Category: Education and Empowerment
शरीयत, संवैधानिक समानता और पसमांदा समाज का भविष्य...
Posted by Arif Aziz | Dec 31, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
इस्लाम में अक़्ल, बहस और ख़ुदा की तलाश...
Posted by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
क्या ईश्वर है?
Posted by Arif Aziz | Dec 24, 2025 | Education and Empowerment, Miscellaneous | 0 |
मुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्य...
Posted by Arif Aziz | Dec 11, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
जब बच्चा ज़िद पर अड़ जाए...
Posted by Arif Aziz | Dec 9, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
भारतीय संविधान: पसमांदा समाज की ढाल और हमारे वजूद का दस्तावेज
by Arif Aziz | Jan 24, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
26 जनवरी वह दिन है जब भारत ने संविधान के ज़रिये बराबरी, आज़ादी और न्याय पर आधारित नया सामाजिक समझौता अपनाया। संविधान ने सत्ता को जनता के अधीन किया, बहुमत और सरकार पर कानून की लगाम लगाई और जाति-धर्म आधारित अन्याय तोड़ा। इसी ने पसमांदा समाज को नागरिक अधिकार, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और न्यायिक सुरक्षा दी। संविधान से ही पसमांदा सुरक्षित है, और पसमांदा की सुरक्षा से भारत मज़बूत।
Read Moreचूहा दौड़ और हमारी ज़िंदगी
by Arif Aziz | Jan 9, 2026 | Education and Empowerment, Miscellaneous | 0 |
लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर अमेरिकी हास्य कलाकार लिली टॉमलिन का एक मशहूर कथन है “चूहा दौड़ की सबसे बड़ी...
Read Moreशरीयत, संवैधानिक समानता और पसमांदा समाज का भविष्य
by Arif Aziz | Dec 31, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
लेख समान नागरिक संहिता (UCC) को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के संदर्भ में देखता है। लेखक तर्क देते हैं कि विविधता के नाम पर भेदभावपूर्ण पर्सनल लॉ को जारी रखना गलत है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा महिलाओं को होता है। वे बताते हैं कि शरीयत अपरिवर्तनीय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से समयानुकूल व्याख्याओं से बदली है। मुस्लिम देशों और भारतीय न्यायपालिका के उदाहरण सुधार की संभावना दिखाते हैं। लेख में अशराफ नेतृत्व द्वारा बहुसंस्कृतिवाद और ‘कफू’ के जातिवादी ढांचे को ढाल की तरह इस्तेमाल करने की आलोचना है। लेखक के अनुसार UCC पसमांदा महिलाओं के लिए समानता, गरिमा और संवैधानिक नागरिकता की दिशा में आवश्यक कदम है।
Read Moreइस्लाम में अक़्ल, बहस और ख़ुदा की तलाश
by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
लेखिका ~ डॉ. उज़्मा खातून मुफ़्ती शमाइल नदवी और जावेद अख़्तर के बीच हालिया बहस ने ख़ुदा के वजूद...
Read MoreReclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context
by Arif Aziz | Dec 24, 2025 | Education and Empowerment, Miscellaneous, Political | 0 |
Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.
Read Moreक्या ईश्वर है?
by Arif Aziz | Dec 24, 2025 | Education and Empowerment, Miscellaneous | 0 |
मुफ्ती शमाइल नदवी और जावेद अख्तर के बीच ईश्वर के अस्तित्व को लेकर हुई बहस ने आस्था और तर्क के टकराव को उजागर किया। नदवी ने सृष्टि की व्यवस्था को ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण बताया, जबकि अख्तर ने ठोस सबूतों की मांग करते हुए दुनिया में दुख और अन्याय पर सवाल उठाए। लेख में कैरन आर्मस्ट्रांग के हवाले से कहा गया कि ईश्वर को विज्ञान से नहीं, अनुभूति से समझा जाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि बहस ईश्वर के होने-न होने से अधिक इस बात पर है कि धर्म और विज्ञान इंसानियत व न्याय की सेवा कर रहे हैं या नहीं।
Read More‘ना’ कहने का जादू
by Arif Aziz | Dec 19, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
लेखक~ अब्दुल्लाह मंसूर हमारी परवरिश और समाज ने हमें बचपन से एक ही बात सिखाई है “सबका कहा...
Read Moreमुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्यों है?
by Arif Aziz | Dec 11, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
इस्लामिक फेमिनिज्म मुस्लिम समाजों में बराबरी और लैंगिक न्याय को पुनर्जीवित करने वाला आंदोलन है, जो कुरान और हदीस की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देकर उनके नैतिक उसूलों—इंसाफ, तौहीद और तक़वा—को केंद्र में रखता है। अस्मा बरलास, अमीना वदूद और फातिमा मेरनिसी जैसी विद्वान दिखाती हैं कि कई भेदभावपूर्ण प्रथाएँ धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक पितृसत्ता की उपज हैं। यह आंदोलन कानूनी व सामाजिक सुधारों, विशेषकर पारिवारिक कानूनों में समानता की मांग करता है। आलोचनाओं के बावजूद, इस्लामिक फेमिनिज्म औरतों के अधिकार, गरिमा और समान भागीदारी को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास है।
Read Moreजब बच्चा ज़िद पर अड़ जाए
by Arif Aziz | Dec 9, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
यह लेख बच्चों की “ज़िद” को भावनात्मक संघर्ष के रूप में समझने पर ज़ोर देता है। लेखक बताता है कि बच्चे तर्क से नहीं, भावना से प्रतिक्रिया करते हैं। उनकी भावनाओं को स्वीकार करना, सही शब्दों में पहचान देना, “लेकिन” की जगह सहयोगी भाषा इस्तेमाल करना, विश लिस्ट या ड्राइंग जैसे उपाय अपनाना और सबसे ज़रूरी—खुद शांत रहना—इन सब से बच्चा सुरक्षित महसूस करता है और धीरे-धीरे बेहतर व्यवहार सीखता है।
Read Moreडी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका
by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।
Read MoreFrom Salwar-Kameez to Hijab: The Crisis of Indian Muslim Identity
by Arif Aziz | Dec 4, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
A subtle cultural shift is reshaping Indian Muslim identity as “Arabization” or “Gulfization” grows through Gulf migration, petro-funded ideology, global media, and aspirational class markers. This trend replaces India’s syncretic Ganga-Jamuni Islamic heritage—rooted in Sufism, local customs, and shared cultural practices—with stricter, standardized doctrines. Changing dress, food habits, and especially the veil symbolize this shift, shaped by caste and patriarchy: historically an Ashraf privilege, now promoted as universal piety, marginalizing Pasmanda culture. Politically, visible “Arab” markers intensify Islamophobic narratives, creating a cycle of resistance. True empowerment lies in embracing an Islam harmonious with India’s indigenous traditions.
Read Moreमानव जीवन में आस्था और विवेक का संतुलन
by Arif Aziz | Nov 14, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
लेखक: अब्दुल्लाह मंसूर हम सब कभी न कभी खुद से यह सवाल पूछते हैं—हमारे जीवन का मकसद क्या है? हम...
Read More