डॉ. उज़्मा ख़ातून

आज के सियासी माहौल में ‘काफ़िर’ शब्द को उसकी रूहानी और धार्मिक गहराई से काटकर उसे एक सियासी हथियार बना दिया गया है। इसका इस्तेमाल भीड़ को उकसाने, सोशल मीडिया पर ज़हर उगलने और आपसी नफ़रत फैलाने के लिए किया जा रहा है। आलोचक अक्सर इसे इस बात का पक्का सबूत बताते हैं कि इस्लाम दुनिया को “मानने वालों” और “दुश्मनों” के दो हिस्सों में बांटता है। टीवी बहसों, झूठी ख़बरों और नफ़रत भरे नैरेटिव ने एक ऐसी संकीर्ण सोच पैदा कर दी है जिससे आम मुसलमानों को कट्टरपंथी दिखाया जाता है। दूसरी तरफ़, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में चरमपंथी गुटों ने भी इस शब्द का हुलिया बिगाड़कर हिंसा और सामाजिक बहिष्कार को जायज़ ठहराया है। इस भाषाई दुरुपयोग का सबसे ज़्यादा बोझ दुनिया भर के आम और मासूम मुसलमानों पर पड़ता है, जबकि सच्चाई यह है कि क़ुरआन में इस शब्द का इस्तेमाल बहुत बारीकी और नैतिकता के साथ किया गया है।

इस भटकाव को समझने के लिए इसकी जड़ तक जाना ज़रूरी है। अरबी में ‘क-फ-र’ का असली मतलब है “ढकना” या “छिपाना”। पुराने समय में यह शब्द उस किसान के लिए इस्तेमाल होता था जो बीज को मिट्टी में छिपा देता था। क़ुरआन के संदर्भ में, यह किसी खास समुदाय की पहचान नहीं, बल्कि एक इंसानी रवैया है—यानी सच्चाई को जान-बूझकर छिपाना या उसे मानने से इनकार करना। दिलचस्प बात यह है कि क़ुरआन इसी शब्द को खुदा के लिए सकारात्मक रूप में भी इस्तेमाल करता है, जब वह इंसानों के गुनाहों को “छिपाता” या “माफ़” (यकफिरु) करता है। इससे साफ़ है कि यह शब्द इंसान के पैदा होने या बिरादरी से नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उसके व्यवहार से जुड़ा है।

मज़हबी ठेकेदारी और ‘तकफीर’ की सीमाएं

एक बड़ी गलतफ़हमी यह है कि हर गैर-मुस्लिम खुद-ब-खुद “काफ़िर” है। लेकिन गंभीर इस्लामी विद्वान यह साफ़ करते हैं कि ‘कुफ़्र’ कोई ऐसा लेबल नहीं है जिसे हर बाहर वाले पर चिपका दिया जाए। जावेद अहमद ग़ामिदी जैसे विद्वान समझाते हैं कि कुफ़्र तब साबित होता है जब कोई व्यक्ति सच्चाई को पूरी तरह जान लेने और समझ लेने के बाद भी सिर्फ अपनी ज़िद और अहंकार में उसे झुठला दे। इसे ‘इतमाम-ए-हुज्जत’ (सच्चाई का पूरी तरह उजागर होना) कहते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह दर्जा ईश्वरीय दूतों (पैग़म्बरों) की मौजूदगी से जुड़ा था। आज किसी भी इंसान के पास यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे के दिल में झांककर उसके ईमान का फैसला करे। इसलिए, किसी को भी ‘काफ़िर’ घोषित करना (तकफीर) खुदा की तय की हुई सीमाओं को लांघना है, क्योंकि यह मज़हबी ठेकेदारी का वह रूप है जो सिर्फ खुदा का अधिकार है।

भारत जैसे साझा संस्कृति (बहुलवादी) वाले समाज में यह फर्क समझना बहुत ज़रूरी है। क़ुरआन लगातार मुसलमानों को दूसरों के ईमान की ‘पुलिसी’ करने से रोकता है। हज़रत मूसा और फ़िरऔन की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। फ़िरऔन जैसे ज़ालिम के पास भी खुदा ने मूसा को यह कहकर भेजा: “उससे नरमी से बात करना, शायद वह नसीहत मान ले” (क़ुरआन 20:44)। अगर फ़िरऔन जैसे शख्स के लिए भी तहज़ीब और नरमी का हुक्म है, तो आज किसी को धर्म के नाम पर अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं है।

