लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
कैथरीन बिगेलो की नई फिल्म ‘A House of Dynamite’ एक ऐसी सिनेमाई रचना है जिसे देखते समय आपकी सांसें अटक सकती हैं, लेकिन जैसे ही फिल्म खत्म होती है, आपके दिमाग में सवालों का एक तूफान खड़ा हो जाता है। जब मैं इस फिल्म की परतों को उधेड़ता हूं, तो मुझे इसमें तकनीक और डर का एक ऐसा घालमेल नजर आता है जिसे समझना आज के वैश्विक हालातों में बेहद जरूरी है। यह फिल्म महज एक काल्पनिक थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह उस अमेरिकी प्रोपेगेंडा की नई और बहुत ही परिष्कृत मिसाल है, जो यह दावा करती है कि दुनिया का अस्तित्व सिर्फ अमेरिका की सलामती में ही सुरक्षित है। पूरी फिल्म इसी केंद्र के इर्द-गिर्द बुनी गई है कि अमेरिका पर आने वाला आंच पूरी दुनिया को भस्म कर सकती है।
फिल्म की शुरुआत बिना किसी भूमिका के होती है और वह आपको सीधे उस नर्क में झोंक देती है जिसकी कल्पना से ही रूह कांप जाए। शिकागो पर एक परमाणु मिसाइल गिरने वाली है और अमेरिका के पास जवाबी कार्रवाई या बचाव के लिए केवल 19 मिनट हैं। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका ‘रियल टाइम’ प्रस्तुतीकरण है। आमतौर पर सिनेमा में समय को खींच दिया जाता है, लेकिन यहाँ बिगेलो ने हर सेकंड को घड़ी की टिक-टिक के साथ महसूस कराया है। रेबेका फर्ग्यूसन और एंथनी रामोस के अभिनय ने इस 19 मिनट के तनाव को इतना असली बना दिया है कि दर्शक खुद को उस कमांड सेंटर का हिस्सा महसूस करने लगता है। यह हिस्सा एक सिनेमाई मास्टरक्लास है क्योंकि यह बिना किसी बड़े विस्फोट के केवल संवादों और चेहरों के पसीने से तबाही का खौफ पैदा कर देता है।
तकनीकी रूप से फिल्म इतनी सटीक है कि पूर्व नाटो अधिकारियों और सैन्य विशेषज्ञों ने इसकी ‘डरावनी हद तक’ सराहना की है। व्हाइट हाउस का वह सिचुएशन रूम, जहाँ दुनिया के सबसे ताकतवर लोग बैठते हैं, उसे जिस बारीकी से दिखाया गया है वह काबिले तारीफ है। परमाणु ‘फुटबॉल’ वह चमड़े का बैग जो राष्ट्रपति के साथ साये की तरह चलता है और उसके भीतर की ‘प्रेसिडेंशियल डिसीजन हैंडबुक’ का चित्रण इतना वास्तविक है कि लगता है फिल्म निर्माताओं ने पेंटागन के अंदरूनी कमरों में जाकर रिसर्च की हो। लेकिन यहीं पर मेरा विचार इस प्रशंसा से अलग होता है। यह तकनीकी सटीकता सिर्फ फिल्म को बेहतर बनाने के लिए नहीं है, बल्कि यह दर्शक के दिमाग में यह यकीन पैदा करने के लिए है कि जो कुछ पर्दे पर हो रहा है, वह हकीकत में भी कभी भी हो सकता है। यह ‘हाइपर-रियलिज्म’ दरअसल डर को बेचने का एक तरीका है। जब हम देखते हैं कि DEFCON का स्तर 4 से बढ़कर 1 की तरफ बढ़ रहा है, (यह अमेरिकी सेना की ‘सतर्कता का मीटर’ है, जो यह बताता है कि देश पर हमला होने का खतरा कितना बड़ा है और सेना को लड़ने के लिए कितना तैयार रहना है।) तो हमें लगता है कि यह केवल फिल्म की बात नहीं है, बल्कि हमारी अपनी दुनिया का अंत करीब है।
