लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर

जॉन अब्राहम की नई फिल्म ‘तेहरान’ सिर्फ एक जासूसी थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनिया भर में चल रहे ‘नैरेटिव’ यानी एक खास तरह की सोच को फैलाने का जरिया है। एक लेखक और चिंतक के तौर पर जब हम इस फिल्म को देखते हैं, तो इसकी तकनीकी चमक-धमक के पीछे एक गहरा राजनीतिक एजेंडा साफ नजर आता है। फिल्म दिल्ली में हुए एक बम धमाके से शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रही आपसी खींचतान तक पहुँच जाती है। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए होती हैं, या फिर वे लोगों के दिमाग में किसी खास मुल्क या समुदाय के लिए नफरत या हमदर्दी पैदा करने का एक सोची-समझी कोशिश हैं? यह फिल्म साल 2012 में दिल्ली में हुए उस धमाके पर आधारित है, जिसने भारत को एक मुश्किल कूटनीतिक मोड़ पर खड़ा कर दिया था। उस वक्त इज़रायली दूतावास की एक कार को निशाना बनाया गया था। फिल्म इस घटना को जिस तरह पेश करती है, उसमें ईरान को सीधे तौर पर एक ‘खतरे’ और ‘आतंक के गढ़’ की तरह दिखाया गया है। यह वही पुराना प्रोपेगेंडा है जिसे दशकों से हॉलीवुड और अब बॉलीवुड के जरिए लोगों के मन में बैठाया जा रहा है कि ईरान पूरी दुनिया के लिए मुसीबत है।

तथ्यों और तकनीकी पहलुओं को देखें तो 13 फरवरी 2012 को दिल्ली के औरंगजेब रोड पर जो धमाका हुआ, वह बेहद शातिराना तरीके से किया गया था। एक बाइक सवार ने चलती हुई टोयोटा इनोवा के पीछे ‘मैग्नेटिक स्टिकी बम’ चिपकाया था। यह ठीक वही तरीका था जिससे तेहरान की सड़कों पर ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों, जैसे मुस्तफा अहमदी रोशन, की हत्या की गई थी। ईरान ने उन हत्याओं का सीधा इल्जाम इज़राइल की जासूसी एजेंसी ‘मोसाद’ पर लगाया था। फिल्म ‘तेहरान’ तर्क देती है कि दिल्ली का धमाका ईरान की ओर से उसी का ‘बदला’ था। लेकिन तकनीकी जांच में कई पेच थे। सीसीटीवी फुटेज धुंधली थी और मुख्य संदिग्धों के बारे में कहा गया कि वे तुरंत देश छोड़कर भाग गए। फिल्म इसी ‘अधूरे सच’ को मोसाद की नजर से ‘पूरा सच’ बनाकर पेश करती है।

यहाँ हमें एडवर्ड सईद के ‘ओरिएंटलिज्म’ के नजरिए को समझना होगा। सईद ने बताया था कि कैसे पश्चिमी देश पूरब के देशों (खासकर मुस्लिम मुल्कों) को जानबूझकर जाहिल, हिंसक और रहस्यमय दिखाते हैं। फिल्म ‘तेहरान’ में भी ईरानी किरदारों को हमेशा अंधेरे कमरों में साजिश रचते हुए या गुस्से में दिखाया गया है, जबकि इज़रायली पक्ष को ‘मजलूूम’ और ‘इंसाफ पसंद’ पेश किया गया है। यह एक तरह का वैचारिक हमला है, जहाँ दर्शक को यह महसूस कराया जाता है कि एक पक्ष हमेशा ‘विलेन’ है। यह नजरिया भारत जैसे मुल्क के लिए खतरनाक है, क्योंकि हमारी अपनी तहजीब और ईरान के साथ हमारे रिश्ते सदियों पुराने हैं।

भारत और ईरान का रिश्ता सिर्फ तेल या गैस का नहीं है, बल्कि यह रूहानी और सांस्कृतिक है। हमारी भाषा, खान-पान, शायरी और वास्तुकला पर ईरानी संस्कृति की गहरी छाप है। फारसी कभी भारत की दरबारी भाषा हुआ करती थी। ऐसे में जब बॉलीवुड की फिल्में ईरान को सिर्फ एक ‘आतंकवादी मुल्क’ के तौर पर पेश करती हैं, तो वे हमारी अपनी साझी विरासत का अपमान करती हैं। 2012 के वक्त भारत सरकार का रवैया बहुत संभला हुआ था। तत्कालीन गृह मंत्री ने इसे आतंकी हमला तो कहा, लेकिन किसी भी देश का नाम नहीं लिया। इसकी बड़ी वजह भारत के अपने हित थे। उस वक्त ईरान भारत को तेल देने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश था। अगर भारत सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराता, तो हमारे यहाँ तेल की सप्लाई रुक सकती थी और अर्थव्यवस्था चरमरा जाती। साथ ही, चाबहार बंदरगाह के जरिए हम मध्य एशिया तक पहुँचने की तैयारी कर रहे थे। फिल्म का यह कहना कि भारत ने तेल के लालच में ‘इंसाफ’ से समझौता किया, बिल्कुल गलत है। हकीकत में इसे ‘राष्ट्रहित’ यानी अपने देश के लोगों के हितों की रक्षा करना कहा जाता है।

