्त की।

Read More

Hazratbal Shrine Controversy over National Emblem and Islamic Teachings

Here’s a 100-word summary:

Hazratbal Dargah in Srinagar, a sacred shrine for Kashmiri Muslims, became the center of controversy when the Waqf Board placed India’s national emblem inside its prayer hall during renovations. Though intended to beautify and symbolize unity, many worshippers saw it as political interference in a holy space, sparking protests. The issue reflects Kashmir’s history of faith intertwined with politics, from the 1963 relic crisis to militancy in the 1990s. Islamic teachings do not ban images outright, but mixing state symbols with worship violates religious sensitivity. The incident highlights the need for dialogue, respect for faith, and separation of politics from spirituality.

Read More

सोशल मीडिया से सड़कों तक जनरेशन-ज़ेड का तूफ़ान

दक्षिण एशिया में युवा आंदोलनों ने सत्ता संरचनाओं को चुनौती दी है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हालिया उथल-पुथल युवाओं की साझा चेतना और भ्रष्टाचार-विरोधी आवाज़ को दर्शाती है। नेपाल में जनरेशन-ज़ेड ने सोशल मीडिया प्रतिबंध, बेरोजगारी और वंशवाद के खिलाफ आंदोलन किया, जिससे राजनीतिक बदलाव हुए। बालेन शाह जैसे नेता सामने आए और सरकार को प्रतिबंध हटाने व सुधार की दिशा में कदम उठाने पड़े। स्थिर भविष्य के लिए युवाओं की आकांक्षाओं को शामिल कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करना अनिवार्य है।

Read More