फिल्म में ‘थ्रेट असेसमेंट’ और ‘मिसाइल अटैक कॉन्फ्रेंस’ के दृश्यों को जिस गंभीरता के साथ पेश किया गया है, वह अमेरिका को एक ‘बेचारे पीड़ित’ के रूप में स्थापित करता है। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि परमाणु हथियारों का वास्तविक उपयोग करने वाला एकमात्र देश अमेरिका ही है, लेकिन यहाँ वह खुद को एक रक्षक के तौर पर पेश कर रहा है जो एक मिसाइल के हमले से पूरी मानवता को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है। यह नैरेटिव तब और भी संदेहास्पद हो जाता है जब हम 2026 की वर्तमान हकीकत को देखते हैं। ईरान और इज़राइल के बीच जो युद्ध अभी जारी है, जहाँ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान के बुनियादी ढांचे को तहस-हस किया जा रहा है, यह फिल्म उस तरह की आक्रामकता को एक नैतिक ढाल प्रदान करती है। फिल्म यह संदेश बहुत ही सूक्ष्म तरीके से देती है कि यदि दुश्मन की मिसाइलें हमारे दरवाजे तक आ सकती हैं, तो उन्हें उनके गढ़ में ही खत्म कर देना जायज है। इसलिए अमेरिका और इजराइल ने पहले हमला कर के ईरान को तबाह कर दिया। फिल्म के दृश्य और वर्तमान में होर्मुज स्ट्रेट में जलते तेल टैंकरों की तस्वीरें एक-दूसरे का पूरक बन जाती हैं।
फिल्म की एक बड़ी सिनेमाई कमी इसकी संरचना है, जिसे समीक्षकों ने ‘ट्रिप्टिच’ कहा है। फिल्म एक ही समय और घटना को तीन अलग-अलग नजरियों से दिखाती है। पहली बार में यह प्रयोग बहुत प्रभावशाली लगता है, लेकिन जैसे ही कहानी दोबारा ‘रीसेट’ होती है, फिल्म की ऊर्जा बिखरने लगती है। दर्शक को वही संवाद, वही घबराहट और वही दृश्य दोबारा देखने पड़ते हैं। जब आप एक ही संकट को बार-बार देखते हैं, तो वह तनाव पैदा करने के बजाय उबाऊ होने लगता है। ऐसा लगता है कि फिल्म केवल एक ‘अकादमिक अभ्यास’ बनकर रह गई है, जहाँ किरदारों के जज्बात से ज्यादा मशीनों की कार्यप्रणाली पर ध्यान दिया गया है। पटकथा इतनी कमजोर हो जाती है कि राष्ट्रपति जैसे कद्दावर पद पर बैठा व्यक्ति भी “यह पागलपन है” जैसे घिसे-पिटे संवाद बोलता नजर आता है।
चरित्र चित्रण के मामले में भी फिल्म काफी कमजोर साबित होती है। इड्रिस एल्बा ने राष्ट्रपति की भूमिका निभाई है, लेकिन उनके किरदार में वह गहराई नहीं दिखती जिसकी उम्मीद थी। उन्हें अक्सर चिड़चिड़ा, असुरक्षित और अपनी क्षमता से बाहर का व्यक्ति दिखाया गया है। शायद निर्देशक यह दिखाना चाहती थीं कि इतने बड़े पद पर बैठा इंसान भी संकट के समय कितना छोटा महसूस करता है, लेकिन सिनेमाई दृष्टि से यह पात्र एक ‘डमी’ जैसा बनकर रह गया है। यही हाल जारेड हैरिस का है, जो रक्षा सचिव के रूप में केवल अपनी निजी पारिवारिक उलझनों में फंसे नजर आते हैं। पात्रों की ये निजी कहानियां, जैसे किसी का तलाक या किसी का बीमार बच्चा, फिल्म में बहुत ही जबरदस्ती ठूंसी हुई लगती हैं। ये कहानियां पात्रों को मानवीय बनाने के बजाय पटकथा की गति में बाधा डालती हैं। ऐसा लगता है कि बिगेलो ने एक चेकलिस्ट बनाई थी कि किस किरदार को कितनी पारिवारिक समस्या देनी है ताकि वह ‘असली’ लगे, लेकिन वह भावुकता पैदा करने में विफल रहीं।
एक और महत्वपूर्ण बिंदु ‘मिसाइल डिफेंस’ की विफलता है। फिल्म में ‘गोल्डन डोम’ जैसे इजराइल का ‘आरन डोम’ जैसी प्रणालियों को नाकाम होते दिखाया गया है। फिल्म इस तकनीकी सच्चाई को दिखाकर यह भ्रम तो तोड़ती है कि अमेरिका अभेद्य है, लेकिन इस ‘असुरक्षा’ को वह एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है। वह दर्शक को यह संदेश देती है कि चूंकि हम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए हमें हमलावर होने का पूरा हक है। यह वही तर्क है जिसके आधार पर आज ईरान में हजारों आम नागरिक मारे जा रहे हैं और दुनिया भर में तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार पहुंच गई हैं। यह फिल्म एक तरह से उन मिसाइल हमलों की वकालत करती है जो आज पेंटागन 11.3 बिलियन डॉलर खर्च करके ईरान पर कर रहा है।
फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि परमाणु युद्ध केवल बटन दबाने का खेल नहीं है, बल्कि यह उन इंसानों के टूटने की कहानी है जो उन बटनों के पीछे बैठे हैं। लेकिन यह मानवीय पक्ष केवल अमेरिकियों के लिए आरक्षित है। हमें दिखाया जाता है कि एक अमेरिकी मेजर अपने परिवार के लिए कितना चिंतित है, लेकिन हमें उन ईरानी परिवारों के बारे में कुछ नहीं बताया जाता जिनकी दुनिया ‘एपिक फ्यूरी’ जैसे ऑपरेशनों में उजड़ रही है। यह फिल्म का वह पक्षपाती नजरिया है जो इसे एक स्वतंत्र कलाकृति के बजाय एक सरकारी विज्ञापन के करीब ले जाता है। बिगेलो ने जिस तरह से हिंसा को पर्दे पर ‘अमूर्त’ रखा है, वह भी एक चालाकी है। जब हम खून नहीं देखते, तो हमें युद्ध की भयावहता का अहसास नहीं होता, केवल ‘रणनीतिक नुकसान’ का अहसास होता है।
फिल्म ने सैन्य प्रक्रियाओं को तो सही पकड़ा है, लेकिन राजनैतिक बारीकियों में यह चूक गई है। फिल्म में दिखाया गया है कि राष्ट्रपति अकेले ही परमाणु हमले का फैसला ले लेते हैं, जबकि वास्तविकता में इसके लिए कई स्तरों पर परामर्श और कानूनी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। लेकिन फिल्म इसे एक ‘वन मैन शो’ के रूप में इसलिए पेश करती है ताकि राष्ट्रपति के चरित्र को और भी नाटकीय और ‘मसीहा’ जैसा दिखाया जा सके। यह अमेरिकी राष्ट्रपति जैसे डोनाल्ड ट्रंप की छवि को दुनिया के भाग्य विधाता के रूप में चमकाने की एक कोशिश है। फिल्म का अंत भी इसी तरह के एक बड़े सवाल के साथ होता है कि क्या मानवता इस परमाणु साये में जी पाएगी? लेकिन यह सवाल केवल अमेरिका की सुरक्षा के चश्मे से पूछा गया है।
‘A House of Dynamite’ एक ऐसी फिल्म है जो तकनीक और कला के जरिए उस प्रोपेगेंडा को बेच रही है जो अमेरिका की दादागिरी को कायम रखने के लिए जरूरी है। यह आपको यह विश्वास दिलाती है कि अगर अमेरिका का राष्ट्रपति सुरक्षित नहीं है, तो पूरी दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है। फिल्म की अच्छाइयां जैसे कि इसकी तकनीकी सटीकता और शुरुआती 19 मिनट का तनाव, दरअसल उस कड़वे सच को छिपाने के लिए हैं कि यह फिल्म युद्ध को सही ठहराने का एक औजार है। एक जागरूक पाठक के तौर पर हमें यह समझना होगा कि हर वह फिल्म जो हमें डराती है, वह जरूरी नहीं कि हमें सचेत कर रही हो; कई बार वह हमें एक खास दिशा में सोचने के लिए मजबूर कर रही होती है। यह फिल्म सिनेमा से ज्यादा एक राजनीतिक बयान है, जिसे बहुत ही चमक-धमक वाले कागज़ में लपेटकर पेश किया गया है। बिगेलो ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे सैन्य तनाव को फिल्माने में माहिर हैं, लेकिन उन्होंने यह भी दिखा दिया कि वे अमेरिकी सत्ता के नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाली सबसे बड़ी फिल्मकार भी हैं।
इस फिल्म को देखने के बाद आप शायद अमेरिका के लिए सहानुभूति महसूस करें, लेकिन अगर आप एक पल रुककर उन देशों के बारे में सोचें जिन्हें इस फिल्म में केवल ‘टारगेट’ या ‘खतरा’ बताया गया है, तो आपको इस फिल्म का असली और डरावना चेहरा दिखाई देगा। यह फिल्म हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है कि हम अपनी आंखों के सामने हो रहे विनाश को मनोरंजन के रूप में देख रहे हैं और उसे ‘सटीक’ बताकर उसकी तारीफ कर रहे हैं।
लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।