लेखक – डॉ. उज़्मा खातून
(नोट: यह लेख मूलतः अंग्रेजी में “Hindu Persecution in Bangladesh: A Test of Islamic Principles” शीर्षक के साथ ‘Awaz The Voice’ वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुका है। यहाँ इस मूल लेख को वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप कुछ आवश्यक संशोधनों के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है।)
इस्लाम की शिक्षाएँ बराबरी और सामाजिक न्याय पर ज़ोर देती हैं। इस्लाम का मानना है कि अल्लाह की नज़र में सभी इंसान बराबर हैं, चाहे उनकी नस्ल, लिंग या सामाजिक हैसियत कुछ भी हो। यह सिद्धांत इस्लाम की बुनियाद है, जैसा कि कुरान और पैगंबर मोहम्मद (स.) के तौर-तरीकों से पता चलता है। उन्होंने हमेशा निष्पक्षता और सबको साथ लेकर चलने की बात कही। लेकिन बांग्लादेश के मौजूदा हालात इन आदर्शों के बिल्कुल विपरीत हैं। शेख हसीना सरकार गिरने के बाद शुरू हुए हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार, जैसे गिरफ्तारियां और चिन्मय कृष्ण दास जैसे धार्मिक गुरुओं के खिलाफ हिंसा, हाल ही में चट्टोग्राम में एक हिंदू युवक को पीट-पीटकर मारकर उसके शव को पेड़ पर लटका देना, ढाका और चट्टोग्राम में दर्जनों हिंदू मंदिरों पर पथराव व तोड़फोड़, दुकानों की लूटपाट और महिलाओं पर हमले, बराबरी के इस्लामी उसूलों से भटकाव है। कट्टरपंथी गुटों ने हिंदू समुदायों पर हमले तेज़ कर दिए हैं, जिससे डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है। ये काम इस्लाम के न्याय और रहम के मूल्यों के खिलाफ हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और भारत ने इन मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई है और बांग्लादेश से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का वादा निभाने को कहा है। यह संकट इस बात की याद दिलाता है कि इस्लाम की बराबरी और न्याय की शिक्षाओं को समाज में फिर से मज़बूत करने की ज़रूरत है।

पैगंबर मोहम्मद (स.) का गैर-मुस्लिमों के साथ बर्ताव हमेशा न्याय, सम्मान और हमदर्दी वाला रहा। उन्होंने ‘मदीना के चार्टर’ जैसे जो समझौते किए, वे शांति से साथ रहने के लिए थे। मक्का की जीत के समय उन्होंने अपने पुराने दुश्मनों को भी माफ कर दिया। उन्होंने नजारान के ईसाई समुदाय को धार्मिक आजादी और सुरक्षा दी। उनके ये काम दिखाते हैं कि अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ मिलकर रह सकते हैं। इस्लाम में न्याय भी इसी बराबरी पर ज़ोर देता है। यहाँ कानून सब पर बराबर लागू होता है। पैगंबर मोहम्मद (स.) ने खुद कहा था कि अगर मैंने किसी का हक मारा हो या किसी को चोट पहुँचाई हो, तो वह मुझसे बदला ले सकता है। खलीफा उमर (र.) ने भी अपनी गलती सुधारते हुए एक व्यक्ति को खुद से बदला लेने की इजाजत दी थी। यह दिखाता है कि इस्लाम में ताकतवर व्यक्ति की भी जवाबदेही तय है। यह बराबरी केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं थी। एक बार एक गैर-मुस्लिम ने चौथे खलीफा हज़रत अली (र.) के खिलाफ शिकायत की। सुनवाई के दौरान, अली (र.) ने कहा कि अदालत में दोनों को उनके नाम से पुकारा जाए, न कि पदवी से। शुरुआती इस्लामी समाज में बिना किसी भेदभाव के सबको एक जैसा समझना मुख्य मूल्य था।
कुरान भी सामाजिक समानता और भाईचारे को बढ़ावा देता है। कुरान बताता है कि अमीरी-गरीबी का फर्क इसलिए है ताकि लोग एक-दूसरे की ज़रूरतों को पूरा कर सकें। लेकिन इंसान की असली कीमत उसके अच्छे चरित्र और अल्लाह के प्रति उसकी निष्ठा से तय होती है, न कि उसकी दौलत से। कुरान याद दिलाता है कि ताकत और पैसा हमेशा रहने वाला नहीं है। सूरह अल-हुजुरात में कहा गया है, “अल्लाह की नज़र में तुममें सबसे इज़्ज़तदार वही है जो सबसे ज्यादा नेक और परहेजगार है।“ इस्लाम व्यक्तिगत संपत्ति की इजाजत देता है, लेकिन इसे अल्लाह की ‘अमानत’ माना गया है। इंसान इसका मालिक नहीं, बल्कि रखवाला है। संपत्ति का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए होना चाहिए। इस्लाम पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच का रास्ता अपनाता है, जहाँ व्यक्तिगत अधिकारों और समाज की ज़रूरतों में संतुलन हो।
पैगंबर मोहम्मद (स.) ने हमेशा गरीबों के कल्याण और सबके लिए बराबरी की वकालत की। कुरान कहता है कि धरती के संसाधन पूरी मानवता के लिए हैं। पैगंबर ने अपने आखिरी भाषण में साफ कहा था, “किसी अरब को गैर-अरब पर और किसी गोरे को काले पर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है, सिवाय उसके अच्छे चरित्र (तक़वा) के।“ इस्लाम में ‘ज़कात’ (अनिवार्य दान) और खैरात सामाजिक ज़िम्मेदारी के हिस्से हैं। पानी और चारागाह जैसे ज़रूरी साधन सबकी साझी संपत्ति माने जाते हैं। कुरान अमीरों को गरीबों की मदद के लिए प्रेरित करता है और समाज के पिछड़ों को सहारा देने को ही सच्ची नेकी बताता है।
निष्कर्ष यह है कि इस्लाम एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जहाँ सबको आगे बढ़ने के बराबर मौके मिलें और किसी के साथ भेदभाव न हो। बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा जैसे नवंबर-दिसंबर 2025 में सुनील जर्नलिस्ट की हत्या और सैकड़ों हिंदुओं के घरों पर आगजनी इन इस्लामी मूल्यों के खिलाफ है। कुरान ज़ुल्म का साथ देने से मना करता है। बांग्लादेश को इन उसूलों पर अमल करना चाहिए ताकि हर इंसान गरिमा और सम्मान के साथ जी सके।
डॉ. उज़्मा खातून – लेखिका अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व संकाय सदस्य, स्तंभकार और सामाजिक चिंतक हैं।