फिल्म में पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ्तारी का जिक्र भी बहुत ही एकतरफा है। काजमी को 2012 में इस आरोप में पकड़ा गया कि उन्होंने संदिग्धों की मदद की। लेकिन फिल्म यह नहीं बताती कि उन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई थी और उन्होंने हमेशा खुद को बेगुनाह कहा। काजमी ने दावा किया था कि उन्हें ‘बलि का बकरा’ बनाया गया और उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे। प्रेस टीवी जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने तो यहाँ तक कहा था कि यह गिरफ्तारी पूरी तरह ‘मोसाद’ के इशारे पर हुई थी ताकि ईरान को बदनाम किया जा सके। फिल्म ऐसे जरूरी पहलुओं को पूरी तरह गायब कर देती है, जो ईरान के पक्ष में जा सकते थे या जांच की खामियों को उजागर करते थे।

एक और गंभीर बात ‘इस्लामोफोबिया’ यानी एक खास समुदाय के प्रति डर पैदा करना है। फिल्म में जब फ़िलिस्तीन की आज़ादी की बात आती है, तो उसे सीधे तौर पर उग्रवाद से जोड़ दिया जाता है। यह भारत की उस पुरानी और गौरवशाली विदेश नीति के खिलाफ है जिसमें हमने हमेशा फ़िलिस्तीन के हक की आवाज उठाई है। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भी सार्वजनिक मंच से कहा था कि इज़राइल को अरब जमीनों पर अपना कब्जा खत्म करना होगा। आज जब गाज़ा में हज़ारों बेगुनाह लोग, अस्पताल और स्कूल तबाह किए जा रहे हैं, तब मुख्यधारा का सिनेमा खामोश रहता है, लेकिन ‘तेहरान’ जैसी फिल्में बनाकर ईरान की हर बात को ‘आतंक’ कहना असल में उस प्रोपेगेंडा का हिस्सा है जो सिर्फ एक पक्ष की कहानी सुनाता है।
यह फिल्म यह भी दिखाने की कोशिश करती है कि अगर राष्ट्रहित के लिए कानून तोड़ना पड़े या अपनी ही सरकार के खिलाफ जाकर विदेशी जासूसी एजेंसी से हाथ मिलाना पड़े, तो वह ‘बहादुरी’ है। यह एक खतरनाक संदेश है। क्या हम यह कहना चाहते हैं कि हमारी अपनी जांच एजेंसियां और हमारी विदेश नीति कमजोर है? भारत ने हमेशा दुनिया के दबाव के बिना अपनी आज़ाद सोच और नीति को कायम रखा है। हमने इज़राइल से भी दोस्ती रखी और ईरान से भी, क्योंकि हमारी कूटनीति किसी दूसरे देश की ‘डिक्टेशन’ पर नहीं चलती।

फिल्म ‘तेहरान’ तकनीकी तौर पर एक अच्छी फिल्म हो सकती है। कैमरा वर्क शानदार है, एक्शन तेज है और जॉन अब्राहम ने अपना किरदार बखूबी निभाया है। लेकिन एक सजग दर्शक और चिंतक के लिए यह जानना जरूरी है कि परदे पर जो ‘सत्य’ दिखाया जा रहा है, वह असल में एक ‘नैरेटिव’ है। यह ‘सॉफ्ट पावर’ का वह इस्तेमाल है जहाँ बंदूकों के बजाय कैमरों से जंग लड़ी जा रही है। इसका मकसद लोगों के दिमाग पर कब्जा करना है ताकि वे बिना सवाल किए एक खास मुल्क को अपना दुश्मन मान लें।

आजकल सिनेमा सिर्फ टाइमपास नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक राजनीति की बिसात का एक मोहरा बन गया है। जब फिल्मों में इतिहास को तोड़-मरोड़ कर दिखाया जाता है, तो नई पीढ़ी उसे ही सच मान लेती है।  हमें समझना होगा कि ‘तेहरान’ जैसी फिल्में असल में क्या छिपा रही हैं। क्या ये फिल्में भारत-ईरान के उन रिश्तों को कमजोर करना चाहती हैं जो सदियों से कायम हैं? या फिर ये हमें एक ऐसी वैश्विक लड़ाई का हिस्सा बनाना चाहती हैं जिसमें हमारा कोई लेना-देना नहीं है? यह कहना जरूरी है कि दर्शकों को फिल्म का मजा तो लेना चाहिए, लेकिन उसके पीछे छिपे इस दिमागी खेल को भी समझना चाहिए। हमारे देश की पहचान हमारी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ है। हमारे लिए जरूरी है कि हमारी सोच किसी विदेशी ‘स्क्रिप्ट’ से नहीं, बल्कि हमारे अपने देश के भले, हमारे साझी तहजीब और इंसानी हक के आधार पर तय हो। सिनेमा अगर सच दिखाने का दावा करता है, तो उसे सिक्के के दोनों पहलुओं को दिखाना चाहिए, न कि केवल उसे जो उसे किसी विदेशी एजेंसी की नजर से ‘सही’ लगता है।

लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।