Category: Political
वैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधि...
Posted by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
स्वभाव से हत्यारा नहीं होते इंसान...
Posted by Arif Aziz | Feb 5, 2026 | Culture and Heritage, Movie Review, Political | 0 |
ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल...
Posted by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Legal Claims
by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Geo Politics | 0 |
The Taliban’s new “Criminal Procedure Code for Courts” has raised serious concerns among human rights observers, particularly regarding women’s rights and legal equality in Afghanistan. Critics argue that the framework normalizes domestic abuse, imposes unfair evidentiary burdens on women, and reflects tribal customs rather than broader Islamic principles. From an Islamic scholarly perspective, the debate highlights the urgent need to distinguish between divine ethical teachings and human interpretations, reaffirming justice, compassion, and education as core Islamic values.
Read Moreखामेनेई के बाद का ईरान: रिजजीम चेंज’ के पश्चिमी भ्रम और सैन्य तंत्र की उभरती चुनौती
अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले में अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या ने पश्चिम एशिया की राजनीति को झकझोर दिया है। यह घटना केवल एक नेता की मृत्यु नहीं, बल्कि चार दशकों से चले आ रहे ईरानी सत्ता-विन्यास और ‘प्रतिरोध की धुरी’ के युग का अंत भी है। लेख में इस हमले के बाद बने रणनीतिक शून्य, IRGC के बढ़ते प्रभाव, अरब देशों की प्रतिक्रिया, AI-आधारित युद्ध और ईरान के भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है।
Read Moreवैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार
by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।
Read Moreएपस्टीन फाइल्स : आधुनिक लोकतंत्र की नैतिक विफलता
यह लेख जेफ्री एपस्टीन केस को एक व्यक्ति के अपराध से आगे, सत्ता-पैसा-न्याय व्यवस्था के पूरे सिस्टम की विफलता के रूप में देखता है। लेखक बताता है कि कैसे पावर एलीट, संस्थाएं, मीडिया और न्याय व्यवस्था ने अपराध को वर्षों तक संरक्षण दिया। असली समस्या व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस ढांचे की है जो अमीर और ताक़तवर लोगों को बचाता है। समाधान सिस्टम की जवाबदेही और सतत निगरानी में है।
Read Moreस्वभाव से हत्यारा नहीं होते इंसान
by Arif Aziz | Feb 5, 2026 | Culture and Heritage, Movie Review, Political | 0 |
यह लेख ब्लैक मिरर के एपिसोड “मेन अगेंस्ट फायर” के ज़रिये सत्ता, तकनीक और हिंसा के रिश्ते की पड़ताल करता है। यह दिखाता है कि इंसान स्वभाव से हिंसक नहीं होता, बल्कि भाषा, विचारधारा और तकनीक के माध्यम से उसे ऐसा बनाया जाता है। जब शब्द इंसान को “कीड़ा”, “आतंकी” या “कोलैटरल डैमेज” में बदल देते हैं, तब हत्या नैतिक अपराध नहीं, बल्कि “ज़रूरी काम” बन जाती है। लेख इतिहास और समकालीन उदाहरणों के सहारे बताता है कि अमानवीकरण की यही प्रक्रिया युद्ध, भीड़-हिंसा और नरसंहार की ज़मीन तैयार करती है। अंततः यह चेतावनी देता है कि सबसे ख़तरनाक हथियार मिसाइल नहीं, बल्कि वह सोच है जो इंसान को दूसरे का कत्ल जायज़ लगने लगे।
Read Moreओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल
by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।
Read Moreतेहरान का अंधेरा: तानाशाही के दमन और विदेशी साम्राज्यवाद के बीच पिसता ईरान
