लेखक : अब्दुल्लाह मंसूर
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि बाज़ार के बीचों-बीच आपका बच्चा किसी खिलौने के लिए ज़मीन पर लेटकर रोने लगे? वह हाथ-पांव पटक रहा हो और आस-पास से गुजरने वाले लोग आपको ऐसे देख रहे हों जैसे आपने कोई गुनाह कर दिया हो? या फिर घर पर सिर्फ टीवी या मोबाइल बंद करने की बात पर ऐसा माहौल बन जाए जैसे कोई बड़ा युद्ध छिड़ गया हो?
एक पिता होने के नाते, जिसकी दो बेटियाँ हैं, मैं इन हालात को बहुत अच्छी तरह पहचानता हूँ। हम जितना उन्हें चुप कराते हैं, वे उतना ही तेज़ रोते हैं। इसका कारण यह है कि उस वक्त वे हमारी बात सुन ही नहीं रहे होते। वे अपनी भावनाओं के बोझ तले दबे होते हैं। उनका नन्हा सा दिमाग अभी तर्क या लॉजिक समझने की हालत में नहीं होता। यहीं से पेरेंटिंग (परवरिश) की सबसे ज़रूरी बात शुरू होती है। एक नियम जिसे हम सबको याद रखना चाहिए बच्चे की हर भावना सही है, लेकिन हर व्यवहार सही नहीं। पाँच या छह साल की उम्र तक बच्चों का दिमाग अभी बन ही रहा होता है। जिसे हम “जिद” कहते हैं, वह अक्सर उनके अंदर चल रहा भावनाओं का तूफ़ान होता है। हमारा काम उस तूफ़ान को रोकना नहीं, बल्कि उस तूफ़ान में उनके साथ खड़े रहना है।
भावनाओं को स्वीकारना
जब बच्चा गुस्से, डर या दुख में होता है, तो उसे कोई लेक्चर नहीं चाहिए। उसे बस एक तसल्ली चाहिए कि कोई उसे समझ रहा है। हम अक्सर गलती से कह देते हैं “इसमें रोने वाली क्या बात है?” बच्चा यह सुनकर और टूट जाता है। इसके बजाय, हमें थोड़ा झुककर बच्चे की आँखों में देखना चाहिए और उसकी भावना को एक नाम देना चाहिए— “तुम बहुत नाराज़ हो”, “तुम परेशान हो क्योंकि तुम्हारा खिलौना टूट गया”, या “तुम उदास हो क्योंकि तुम्हें पार्क में और खेलना था।” जैसे ही आप उनकी भावना को पहचानकर उसे बोलते हैं, जादू जैसा असर होता है। बच्चा अचानक शांत होने लगता है क्योंकि उसे महसूस होता है कि मेरे माता-पिता मुझे समझ गए हैं।
यहाँ भाषा का एक छोटा सा बदलाव बहुत काम आता है। अक्सर हम बच्चे को समझते तो हैं, पर साथ में ‘लेकिन’ जोड़ देते हैं। जैसे: “मैं जानता हूँ तुम्हें खेलना है, लेकिन अब घर चलना है।” ‘लेकिन’ शब्द सुनते ही बच्चे को लगता है कि आप उसकी इच्छा के खिलाफ हैं। इसकी जगह आप कहें: “तुम मज़े से खेल रही हो और तुम्हारा मन नहीं भर रहा… समस्या यह है कि अब अंधेरा हो रहा है और हमें घर पहुँचना है।” जब आप ऐसा कहते हैं, तो बच्चा आपको अपना दुश्मन नहीं मानता। वह देखता है कि आप उसके साथ हैं, और ‘अंधेरा’ होना एक समस्या है जिसे मिलकर हल करना है।
कभी-कभी सिर्फ बोलना काफी नहीं होता, खासकर जब बच्चा किसी खिलौने के लिए बाज़ार में अड़ जाए। ऐसे में ‘विश लिस्ट’ (Wish List) बनाना एक शानदार तरीका है। अगर आप सीधे ‘ना’ कहेंगे, तो उसे बुरा लगेगा। इसके बजाय कहें “वाह! यह खिलौना तो सच में बहुत शानदार है। चलो, हम इसे तुम्हारी विश लिस्ट में लिख लेते हैं।” बच्चों के लिए, अपनी इच्छा को लिखा हुआ देखना, उस चीज़ को पा लेने जैसा ही संतोष देता है। इसी तरह, अगर बच्चा गुस्से में है, तो उसे एक कागज़ दें और कहें कि वह अपना गुस्सा उस पर बनाकर निकाले। यह तनाव बाहर निकालने का एक सुरक्षित और असरदार तरीका है।
माता-पिता की शांति ही बच्चे की सुरक्षा है
सच तो यह है कि बच्चे की ज़िद उतनी बड़ी समस्या नहीं होती, जितनी हमारी अपनी प्रतिक्रिया (Reaction)। जब बच्चा रोता है, तो हमारा धैर्य जवाब दे जाता है और हम भी चिल्लाने लगते हैं। लेकिन याद रखें, एक अशांत मन दूसरे अशांत मन को शांत नहीं कर सकता। अगर हम भी बच्चे के साथ चिल्लाने लगेंगे, तो उसे लगेगा कि स्थिति सच में खतरे वाली है और वह और ज़्यादा डरेगा।
ऐसे समय में सबसे पहला काम है—खुद को 10 सेकंड का समय दें। एक गहरी सांस लें। खुद को याद दिलाएं कि “मेरा बच्चा बुरा नहीं है, वह बस अपनी भावना संभाल नहीं पा रहा।” जब हम शांत रहते हैं, तो हमारी आवाज़ और चेहरे का भाव बच्चे को बताता है कि सब ठीक है। हमारी शांति उसे भी धीरे-धीरे शांत कर देती है।
बाज़ार या में के सामने यह मुश्किल होता है क्योंकि हमें शर्म महसूस होती है। हमें लगता है लोग क्या सोचेंगे। उस वक्त लोगों की परवाह छोड़ दें। अपने बच्चे से कहें, “मैं देख रहा हूँ तुम परेशान हो, चलो पहले एक लंबी सांस लेते हैं।” यह वाक्य आपको और बच्चे, दोनों को पटरी पर ले आता है।
ज़िद को एक मुसीबत की तरह न देखें, बल्कि इसे एक मौके की तरह देखें—बच्चे के करीब जाने का और उसे यह सिखाने का कि अपनी भावनाओं को कैसे संभालना है। जब हम उसके जज्बातों को नकारने के बजाय उन्हें स्वीकार करते हैं और साथ खड़े रहते हैं, तो बच्चा खुद-ब-खुद बेहतर व्यवहार सीखने लगता है। यही समझ माता-पिता और बच्चे के रिश्ते को गहराई देती है और घर का माहौल अधिक शांत और सुरक्षित बनाती है।