Category: Education and Empowerment

क्या पितृसत्ता ने मर्दों से उनका सुकून छीन लिया है?

हर साल 8 मार्च को महिला अधिकारों पर बहस होती है, लेकिन इस चर्चा में एक सच अक्सर छूट जाता है—पितृसत्ता सिर्फ औरतों को ही नहीं, मर्दों को भी कैद करती है। बचपन से ही लड़कों को सख्त और निडर बनने की सीख दी जाती है, जिससे उनकी भावनाएँ दब जाती हैं। यह व्यवस्था उन्हें ताकत का भ्रम तो देती है, मगर बदले में उनसे उनकी संवेदनशीलता, सुकून और इंसानियत छीन लेती है।

Read More

Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Legal Claims

The Taliban’s new “Criminal Procedure Code for Courts” has raised serious concerns among human rights observers, particularly regarding women’s rights and legal equality in Afghanistan. Critics argue that the framework normalizes domestic abuse, imposes unfair evidentiary burdens on women, and reflects tribal customs rather than broader Islamic principles. From an Islamic scholarly perspective, the debate highlights the urgent need to distinguish between divine ethical teachings and human interpretations, reaffirming justice, compassion, and education as core Islamic values.

Read More

मुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की व्याख्या की ज़रूरत क्यों है?

क़ुरआन ईश्वरीय वह्य है, जबकि तफ़्सीर मानवीय समझ की कोशिश। इतिहास में अधिकतर व्याख्याएँ पुरुष दृष्टिकोण से गढ़ी गईं, जिससे महिलाओं के अनुभव हाशिये पर रहे। क़ुरआन नैतिक बराबरी, इंसाफ़ और रहम की बात करता है। इसलिए ज़रूरी है कि वह्य और व्याख्या में फर्क पहचानकर, समकालीन संदर्भ में आयतों को उसके व्यापक नैतिक संदेश की रोशनी में समझा जाए—ताकि परंपरा को बरक़रार रखते हुए न्यायपूर्ण पुनर्विचार संभव हो।

Read More

Why Muslim Society Needs the Qur’an from Women’s Perspectives

The Qur’an is divine revelation, but tafsir is a human effort shaped by history. For centuries, interpretation was largely male-dominated, limiting women’s perspectives. Yet the Qur’an addresses believing men and women equally, emphasizing justice and mercy. Re-examining contested verses like 4:34 through context and language does not alter revelation; it refines understanding. If moral responsibility is shared, interpretive responsibility must be shared as well.

Read More

समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद

पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।

मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।

Read More

भारतीय संविधान: पसमांदा समाज की ढाल और हमारे वजूद का दस्तावेज

26 जनवरी वह दिन है जब भारत ने संविधान के ज़रिये बराबरी, आज़ादी और न्याय पर आधारित नया सामाजिक समझौता अपनाया। संविधान ने सत्ता को जनता के अधीन किया, बहुमत और सरकार पर कानून की लगाम लगाई और जाति-धर्म आधारित अन्याय तोड़ा। इसी ने पसमांदा समाज को नागरिक अधिकार, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और न्यायिक सुरक्षा दी। संविधान से ही पसमांदा सुरक्षित है, और पसमांदा की सुरक्षा से भारत मज़बूत।

Read More

शरीयत, संवैधानिक समानता और पसमांदा समाज का भविष्य

लेख समान नागरिक संहिता (UCC) को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के संदर्भ में देखता है। लेखक तर्क देते हैं कि विविधता के नाम पर भेदभावपूर्ण पर्सनल लॉ को जारी रखना गलत है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा महिलाओं को होता है। वे बताते हैं कि शरीयत अपरिवर्तनीय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से समयानुकूल व्याख्याओं से बदली है। मुस्लिम देशों और भारतीय न्यायपालिका के उदाहरण सुधार की संभावना दिखाते हैं। लेख में अशराफ नेतृत्व द्वारा बहुसंस्कृतिवाद और ‘कफू’ के जातिवादी ढांचे को ढाल की तरह इस्तेमाल करने की आलोचना है। लेखक के अनुसार UCC पसमांदा महिलाओं के लिए समानता, गरिमा और संवैधानिक नागरिकता की दिशा में आवश्यक कदम है।

Read More

Reclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context

Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.

Read More

क्या ईश्वर है?

मुफ्ती शमाइल नदवी और जावेद अख्तर के बीच ईश्वर के अस्तित्व को लेकर हुई बहस ने आस्था और तर्क के टकराव को उजागर किया। नदवी ने सृष्टि की व्यवस्था को ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण बताया, जबकि अख्तर ने ठोस सबूतों की मांग करते हुए दुनिया में दुख और अन्याय पर सवाल उठाए। लेख में कैरन आर्मस्ट्रांग के हवाले से कहा गया कि ईश्वर को विज्ञान से नहीं, अनुभूति से समझा जाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि बहस ईश्वर के होने-न होने से अधिक इस बात पर है कि धर्म और विज्ञान इंसानियत व न्याय की सेवा कर रहे हैं या नहीं।

Read More
Loading