लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर

ब्लैक मिरर एक ऐसी सीरीज है जो विज्ञान और तकनीक के बहाने सत्ता और इंसान के रिश्ते को टटोलती है। यह हमें इस बात से नहीं डराती कि मशीनें इंसानों पर कब्जा कर लेंगी, बल्कि यह दिखाती है कि इंसान कितनी आसानी से मशीनों के पीछे छिपकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। मोबाइल, टीवी और लैपटॉप की काली स्क्रीन हमारे दौर का आईना बन चुकी हैं। इन्हीं स्क्रीन के जरिए हम युद्ध देखते हैं, लाशें देखते हैं और फिर अगले वीडियो पर स्क्रॉल कर जाते हैं। हिंसा हमारे सामने होती है, लेकिन वह हमें महसूस नहीं होती। ब्लैक मिरर का एपिसोड “मेन अगेंस्ट फायर” इसी सुन्न होती संवेदना की कहानी है। यह कहानी महज़ कल्पना नहीं है, बल्कि इसका आधार एस. एल. ए. मार्शल की मशहूर किताब है। मार्शल ने एक बहुत पते की बात कही थी कि एक आम इंसान स्वभाव से किसी दूसरे इंसान को मारना नहीं चाहता। उसके अंदर एक नैतिक रोक होती है। अगर इंसान पैदाइशी कातिल होता, तो फौजियों को गोली चलाना सिखाने के लिए इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती।

मार्शल की यह बात सत्ता को परेशान करती है, क्योंकि अगर इंसान स्वभाव से हिंसक नहीं है, तो फिर सरकारों और विचारधाराओं को यह मानना पड़ेगा कि नफरत कुदरती नहीं, बल्कि सिखाई हुई है। इसीलिए इतिहास में हर सत्ता ने सबसे पहले भाषा को बदला। जर्मनी में नाजी शासन ने यहूदियों को “कीड़ा” और “बीमारी” कहा। जब इंसान को बीमारी मान लिया जाए, तो उसे खत्म करना इलाज बन जाता है। रवांडा में रेडियो के जरिए एक समुदाय को “तिलचट्टा” कहा गया और कुछ ही महीनों में लाखों लोग मार दिए गए। जान लेने से पहले हमेशा शब्दों का जाल बुना गया। “मेन अगेंस्ट फायर” इसी खेल को तकनीक के जरिए दिखाता है। सैनिकों के दिमाग में लगी चिप उन्हें सामने वाले इंसान को राक्षस के रूप में दिखाती है। उसकी भाषा समझ नहीं आती, उसका चेहरा डरावना दिखता है। असल दुनिया में यही काम विचारधाराएं करती हैं। वे सामने वाले की इंसानियत को धुंधला कर देती हैं। जब इंसान दिखाई ही नहीं देगा, तब उसे मारते समय कोई पछतावा भी नहीं होगा।

आज के दौर का युद्ध इसका सबसे साफ उदाहरण है। बम गिराने वाले सैनिक अक्सर हजारों किलोमीटर दूर बैठे होते हैं। स्क्रीन पर बस एक बिंदु हिलता है, हुक्म आता है और मिसाइल छोड़ दी जाती है। इसे नागरिकों की हत्या नहीं, बल्कि “कोलैटरल डैमेज” कहा जाता है। भाषा यहाँ भी वही काम कर रही है हत्या को एक तकनीकी घटना बना देना। यह भी एक तरह की चिप है, जो हमारे विवेक को सुला देती है। यह सिलसिला सिर्फ सरकारों तक ही नहीं है। हर वह सोच जो अपने मकसद को सबसे पवित्र मानती है, वह अपने अनुयायियों को धीरे-धीरे हिंसक बनाती है। साम्यवादी क्रांतियों में “वर्ग-शत्रु” की बात हो या धार्मिक कट्टरपंथ में “काफिर” और “देशद्रोही” जैसे शब्द जब किसी को इन श्रेणियों में डाल दिया जाए, तो उसकी हत्या को खुदा या राष्ट्र की मर्जी बता दिया जाता है।

दक्षिण एशिया में पिछले कुछ सालों में यह सब साफ तौर पर देखा जा सकता है। भीड़ द्वारा की गई हत्याएं अचानक नहीं होतीं। उनसे पहले बरसों तक एक समुदाय को “घुसपैठिया”, “बोझ” या “खतरा” बताया जाता है। जब यह भाषा आम हो जाती है, तब सड़क पर किसी इंसान को मारते समय हमलावर को यह नहीं लगता कि वह किसी की जान ले रहा है, उसे लगता है कि वह व्यवस्था की सफाई कर रहा है। आज यही खेल फिलिस्तीन से लेकर म्यांमार तक ही नहीं, बल्कि इतिहास के कई युद्धों में दोहराया गया है। कहीं किसी आबादी को “आतंकियों की शरणस्थली” कहा गया, कहीं “राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा” बताया गया। इराक युद्ध से पहले पूरी एक क़ौम को “विनाशकारी हथियारों” से जोड़ा गया। बम गिरने से पहले टीवी स्टूडियो में डर पैदा किया गया, नक़्शों पर दुश्मन बनाया गया, ताकि जब शहर राख बनें तो सवाल न उठें। मरने वाले बच्चे बच्चे नहीं रहे, वे “कोलैटरल डैमेज” बन गए।

बाल्कन युद्धों में, वियतनाम में, लैटिन अमेरिका की सैन्य तानाशाहियों में भी यही पैटर्न दिखता है: पहले इंसान को अमानवीय बनाया जाता है, फिर उसकी मौत को जायज़ ठहराया जाता है। जब किसी समूह को “बाहरी”, “घुसपैठिया” या “अपरिहार्य नुकसान” कहा जाने लगता है, तो उसके अधिकार नहीं, उसकी मौजूदगी ही अपराध बन जाती है। आधुनिक समाजशास्त्र में ग्रेगरी स्टैंटन के ’10 स्टेजस् ऑफ़ जनोसाईड ‘ भी यही रेखांकित करते हैं कि नरसंहार अचानक नहीं होता, बल्कि अमानवीकरण की एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है, जहाँ इंसान की आँखों पर नफरत की एक ‘तकनीकी’ या ‘वैचारिक’ पट्टी बांध दी जाती है।”

इस एपिसोड का सैनिक तब टूटता है जब उसकी चिप ख़राब हो जाती है। यह पल बेहद अहम है। जैसे ही तकनीक और प्रचार का पर्दा हटता है, इंसानियत लौट आती है। वह देखता है कि जिन्हें वह राक्षस समझ रहा था, वे तो डरे हुए, भूखे और बेबस लोग हैं। लेकिन सत्ता को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो सच देख सकें। उसे चाहिए ऐसे लोग जो बिना सोचे हुक्म मानें। इसीलिए हर राज्य, हर विचारधारा, हर साम्राज्य सवाल करने वालों से डरता है। क्योंकि सोचने वाला इंसान बंदूक से नहीं, नॉरेटिव से लड़ता है और यही सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।  ब्लैक मिरर हमें चेतावनी देता है कि हमारे समय की चिप कोई धातु का टुकड़ा नहीं है। वह विचार है, वह प्रोपेगेंडा है और वह लगातार दोहराई जाने वाली नफरत की भाषा है। यह एपिसोड हमें हमारे आज से रूबरू कराता है और बताता है कि सबसे खतरनाक हथियार मिसाइल नहीं, बल्कि वह सोच है जो इंसान को यह यकीन दिला दे कि दूसरे का कत्ल जरूरी है।

लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।