पैग़म्बर मोहम्मद (स.) ने खुद इस सिद्धांत को मज़बूत किया। जब उनसे विरोधियों को बद्दुआ देने को कहा गया, तो उन्होंने कहा, “मुझे लानत भेजने वाला नहीं, बल्कि रहमत (दया) बनाकर भेजा गया है।” सच्चा मुसलमान वह है जो न गाली देता है, न किसी को नीचा दिखाता है। ‘काफ़िर’ शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करना ईमान नहीं, बल्कि पैग़म्बरी चरित्र (अख़लाक़) के साथ गद्दारी है। क़ुरआन ने यहूदियों और ईसाइयों को ‘अहल-ए-किताब’ (आसमानी किताबों को मानने वाले) कहकर पुकारा, जिससे उनकी धार्मिक जड़ों को सम्मान दिया गया।

कानूनी नैतिकता और सामाजिक प्रभाव

इस्लामी कानून (फ़िक़्ह) भी ऐसी ज़ुबान पर सख्त पाबंदी लगाता है जिससे दूसरों के सम्मान को ठेस पहुंचे। हनफ़ी और हंबली पंथ के बड़े विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि किसी गैर-मुस्लिम की बेइज़्ज़ती करना गुनाह है। इब्न नुजैम जैसे विद्वान ने यहाँ तक कहा है कि किसी को “ओ काफ़िर” कहना भी इसलिए मना है क्योंकि यह सामने वाले को मानसिक पीड़ा देता है। यह कानूनी परंपरा क़ुरआन के इस सीधे आदेश पर आधारित है: “एक-दूसरे को बुरे नामों से मत पुकारो” (49:11)।

क़ुरआन तो यह भी कहता है कि दूसरों के पूज्य देवताओं को बुरा न कहो, ताकि जवाब में वे खुदा की शान में गुस्ताखी न करें। आज के दौर में, जहाँ मुसलमान एक असुरक्षित अल्पसंख्यक के रूप में रह रहे हैं, वहां इन धार्मिक शब्दों का गैर-ज़िम्मेदाराना इस्तेमाल न केवल अनैतिक है बल्कि खतरनाक भी है। यहाँ चरमपंथियों की भूमिका को पहचानना होगा। ISIS और दक्षिण एशिया के कुछ उग्रवादी गुटों ने ‘तकफीर’ को सियासी हथियार बनाकर कत्लेआम मचाया। उनके इन कामों ने मुसलमानों को अंदर से कमज़ोर किया और दुनिया में ‘इस्लामोफोबिया’ को खाद-पानी दिया।

अंत में, ‘काफ़िर’ शब्द के सही क़ुरआनी अर्थ को बहाल करना केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि यह इस्लामी नैतिकता को बचाने की कोशिश है। समस्या मज़हबी शब्दावली में नहीं, बल्कि इसके गलत इस्तेमाल में है। लेखकों, शिक्षकों और विचारकों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे बताएं कि धर्म का मतलब गाली-गलौज या शोर-शराबा नहीं है। एक बंटे हुए समाज में मुसलमानों को खुद अपने मज़हबी शब्दों के गलत इस्तेमाल के खिलाफ खड़ा होना होगा। मानवीय गरिमा की रक्षा करना कोई आधुनिक दिखावा नहीं, बल्कि एक क़ुरआनी फ़र्ज़ है। संयम, स्पष्टता और नैतिक साहस के ज़रिए ही हम इन पवित्र अवधारणाओं को तबाही का हथियार बनने से रोक सकते हैं और उन्हें उनके असली उद्देश्य—तैयार मार्गदर्शन, न्याय और रहमत—पर वापस ला सकते हैं।

लेखिका परिचय: डॉ. उज़्मा ख़ातून, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व संकाय सदस्य, प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक विचारक हैं।