by Arif Aziz | Jan 19, 2026 | Geo Politics, Political | 0 |
ईरान जनवरी 2026 में गंभीर संकट से गुजर रहा है—इंटरनेट बंद है, सड़कों पर दमन जारी है और 500 से अधिक मौतों व हजारों गिरफ्तारियों ने हालात को गृहयुद्ध जैसी स्थिति बना दिया है। जनता महंगाई, मुद्रा गिरावट और अमेरिकी प्रतिबंधों से उत्पन्न आर्थिक तबाही के खिलाफ भूख के विद्रोह में उतर आई है। दूसरी ओर अमेरिका और इज़रायल इस अस्थिरता को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए भुनाना चाहते हैं, ताकि ईरान को कमजोर कर सत्ता परिवर्तन कराया जा सके। ईरानी अवाम मौजूदा शासन और बाहरी हस्तक्षेप—दोनों के बीच पिस रही है, जबकि देश की संप्रभुता खतरे में है।
Read Moreवेनेजुएला का संकट: तेल, तख्तापलट और ‘जंगल राज’
वेनेजुएला में 3 जनवरी 2026 को अमेरिकी फौज द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले इस देश पर अमेरिका ड्रग तस्करी और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाता है, लेकिन विश्लेषकों के अनुसार असली मकसद तेल संसाधनों पर नियंत्रण है। 200 साल पुराने ‘मुनरो सिद्धांत’ की तर्ज पर किया गया यह हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन माना जा रहा है। अमेरिका की 900 से अधिक आर्थिक पाबंदियों ने वेनेजुएला को पंगु बनाया, जबकि चीन–रूस ने कार्रवाई की निंदा की है। यह संकट साम्राज्यवाद बनाम संप्रभुता की नई जंग बन चुका है।
Read MoreReclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context
by Arif Aziz | Dec 24, 2025 | Education and Empowerment, Miscellaneous, Political | 0 |
Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.
Read Moreबांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धांतों की एक परीक्षा
by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
लेखक – डॉ. उज़्मा खातून (नोट: यह लेख मूलतः अंग्रेजी में “Hindu Persecution in Bangladesh:...
Read Moreवंदे मातरम विरोध: पसमांदा को मुख्यधारा से काटने की साजिश
by Arif Aziz | Dec 18, 2025 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेख में वंदे मातरम विवाद को धर्म या राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि अशराफ़ नेतृत्व की भावनात्मक और डर-आधारित राजनीति बताया गया है। लेखक के अनुसार यह विवाद पसमांदा मुसलमानों के असली मुद्दों—शिक्षा, रोज़गार और हिस्सेदारी—से ध्यान भटकाने का साधन है। इतिहास में 1937 के समझौते से यह प्रश्न सुलझ चुका था, फिर भी इसे बार-बार उछाला जाता है। अशराफ़ वर्ग अपनी सत्ता बचाने के लिए अलगाव को बढ़ावा देता है, जबकि पसमांदा समाज का असली संघर्ष गरीबी, जहालत और राजनीतिक शोषण के खिलाफ होना चाहिए।
Read Moreव्हाइट-कॉलर’ आतंक: शिक्षित दिमाग में ज़हरीली सोच
by Arif Aziz | Nov 24, 2025 | Poetry and literature, Political | 0 |
Here is a **100-word summary**:
दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर का विस्फोट दिखाता है कि आतंकवाद अब सिर्फ गरीब या अशिक्षितों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षित पेशेवर भी कट्टरपंथ का शिकार हो रहे हैं। यह साबित करता है कि चरमपंथ का मूल आर्थिक नहीं, वैचारिक ज़हर है, जो लोगों को ‘बड़े मकसद’ और ‘हम बनाम वे’ की सोच में उलझा देता है। इसका असर पूरे मुस्लिम समुदाय पर अविश्वास बढ़ाता है। समाधान तकनीकी नहीं, वैचारिक और सामाजिक है—जैसे विश्वविद्यालयों में डी-रेडिकलाइज़ेशन, सकारात्मक डिजिटल अभियान और पसमांदा आंदोलन, जो भारतीय मुसलमानों को समानता, राष्ट्रहित और संवैधानिक रास्ते से जोड़ता है।
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